भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
गणपति-तत्त्व ४५५ कहना है कि पहले गणेशजी आर्योंके देवता नहीं थे। किंतु एतद्देशीय अनार्योंको पराजित करनेपर उनके सान्त्वनार्थ गणेशको आर्योंने अपने देवताओंमें मिला लिया है। इस ढंगके विद्वान् कुछ पुराण, कुछ वेदमन्त्र, कुछ चौपाइयोंका संग्रहकर अपनी अनभिज्ञताका परिचय देते हुए ऐसे गणपतिस्वरूपका वर्णन करते हैं कि जिससे शास्त्रीय गणपति-स्वरूप समाच्छन्न हो जाता है। यद्यपि थोड़ा-सा भी तत्त्वज्ञान रखनेवाले पुरुषके लिये ऐसे असम्बद्धप्रलाप हेय ही हैं तथापि मूर्खोंको तो उनसे व्यामोह होना स्वाभाविक ही है। कोई इन महानुभावोंसे पूछे कि गणेश नामका कोई तत्त्व है, यह आपने कैसे जाना? पुराणादि शास्त्रोंद्वारा या यत्र-तत्र गणपतिकी मूर्तियोंको देखकर? यदि शास्त्रोंसे ही गणेश-तत्त्व समझा जाय, तो फिर गणेशको अनार्योंके देव कैसे कहा जाय; क्योंकि शास्त्रोंसे तो वे ब्रह्मादिके पूज्य पाये जाते हैं। रही दूसरी बात मूर्तियोंको देखकर जाननेकी तो फिर प्रश्न होगा कि 'ये मूर्तियाँ किस आधारपर बनीं?' वे तो शास्त्रोक्त ध्यानानुकूल ही बनी हैं। यदि इसे उचित न मानें तो गणपतिको देवता या पूज्य समझना केवल मूर्खता ही है। कारण यह है कि केवल काष्ठमृत्पाषाणादिको कौन अभिज्ञजन पूज्य समझेगा? यदि कहा जाय कि अदृश्य शक्तिविशेषका उस मूर्तिमें आवाहनकर उसका पूजन किया गया है, तो भी वह विशिष्ट देवशक्ति किस प्रमाणसे पहचानी या आहूत की गयी है? इसके उत्तरमें यदि यह कहा जाय कि यह बात शास्त्रोंसे ही जानी गयी तो फिर शास्त्रोंने तो गणेश-तत्त्वको अनादि ईश्वर कहा ही है। अतः वे अनार्योंके देवता कैसे हुए? एक दूसरी विलक्षण बात यह है कि शास्त्रोंके ही आधारपर गणेशको अनार्याभिमत देव समझना और आर्योंका कहीं बाहरसे यहाँ आना, भारतवर्षमें प्राथमिक अनार्योंका निवास और अनार्योंके देवता गणेशका आर्योंद्वारा ग्रहण! भला, ऐसी बेसिर-पैरकी बातें अनार्य शिष्योंके सिवा और किसको सूझ सकती हैं? भला, कोई भी सहृदय पुरुष वेद-पुराणादि शास्त्रोंको मानता हुआ भी क्या गणेशका अनार्यदेवत्व स्वीकार कर सकता है? वस्तुतः यह सब दूषित संस्कारों एवं आचार-शून्य मनमाने शास्त्रोंके पुस्तकीय ज्ञानका ही कुफल है। इसीलिये वे ज्ञानलवदुर्विदग्ध अनभिज्ञोंसे भी शोचनीय समझे जाते हैं। इसी कारणसे अपने यहाँ किसी भी सच्छास्त्रके अध्ययनका यही नियम है कि आचार्य-परम्परासे शास्त्रीय गूढ़ रहस्योंको समझना चाहिये और परस्परविरोधी प्रतीत होनेवाले वाक्योंका समन्वय करना चाहिये। ऐसा न होनेसे ही श्रीगणपतिकी भिन्न-भिन्न लीलाएँ प्राणियोंको मोहित करनेवाली होती हैं। जैसे उनका नित्यत्व, पार्वती-पुत्रत्व, शनिके दृष्टिपातसे शिरश्छेद और गजवदनका सन्धान आदि। ये सब बातें केवल गणपतिके ही विषयमें नहीं, अपितु श्रीरामचन्द्र आदिके विषयमें भी हैं। जैसे अजत्व और जायमानत्व, नित्यमुक्तत्व और सीता- विरहमें रोदनादि। इसीलिये गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीने कहा है— राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे॥ वस्तुतः जिन्होंने भगवान्की अघटनघटनापटीयसी मायाका महत्त्व नहीं समझा, उन्हें अचिन्त्यमहामहिम वैभवशाली भगवान्की निर्गुण तथा सगुण लीलाओंका ज्ञान कैसे हो? 'अन्तरजायमानो बहुधा वि जायते।' (यजु० ३१।१९) 'मत्स्थानि सर्वभूतानि' (गीता ९।४) 'न च मत्स्थानि भूतानि' (गीता ९।५) —इत्यादिका अभिप्राय कैसे विदित हो? सगुण लीला तो निर्गुणकी अपेक्षा भी भावुकोंकी दृष्टिमें दुरवगाह्य है— निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥ (रा०च०मा० ७।७३ (ख))
४५६ भक्तिसुधा इसलिये गोस्वामीजीने कहा है कि अनादि देवता समझकर गणेशादिके रूपभेद, शिवपूज्यता आदि अंशोंमें संशय न करें—'कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥' फिर जब बड़े-से- बड़े तार्किकोंका तर्क भौतिक भावोंमें ही कुण्ठित हो जाता है, तब व्याप्ति या हेतु तथा हेत्वाभासके ज्ञानसे शून्य आधुनिक विद्वानोंको देवता या ईश्वरके विषयमें तर्क करनेका क्या अधिकार है? वे महानुभाव यदि तर्कके स्वरूपका भी ठीक-ठीक निरूपण कर सकें, तो उन्हें यह पता लग सकेगा कि धर्म तथा देवतापर तर्क कुछ काम कर सकता है या नहीं? भला यदि इनसे कोई पूछे कि यह आपने कैसे अनुमान किया कि गणेश अनार्योंके देवता हैं और आदि भारतवासी अनार्य ही हैं? क्या कोई अव्यभिचरित-हेतु इसका आपके पास है? तो ये लोग सिवा अटकलपच्चू कल्पित मिथ्या इतिहासके और क्या बतला सकते हैं? परंतु यदि इनके भ्रमपूर्ण निराधार आधुनिक इतिहास मान्य हैं तो प्राचीन आध्यात्मिक गम्भीर भावपूर्ण हमारे इतिहास क्यों मान्य नहीं? अस्तु, आस्तिकोंको पूर्वोक्त प्रमाणोंसे निर्धारित गणपति-तत्त्वका श्रद्धासहित समस्त कर्मोंमें आराधन अवश्य करना चाहिये। पारलौकिक तत्त्व-निर्धारणमें एकमात्र शास्त्र ही आदरणीय है। इसीलिये भगवान्ने गीता (१६।२४)-में कहा है— तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ भगवान् सूर्य—हमारे प्रत्यक्ष देवता सभी प्राणियोंको जन्मसे ही भगवान् सूर्यके दर्शन होते हैं। ये सर्वप्रसिद्ध देवता हैं। अन्य किसी देवताकी स्थितिमें कुछ सन्देह भी हो सकता है, किंतु भगवान् सूर्यकी सत्तामें किसीको सन्देहके लिये कोई अवसर ही नहीं है। सभी लोग इनका प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) प्राप्त करते हैं। 'सृ गतौ' अथवा 'षू प्रेरणे' से क्यप् प्रत्यय होनेपर 'सूर्य' शब्द निष्पन्न होता है। 'सरति आकाशे— इति सूर्यः'—जो आकाशमें निराधार भ्रमण करता है अथवा 'सुवति कर्मणि लोकं प्रेरयति'—जो (उदयमात्रसे) अखिल विश्वको अपने-अपने कर्ममें प्रवृत्त कराता है, वह सूर्य है। व्याकरण-शास्त्रमें इसी अर्थमें—'राजसूयसूर्यमृषोद्यरुच्यकुप्यकृष्टपच्या- व्यथ्याः' (पा० सू० ३।१।११४) इस पाणिनि- सूत्रसे निपातन होकर भी सूर्य शब्द बनता है। अखिल विश्वमें प्रकाश देनेवाला, अनन्त तेजका भण्डार-मण्डल ही सूर्य शब्दका वाच्यार्थ है और इसका लक्ष्यार्थ है—मण्डलाभिमानी पुरुष—चेतन- आत्मा तथा उसका अन्तर्यामी। ऋग्वेदसंहिता कहती है— 'सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च' (१।११५।१) अर्थात्—'भगवान् सूर्य सभी स्थावर-जंगमात्मक विश्वके अन्तरात्मा हैं।' 'कालात्मा पुरुष भी सूर्य ही हैं।' ऋग्वेदसंहिताका वचन है— सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्र- मेको अश्वो वहति सप्तनामा। त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधि तस्थुः ॥ (१।१६४।२) अर्थात् इस कालात्मा पुरुषका रथ बहुत ही विलक्षण है। रंहणस्वभाव (गमनशील) होनेके कारण उसे रथ कहा जाता है। वह अनवरत (सतत) गमन किया करता है। उस रथमें संवत्सरात्मा एक ही चक्र है। अहोरात्रके निर्वाहके लिये (अहोरात्रके स्वरूप- निर्माणके लिये) उसमें सात अश्व जोड़े जाते हैं— 'रथस्यैकं चक्रं भुजगयमिताः सप्त तुरगाः।' ये सात अश्व ही सात दिन हैं। वस्तुतः अश्व एक ही
भगवान् सूर्य—हमारे प्रत्यक्ष देवता ४५७ है, किंतु सात नाम होनेके कारण सात अश्व कहे जाते हैं। उस एक चक्रमें ही (भूत, भविष्य और वर्तमान) ये तीन नाभियाँ हैं। वह रथ अजर-अमर (जरा- मरणसे रहित) अर्थात् अविनाशी है एवं अनर्व अर्थात् अत्यन्त दृढ़ है अर्थात् कभी शिथिल नहीं होता। इसी कालात्मा पुरुषके सहारे पिण्डज, अण्डज, स्थावर, ऊष्मज सभी प्रकारके प्राणी टिके हुए हैं। ऐसे रथपर स्थित इन भुवनभास्करको देखकर (समझकर) मनुष्य पुनर्जन्म नहीं पाता—मुक्त हो जाता है— 'रथस्थं भास्करं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते।' शतपथब्राह्मणमें भगवान् सूर्यको त्रयीमय कहा गया है—'यदेतन्मण्डलं तपति तन्महदुक्थं ता ऋचः स ऋचां लोकोऽथ यदेतदर्चिर्दीप्यते तन्महाव्रतं तानि सामानि स साम्नां लोकोऽथ य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः सोऽग्निस्तानि यजूंषि स यजुषां लोकः ॥' (१०।५।२।१) इस श्रुतिमें भगवान् सूर्यके दिव्य गृहस्थानीय मण्डलकी स्तुति की गयी है। मण्डलकी स्तुतिसे मण्डलाभिमानी पुरुष और उसकी स्तुतिसे अन्तर्यामीकी स्तुति स्वभावतः सिद्ध है। यह जो सर्वप्राणिनेत्रगोचर आकाशका भूषण वर्तुलाकार मण्डल है, वह महदुक्थ (बृहती सहस्र नामसे प्रसिद्ध होत्रमें शस्त्रविशेष) है तथा वही ऋक् है। जो इस मण्डलमें अर्चि (सर्वजगत्- प्रकाशक तेज) है, वह 'महाव्रत' नामक क्रतु (यज्ञकर्म) विशेष है और बृहत्-रथन्तर आदि साम भी वही है तथा जो मण्डलाभिमानी पुरुष है, वह अग्नि (अर्थात् अग्न्युपलक्षित सर्वदेव) है तथा यजुष् भी वही पुरुष है। अपने तेजसे तीनों लोकोंको पूरित करनेके कारण वह पुरुष है—'आ प्रा द्यावा पृथिवी अन्तरिक्षम्' अथवा सभी प्राणियोंके शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण वह पुरुष है—'सर्वासु पूर्षु शेषे' (श० ब्रा० १४।२।५।१८) अथवा सभी पापोंको भस्म कर देनेके कारण वह पुरुष है—'सर्वान् पाप्मन औषत्त- स्मात्पुरुषः' (श० ब्रा० १४।१।२।२)। छान्दोग्य- उपनिषद्में इस पुरुषका वर्णन किया गया है— 'य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ।... स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद (छा० उ० १।६।६- ७)। श्रुति भी आदित्यरूपमें इसी अन्तर्यामी पुरुषका वर्णन कर रही है। 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' (ब्र० सू० १।१।