भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 465

गणपति-तत्त्व ४५५ कहना है कि पहले गणेशजी आर्योंके देवता नहीं थे। किंतु एतद्देशीय अनार्योंको पराजित करनेपर उनके सान्त्वनार्थ गणेशको आर्योंने अपने देवताओंमें मिला लिया है। इस ढंगके विद्वान् कुछ पुराण, कुछ वेदमन्त्र, कुछ चौपाइयोंका संग्रहकर अपनी अनभिज्ञताका परिचय देते हुए ऐसे गणपतिस्वरूपका वर्णन करते हैं कि जिससे शास्त्रीय गणपति-स्वरूप समाच्छन्न हो जाता है। यद्यपि थोड़ा-सा भी तत्त्वज्ञान रखनेवाले पुरुषके लिये ऐसे असम्बद्धप्रलाप हेय ही हैं तथापि मूर्खोंको तो उनसे व्यामोह होना स्वाभाविक ही है। कोई इन महानुभावोंसे पूछे कि गणेश नामका कोई तत्त्व है, यह आपने कैसे जाना? पुराणादि शास्त्रोंद्वारा या यत्र-तत्र गणपतिकी मूर्तियोंको देखकर? यदि शास्त्रोंसे ही गणेश-तत्त्व समझा जाय, तो फिर गणेशको अनार्योंके देव कैसे कहा जाय; क्योंकि शास्त्रोंसे तो वे ब्रह्मादिके पूज्य पाये जाते हैं। रही दूसरी बात मूर्तियोंको देखकर जाननेकी तो फिर प्रश्न होगा कि 'ये मूर्तियाँ किस आधारपर बनीं?' वे तो शास्त्रोक्त ध्यानानुकूल ही बनी हैं। यदि इसे उचित न मानें तो गणपतिको देवता या पूज्य समझना केवल मूर्खता ही है। कारण यह है कि केवल काष्ठमृत्पाषाणादिको कौन अभिज्ञजन पूज्य समझेगा? यदि कहा जाय कि अदृश्य शक्तिविशेषका उस मूर्तिमें आवाहनकर उसका पूजन किया गया है, तो भी वह विशिष्ट देवशक्ति किस प्रमाणसे पहचानी या आहूत की गयी है? इसके उत्तरमें यदि यह कहा जाय कि यह बात शास्त्रोंसे ही जानी गयी तो फिर शास्त्रोंने तो गणेश-तत्त्वको अनादि ईश्वर कहा ही है। अतः वे अनार्योंके देवता कैसे हुए? एक दूसरी विलक्षण बात यह है कि शास्त्रोंके ही आधारपर गणेशको अनार्याभिमत देव समझना और आर्योंका कहीं बाहरसे यहाँ आना, भारतवर्षमें प्राथमिक अनार्योंका निवास और अनार्योंके देवता गणेशका आर्योंद्वारा ग्रहण! भला, ऐसी बेसिर-पैरकी बातें अनार्य शिष्योंके सिवा और किसको सूझ सकती हैं? भला, कोई भी सहृदय पुरुष वेद-पुराणादि शास्त्रोंको मानता हुआ भी क्या गणेशका अनार्यदेवत्व स्वीकार कर सकता है? वस्तुतः यह सब दूषित संस्कारों एवं आचार-शून्य मनमाने शास्त्रोंके पुस्तकीय ज्ञानका ही कुफल है। इसीलिये वे ज्ञानलवदुर्विदग्ध अनभिज्ञोंसे भी शोचनीय समझे जाते हैं। इसी कारणसे अपने यहाँ किसी भी सच्छास्त्रके अध्ययनका यही नियम है कि आचार्य-परम्परासे शास्त्रीय गूढ़ रहस्योंको समझना चाहिये और परस्परविरोधी प्रतीत होनेवाले वाक्योंका समन्वय करना चाहिये। ऐसा न होनेसे ही श्रीगणपतिकी भिन्न-भिन्न लीलाएँ प्राणियोंको मोहित करनेवाली होती हैं। जैसे उनका नित्यत्व, पार्वती-पुत्रत्व, शनिके दृष्टिपातसे शिरश्छेद और गजवदनका सन्धान आदि। ये सब बातें केवल गणपतिके ही विषयमें नहीं, अपितु श्रीरामचन्द्र आदिके विषयमें भी हैं। जैसे अजत्व और जायमानत्व, नित्यमुक्तत्व और सीता- विरहमें रोदनादि। इसीलिये गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीने कहा है— राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे॥ वस्तुतः जिन्होंने भगवान्‌की अघटनघटनापटीयसी मायाका महत्त्व नहीं समझा, उन्हें अचिन्त्यमहामहिम वैभवशाली भगवान्‌की निर्गुण तथा सगुण लीलाओंका ज्ञान कैसे हो? 'अन्तरजायमानो बहुधा वि जायते।' (यजु० ३१।१९) 'मत्स्थानि सर्वभूतानि' (गीता ९।४) 'न च मत्स्थानि भूतानि' (गीता ९।५) —इत्यादिका अभिप्राय कैसे विदित हो? सगुण लीला तो निर्गुणकी अपेक्षा भी भावुकोंकी दृष्टिमें दुरवगाह्य है— निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥ (रा०च०मा० ७।७३ (ख))