भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७१ नासदासीन्नो सदासीत् तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।' (ऋक्० १०।१२९।१) 'न सन्न चासच्छिव एव केवलः।' अर्थात् पहले कुछ भी नहीं था, केवल शिव ही था। सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युत: पुरुषादधि। नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्च न मध्ये परिजग्रभन्॥ उसीसे विद्युत् पुरुष और फिर उससे निमेषादि काल-विभाग उत्पन्न हुए। वही विद्युत् पुरुष ज्योतिर्लिंग हुआ। उसका पार आदि, अन्त, मध्य कहींसे किसीको नहीं मिला। वही 'तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशु-समप्रभम्' (मनु० १।९) है। अर्थात् सूर्यके समान परम तेजोमय अण्ड उत्पन्न हुआ। तल्लिङ्गसंज्ञितं साक्षात्तेजो माहेश्वरं परम्। तदेव मूलप्रकृतिर्माया च गगनात्मिका॥ (शिवपुराण) ब्रह्माण्डपिण्ड सप्तावरण प्रकृतिरूप योनिसे आवृत-परिवेष्ठित-है। 'शिवपुराण' में लिंग शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार बतलायी गयी है— भगवन्तं महादेवं शिवलिङ्गं प्रपूजयेत्। लोकप्रसविता सूर्यस्तच्चिह्नं प्रसवाद्भवेत्॥ लिङ्गे प्रसूतकर्तारं लिङ्गिनं पुरुषो यजेत्। लिङ्गार्थगमकं चिह्नं लिङ्गमित्यभिधीयते॥ लिङ्गमर्थं हि पुरुषं शिवं गमयतीत्यदः। शिवशक्त्योश्च चिह्नस्य मेलनं लिङ्गमुच्यते॥ अर्थात् शिवशक्तिके चिह्नका सम्मेलन ही लिंग है। लिंगमें विश्वप्रसूतिकर्ताकी अर्चा करनी चाहिये। यह परमार्थ शिवतत्त्वका गमक-बोधक होनेसे भी लिंग कहलाता है। प्रणव भी भगवान्‌का ज्ञापक होनेसे लिंग कहा गया है। पंचाक्षर उसका स्थूल रूप है— तदेव लिङ्गं प्रथमं प्रणवं सार्वकामिकम्। सूक्ष्मप्रणवरूपं हि सूक्ष्मरूपन्तु निष्कलम्॥ स्थूललिङ्गं हि सकलं तत्पञ्चाक्षरमुच्यते। माघ कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रिके दिन कोटि-सूर्य समान परम तेजोमय शिवलिंगका प्रादुर्भाव हुआ है— माघकृष्णाचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। शिवलिङ्गतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभः॥ 'शिवपुराण' में लिखा है कि एक शिव ही ब्रह्मस्वरूप होनेसे निष्कल है, दूसरे देव सभी रूपी होनेसे सकल कहे जाते हैं। निष्कल होनेसे ही शिवका निराकार (आकारविशेषशून्य) लिंग ही पूज्य होता है, सकल होनेसे ही अन्य देवताओंका साकार विग्रह पूज्य होता है। शिव सकल, निष्कल दोनों ही हैं, अतः उनका निराकार लिंग और साकारस्वरूप दोनों ही पूज्य होते हैं। दूसरे देवता साक्षात् निष्कल ब्रह्मरूप नहीं हैं। अतएव निराकार लिंगरूपमें उनकी आराधना नहीं होती। (शि० पु० विद्येश्वरसंहिता, अध्याय ३) यहीं आगे निष्कल स्तम्भरूपमें ब्रह्मा-विष्णुका विवाद मिटानेके लिये शिवका प्रादुर्भाव वर्णित है। श्रीशिवलिंगसे ही समस्त विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और अन्तमें सबका उन्हींमें लय होता है। सबके आश्रय होनेसे और सबके लयका अधिष्ठान होनेसे भगवान् ही लिंग कहलाते हैं। अथवा कार्यद्वारा कारणरूपसे लिंगित-अवगत होनेसे ही भगवान् लिङ्गशब्दवाच्य हैं। इसलिये जब सब सृष्टिका आधार ही शिवलिंग है, तब तो फिर सर्वत्र शिवलिंगकी पूजा पायी जाय, यह ठीक ही है। अतः यह पहले अनार्योंकी पूज्य मूर्ति थी, यह सब कहना निराधार ही है। दूसरी दृष्टिसे कूटस्थ स्थाणु परब्रह्म ही शिव है। श्रीपार्वती शक्ति अपर्णा-लताके संसर्गसे यह पुराण स्थाणु कैवल्यपदवी देता है, जो कि कल्पवृक्षोंके लिये भी देना अशक्य है। स्थाणु (ठूँठ) लिंगरूपमें व्यक्त शिव है, अपर्णा जलहरी है। शिवलिंगका कुछ अंश जलहरीसे ग्रस्त है, यही योनिग्रस्त लिंग है, प्रकृति-संसृष्ट पुरुषोत्तम है— 'पीठमम्बामयं सर्वं शिवलिङ्गञ्च चिन्मयम्।'