२०)—इस ब्रह्मसूत्रमें भी यह निर्णय किया गया है कि इस छान्दोग्यश्रुतिमें प्रतिपादित पुरुष अन्तर्यामी है। इस प्रकार भगवान् सूर्य सर्वदेवमय हैं—'तस्मा- त्परमेश्वर एवेहोपदिश्यते इत्यादि' (शांकरभाष्य) गायत्री-उपासना सर्वदेवमय आदित्यकी उपासना है श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणके युद्धकाण्डमें आदित्य- हृदयस्तोत्रके द्वारा इन्हीं भगवान् सूर्यकी स्तुति की गयी है। उसमें कहा गया है कि ये ही भगवान् सूर्य ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द और प्रजापति हैं। महेन्द्र, कुबेर, वरुण, काल, यम, सोम आदि भी ये ही हैं— एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः। महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपाम्पतिः ॥ आपत्तिके समयमें, भयंकर विषम परिस्थितिमें, जनशून्य अरण्यमें, अत्यन्त भयदायी घोर समयमें अथवा महासमुद्रमें इनका स्मरण, कीर्तन और स्तुति करनेसे प्राणी सभी विपत्तियोंसे छुटकारा पा जाता है— एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च। कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥ तीनों सन्ध्याओंमें गायत्री-मन्त्रद्वारा इन्हींकी उपासना की जाती है। इनकी अर्चनासे सबकी मनःकामनाएँ पूर्ण होती हैं। भगवान् श्रीरामने युद्धक्षेत्रमें इनकी आराधना करके रावणपर विजय प्राप्त की थी। इनका स्तोत्र 'आदित्यहृदय' वरदानी है, अमोघ है। उसके द्वारा इनकी स्तुति करनेसे सभी आपदाओंसे छुटकारा पाकर प्राणी अन्तमें परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है।
४५८ भक्तिसुधा श्रीशिव-तत्त्व भगवान् शिव—समस्त प्राणियोंके विश्रामस्थान शिव वही तत्त्व है, जो समस्त प्राणियोंके विश्रामका स्थान है। 'शीङ् स्वप्ने' धातुसे 'शिव' शब्दकी सिद्धि है। 'शेरते प्राणिनो यत्र स शिवः'— अनन्त पाप-तापोंसे उद्विग्न होकर विश्रामके लिये प्राणी जहाँ शयन करें, बस उसी सर्वाधिष्ठान, सर्वाश्रयको शिव कहा जाता है। वैसे तो— 'शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥' (माण्डूक्योपनिषद् ७) —इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—तीनों अवस्थासे रहित, सर्वदृश्यविवर्जित, स्वप्रकाश, सच्चिदानन्दघन परब्रह्म ही शिवतत्त्व है, फिर भी वही परमतत्त्व अपनी दिव्य शक्तियोंसे युक्त होकर अनन्त ब्रह्माण्डोंका उत्पादन, पालन एवं संहार करते हुए ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि संज्ञाओंको धारण करते हैं। यद्यपि कहीं ब्रह्मा जीव भी कहा जाता है, 'सोऽबिभेत् एकाकी न रेमे जाया मे स्यादथ कर्म कुर्वीय' इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार भय, अरमण आदिसे युक्त होनेसे हिरण्यगर्भ एवं विराट्को जीव ही कहा गया है तथापि वह एक-एक ब्रह्माण्डके उत्पादक मुख्य ब्रह्मादिके साथ तादात्म्याभिमानी जीव ब्रह्मा कहा जाता है। वास्तवमें तो जैसे किसान ही क्षेत्रमें बीजको बोकर अंकुरादिरूपमें उत्पादक होता है, वही सिंचनादिद्वारा पालक और अन्तमें वही काटनेवाला होता है, वैसे ही एक ही अनन्त- अचिन्त्य-शक्तिसम्पन्न भगवान् विश्वके उत्पादक, पालक और संहारक होते हैं। सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥ (गीता १४।४) भगवान्का कहना है कि समस्त भूतोंमें जितनी भी मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन सबकी महद् ब्रह्म (प्रकृति) योनि (माता) है और बीज प्रदान करनेवाला पिता मैं हूँ। 'पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः' (गीता ९।१७)—मैं ही समस्त जगत्का पिता—उत्पादक हूँ। मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥ (गीता १४।३) अर्थात् प्रकृतिरूप योनिमें जब मैं गर्भाधान करता हूँ, तब उससे समस्त विश्वकी उत्पत्ति होती है। इस तरह ब्रह्माण्डोत्पादक ब्रह्मा भी परमेश्वर ही है, अतएव— 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।' (तैत्तिरीयोपनिषद् ३।१) विश्वका उत्पादक, पालक, संहारक— एक या अनेक ? इस श्रुतिसे जो ब्रह्मका लक्षण कहा गया है, उससे विश्वके उत्पादक, पालक एवं संहारकको परमेश्वर समझना चाहिये। यदि यह तीनों पृथक्- पृथक् हों, तब तो कोई भी परमेश्वर नहीं सिद्ध हो सकेगा; क्योंकि निरतिशय ऐश्वर्य और सार्वज्ञ-गुण- सम्पन्नको परमेश्वर कहा जाता है। यदि ये तीनों ही सर्वशक्तिसम्पन्न परमेश्वर हैं तो यह प्रश्न होगा कि ये तीनों मिलकर सलाहसे कार्य करते हैं या स्वतन्त्रतासे अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार ? यदि सलाहसे ही करते हैं यह माना जाय, तब तो इनमें परमेश्वर कोई भी न हुआ। किंतु इन तीनोंकी पर्षद् या पंचायत ही परमेश्वर है; क्योंकि अकेले कोई भी कार्य करनेमें स्वतन्त्र नहीं है। यदि तीनोंकी इच्छा समान ही होती है और तीनोंके इच्छानुसार ही उनकी शक्तियाँ कार्यमें प्रवृत्त होती हैं, तब भी तीनका मानना ही व्यर्थ है। फिर तो एकसे भी वह सब कार्य सम्पन्न हो ही सकता है। यदि द्वितीय पक्ष स्वीकार किया जाय
श्रीशिव-तत्त्व ४५९ अर्थात् स्वतन्त्रतासे भी तीनों कार्य कर सकते हैं, तब भी इनमें कोई भी परमेश्वर नहीं सिद्ध होगा; क्योंकि स्वतन्त्रतासे यदि इच्छा उत्पन्न होगी तो सम्भव है कि जिस समय एकको जगत्पालनकी रुचि हुई, उसी समय दूसरेको संहारकी रुचि उत्पन्न हो। अब यहाँ जिसकी इच्छा सफल होगी, उसीका निरंकुश ऐश्वर्य समझा जायगा। जिसका मनोरथ भग्न हुआ, उसकी ईश्वरता औपचारिक ही रहेगी। एक विषयमें विरुद्ध दो प्रकारकी इच्छाओंका सफल होना असम्भव ही है। इस तरह अनेक ईश्वरका होना किसीके भी मतमें कथमपि सम्भव नहीं, अतः एकेश्वरवाद ही सबको मानना पड़ता है। इसीलिये महानुभावोंने एकहीमें अवस्थाभेदसे उत्पादकत्व, पालकत्व और संहारकत्व माना है। निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्चभूतानि। स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः॥ (भामती १।२) एक तत्त्वका अनेक नाम-रूपोंमें परिणमन भगवान्के निःश्वाससे ही वेदोंका प्रादुर्भाव हो जाता है। वीक्षण (देखने)-से आकाशादि अपंचीकृत पंच महाभूतकी सृष्टि होती है। स्मित (मन्दहास, मुसकराहट)-से भौतिक अनन्त ब्रह्माण्ड बन जाते हैं और सुप्तिसे ही निखिल ब्रह्माण्डका प्रलय हो जाता है। इस दृष्टिसे एक ब्रह्माण्डके उत्पादक, पालक, संहारक ब्रह्मा, विष्णु, शिवके अतिरिक्त निखिल ब्रह्माण्डोंके उत्पादक, पालक, संहारक ब्रह्मा, विष्णु और शिवमें किंचिन्मात्र भी भेद नहीं है। जैसे एक ही गगनस्थ सूर्य अनन्त घटोदकों और तड़ागोदकोंमें प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही एक ही अखण्ड, अनन्त, निर्विकार चिदानन्द परमात्मतत्त्व अनन्त अन्तःकरणों और मायाभेदोंमें प्रतिबिम्बित होते हैं। अन्तःकरणगत प्रतिबिम्ब ही जीव कहलाते हैं। मायागत प्रतिबिम्ब ही ईश्वर कहलाते हैं। जैसे अन्तःकरणके स्वच्छत्वादि- तारतम्यसे जीवोंमें काल्पनिक भेद होता है, वैसे ही मायाकी उत्पादकत्व, पालकत्व, संहारकत्व शक्तिके भेदसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रमें काल्पनिक भेद होता है। अनन्त ब्रह्माण्डकी कल्पनामें अनन्त ब्रह्माण्डकी उत्पादिनी शक्तियाँ भी अनन्त हैं। उन एक-एक शक्तियों, अनन्त अन्तःकरण और उत्पादकत्व, पालकत्व, संहारकत्व शक्तिसे युक्त माया है। इस तरह एक-एक शक्तिसे ब्रह्माण्ड और उसके अन्तर्गत अनन्त जीव एवं उत्पादक, पालक, संहारक ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र व्यक्त होते हैं। परंतु इन सभी प्रतिबिम्बोंका मूलभूत जो बिम्ब है, वह तो सर्वथा एक ही है। वही विष्णुभक्तोंको विष्णुरूपसे, रामभक्तोंको रामरूपसे, शिवभक्तोंको शिव- स्वरूपसे दृष्टिगोचर होता है। जैसे एक ही गगनस्थ सूर्य नीले चश्मेसे नीला, पीलेसे पीला दिखलायी देता है, वैसे ही विष्णुभावनासे भावित अन्तःकरण विष्णुभक्त उसी परमतत्त्वको विष्णु कहते हैं, शिवभावनासे भावितमनस्क उसी परमतत्त्वको शिव कहते हैं और वही श्रीकृष्ण, श्रीराम आदि रूपमें उपलब्ध होता है। वही गगनस्थ सूर्यस्थानीय परमतत्त्व 'शिव-स्कन्दादि' पुराणका शिव है, वही 'विष्णुपुराण', 'रामायण', 'भागवत' आदि सद्ग्रन्थोंमें विष्णु, राम, कृष्णरूपसे गाया गया है। भक्तके भावनानुसार ही उस परमतत्त्वकी ही विशुद्ध सत्त्वमयी दिव्य शक्तिके योगसे मधुर मनोहर मूर्ति भी व्यक्त होती है। इस तरह मूलतः शिव एवं विष्णु एक ही हैं, फिर भी उनके अपर रूपमें सत्त्वके योगसे विष्णुको सात्त्विक और तमस्के योगसे रुद्रको तामस कहा जाता है। वस्तुतः सत्त्वनियन्ता विष्णु और तमनियन्ता रुद्र हैं। तमस् ही मृत्यु है, काल है, अतः उसके नियन्ता महामृत्युंजय महाकालेश्वर भगवान् रुद्र हैं। दूसरी दृष्टिसे भी जैसे तमःप्रधान सुषुप्तिसे ही जागर-स्वप्नकी सृष्टि होती है, वैसे ही तमःप्रधान प्रलयावस्थासे ही सर्वप्रपंचकी सृष्टि होती है। श्रीकृष्णके अनन्य प्रेमी भक्तगण तमस्को बहुत ऊँचा किंवा सबसे उत्कृष्ट मानते हैं। प्रेममयी आसक्ति मोह, मूर्च्छा, सात्त्विक विवेक, प्रकाशसे कहीं अधिक महत्त्वकी होती है। वास्तवमें किसी भी कार्यमें अवष्टम्भ (रुकावट), प्रकाश और प्रवृत्ति
