भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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जैसे प्रियतमाके परिरम्भणमें कामुकको आनन्दो- द्रेकसे बाह्य, आभ्यन्तर विश्व विस्मृत होता है, वैसे ही जीवको परमात्माके सम्मिलनमें प्रपंचका विस्मरण होता है। श्रुतियों एवं पुराणोंमें आध्यात्मिक, आधिदैविक तत्त्वोंका ही लौकिक भाषामें वर्णन किया जाता है, जिससे कभी-कभी अज्ञोंको उसमें अश्लीलता झलकने लगती है। गोलोकधाममें एक पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने अकेले अरमणके कारण अपने-आपको दो रूपमें प्रकट किया—एक श्याम तेज, दूसरा गौर तेज। गौर तेज राधिकामें श्यामल तेज कृष्णसे गर्भाधान होनेपर महत्तत्त्वप्रधान हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुए। यह भी प्रकृति-पुरुषके संयोगसे महत्तत्त्वादि प्रपंचका उत्पत्तिरूपक कहा गया है। ईश्वरभाव मायासे आवृत और शिवभाव अनावृत है इसीको यों भी समझ सकते हैं—जाग्रत्, स्वप्नके अभिमानी विश्व, तैजस और विराट्, हिरण्यगर्भ—ये सभी सावयव हैं। किंतु सर्वलयाधिकरण ईश्वर निरवयव है, वह मायासे आवृत होता है। अविद्याके भीतर ही रहनेवाला तो जीव है, परंतु जो ‘अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्’ के सिद्धान्तानुसार अविद्याका अतिक्रमणकर स्थित है, वही ईश्वर है। निरावरण तत्त्व शिव है। ईश्वरभाव मायासे आवृत और शिवभाव अनावृत है। माया जलहरी है, उसके भीतर आवृत ईश्वर है, जलहरीके बाहर निकला हुआ शिवलिंग निरावरण ईश्वर है। जिसका पृथक्-पृथक् अंग न व्यक्त हो, वह पिण्डके ही रूपमें रहेगा। सुषुप्तिमें प्रतीयमान विशिष्ट आत्मभावकी सूचक पिण्डी है। शिवके सम्बन्धमात्रसे प्रकृति स्वयं विकाररूपमें प्रवाहित होती है। इसलिये अर्घा गोल नहीं, किंतु दीर्घ होता है। लिंगके मूलमें ब्रह्मा, मध्यमें विष्णु, ऊपर प्रणवात्मक शंकर हैं। लिंग महेश्वर, अर्घा महादेवी हैं— मूले ब्रह्मा तथा मध्ये विष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः। रुद्रोपरि महादेवः प्रणवाख्यः सदाशिवः॥ लिङ्गवेदी महादेवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः। तयोः सम्पूजनान्नित्यं देवी देवश्च पूजितौ॥ (लिंगपुराण) चैतन्यरूप लिंगसत्ता और प्रकृतिसे ही ब्रह्माण्ड बना। उनके सहारे ही वह लयकी ओर जा सकेगा। अर्थात् शुद्ध मोक्षके लिये उसीके द्वारा पहुँचना होगा। यद्वा प्रणवमें अकार शिवलिंग है, उकार जलहरी है, मकार शिवशक्तिका सम्मिलित रूप समझ लिया जाता है। शिव-ब्रह्मका स्थूल आकार विराट् ब्रह्माण्ड है, ब्रह्माण्डके आकारका ही शिवलिंग होता है। निर्गुण ब्रह्मका बोधक होनेसे यही ब्रह्माण्ड लिंग है। अथवा उकारसे जलहरी, अकारसे पिण्डी और मकारसे त्रिगुणात्मक त्रिपुण्ड्र कहा गया है। अथवा निराकारके आकाशरूप आकार, ज्योतिःस्तम्भाकार तथा ब्रह्माण्डाकार आदि सभी स्वरूपोंमें शक्तिसहित शिवतत्त्वका ही निवेश है। सर्वरूप, पूर्ण एवं निराकारका आकार अण्डके आकारका ही होता है। मैदानमें खड़े होकर देखनेसे पृथ्वीपर टिका हुआ आकाश अर्धअण्डाकार ही मालूम होता है। पृथ्वीके ऊपर जैसे आकाश है, वैसे ही नीचे भी, दोनोंको मिलानेसे वह भी अण्डाकार ही होगी। आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति है, यही निराकारका ज्ञापक लिंग उसका स्थूल शरीर है। पंचतत्त्वात्मिका प्रकृति उसकी पीठिका है। आकाश भी अमूर्त और निराकार होनेसे विशेष रूपसे तो प्रत्यक्ष होता नहीं, फिर भी वह कुछ है—ऐसा ही निश्चय होता है। उसीका सूचक भावमय गोलाकार है। शिव-ब्रह्म निराकार होता हुआ भी सब कुछ है, निर्विशेष ही सर्वविशेषरूप होता ही है। चिदाकाशमें भी इसी तरह शिवलिंगकी भावना है। इसी अण्डाकार रेखासे सब अंक उत्पन्न होते हैं। यही किसी अंकके आगे आकर उसे दसगुना अधिक करता है। ज्योतिर्लिङ्गका स्वरूप ज्योतिर्लिंगका स्वरूप इस तरह समझना चाहिये—