४६० भक्तिसुधा (हलचल)-की अपेक्षा होती है। तीनोंमेंसे एकके बिना भी कार्य नहीं होता। प्राकृत या अप्राकृत दिव्य- से-दिव्य कार्योंमें भी अवष्टम्भकी अपेक्षा होती है, वही दिव्य अवष्टम्भ तम है। इसी तामस एवं तामस भावनाका अत्यन्त महत्त्व माना जाता है। श्रीभागवतका तामसफल (रासलीला)-प्रकरण सर्वापेक्षया अपना अधिक महत्त्व रखता है। वैसे भी विश्रामके लिये तामस सुषुप्तिकी ऐसी महिमा है कि इन्द्रादि दिव्य भोग-सामग्री-सम्पन्न होकर भी उसे छोड़कर सुषुप्ति चाहते हैं। चिन्तन, मनन सात्त्विक होनेपर भी सुषुप्तिका प्रतिबन्धक होनेसे उद्वेजक समझा जाता है। जब जाग्रदादि अवस्थामें द्वैत-दर्शनसे जीव उद्विग्न हो उठता है, तब उसे विश्रामके लिये सुषुप्तिका आश्रयण अनिवार्य हो जाता है। वैसे ही जब सृष्टिकालके उपद्रवोंसे जीव व्याकुल हो जाता है, तब उसकी दीर्घ सुषुप्तिमें विश्रामके लिये भगवान् सर्वसंहार करके प्रलयावस्था व्यक्त करते हैं। संहारमें भी भगवत्कृपा यह संहार भी भगवान्की कृपा ही है, जैसे दुश्चिकित्स्य व्रणसे व्याकुलको देखकर चिकित्सक करुणासे ही व्रण-छेदनके लिये तीक्ष्ण शस्त्रको ग्रहण करता है, वैसे ही दुर्निवार्य पाप-तापके बढ़ जानेपर करुणासे ही भगवान् विश्वका संहार करते हैं— जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाईं। मातु चिराव कठिन की नाईं॥ (रा०च०मा० ७।७४।८) कार्यावस्थासे कारणावस्थाका महत्त्व स्पष्ट ही है। तमः प्रधानावस्था है, उसीसे उत्पादनावस्था और पालनावस्था व्यक्त होती है। अन्तमें फिर भी सबको प्रलयावस्थामें जाना पड़ता है— 'भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।' (गीता ८।१९) अर्थात् यह समस्त भूतग्राम अनन्त कालसे उत्पन्न हो-होकर पुनः-पुनः प्रलयावस्थाको प्राप्त होता है। कारणसे ही सबकी उत्पत्ति और उसीमें पालन और पुनः उसीमें सबका संहार होता है। निःस्तब्ध समुद्रसे ही तरंगकी उत्पत्ति, उसीमें उसका पालन, अन्तमें फिर उसीमें संहार भी होता है। उत्पादनावस्थाके नियामक ब्रह्मा, पालनावस्थाके नियामक विष्णु और संहारावस्था एवं कारणावस्थाके नियामक शिव हैं। पहले भी कारणावस्था रहती है, अन्तमें भी वही रहती है। इस तरह प्रारम्भमें भी शिव और अन्तमें भी शिव ही तत्त्व अवशिष्ट रहता है— अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥ तत्त्वज्ञ लोग उसीमें आत्मभाव करते हैं, जो चराचर प्रपंचकी उत्पत्तिके पहले होता है, उसकी महिमा और वीर्यवत्ता प्रसिद्ध ही है। अतः वही मुख्य निरुपचरित ईश्वर या महेश्वर होता है। शिव सर्वाराध्य परम दैवत हैं शिवजी ही केवल ईश्वर शब्दसे कहे जाते हैं— 'ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानाम्।' 'महेश्वरस्त्र्यम्बक एव नापरः।' 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।' अर्थात् ईशान ही सर्व विद्याओं एवं भूतोंके ईश्वर हैं, वे ही महेश्वर हैं, वे ही सर्व प्राणियोंके हृदयमें रहते हैं। हृदयमें ही सुषुप्ति होती है, वहीं कारणावस्थाके अधिपतिका होना युक्त भी है। कहीं उपनिषदोंमें एकादश प्राणोंको 'रुद्र' कहा गया है। वे निकलनेपर प्राणियोंको रुलाते हैं, इसलिये रुद्र कहे जाते हैं। अतः दस इन्द्रियाँ और मन ही एकादश रुद्र हैं। परंतु ये आध्यात्मिक रुद्र हैं। आधिदैविक एवं सर्वोपाधिविनिर्मुक्त रुद्र इनसे पृथक् हैं। जैसे विष्णु (उपेन्द्र) पाद (पाँव)-के अधिष्ठाता हैं, वैसे ही रुद्र अहंकारके अधिष्ठाता हैं। 'एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे।' अर्थात् एक रुद्र ही तत्त्व था, द्वित्वसंख्यापूर्त्यर्थ कोई दूसरा तत्त्व ही न था। इन श्रुतियोंसे प्रोक्त रुद्र तो महाकारण या कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्म ही है। यह भी 'रोदनात् रुद्र' है, प्रलयकालमें सबको रुलानेवाले ये ही हैं।
श्रीशिव-तत्त्व ४६१ यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः। समान महाभयानक है। उसीके भयसे सूर्य, चन्द्र, मृत्यर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ अग्नि, वायु, इन्द्र नियमसे अपने-अपने काममें लगे (कठोपनिषद् १।२।२५) हैं। उसीके भयसे मृत्यु भी दौड़ रही है— अर्थात् ब्रह्मक्षत्रोपलक्षित समस्त प्रपंच जिसका भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। ओदन (भात) है, मृत्यु जिसका उपसेचन (दूध, दही, भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ दाल या कढ़ी) है, उसे कौन, कैसे, कहाँ जाने? जैसे (तैत्तिरीयोपनिषद् २।८।१) प्राणी कढ़ी, भात मिलाकर खा लेता है, बस यही प्रचण्ड कोपरूप भी है, कोपका कार्य मृत्यु विश्वसंहारक काल और समस्त प्रपंचको मिलाकर है। फिर जो मृत्युका भी मृत्यु है, उसकी कोपरूपतामें खानेवाला परमात्मा मृत्युका भी मृत्यु है, अतः क्या सन्देह है? सर्वसंहारक प्रचण्ड उग्र शासक महामृत्युंजय है, कालका भी काल है, अतः काल- परमात्मा ही ईश्वर, ईशान, भीम, उग्र, रुद्र, चण्ड एवं काल या महाकालेश्वर है। यदि कोई भी बच जाय, चण्डिका आदि शब्दोंसे व्यवहृत होता है। तब तो उसकी सर्वसंहारकतामें बाधा उपस्थित होती वेदान्तकी दृष्टिसे अज्ञानी लोग सर्वविधभेदशून्य, है, अतएव 'योऽवशिष्येत' वही एक ब्रह्म है। स्वप्रकाश, अद्वैत ब्रह्मसे डरते हैं— इसीलिये विष्णु भी वही है, यदि वे शिव या रुद्रसे 'योगिनो बिभ्यति ह्यस्माद्भये भयदर्शिनः।' पृथक् होंगे, तब महामृत्युंजय, महाकालेश्वर, सर्वसंहारकसे (माण्डूक्यकारिका ३।३९) संहृत हो जायँगे अन्यथा एकको छोड़कर सर्वकी जैसे नीमके कीड़ेको सिता शर्करासे उद्वेग होता संहारकता ही शिवमें समझी जायगी। सर्वसंहर्ताके है, वैसे ही सप्रपंच द्वैतसुखके कीट अज्ञानियोंको सामने दूसरी जो भी चीज उपस्थित होगी, वह उसका निष्प्रपंच अद्वैतसुखसे भय होता है; क्योंकि उनके अवश्य संहार करेगा। अतः यदि कोई बचेगा तो अभिलषित वादित्र, नृत्य-गीतादि द्वैतसुखका वहाँ उसका आत्मा ही बचेगा; क्योंकि अपनेमें संहार्य- अत्यन्ताभाव होता है। परंतु ज्ञानियोंको तो वही संहारकभाव नहीं बनता। इसीलिये शिवकी आत्मा परमानन्दरसरूप है। इस तरह अज्ञानियोंको उद्वेजक विष्णु और विष्णुकी आत्मा शिव हैं। वहाँ भिन्नता होता हुआ भी वह तत्त्वज्ञानियोंको परमरसामृतरूप है ही नहीं, जिससे परसमवेत-क्रियाशालित्वरूप कर्मत्वका होकर प्रकट होता है। योग हो। सर्वसंहारकमें ही निरतिशय प्राबल्य एवं विवेकियोंकी दृष्टिमें प्रमाद ही मृत्यु है— परमेश्वरत्व, सर्वोत्कृष्टत्व सिद्ध होता है। शेष जो भी 'प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि।' उससे भिन्न अवशिष्ट होते हैं, उन सबका संहार हो (सनत्सुजातीय १।४) जाता है। अतः उनका अनीश्वरत्व, निकृष्टत्व, उन समस्त प्रमादोंकी जड़ मोहमूल अज्ञान ही विधेयत्व, तद्वशवर्तित्व सुतरां सिद्ध होता है। है और उसका अन्त करनेवाला ब्रह्माकारा चरम जो परमेश्वर भक्तों, प्रेमियों और ज्ञानियोंके वृत्तिपर आरूढ़ शुद्ध ब्रह्म ही है। इस तरह मृत्युरूप निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमके आस्पद होते हैं और अज्ञानका नाशक होनेसे सर्वसंहारक महामृत्युंजय परमानन्दरसरूप होते हैं, वही अभक्तोंके लिये प्रचण्ड महाकालेश्वर परम-तत्त्व शिव ही हैं। वे ही लीलया मृत्युरूप होकर उपलब्ध होते हैं और उनसे सब दिव्यमंगलमयी मूर्ति धारण करते हैं, भक्तोंकी अपनी भयभीत होते हैं। संहारक और शासकसे सबको भय उपासनामें चावपूर्वक प्रवृत्ति देख कुतूहलवशात् स्वयं होना स्वाभाविक है। इसीलिये कहा गया है कि भी भक्तिरसका आस्वादन करनेके लिये अपने- 'महद्भयं वज्रमुद्यतम्।' अर्थात् परमेश्वर उद्यत वज्रके आपको उपास्य-उपासक दो रूपमें व्यक्त करते हैं।
बाल रामचन्द्र, बाल मुकुन्द-रूपसे निज हस्तारविन्दके अंगुष्ठको मुखारविन्दमें विनिवेशितकर चरणारविन्द- मकरन्द-लुब्ध भावुक मनोमिलिन्दोंके लोकोत्तर सौभाग्यको समझकर स्वयं भी भक्त होकर श्रीशिवकी उपासना करते हैं और शिवजीके रूपसे विष्णुरूपकी उपासना करते हैं। शिवके हृदयमें राम, रामके हृदयमें शिव हैं। साम्राज्यसिंहासनसमासीन भगवान् रामके हृदयकमलमें अभिव्यक्त श्रीशिवका प्रत्यक्ष दर्शन महर्षियोंने किया और शिवके हृदयमें रामके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। इस तरह ‘सेवक स्वामि सखा सिय पी के’ (रा०च०मा० १।१५।४) शिव सर्वाराध्य परम दैवत हैं। शिव-विष्णुका सर्वथा अभेद श्रीकृष्णने उपमन्यु महर्षिसे दीक्षित होकर भगवान् अम्बासहित श्रीशिवकी आराधना करके दिव्य वर प्राप्त किया था। धर्मराज युधिष्ठिरने जब भीष्मजीसे शिवतत्त्वके सम्बन्धमें प्रश्न किया, तब उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट करके कहा कि 'श्रीकृष्ण उनकी कृपाके पात्र हैं, उनकी महिमाको जानते हैं और वे ही कुछ वर्णन भी कर सकते हैं।' युधिष्ठिरके प्रश्नसे श्रीकृष्णने शान्त, समाहित होकर यही कहा कि 'भगवान्की महिमा तो अनन्त है तथापि उन्हींकी कृपासे उनकी महिमाको अति संक्षेपमें कहता हूँ।' यह कहकर बड़ी ही श्रद्धासे उन्होंने शिव-महिमाका गायन किया। विष्णुभगवान्ने तो अपने नेत्रकमलसे भगवान्की पूजा की है। उसी भक्त्युद्रेकसे उन्हें सुदर्शन चक्र मिला है। शिव-विष्णुका तो परस्परमें ऐसा उपास्योपासक-सम्बन्ध है कि जो अन्यत्र हो ही नहीं सकता। तम काला होता है और सत्त्व शुक्ल, इस दृष्टिसे सत्त्वोपाधिक विष्णुको शुक्लवर्ण होना था और तम-उपाधिक रुद्रको कृष्णवर्ण होना था और सम्भवतः हैं भी वे वैसे ही, परंतु परस्पर एक-दूसरेकी ध्यानजनित तन्मयतासे दोनोंके ही स्वरूपमें परिवर्तन हो गया अर्थात् विष्णु कृष्णवर्ण और रुद्र शुक्लवर्ण हो गये। मुरलीरूपसे कृष्णके अधरामृतपानका अधिकार शिवको ही हुआ। श्रीकृष्ण अपने अमृतमय मुखचन्द्रपर, सुमधुर अधरपल्लवपर वंशीको पधराकर अपनी कोमलांगुलियोंसे उनके पादसंवाहन करते, अधरामृतका भोग धरते, किरीट-मुकुटका छत्र धरते और कुण्डलसे नीराजन करते हैं। श्रीराधारूपसे श्रीशिवका प्राकट्य होता है तो कृष्णरूपसे विष्णुका, कालीरूपसे विष्णुका तो शंकररूपसे शिवका। इस तरह ये दोनों उभय- उभयात्मा, उभय-उभयभावात्मा हैं। शिवके सगुणस्वरूपकी मनोहरता एवं मंगलमयता श्रीशिवका सगुण स्वरूप भी इतना अद्भुत, मधुर, मनोहर और मोहक है कि उसपर सभी मोहित हैं। भगवान्की तेजोमयी, दिव्य, मधुर, मनोहर, विशुद्ध सत्त्वमयी, मंगलमयी मूर्तिको देखकर स्फटिक, शंख, कुन्द, दुग्ध, कर्पूरखण्ड, श्वेताद्रि, चन्द्रमा सभी लज्जित होते हैं। अनन्तकोटि चन्द्रसागरके मन्थनसे समुद्भूत, अद्भुत, अमृतमय, निष्कलंक पूर्णचन्द्र भी उनके मनोहर मुखचन्द्रकी आभासे लज्जित हो उठता है। मनोहर त्रिनयन, बालचन्द्र एवं जटामुकुटपर दुग्धधवल स्वच्छाकृति गंगाकी धारा हठात् मनको मोहती है। हस्ति-शुण्डके समान विशाल, भूतिभूषित सुडौल, गोल, तेजोमय अंगद-कंकण-शोभित भुजा, मुक्ता-मोतियोंके हार, नागेन्द्रहार, व्याघ्रचर्म, मनोहर चरणारविन्द और उनमें सुशोभित नखमणिचन्द्रिकाएँ भावुकोंको अपार आनन्द प्रदान करती हैं। हिमाद्रिके समान धवलवर्ण स्वच्छ नन्दीगणपर विराजमान सदाशक्तिरूपा श्रीउमाके संग श्रीशिव ठीक वैसे ही शोभित होते हैं, जैसे धर्मतत्त्वके ऊपर ब्रह्मविद्यासहित ब्रह्म विराजमान हों, किंवा माधुर्याधिष्ठात्री महा- शक्तिके साथ मूर्तिमान् होकर परमानन्दरसामृतसिन्धु विराजमान हो। भगवान्की ऐसी सर्वमनोहारिता है कि सभी उनके उपासक हैं। कालकूट विष और शेषनागको गलेमें धारण करनेसे भगवान्की मृत्युंजयरूपता स्पष्ट है। उन्होंने जटामुकुटमें श्रीगंगाको धारणकर विश्वमुक्ति-
मूलको स्वाधीन कर लिया। अग्निमय तृतीय नेत्रके समीपमें ही चन्द्रकलाको धारणकर अपने संहारकत्व- पोषकत्वरूप विरुद्ध धर्माश्रयत्वको दिखलाया। सर्वलोकाधिपति होकर भी विभूति और व्याघ्रचर्मको ही अपना भूषण-वसन बनाकर संसारमें वैराग्यको ही सर्वापेक्षया श्रेष्ठ बतलाया। आपका वाहन नन्दी तो उमाका वाहन सिंह, गणपतिका वाहन मूषक तो स्वामी कार्तिकेयका वाहन मयूर है। मूर्तिमान् त्रिशूल और भैरवादिगण आपकी सेवामें सदा संलग्न हैं। ब्रह्मा, विष्णु, राम, कृष्णादि भी उनकी उपासना करते हैं। नर, नाग, गन्धर्व, किन्नर, सुर, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापतिप्रभृति भी शिवकी उपासनामें तल्लीन हैं। इधर तामससे तामस असुर, दैत्य, यक्ष, भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल, डाकिनी, शाकिनी, वृश्चिक, सर्प, सिंह सभी आपकी सेवामें तत्पर हैं। वस्तुतः परमेश्वरका लक्षण भी यही है कि उसे सभी पूजें। पार्वतीके विवाहमें जब भगवान् शंकर प्रसन्न हुए, तब अपनी सौन्दर्य-माधुर्य-सुधामयी दिव्य मूर्त्तिका दर्शन दिया। बरातमें पहले लोग इन्द्रका ऐश्वर्य, माधुर्य देखकर मुग्ध हो गये, समझा कि ये ही शंकर हैं और उन्हींकी आरतीके लिये प्रवृत्त हुए। जब इन्द्रने कहा कि 'हम तो श्रीशंकरके उपासकोंके भी उपासकोंमें निम्नतम हैं,' तब उन लोगोंने प्रजापति ब्रह्मा आदिका अद्भुत ऐश्वर्य देखकर उन्हें परमेश्वर समझा। जब उन्होंने भी अपनेको भगवान्का निम्नतम उपासक कहा, तब वे लोग विष्णुकी ओर प्रवृत्त हुए और उन्हें ही अद्भुत ऐश्वर्य-माधुर्य-सौन्दर्यसम्पन्न देखकर शंकर समझा। जब श्रीविष्णुने भी अपनेको शंकरका उपासक बतलाया, तब तो सब आश्चर्यसिन्धुमें डूबने लगे। सचमुच भगवान् श्रीकृष्णके श्रीअंगका सौन्दर्य, माधुर्य अद्भुत है। औरकी कौन कहे, उसपर वे स्वयं मुग्ध हो जाते हैं। मणिमय स्तम्भों या मणिमय प्रांगणमें प्रतिबिम्बित अपनी ही मधुर, मनोहर, मंगलमयी मूर्तिको देख, उसके ही सम्मिलन और परिरम्भणके लिये वे स्वयं विभोर हो उठते हैं। श्रीमूर्तिके प्रत्येक अंगभूषणोंको भी भूषित करते हैं। कौस्तुभादि मणिगणोंने अनन्त आराधनाओंके अनन्तर अपनी शोभा बढ़ानेके लिये उनके श्रीकण्ठको प्राप्त किया है, किं बहुना अनन्त गुणगणोंने भी अनन्त तपस्याओंके अनन्तर अपनी गुणत्वसिद्धिके लिये जिन निर्गुण, निरपेक्षका आश्रयण किया है, वे स्वयं श्रीकृष्ण जिसकी उपासना करें, जिसपर मुग्ध रहें, उसकी महिमा, मधुरिमाका कहना ही क्या? राधारूपसे जिसे प्रतिक्षण हृदय एवं रोम-रोममें रखें, वंशीरूपसे अधरपल्लवपर रखें, जिनके स्वरूपका निरन्तर ध्यान करें, उनकी महिमाको कौन कह सकता है? शब्द, स्पर्श, रस, गन्धके माधुर्यमें प्राणियोंका चित्त आसक्त होता है। चित्तमें अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय ब्रह्मका आरोहण कठिन होता है। इसीलिये भगवान् ऐसी मधुर, मनोहर, मंगलमयी मूर्तिरूपमें अपने- आपको व्यक्त करते हैं, जिसके शब्द-स्पर्शादिके माधुर्यका पारावार नहीं, जिसके लावण्य, सौन्दर्य, सौगन्ध्य, सौकुमार्यकी तुलना कहीं है ही नहीं। मानो भगवान्की सौन्दर्य-सुधाजलनिधि मंगलमूर्तिसे ही, किंवा उसके सौन्दर्यादि-सुधासिन्धुके एक बिन्दुसे ही अनन्त ब्रह्माण्डमें सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्य, सौगन्ध्य, सौकुमार्य आदि वितत हैं। जब प्राणीका मन प्राकृत कान्ताके सौन्दर्य, माधुर्यादिमें आसक्त हो जाता है, तब अनन्तब्रह्माण्डगत सौन्दर्य, माधुर्यादि बिन्दुओंके उद्गमस्थान सौन्दर्यादि सुधाजलनिधि भगवान्के मधुर स्वरूपमें क्यों न आसक्त होगा? भगवान् शिव आशुतोष हैं भगवान्का हृदय भास्वती भगवती अनुकम्पा देवीके परतन्त्र है। संसारमें माँगनेवाला किसीको अच्छा नहीं लगता, उससे सभी घृणा करते हैं। परंतु, भगवान् शंकर तो आक, धतूर, अक्षत, बिल्वपत्र, जलमात्र चढ़ाने अथवा गाल बजानेसे ही सन्तुष्ट होकर सब कुछ देनेको प्रस्तुत हो जाते हैं। ब्रह्माजी पार्वतीसे अपना दुखड़ा रोते हुए कहते हैं—
४६४ भक्तिसुधा बावरो रावरो नाह भवानी। * सिवकी दई संपदा देखत, श्री-सारदा सिहानी। जिनके भाल लिखी लिपि मेरी, सुखकी नहीं निसानी। तिन रंकनकी नाक संवारत, हौं आयो नकबानी॥ (विनय-पत्रिका ५) दीन-दयालु दिबोई भावै, जाचक सदा सोहाहीं॥ (विनय-पत्रिका ४) उनका भक्त एक ही बार प्रणाम करनेसे अपनेको मुक्त मानता है। भगवान् भी 'महादेव' ऐसे नाम उच्चारण करनेवालेके प्रति ऐसे दौड़ते हैं, जैसे वत्सला गौ अपने बछड़ेके प्रति— महादेव महादेव महादेवेति वादिनम्। वत्सं गौरिव गौरीशो धावन्तमनुधावति॥ जो पुरुष तीन बार 'महादेव, महादेव, महादेव' इस तरह भगवान्का नाम उच्चारण करता है, भगवान् एक नामसे मुक्ति देकर शेष दो नामसे उसके ऋणी हो जाते हैं— महादेव महादेव महादेवेति यो वदेत्। एकेन मुक्तिमाप्नोति द्वाभ्यां शम्भू ऋणी भवेत्॥ ठीक ही है, वेदान्त-सिद्धान्तानुसार शब्दसे ही तत्त्वका साक्षात्कार होता है। उपनिषदों, महावाक्यों एवं भगवत्स्वरूप-बोधक प्रणवादि नामोंसे तत्त्वसाक्षात्कार होता है। तत्त्वसाक्षात्कार होते ही कल्पित संसार मिट जाता है। स्वाभाविक पारमार्थिक ब्रह्मानन्दरसामृत मुक्ति मिल जाती है। जैसे अमृतसागरमें क्षारसागरकी कल्पना भ्रान्तिसे होती है, वैसे ही परमानन्दरसामृतमूर्ति शिवतत्त्वमें भवसागरकी भ्रान्ति होती है। अधिष्ठानके साक्षात्कारसे कल्पना मिट जाती है। यह 'नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं' (रा०च०मा० १।२५।४) का आशय है। दूसरी दृष्टिसे जैसे तृण, वीरुध, औषधोंके विचित्र सम्प्रयोग-विप्रयोगसे विचित्र गुणों और दोषोंका उद्भव-अभिभव होता है, वैसे ही वर्णोंके विचित्र सम्प्रयोग-विप्रयोगमें विचित्र शक्तियाँ होती हैं। 'क' 'ख' 'ग' 'घ' आदि वर्णोंके ही जोड़-तोड़से विचित्र वाङ्मय शास्त्र बने हैं। 'राजा', 'जारा'; 'नदी', 'दीन' ये सब अर्थ-विपरिणाम वर्णोंके आनुपूर्वी भेदसे ही होते हैं। उन्हीं वर्णोंके ऐसे भी जोड़-तोड़ होते हैं, जिनसे घोर-से-घोर शत्रु वशमें हो जाते हैं। सर्प, वृश्चिक, पिशाच, राक्षस, देवता वशमें हो जाते हैं। ऐसे विचित्र वर्णविन्यास होते हैं, जिनका मूल संसारमें कुछ भी नहीं है। विद्वानों, कवियों, तार्किकोंके वर्ण-विन्यास- विशेषमें ही विशेषता (खूबी) है, किन्हीं वर्णविन्यासोंसे परम मित्र भी शत्रु हो जाते हैं। इस तरह अदृष्टविधया भी भगवान्के शिव, महादेव आदि नामोंमें विचित्र शक्ति है, जिससे प्राणी निष्पाप होकर परमतत्त्वका साक्षात्कारकर कृतकृत्य हो जाता है।
शिवसे शिक्षा
भगवान् भूतभावन श्रीविश्वनाथके चरित्रोंसे प्राणियोंको नैतिक, सामाजिक, कौटुम्बिक—अनेक प्रकारकी शिक्षा मिलती है। समुद्र-मन्थनमें निकलनेवाले कालकूट विषका भगवान् शंकरने पान किया और अमृत देवताओंको दिया। राष्ट्रके नेता और समाज एवं कुटुम्बके स्वामीका यही कर्तव्य है, उत्तम वस्तु राष्ट्रके अन्यान्य लोगोंको देनी चाहिये और अपने लिये परिश्रम, त्याग तथा तरह-तरहकी कठिनाइयोंको ही रखना चाहिये। विषका भाग राष्ट्र या बच्चोंको देनेसे वैमनस्य और उससे सर्वनाश हो जायगा। शिवजीने न विषको हृदय (पेट)-में उतारा और न उसका वमन ही किया, अपितु कण्ठमें ही रोक रखा। इसीलिये विष और कालिमा भी उनके भूषण हो गये। जो संसारके हितके लिये विषपानसे भी नहीं हिचकते, वे ही राष्ट्र या जगत्के ईश्वर हो सकते हैं। समाज या राष्ट्रकी कटुताको पी जानेसे ही नेता राष्ट्रका कल्याण कर सकता है। परंतु फिर भी उस कटुताका विष वमन करनेसे फूट और उपद्रव ही होगा।
शिवसे शिक्षा ४६५
साथ ही उस विषको हृदयमें रखना भी बुरा है। अमृत- पानके लिये सभी उत्सुक होते हैं, परंतु विषपानके लिये शिव ही हैं; वैसे ही फलभोगके लिये सभी तैयार रहते हैं, परंतु त्याग तथा परिश्रमको स्वीकारनेके लिये महापुरुष ही प्रस्तुत होते हैं। जैसे अमृतपानके अनुचित लोभसे देव-दानवोंका विद्वेष स्थिर हो गया, वैसे ही अनुचित फलकामनासे समाजमें विद्वेष स्थिर हो जाता है। शिवकुटुम्बका वैचित्र्य शिवजीका कुटुम्ब भी विचित्र ही है। अन्नपूर्णाका भण्डार सदा भरा, पर भोलेबाबा सदाके भिखारी। कार्तिकेय सदा युद्धके लिये उद्यत, पर गणपति स्वभावसे ही शान्तिप्रिय। फिर कार्तिकेयका वाहन मयूर, गणपतिका मूषक, पार्वतीका सिंह और स्वयं अपना नन्दी और उसपर आभूषण सर्पोंके। सभी एक-दूसरेके शत्रु, पर गृहपतिकी छत्रछायामें सभी सुख तथा शान्तिसे रहते हैं। घर में प्रायः विचित्र स्वभाव और रुचिके लोग रहते हैं, जिसके कारण आपसमें खटपट चलती ही रहती है। घरकी शान्तिके आदर्शकी शिक्षा भी शिवसे ही मिलती है। भगवान् शिव और अन्नपूर्णा अपने-आप परम विरक्त रहकर संसारका सब ऐश्वर्य श्रीविष्णु और लक्ष्मीको अर्पण कर देते हैं। श्रीलक्ष्मी और विष्णु भी संसारके सभी कार्योंको सँभालने, सुधारनेके लिये अपने आप ही अवतीर्ण होते हैं। गौरी-शंकरको कुछ भी परिश्रम न देकर आत्मानुसन्धानके लिये उन्हें निष्प्रपंच रहने देते हैं। ऐसे ही कुटुम्ब और समाजके सर्वमान्य पुरुषोंको चाहिये कि योग्यतम कुटुम्बियोंके हाथ समाज और कुटुम्बका सब ऐश्वर्य दे दें और उन योग्य अधिकारियोंको चाहिये कि समाजके प्रत्येक कार्य- सम्पादनके लिये स्वयं ही अग्रसर हों, वृद्धोंको निष्प्रपंच होकर आत्मानुसन्धान करने दें। महापार्थिवेश्वर हिमालयकी महाशक्तिरूपा पुत्रीका श्रीशिवके साथ परिणय होनेसे ही विश्वका कल्याण हो सकता है। किसी प्रकारकी भी शक्ति क्यों न हो, जब- तक वह धर्मसे परिणीत—संयुक्त नहीं होती, तबतक कल्याणकारिणी नहीं होती। परंतु आसुरी शक्ति तो तपस्या चाहती ही नहीं, फिर उसे शिव या धर्म कैसे मिलेंगे? धर्मसम्बन्धके बिना शक्ति आसुरी होकर अवश्य ही संहारका हेतु बनेगी। प्रकृतिमाताकी यह प्रतिज्ञा है कि— यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति। यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥ (श्रीदुर्गासप्तशती ५।१२०) अर्थात् संघर्षमें जो मुझे जीत लेगा, जो मेरे दर्पको चूर्ण कर देगा और जो मेरे समान या अधिक बलका होगा, वही मेरा पति होगा। यह स्पष्ट है कि रक्तबीज, शुम्भ, निशुम्भ आदि कोई भी दैत्य, दानव प्रकृति- विजेता नहीं हुए। किंतु सब प्रकृतिसे पराजित, प्रकृतिके अंश काम, क्रोध, लोभ, मोह, दर्प आदिसे पद-पदपर भग्नमनोरथ होते रहे हैं। हाँ, गुणातीत प्रकृतिपार भगवान् शिव ही प्रकृतिको जीतते हैं। तभी तो प्रकृतिमाताने उन्हें ही अपना पति बनाया। यही क्यों, कन्दर्प-विजयी शिवकी प्राप्तिके लिये तो उन्होंने घोर तपस्या भी की। आजका संसार शुम्भ-निशुम्भकी तरह विपरीत मार्गसे प्रकृतिपर विजय चाहता है। इसीलिये प्रकृति अनेक तरहसे उसका संहार कर रही है। पार्थिव, आप्य, तैजस, विविध तत्त्वोंका अन्वेषण; जल, स्थल, नभपर शासन करना; समुद्र-तलके जन्तुओंतककी शान्ति भंग करना, तरह-तरहके यन्त्रोंका आविष्कार और उनसे काम लेना ही आजका प्रकृतिजय है। इन्द्रिय, मन, बुद्धि और उनके विकारोंपर नियन्त्रण करनेका आज कोई भी मूल्य नहीं। प्रकृति भी कोयला, लोहा, तेल आदि साधारण-से-साधारण वस्तुओंको निमित्त बनाकर उन्हीं यन्त्रोंसे उनका संहार करा रही है। आज शिव 'अनार्य' देवता बतलाये जा रहे हैं। शिवकी आराधना भूल जानेसे आज राष्ट्रका भी शिव (मंगल) नहीं हो रहा है— जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय। तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस ॥ (रा०च०मा० ४।१ सो०)
४६६ भक्तिसुधा शिवलिङ्गोपासना-रहस्य सच्चिदानन्द परमात्माका शिवशक्ति- रूपमें प्राकट्य सर्वाधिष्ठान, सर्वप्रकाशक, परब्रह्म परमात्मा ही 'शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः' (माण्डूक्योपनिषद् ७) इत्यादि श्रुतियोंसे शिवतत्त्व कहा गया है। वही सच्चिदानन्द परमात्मा अपने-आपको ही शिवशक्तिरूपमें प्रकट करता है। वह परमार्थतः निर्गुण, निराकार होते हुए भी अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे सगुण, साकार, सच्चिदानन्दघनरूपमें भी प्रकट होता है। वही शिवशक्ति, राधाकृष्ण, अर्द्धनारीश्वर आदि रूपमें प्रकट होता है। सत्ताके बिना आनन्द नहीं और आनन्दके बिना सत्ता नहीं। 'स्वप्रकाश सत्तारूप आनन्द' ऐसा कहनेसे आनन्दकी वैषयिक सुखरूपताका वारण होता है, सत्ताको आनन्दरूप कहनेसे उसकी जड़ताका वारण होता है। जैसे आनन्दसिन्धुमें माधुर्य उसका स्वरूप ही है, वैसे ही पार्वती-शिवका स्वरूप किंवा आत्मा ही है। माधुर्यके बिना आनन्द नहीं और आनन्दके बिना माधुर्य नहीं। दूसरी दृष्टिसे- सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥ (गीता १४।४) समस्त योनियोंमें, जितनी वस्तुएँ-मूर्तियाँ अर्थात् प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबकी योनि अर्थात् उत्पन्न करनेवाली माता प्रकृति है और बीज देनेवाला शिव (लिंग) पिता मैं हूँ। अर्थात् मूल प्रकृति और परमात्मा ही उन माता-पिता (योनि-लिंग)-रूपमें उन-उन मूर्तियों (वस्तुओं)-का उत्पादन करते हैं। जैसे लोकमें प्रजोत्पादनकी कामनासे प्राणी नारीमें गर्भाधान करता है, वैसे ही "एकोऽहं बहु स्यां, प्रजायेय" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार एक ब्रह्मतत्त्व ही प्रजोत्पादन या बहुभवनकी कामनासे प्रकृतिमें गर्भाधान करता है। "सोऽकामयत" यह प्रजाकी सिसृक्षारूप काम ही प्राथमिक आधिदैविक काम है। इसी कामद्वारा प्रकृतिसंसृष्ट होकर भगवान् ब्रह्माण्डको उत्पन्न करते हैं। यह काम भी भगवान्का ही अंश है—'कामस्तु वासुदेवांशः' (श्रीमद्भा० १०।५५।१)। लोकमें भी प्रेम, काम या इच्छाका मुख्य विषय आनन्द ही है। सुखमें साक्षात् कामना और उससे अन्यमें सुखका साधन होनेसे इच्छा होती है, इसीलिये आनन्द और तद्रूप आत्मा निरतिशय, निरूपाधिक परप्रेमका आस्पद है, अन्य वस्तुएँ सातिशय, सोपाधिक अपर प्रेमके आस्पद हैं। कान्तको कान्ताकी कामना उसको सुखाभिव्यंजक अतएव सुखमय समझकर ही होती है। कामना या तृष्णासे व्यथित हृदयमें स्वरूपभूत आत्मानन्दका प्राकट्य नहीं होता। परंतु अभिलषित कान्ताकी प्राप्ति होनेपर क्षणभरके लिये वह तृष्णा निवृत्त हो जाती है, बस; तभी अन्तर्मुख किञ्चित् शान्त मनपर आत्मानन्दका प्राकट्य होता है। परंतु आत्मामें ही आनन्द है अथवा आनन्दाभिव्यंजक तृष्णाकी निवृत्तिमें, इसको तो विवेकी ही जानता है, अविवेकी तो आत्माके स्वरूपभूत आनन्दको नहीं समझता। तृष्णानिवर्तक सुन्दरी-कान्तामें ही आनन्द मानता है। अतएव उसीकी पुनः तृष्णा करता है और फिर कान्ताप्राप्तिकी तृष्णारूप व्यथाकी निवृत्तिसे आनन्दित होकर फिर उसीको चाहता है। विवेकी समझता है कि यद्यपि कान्ताप्राप्तिके अनन्तर आनन्द होता है तथापि कान्ता साक्षात् आनन्दरूप नहीं है, किंतु तृष्णानिवृत्ति, मनःशान्तिसे आत्माका ही आनन्द प्रकट होता है। आनन्दकी प्राप्तिमें कान्ता दूरतः कारण है, वह भी आनन्दजनकत्व या आनन्दमयत्वकी भ्रान्तिसे। जैसे विषके प्रभावसे कटु निम्बमें मिठास प्रतीत होती है, वैसे ही भ्रान्ति या मोहके प्रभावसे मांसमयी कान्तामें आनन्दका भान होता है। परंतु इसके अतिरिक्त शुद्ध आनन्द या आत्मामें जो प्रेम, आनन्द, कामना है, वह तो स्वाभाविक है, आत्माका
शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४६७
अंश ही है, इसीलिये अद्वैत आत्मा ही निरुपाधिक प्रेमका आस्पद कहा जाता है, परंतु वहाँ प्रेम और उसके आश्रय तथा विषयमें भेद नहीं है। प्रेम, आनन्द, रस—ये सभी आत्माके ही स्वरूप हैं। रसरूप आनन्दसे ही समस्त विश्व उत्पन्न होता है, अतः सबमें उसका होना अनिवार्य है। इसीलिये जिस तरह सोपाधिक आनन्द और सोपाधिक प्रेम सर्वत्र है ही, उसी तरह कान्ता भी सोपाधिक आनन्दरूप कही जा सकती है। अतएव वह सोपाधिक प्रेमका विषय भी है। परंतु निरुपाधिक प्रेम तो निरुपाधिक आत्मामें ही होना ठीक है। जैसे सत्के ही सविशेष रूपमें अनुकूलता, प्रतिकूलता, हेयता, उपादेयता होती है, निर्विशेष तो शुद्ध आत्मा ही है, वैसे ही सविशेष आनन्द और प्रेममें भी हेयता, उपादेयता है। शास्त्रनिषिद्ध विषयोंमें आनन्द और प्रेम दोष है, हेय है सुन्दर, मनोहर देवता और तद्विषयक प्रेम आदि उपादेय है, सुन्दरी वेश्यादिकी आनन्दरूपता और तद्विषयक प्रेम हेय है। जैसे अतिपवित्र दुग्ध भी अपवित्र पात्रके संसर्गसे अपवित्र समझा जाता है, वैसे ही आनन्द और प्रेम भी अपवित्र उपाधियोंके संसर्गसे दूषित हो जाता है। शास्त्रनिषिद्ध विषयोंमें आनन्द और प्रेम दोष है, हेय है। शास्त्रविहित विषयोंमें आनन्द और प्रेम पुण्य है, उपादेय है। परंतु निर्विशेष, सर्वोपाधिमुक्त प्रेम, आनन्द तो स्पष्ट आत्मा या ब्रह्म ही है। आत्माके ही अंश अपवित्र विषयके दूषणसे ही कामिनी आदि विषयक प्रेमको काम या राग आदि कहा जाता है, देवताविषयक प्रेमको भक्ति आदि कहा जाता है। सजातीयमें ही सजातीयका आकर्षण होता है। बस यह आकर्षण ही प्रेम या काम है। कान्ता- कान्त दोनोंमें ही रहनेवाले तत्तदवच्छिन्न रस या आनन्दमें ही जो परस्पर आकर्षण है, वही काम है। शुद्ध प्रेम ही शुद्ध काम है समष्टि ब्रह्मका प्रकृतिकी ओर झुकाव आधिदैविक काम है। परंतु जहाँ शुद्ध, सच्चिदानन्दघन परब्रह्मका स्वरूपमें ही आकर्षण होता है, किंवा आत्माका अपने ही अत्यन्त अभिन्न स्वरूपमें ही जो आकर्षण या निरतिशय, निरुपाधिक प्रेम है, वह तो आत्मस्वरूप ही है। यही राधा-कृष्ण, गौरी-शंकर अर्धनारीश्वरका परस्पर प्रेम, परस्पर आकर्षण है और यह शुद्ध प्रेम ही शुद्ध काम है। यह कामेश्वर या कृष्णका स्वरूप ही है। अनन्त ब्रह्माण्डमें विस्तीर्ण कामबिन्दु मन्मथ है। अनन्तब्रह्माण्डनायकका प्रकृतिमें वीर्याधानका प्रयोजक कामसागर साक्षात् मन्मथ है। परंतु सौन्दर्य- माधुर्यसारसर्वस्व, निखिलरसामृतमूर्ति कृष्णचन्द्रका जो अपनी ही स्वरूपभूता माधुर्याधिष्ठात्री राधामें आकर्षण है, वह तो साक्षान्मन्मथमन्मथ ही है। उनका पूर्णतम सौन्दर्य ऐसा अद्भुत है कि उन्हें ही विस्मित कर देता है। काम उनकी पदनखमणिचन्द्रिकाकी रश्मिछटाको देखकर मुग्ध हो गया। उसका स्त्रीत्व-पुंस्त्वभाव ही मिट गया, उसने अपने मनमें यह ठान लिया कि अनन्त जन्मोंतक भी तपस्या करके ब्रजांगनाभाव प्राप्तकर श्रीकृष्णके पद-नखमणिचन्द्रिकाका सेवन प्राप्त करूँगा। परंतु यहाँ तो कृष्णने ही अपने स्वरूपपर मुग्ध होकर उस रसके आस्वादनके लिये ब्रजांगनाभावप्राप्त्यर्थ तपस्याका विचार कर लिया। यहाँ शुद्ध परमतत्त्वमें ही शिवशक्तिभाव, अर्धनारीश्वरभाव और शुद्ध आकर्षण प्रेम या काम है। सत्-रूप गौरी एवं चित्-रूप शिव दोनों ही जब अर्धनारीश्वरके रूपमें मिथुनीभूत (सम्मिलित) होते हैं, तभी पूर्ण सच्चिदानन्दका भाव व्यक्त होता है, परंतु यह भेद केवल औपचारिक ही है, वास्तवमें तो वे दोनों एक ही हैं। कुछ महानुभावोंका कहना है कि पूर्ण सौन्दर्य अपनेमें ही अपने प्रतिबिम्बको अपने-आप देख सकता है, भगवान् अपने स्वरूपको देखकर स्वयं विस्मित हो जाते हैं— 'विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः' (श्रीमद्भा० ३।२।१२) बस, इसीसे प्रेम या काम प्रकट होता है। इसीसे
४६८ | भक्तिसुधा
शिव-शक्तिका सम्मिलन होता है। वही शृंगाररस है। कामेश्वर-कामेश्वरी, श्रीकृष्ण-राधा, अर्धनारीश्वर वही है। पूर्ण सौन्दर्य अनन्त है, अप्सराओंका सौन्दर्य उसके सामने नगण्य है। उसी सौन्दर्यके कणमात्रसे विष्णुने मोहिनीरूपसे शिवको मोह लिया। उसीके लेशसे मदन मुनियोंको मोहता है। वही सगुणरूपमें कहीं ललिता, कहीं कृष्णरूपमें प्रकट होता है— 'षोडशी तु कला ज्ञेया सच्चिदानन्दरूपिणी।' (सुभगोदय) 'नित्यं किशोर एवासौ भगवानन्तकान्तकः ॥' कभी आद्या ललिता ही पुंरूपधारिणी होकर कृष्ण बनती हैं, वही वंशीनादसे विश्वको मोहित करती हैं— कदाचिदाद्या ललिता पुंरूपा कृष्णविग्रहा। वंशीनादसमारम्भादकरोद्विवशं जगत्॥ (तन्त्रराज) शिव-शक्तिमें ही लिंगयोनि-भावकी कल्पना प्रकृतिपार, सौन्दर्य-माधुर्यसार, आनन्दरससार परमात्मामें भी शिव-पार्वती-भाव बनता है। अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डोत्पादिनी अनिर्वचनीय शक्तिविशिष्ट ब्रह्ममें भी शिव-पार्वती-भाव है। उस परमात्मामें ही लिंगयोनि- भावकी कल्पना है। निराकार, निर्विकार, व्यापक दृक् या पुरुषतत्त्वका प्रतीक ही लिंग है और अनन्तब्रह्माण्डोत्पादिनी महाशक्ति प्रकृति ही योनि, अर्घा या जलहरी है। न केवल पुरुषसे सृष्टि हो सकती है, न केवल प्रकृतिसे। पुरुष निर्विकार, कूटस्थ है, प्रकृति ज्ञानविहीन, जड़ है। अतः सृष्टिके लिये दृक्-दृश्य, प्रकृति-पुरुषका सम्बन्ध अपेक्षित होता है। 'गीता' में भी प्रकृतिको परमात्माकी योनि कहा गया है— मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥ (१४।३) भगवान् कहते हैं—महद्ब्रह्म—प्रकृति—मेरी योनि है, उसीमें मैं गर्भाधान करता हूँ, तभी उससे महदादिक्रमेण समस्त प्रजा उत्पन्न होती है। प्रकृतिरूप योनिमें प्रतिष्ठित होकर ही पुरुषरूप लिंगका उत्पादन करता है। अतएव बिना योनि-लिंग-सम्बन्धके कहीं भी किसीकी सृष्टि ही नहीं होती। हाँ, यह बात अवश्य समझ लेनी चाहिये कि लोकप्रसिद्ध मांसचर्ममय ही लिंग और योनि नहीं है, किंतु वह व्यापक भी है। उत्पत्तिका उपादानकारण पुरुषत्वका चिह्न ही लिंग कहलाता है। दृश्य अण्डरूप ब्रह्म ही अदृश्य पुरुष ब्रह्मका चिह्न है और वही संसारका उपादान भी है, अतः वह लिंगपदवाच्य है। लिंग और योनि पुरुष- स्त्रीके गुह्यांगपरक होनेसे ही उन्हें अश्लील समझना ठीक नहीं है। गेहूँ, यव आदिमें भी जिस भागमें अंकुर निकलता है, उसे योनि माना जाता है, दाने निकलनेसे पहले जो छत्र होता है, वह लिंग है। ब्रह्मा या देवताओंके संकल्पसे उत्पन्न सृष्टिका भी लिंग- योनिसे सम्बन्ध है अर्थात् शिव-शक्ति ही यहाँ लिंग- योनि शब्दसे विवक्षित हैं। उत्पत्तिका आधारक्षेत्र भग है, बीज लिंग है। वृक्ष, अंकुरादि सभी प्रपंचकी उत्पत्तिका क्षेत्र भग है, बीज पुरुष लिंग है। जैसे दृक्तत्त्व व्यापक है, वैसे ही दृश्य प्रकृतितत्त्व भी। तभी तो कभी लोकप्रसिद्ध योनि-लिंगके बिना भी मानसी संकल्पजा सृष्टि होती थी। कहीं दर्शनसे, कहीं स्पर्शसे, कहीं फलादिसे भी सन्तान उत्पन्न हो जाती थी। कहीं भी, कैसी भी, सृष्टि क्यों न हो, परंतु वहाँ सृष्टिके उत्पादनानुकूल शिव-शक्तिका सम्बन्ध अवश्य मानना पड़ता है। वृक्ष, लता, दूर्वा, तृणादि सभी तत्त्वोंकी उत्पत्तिमें तदुपयुक्त शिव-शक्तिका सम्बन्ध अनिवार्य है। योगसिद्ध महर्षियोंका प्रकृतिपर अधिकार होता था। अतः ये संकल्प, स्पर्श, अवलोकन आदिसे ही सृष्टिके उपयुक्त लिंग-योनि-सम्बन्ध स्थापित कर सकते थे। प्रसिद्ध लिंग और योनि ही असली लिंग-योनि नहीं है। किंतु यह तो उनकी अभिव्यक्तिका स्थान, केवल गोलक है। सर्वसाधारण लोग जिसे नेत्र समझते हैं, वह नेत्र नहीं है, किंतु वह तो अतीन्द्रिय नेत्र इन्द्रियकी
शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४६१
अभिव्यक्तिका स्थान—गोलक है, इन्द्रिय उससे पृथक् सूक्ष्म वस्तु है। प्रसिद्ध नासिका या कान ही घ्राण और श्रोत्र नहीं, किंतु ये सब तो गोलक हैं। घ्राण, श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ तो अतिसूक्ष्म हैं, वे नेत्रादिके विषय नहीं हैं। फिर भी विशेषरूपसे उनका इन गोलकोंमें प्राकट्य होता है, अतएव कभी जब इन गोलकोंके ज्यों-के-त्यों बने रहनेपर भी इन्द्रियशक्ति क्षीण हो जाती है, तब दर्शन, श्रवण, आघ्राण आदि नहीं होते। योगियोंको घ्राण, श्रोत्र, नेत्र-सम्बन्ध बिना भी दूरदर्शन- श्रवणादि होते हैं। उसी तरह लौकिक प्रसिद्ध लिंग- योनि आदि केवल गोलक हैं, उनमें व्यक्त होनेवाला योनि-लिंग तो अतीन्द्रिय ही है। वैसे ही प्रजनन- इन्द्रिय, वीर्य, रज आदि भी उसके मुख्य रूप नहीं, किंतु उनसे भी सूक्ष्म, उनमें विशेषरूपसे व्यक्त दृक्- दृश्य ही शिव और शक्ति है। यद्वा जैसे अग्नितादात्म्यापन्न लौह-पिण्डमें दाहकत्व, प्रकाशकत्व हो सकता है, वैसे ही पुरुष- प्रतिबिम्बोपेत ही अचेतन प्रकृति चेतित होकर विश्वका निर्माण करती है। जैसे पुरुषके सर्वांगसार वीर्यको पाकर ही योनि सन्तान रचती है, वैसे ही पुरुष- प्रतिबिम्ब भी पुरुष समानाकार पुरुषकी प्रतिकृति ही होता है, उसीसे अचेतन प्रकृतिमें भी चेतनताका संचार होता है। इधर मूर्तिपूजाका भी भाव यही होता है कि दृश्यसे अदृश्यकी पूजा हो। शालग्राममें विष्णुकी भावना होती है। केवल काष्ठ, पाषाण, धातुकी पूजा नहीं होती, किंतु मन्त्र और विधानोंकी महिमासे आहूत, संनिहित व्यापक दैवतत्त्व ही मूर्तिमें आराध्य होता है। व्यष्टिके द्वारा ही प्राणियोंके मनमें समष्टिभावका आरोहण होता है। अतएव समस्त व्यष्टि-लिंगों एवं अन्यत्र भी व्यापक शिवतत्त्वकी समष्टि मूर्ति महादेव-लिंग है। जैसे व्यष्टि नेत्रोंका अधिष्ठाता समष्टिदेव सूर्य है, वैसे ही व्यष्टि प्रजननशक्तियोंमें व्याप्त शिवतत्त्वका समष्टिस्वरूप शिवलिंग है। जैसे व्यष्टिनेत्रकी उपासना न होकर समष्टिनेत्र सूर्यकी ही आराधना होती है और प्रतिमा भी उन्हींकी बनती है, वैसे ही समष्टि शिवमूर्तिकी ही उपासना और प्रतिमा होती है। जैसे जाग्रत्, स्वप्नकी उत्पत्ति और लय सौषुप्त तमसे ही होते हैं, वैसे ही तमसे ही सबका उद्भव और उसीमें सबका लय होता है। तमको वशमें रखकर उसके अधिष्ठाता शिव ही सर्वकारण हैं। कार्योंको कारणके आद्यन्तका पता नहीं लगता। यह कहा जा चुका है कि समस्त योनियोंका समष्टि रूप प्रकृति है, वही शिवलिंगकी पीठ या जलहरी है। योनिमें प्रतिष्ठित लिंग आनन्दप्रधान, आनन्दमय होता है। जैसे समस्त रूपोंका आश्रय चक्षु, समस्त गन्धोंका आश्रय—एकायतन—घ्राण है, वैसे ही समस्त आनन्दोंका एकायतन लिंग-योनिरूप उपस्थ है। अतएव प्रकृतिविशिष्ट दृक्रूप परमात्मा आनन्दमय कहलाता है। सुषुप्तिमें भी उसीके अंश- भूत व्यष्टि आनन्दमयका उपलम्भ होता है। प्रिय, मोद, प्रमोद, आनन्द—ये आनन्दमयके अवयव हैं, शुद्ध ब्रह्म इन सबका आधार है। जब अनन्त- ब्रह्माण्डोत्पादिनी प्रकृति समष्टियोनि है, तब अनन्तब्रह्माण्डनायक परमात्मा ही समष्टिलिंग हैं और अनन्त ब्रह्माण्ड प्रपंच ही उनसे उत्पन्न सृष्टि है। इसीलिये परमप्रकाशमय, अखण्ड, अनन्त शिवतत्त्व ही वास्तविक लिंग है और वह परम प्रकृतिरूप योनि—जलहरीमें प्रतिष्ठित है। उसीकी प्रतिकृति पाषाणमयी, धातुमयी जलहरी और लिंगरूपमें बनायी जाती है। अदूरदर्शी अज्ञ प्राणीके लिये सांसारिक सुखोंमें सर्वाधिक सुख प्रियाप्रियतम-परिष्वंग-मैथुनमें है। अतः उसके उदाहरणसे भी श्रुतियोंने अनन्त, अखण्ड, परमानन्द ब्रह्म और प्रकृतिके आनन्दमय स्वरूपको दिखलाया है। कहीं-कहीं जीवात्माके परमात्मसम्मिलन- सुखको इसी दृष्टान्त सुखसे दिखलाया गया है— तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्॥ (बृहदा० ४।३।२१)
जैसे प्रियतमाके परिरम्भणमें कामुकको आनन्दो- द्रेकसे बाह्य, आभ्यन्तर विश्व विस्मृत होता है, वैसे ही जीवको परमात्माके सम्मिलनमें प्रपंचका विस्मरण होता है। श्रुतियों एवं पुराणोंमें आध्यात्मिक, आधिदैविक तत्त्वोंका ही लौकिक भाषामें वर्णन किया जाता है, जिससे कभी-कभी अज्ञोंको उसमें अश्लीलता झलकने लगती है। गोलोकधाममें एक पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने अकेले अरमणके कारण अपने-आपको दो रूपमें प्रकट किया—एक श्याम तेज, दूसरा गौर तेज। गौर तेज राधिकामें श्यामल तेज कृष्णसे गर्भाधान होनेपर महत्तत्त्वप्रधान हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुए। यह भी प्रकृति-पुरुषके संयोगसे महत्तत्त्वादि प्रपंचका उत्पत्तिरूपक कहा गया है। ईश्वरभाव मायासे आवृत और शिवभाव अनावृत है इसीको यों भी समझ सकते हैं—जाग्रत्, स्वप्नके अभिमानी विश्व, तैजस और विराट्, हिरण्यगर्भ—ये सभी सावयव हैं। किंतु सर्वलयाधिकरण ईश्वर निरवयव है, वह मायासे आवृत होता है। अविद्याके भीतर ही रहनेवाला तो जीव है, परंतु जो ‘अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्’ के सिद्धान्तानुसार अविद्याका अतिक्रमणकर स्थित है, वही ईश्वर है। निरावरण तत्त्व शिव है। ईश्वरभाव मायासे आवृत और शिवभाव अनावृत है। माया जलहरी है, उसके भीतर आवृत ईश्वर है, जलहरीके बाहर निकला हुआ शिवलिंग निरावरण ईश्वर है। जिसका पृथक्-पृथक् अंग न व्यक्त हो, वह पिण्डके ही रूपमें रहेगा। सुषुप्तिमें प्रतीयमान विशिष्ट आत्मभावकी सूचक पिण्डी है। शिवके सम्बन्धमात्रसे प्रकृति स्वयं विकाररूपमें प्रवाहित होती है। इसलिये अर्घा गोल नहीं, किंतु दीर्घ होता है। लिंगके मूलमें ब्रह्मा, मध्यमें विष्णु, ऊपर प्रणवात्मक शंकर हैं। लिंग महेश्वर, अर्घा महादेवी हैं— मूले ब्रह्मा तथा मध्ये विष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः। रुद्रोपरि महादेवः प्रणवाख्यः सदाशिवः॥ लिङ्गवेदी महादेवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः। तयोः सम्पूजनान्नित्यं देवी देवश्च पूजितौ॥ (लिंगपुराण) चैतन्यरूप लिंगसत्ता और प्रकृतिसे ही ब्रह्माण्ड बना। उनके सहारे ही वह लयकी ओर जा सकेगा। अर्थात् शुद्ध मोक्षके लिये उसीके द्वारा पहुँचना होगा। यद्वा प्रणवमें अकार शिवलिंग है, उकार जलहरी है, मकार शिवशक्तिका सम्मिलित रूप समझ लिया जाता है। शिव-ब्रह्मका स्थूल आकार विराट् ब्रह्माण्ड है, ब्रह्माण्डके आकारका ही शिवलिंग होता है। निर्गुण ब्रह्मका बोधक होनेसे यही ब्रह्माण्ड लिंग है। अथवा उकारसे जलहरी, अकारसे पिण्डी और मकारसे त्रिगुणात्मक त्रिपुण्ड्र कहा गया है। अथवा निराकारके आकाशरूप आकार, ज्योतिःस्तम्भाकार तथा ब्रह्माण्डाकार आदि सभी स्वरूपोंमें शक्तिसहित शिवतत्त्वका ही निवेश है। सर्वरूप, पूर्ण एवं निराकारका आकार अण्डके आकारका ही होता है। मैदानमें खड़े होकर देखनेसे पृथ्वीपर टिका हुआ आकाश अर्धअण्डाकार ही मालूम होता है। पृथ्वीके ऊपर जैसे आकाश है, वैसे ही नीचे भी, दोनोंको मिलानेसे वह भी अण्डाकार ही होगी। आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति है, यही निराकारका ज्ञापक लिंग उसका स्थूल शरीर है। पंचतत्त्वात्मिका प्रकृति उसकी पीठिका है। आकाश भी अमूर्त और निराकार होनेसे विशेष रूपसे तो प्रत्यक्ष होता नहीं, फिर भी वह कुछ है—ऐसा ही निश्चय होता है। उसीका सूचक भावमय गोलाकार है। शिव-ब्रह्म निराकार होता हुआ भी सब कुछ है, निर्विशेष ही सर्वविशेषरूप होता ही है। चिदाकाशमें भी इसी तरह शिवलिंगकी भावना है। इसी अण्डाकार रेखासे सब अंक उत्पन्न होते हैं। यही किसी अंकके आगे आकर उसे दसगुना अधिक करता है। ज्योतिर्लिङ्गका स्वरूप ज्योतिर्लिंगका स्वरूप इस तरह समझना चाहिये—
शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७१ नासदासीन्नो सदासीत् तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।' (ऋक्० १०।१२९।१) 'न सन्न चासच्छिव एव केवलः।' अर्थात् पहले कुछ भी नहीं था, केवल शिव ही था। सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युत: पुरुषादधि। नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्च न मध्ये परिजग्रभन्॥ उसीसे विद्युत् पुरुष और फिर उससे निमेषादि काल-विभाग उत्पन्न हुए। वही विद्युत् पुरुष ज्योतिर्लिंग हुआ। उसका पार आदि, अन्त, मध्य कहींसे किसीको नहीं मिला। वही 'तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशु-समप्रभम्' (मनु० १।९) है। अर्थात् सूर्यके समान परम तेजोमय अण्ड उत्पन्न हुआ। तल्लिङ्गसंज्ञितं साक्षात्तेजो माहेश्वरं परम्। तदेव मूलप्रकृतिर्माया च गगनात्मिका॥ (शिवपुराण) ब्रह्माण्डपिण्ड सप्तावरण प्रकृतिरूप योनिसे आवृत-परिवेष्ठित-है। 'शिवपुराण' में लिंग शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार बतलायी गयी है— भगवन्तं महादेवं शिवलिङ्गं प्रपूजयेत्। लोकप्रसविता सूर्यस्तच्चिह्नं प्रसवाद्भवेत्॥ लिङ्गे प्रसूतकर्तारं लिङ्गिनं पुरुषो यजेत्। लिङ्गार्थगमकं चिह्नं लिङ्गमित्यभिधीयते॥ लिङ्गमर्थं हि पुरुषं शिवं गमयतीत्यदः। शिवशक्त्योश्च चिह्नस्य मेलनं लिङ्गमुच्यते॥ अर्थात् शिवशक्तिके चिह्नका सम्मेलन ही लिंग है। लिंगमें विश्वप्रसूतिकर्ताकी अर्चा करनी चाहिये। यह परमार्थ शिवतत्त्वका गमक-बोधक होनेसे भी लिंग कहलाता है। प्रणव भी भगवान्का ज्ञापक होनेसे लिंग कहा गया है। पंचाक्षर उसका स्थूल रूप है— तदेव लिङ्गं प्रथमं प्रणवं सार्वकामिकम्। सूक्ष्मप्रणवरूपं हि सूक्ष्मरूपन्तु निष्कलम्॥ स्थूललिङ्गं हि सकलं तत्पञ्चाक्षरमुच्यते। माघ कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रिके दिन कोटि-सूर्य समान परम तेजोमय शिवलिंगका प्रादुर्भाव हुआ है— माघकृष्णाचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। शिवलिङ्गतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभः॥ 'शिवपुराण' में लिखा है कि एक शिव ही ब्रह्मस्वरूप होनेसे निष्कल है, दूसरे देव सभी रूपी होनेसे सकल कहे जाते हैं। निष्कल होनेसे ही शिवका निराकार (आकारविशेषशून्य) लिंग ही पूज्य होता है, सकल होनेसे ही अन्य देवताओंका साकार विग्रह पूज्य होता है। शिव सकल, निष्कल दोनों ही हैं, अतः उनका निराकार लिंग और साकारस्वरूप दोनों ही पूज्य होते हैं। दूसरे देवता साक्षात् निष्कल ब्रह्मरूप नहीं हैं। अतएव निराकार लिंगरूपमें उनकी आराधना नहीं होती। (शि० पु० विद्येश्वरसंहिता, अध्याय ३) यहीं आगे निष्कल स्तम्भरूपमें ब्रह्मा-विष्णुका विवाद मिटानेके लिये शिवका प्रादुर्भाव वर्णित है। श्रीशिवलिंगसे ही समस्त विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और अन्तमें सबका उन्हींमें लय होता है। सबके आश्रय होनेसे और सबके लयका अधिष्ठान होनेसे भगवान् ही लिंग कहलाते हैं। अथवा कार्यद्वारा कारणरूपसे लिंगित-अवगत होनेसे ही भगवान् लिङ्गशब्दवाच्य हैं। इसलिये जब सब सृष्टिका आधार ही शिवलिंग है, तब तो फिर सर्वत्र शिवलिंगकी पूजा पायी जाय, यह ठीक ही है। अतः यह पहले अनार्योंकी पूज्य मूर्ति थी, यह सब कहना निराधार ही है। दूसरी दृष्टिसे कूटस्थ स्थाणु परब्रह्म ही शिव है। श्रीपार्वती शक्ति अपर्णा-लताके संसर्गसे यह पुराण स्थाणु कैवल्यपदवी देता है, जो कि कल्पवृक्षोंके लिये भी देना अशक्य है। स्थाणु (ठूँठ) लिंगरूपमें व्यक्त शिव है, अपर्णा जलहरी है। शिवलिंगका कुछ अंश जलहरीसे ग्रस्त है, यही योनिग्रस्त लिंग है, प्रकृति-संसृष्ट पुरुषोत्तम है— 'पीठमम्बामयं सर्वं शिवलिङ्गञ्च चिन्मयम्।'
४७२ भक्तिसुधा ऊपर महान् अंश योनिबहिर्भूत प्रकृतिसे असंस्पृष्ट है— 'पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।' प्रकृतिविशिष्ट परम ब्रह्म ही सर्वकर्ता, सर्वफलदाता है, केवल तो उदासीन है। शुद्ध शिवतत्त्व त्रिगुणातीत है, त्रिमूर्त्यन्तर्गत शिव परम बीज, तमोगुणके नियामक हैं। सत्त्वके नियमनकी अपेक्षा तमका नियमन बहुत कठिन है। सर्वसंहारक तम है, पर उसको भी वशमें रखनेवाले शिवकी विशेषता स्पष्ट ही है। एक दृष्टिसे लिंग चिह्नको भी कहा जाता है। चिह्नशून्य निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्म अलिंग है। श्रुतियाँ उसे अशब्द, अस्पर्श, अरूप बतलाती हैं। परंतु लिंगका अधिष्ठान मूल वही है। अव्यक्त तत्त्व लिंग है। मायाद्वारा एक ही परब्रह्म परमात्मासे ब्रह्माण्डरूप लिंगका प्रादुर्भाव होता है। चौबीस प्रकृति-विकृति, पचीसवाँ पुरुष, छब्बीसवाँ ईश्वर यह सब कुछ लिंग ही है। उसीसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रका आविर्भाव होता है। प्रकृतिके सत्त्व, रज, तम—इन तीनों गुणोंसे त्रिकोण योनि बनती है। प्रकृतिमें स्थित निर्विकारबोधरूप शिवतत्त्व ही लिंग है। इसीको विश्व-तैजस-प्राज्ञ, विराट्-हिरण्यगर्भ- वैश्वानर, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति, ऋक्-साम-यजुः, परा-पश्यन्ती-मध्यमा आदि त्रिकोणपीठोंमें तुरीय, प्रणव, परा वाक्स्वरूप लिंगरूपमें समझना चाहिये। 'अ, उ, म्' इस प्रणवात्मक त्रिकोणमें अर्द्धमात्रा- स्वरूप लिंग है। परमेश्वर समष्टि-व्यष्टि लिंगरूपसे प्रत्येक योनिमें प्रतिष्ठित होकर अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमयरूप पंचकोशात्मक देहोंको उत्पन्न करता है— अधितिष्ठति योनिं यो योनिं वाचैक ईश्वरः। देहं पञ्चविधं येन तमीशानं पुरातनम्॥ (लिंगपुराण २।१८।३९) लिंग-भगसे ही समस्त विश्वकी उत्पत्ति है, अतएव सभी लिंग और भगसे अंकित हैं। वेद, उपनिषद्, महाभारत, रामायण, पुराण, तन्त्र सर्वत्र ही शिवकी महिमा गायी गयी है। विष्णु, ब्रह्मा, कृष्ण, राम आदि देवाधिदेवोंने भी शिवलिंगकी अर्चा की है। सृष्टि-विस्तारकी दृष्टिसे लिंग-भगका महत्त्व समझमें आ सकता है, काम-प्रयुक्त भोगमात्रकी दृष्टिसे देखना और बात है। शंकरने कामको जलाकर सृष्टिकी बुद्धिसे ही मैथुनद्वारा सृष्टि की है, ऐसा ही औरोंको भी करना युक्त है। किसी अवसरमें दृग् और दृश्य दोनों एक ही रूप होते हैं— 'आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम्।' (श्रीमद्भा० ११।२४।२) सृष्टिसे पहले ज्ञान और अर्थ (दृश्य) एकमेव हो रहे थे। दृश्यशक्तिके उद्भव बिना सर्वसंद्रष्टा चिदात्मा भी अपनेको असत् ही मानने लगता है— 'मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसृप्तदृक्॥' (श्रीमद्भा० ३।५।२४) वह अन्तर्मुख विमर्शरूप सुप्त शक्ति ही माया पदसे कही जाती है— 'सा वा एतस्य संद्रष्टुः शक्तिः सदसदात्मिका। माया नाम महाभाग ययेदं निर्ममे विभुः ॥' (श्रीमद्भा० ३।५।२५) शिव ही शक्ति और शक्ति ही शिव हैं निरधिष्ठान शक्ति नहीं और अशक्त (शक्तिरहित) अधिष्ठान नहीं, अतः उभय उभयस्वरूप ही हैं। इसीलिये शिव ही शक्ति और शक्ति ही शिव हैं, इस दृष्टिसे योनि लिंगात्मक एवं लिंग योन्यात्मक है। फिर भी इस द्वैतमें अद्वैततत्त्व अनुस्यूत है। ईश्वर और महाशक्तिकी अधिष्ठानभूत अद्वैतसत्ता भी निरंजन, निष्कलसत्ताके साथ एकीभूत है। यह सृष्टिका बीज होनेपर भी निःस्पन्द शिवमात्र है। अव्यक्त अवस्था अलिंगावस्था भी है। इसे महालिंगावस्था भी कहा जा सकता है। अव्यक्तसे तेजोमय, ज्योतिर्मय तत्त्व आविर्भूत होता है। वह स्वयं उत्पन्न होनेसे स्वयम्भू लिंग है। वह अव्यक्त अवस्थाका परिचायक होनेसे लिंग है। परमार्थतः द्वैतशून्य तत्त्व है। योनि त्रिकोण
शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७३ है, केन्द्र या मध्यबिन्दु लिंग है— मूलाधारे त्रिकोणाख्ये इच्छाज्ञानक्रियात्मके। मध्ये स्वयम्भुलिङ्कन्तु कोटिसूर्यसमप्रभम् ॥ इस वचनमें इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक योनिमें कोटिसूर्यसमप्रभ स्वयम्भू चिज्ज्योतिस्वरूप शिवलिंग माना गया है। मूलाधार आदि षट्चक्र भी योनि ही है। सर्वत्र यही लिंग भी भिन्न-भिन्न रूपमें विराजमान है। योनिसे अतीत होकर बिन्दु अव्यक्त और लिंग अलिंग हो जाता है। कोई गुण, कर्म, द्रव्य बिना योनि-लिंगके नहीं बन सकते। याज्ञिकोंके यहाँ भी वेदीकी स्त्री-रूपमें, कुण्डकी योनिरूपमें और अग्नि- रुद्रकी लिंगरूपमें उपासना होती है। शिवलिंग योनिरूपा कुण्डलिनीसे परिवेष्टित एक समय देवी पार्वतीने भगवान् शंकरसे प्रश्न किया कि 'इन्द्रियोंसे रहित देव शून्यरूप है, उसका कोई आकार नहीं है, उस शून्यके पूजनसे क्या फल ?' शिवजीने कहा- 'महेशानि ! शक्तिशून्य शिव शव या प्रेतके ही समान है। उसकी पूजा नहीं बन सकती, अतः रौद्री शक्तिसहित ही उनकी पूजा होनी चाहिये। वही ब्रह्मा-विष्णु-शिवात्मिका आद्याशक्ति सार्द्धत्रिवलया (साढ़े तीन फेरेकी) कुण्डलिनीरूपा है। वह शिवतत्त्वको अपने साढ़े तीन फेरेसे वेष्टित किये हुए है। उसी शक्तिके संयोगसे शिव अनन्त ब्रह्माण्डका उत्पादनादि कार्य करते हैं। वही कुण्डलिनी योनि है, उससे परिवेष्टित शिवलिंग है। यही अपर्णालतापरिवेष्टित स्थाणु भी है, अपर्णा पार्वती योनि है, कूटस्थ ब्रह्म ही स्थाणु, हूँठ या लिंग है— देव्युवाच इन्द्रियै रहितो देवः शून्यरूपः सदाशिवः । आकारो नास्ति देवस्य किं तस्य पूजने फलम् ॥ शिव उवाच प्रेते पूजा महेशानि कदाचिन्नास्ति पार्वती । रुद्रस्य परमेशानि रौद्रीशक्तिरितीरिता ॥ रौद्री तु परमेशानि आद्या कुण्डलिनी भवेत् । वर्तते परमेशानि ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका ॥ सार्द्धत्रिवलयाकारैः शिवं वेष्ट्य सदा स्थिता। शक्तिं विना महेशानि प्रेतत्वं तस्य निश्चितम् ॥ शक्तिसंयोगमात्रेण कर्मकर्ता सदाशिवः । अतएव महेशानि पूजयेच्छिवलिङ्गकम् ॥ (लिंगार्चनतन्त्र पटल २) लिंगपूजनसे भुक्ति एवं मुक्ति 'स्कन्दपुराण' के अनुसार लिंगपूजनके बिना महान् अमंगल होता है और उसके पूजनसे भुक्ति, मुक्ति सब कुछ मिलती है— विना लिङ्गार्चनं यस्य कालो गच्छति नित्यशः । महाहानिर्भवेत्तस्य दुर्गतस्य दुरात्मनः ॥ एकतः सर्वदानानि व्रतानि विविधानि च। तीर्थानि नियमा यज्ञा लिङ्गाराधनमेकतः ॥ भुक्तिमुक्तिप्रदं लिङ्गं विविधापन्निवारणम् । यद्यपि शिवलिंग और उसकी पूजा अनादिकालसे ही है तथापि उनके आविर्भावका पुराणोंमें वर्णन है— ब्रह्मा, विष्णु दोनों ही 'मैं बड़ा हूँ' ऐसा कहकर परस्पर लड़ रहे थे। उनका विवाद मिटानेके लिये परमज्योतिर्मय लिंगका आविर्भाव हुआ। ब्रह्मा भगवान्के उस ज्योतिर्मयलिंगका पता लगानेके लिये हंसपर आरूढ़ होकर ऊपरकी ओर गये और विष्णु वराहरूप धारणकर नीचे गये। हजारों वर्षतक घोर परिश्रम करनेपर भी दोनोंको उसका कहीं आद्यन्त न मिला। शिवलिंगके मस्तकसे गिरती हुई केतकीने कहा कि 'मैं दस कल्पसे चलते यहाँतक पहुँची हूँ, अभी कुछ ठिकाना नहीं कि कितना जाना पड़ेगा।' इससे शिवलिंगकी अनन्तता मालूम पड़ती है। दिव्यवाणीसे भगवान्ने ब्रह्मा, विष्णु दोनोंहीको प्रबोध कराया। अन्यत्र पृथ्वीको पीठ और आकाशको लिंग कहा है। जैसे वेदीपर लिंग विराजता है, वैसे ही पृथ्वीपर आकाश है। जैसे ब्रह्मका एक देश ही प्रकृति-संस्पृष्ट है, वैसे ही आकाशलिंगका भी एक देश ही पृथ्वीसंस्पृष्ट है। इसीलिये कहीं लिंग ठीक पुरुषके जननेन्द्रियके समान ही होता है, कहीं ब्रह्माण्डके आकारका, कहीं पिण्डके आकारका।
केदारेश्वरकी नित्यसिद्ध स्वयम्भू मूर्ति कहीं भी लिंगके आकारकी नहीं है। वही कारणावस्था या पिण्डावस्थाका चिह्न ही लिंग समझना चाहिये। वस्तुदृष्टिसे फिर भी वह लिंग ही है। आधुनिक वैज्ञानिकोंकी भी दृष्टिसे आकाश वक्र है जैसा कि लिंगका स्वरूप है। किं बहुना देश, काल, वस्तु सभी वक्र हैं, ब्रह्मको भी वक्र और स्तब्ध कहा है। फिर उससे उत्पन्न सबको वक्र होना ही चाहिये। अनन्तकोटि विश्व सब लिंगमय ही है। विश्वोंसे परे सगुण ब्रह्मका भी आकार लिंग ही है। शिवशक्तिके सहवासमें अवकाश न मिलनेसे शुक्राचार्यने उन्हें शाप दिया कि तुम योनिस्थ लिंगके रूपमें पूजित होगे। एकबार शंकर दिगम्बर वेशसे स्वलिंग अपने हस्तमें लेकर दारुकवनमें गये। उन्हें देखकर ऋषिपत्नियां मोहित हो गयीं, यह देखकर ऋषियोंने शंकरको शाप दिया कि तुम्हारा लिंग गिर जाय। ऐसा ही हुआ, किंतु लिंगके पृथ्वीपर गिरते ही वह प्रज्वलित होकर अपने तेजसे लोकको जलाने लगा। अन्तमें शिवाने उसे योनिमें स्थापित किया और सब ऋषियों और देवताओंने उसकी पूजा की। यहाँ लिंग-योनि दिव्यप्रकृति और परम पुरुष ही हैं। शिवशक्तिरूप लिंग-योनिको प्राकृत स्त्री-पुरुषके समान चर्मखण्ड मूत्रेन्द्रियमात्र मान लेना बड़ा अपराध होगा। वहीं यह भी कथा है कि मुनियोंके शापसे गिरा हुआ शिवलिंग अग्निके समान जाज्वल्यमान होकर भूमि, स्वर्ग एवं पातालमें फिरा, सभी लोक बड़े दुःखी हुए। ब्रह्माजीने कहा कि 'गिरिजाकी प्रार्थना करो, वे ही योनिरूपसे परमज्योतिर्मय लिंगको धारण कर सकती हैं।' फिर सब देवताओं एवं मुनियोंने जब आराधना की, तब भगवान् और गिरिजा प्रसन्न हुए और गिरिजामें शिवकी प्रतिष्ठा हुई। क्या साधारण लिंगका गिरकर अग्निमय होकर सर्व लोकोंमें घूमना बन सकता है ? और विष्णु, राम, कृष्ण तथा सभी देव, मुनि क्या केवल साधारण लिंग-योनिकी ही पूजा करते थे ? यदि यही बात थी, तो कृष्णकी उपमन्युके यहाँ जाकर दीक्षापूर्वक शिवाराधनके लिये घोर तपस्या करनेकी क्या आवश्यकता थी ? कुछ लोग कथामें आये हुए उक्त शिवलिंगको केवल ब्रह्माण्ड कहते हैं, उसीको हाथमें लिये हुए भगवान् लीलया दारुकवनमें गये थे, वहीं मुनियोंके शापसे उनके हाथसे लिंग गिर पड़ा। अतएव वहाँ उसका 'गिरना' कहा गया है, 'कटना' नहीं। उस ज्योतिर्लिंग ब्राह्म तेजका आधार पंचतत्त्वात्मिका प्रकृति ही योनि है। अतः पार्वतीने योनिरूपसे उस लिंगको धारण किया अर्थात् पंचतत्त्वात्मिका प्रकृति बनकर उन्होंने ब्रह्माण्डको धारण किया। अग्निमय सर्वदाहक लिंगको योनि-प्राकृत चर्मखण्ड मूत्रेन्द्रियमें कौन धारण कर सकता था ? 'बाणरूपा श्रुता लोके पार्वती शिववल्लभा।' योनिरूपाका अर्थ ही बाणरूपा है। 'बाण' शब्द पाँच संख्याका बोधक होता है, पंचशरके अभिप्रायसे काममें, पंचमुखके अभिप्रायसे शिवमें, पंचतत्त्वात्मिकाकी दृष्टिसे पार्वतीमें 'बाण' शब्दका प्रयोग होता है। जैसे विद्युत-पुंज पंचतत्त्वमें व्याप्त होते हुए भी जल और पर्वतश्रेणीमें अधिकतासे रहता है, वैसे ही पार्वती बाणरूपा हुईं अर्थात् पर्वतश्रेणीरूपा हुईं और उन्हींमें वह तेजोमय लिंग समा गया। विद्युत्-पुंज यदि अपनी योनि पृथ्वी या जलमें पड़े तो स्थिर होता है, अन्यथा वृक्ष, मनुष्य सबको भस्म ही करता है। यही बात शिवजीने कहा है- पार्वतीञ्च विना नान्या लिङ्गं धारयितुं क्षमा। तया धृतञ्च मल्लिङ्गं द्रुतं शान्तिं गमिष्यति ॥ अर्थात् पार्वतीके बिना कोई इसे नहीं धारण कर सकता, उनके धारणसे वह शीघ्र ही शान्त हो जायगा। 'सतश्च योनिमसतश्च।' (यजु०) 'यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येकः।' (श्वेता० ४।११) 'यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः।' (श्वेता० ५।५) 'तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीराः।' (यजु०)