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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७१ नासदासीन्नो सदासीत् तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।' (ऋक्० १०।१२९।१) 'न सन्न चासच्छिव एव केवलः।' अर्थात् पहले कुछ भी नहीं था, केवल शिव ही था। सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युत: पुरुषादधि। नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्च न मध्ये परिजग्रभन्॥ उसीसे विद्युत् पुरुष और फिर उससे निमेषादि काल-विभाग उत्पन्न हुए। वही विद्युत् पुरुष ज्योतिर्लिंग हुआ। उसका पार आदि, अन्त, मध्य कहींसे किसीको नहीं मिला। वही 'तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशु-समप्रभम्' (मनु० १।९) है। अर्थात् सूर्यके समान परम तेजोमय अण्ड उत्पन्न हुआ। तल्लिङ्गसंज्ञितं साक्षात्तेजो माहेश्वरं परम्। तदेव मूलप्रकृतिर्माया च गगनात्मिका॥ (शिवपुराण) ब्रह्माण्डपिण्ड सप्तावरण प्रकृतिरूप योनिसे आवृत-परिवेष्ठित-है। 'शिवपुराण' में लिंग शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार बतलायी गयी है— भगवन्तं महादेवं शिवलिङ्गं प्रपूजयेत्। लोकप्रसविता सूर्यस्तच्चिह्नं प्रसवाद्भवेत्॥ लिङ्गे प्रसूतकर्तारं लिङ्गिनं पुरुषो यजेत्। लिङ्गार्थगमकं चिह्नं लिङ्गमित्यभिधीयते॥ लिङ्गमर्थं हि पुरुषं शिवं गमयतीत्यदः। शिवशक्त्योश्च चिह्नस्य मेलनं लिङ्गमुच्यते॥ अर्थात् शिवशक्तिके चिह्नका सम्मेलन ही लिंग है। लिंगमें विश्वप्रसूतिकर्ताकी अर्चा करनी चाहिये। यह परमार्थ शिवतत्त्वका गमक-बोधक होनेसे भी लिंग कहलाता है। प्रणव भी भगवान्‌का ज्ञापक होनेसे लिंग कहा गया है। पंचाक्षर उसका स्थूल रूप है— तदेव लिङ्गं प्रथमं प्रणवं सार्वकामिकम्। सूक्ष्मप्रणवरूपं हि सूक्ष्मरूपन्तु निष्कलम्॥ स्थूललिङ्गं हि सकलं तत्पञ्चाक्षरमुच्यते। माघ कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रिके दिन कोटि-सूर्य समान परम तेजोमय शिवलिंगका प्रादुर्भाव हुआ है— माघकृष्णाचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। शिवलिङ्गतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभः॥ 'शिवपुराण' में लिखा है कि एक शिव ही ब्रह्मस्वरूप होनेसे निष्कल है, दूसरे देव सभी रूपी होनेसे सकल कहे जाते हैं। निष्कल होनेसे ही शिवका निराकार (आकारविशेषशून्य) लिंग ही पूज्य होता है, सकल होनेसे ही अन्य देवताओंका साकार विग्रह पूज्य होता है। शिव सकल, निष्कल दोनों ही हैं, अतः उनका निराकार लिंग और साकारस्वरूप दोनों ही पूज्य होते हैं। दूसरे देवता साक्षात् निष्कल ब्रह्मरूप नहीं हैं। अतएव निराकार लिंगरूपमें उनकी आराधना नहीं होती। (शि० पु० विद्येश्वरसंहिता, अध्याय ३) यहीं आगे निष्कल स्तम्भरूपमें ब्रह्मा-विष्णुका विवाद मिटानेके लिये शिवका प्रादुर्भाव वर्णित है। श्रीशिवलिंगसे ही समस्त विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और अन्तमें सबका उन्हींमें लय होता है। सबके आश्रय होनेसे और सबके लयका अधिष्ठान होनेसे भगवान् ही लिंग कहलाते हैं। अथवा कार्यद्वारा कारणरूपसे लिंगित-अवगत होनेसे ही भगवान् लिङ्गशब्दवाच्य हैं। इसलिये जब सब सृष्टिका आधार ही शिवलिंग है, तब तो फिर सर्वत्र शिवलिंगकी पूजा पायी जाय, यह ठीक ही है। अतः यह पहले अनार्योंकी पूज्य मूर्ति थी, यह सब कहना निराधार ही है। दूसरी दृष्टिसे कूटस्थ स्थाणु परब्रह्म ही शिव है। श्रीपार्वती शक्ति अपर्णा-लताके संसर्गसे यह पुराण स्थाणु कैवल्यपदवी देता है, जो कि कल्पवृक्षोंके लिये भी देना अशक्य है। स्थाणु (ठूँठ) लिंगरूपमें व्यक्त शिव है, अपर्णा जलहरी है। शिवलिंगका कुछ अंश जलहरीसे ग्रस्त है, यही योनिग्रस्त लिंग है, प्रकृति-संसृष्ट पुरुषोत्तम है— 'पीठमम्बामयं सर्वं शिवलिङ्गञ्च चिन्मयम्।'

४७२ भक्तिसुधा ऊपर महान् अंश योनिबहिर्भूत प्रकृतिसे असंस्पृष्ट है— 'पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।' प्रकृतिविशिष्ट परम ब्रह्म ही सर्वकर्ता, सर्वफलदाता है, केवल तो उदासीन है। शुद्ध शिवतत्त्व त्रिगुणातीत है, त्रिमूर्त्यन्तर्गत शिव परम बीज, तमोगुणके नियामक हैं। सत्त्वके नियमनकी अपेक्षा तमका नियमन बहुत कठिन है। सर्वसंहारक तम है, पर उसको भी वशमें रखनेवाले शिवकी विशेषता स्पष्ट ही है। एक दृष्टिसे लिंग चिह्नको भी कहा जाता है। चिह्नशून्य निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्म अलिंग है। श्रुतियाँ उसे अशब्द, अस्पर्श, अरूप बतलाती हैं। परंतु लिंगका अधिष्ठान मूल वही है। अव्यक्त तत्त्व लिंग है। मायाद्वारा एक ही परब्रह्म परमात्मासे ब्रह्माण्डरूप लिंगका प्रादुर्भाव होता है। चौबीस प्रकृति-विकृति, पचीसवाँ पुरुष, छब्बीसवाँ ईश्वर यह सब कुछ लिंग ही है। उसीसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रका आविर्भाव होता है। प्रकृतिके सत्त्व, रज, तम—इन तीनों गुणोंसे त्रिकोण योनि बनती है। प्रकृतिमें स्थित निर्विकारबोधरूप शिवतत्त्व ही लिंग है। इसीको विश्व-तैजस-प्राज्ञ, विराट्-हिरण्यगर्भ- वैश्वानर, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति, ऋक्-साम-यजुः, परा-पश्यन्ती-मध्यमा आदि त्रिकोणपीठोंमें तुरीय, प्रणव, परा वाक्स्वरूप लिंगरूपमें समझना चाहिये। 'अ, उ, म्' इस प्रणवात्मक त्रिकोणमें अर्द्धमात्रा- स्वरूप लिंग है। परमेश्वर समष्टि-व्यष्टि लिंगरूपसे प्रत्येक योनिमें प्रतिष्ठित होकर अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमयरूप पंचकोशात्मक देहोंको उत्पन्न करता है— अधितिष्ठति योनिं यो योनिं वाचैक ईश्वरः। देहं पञ्चविधं येन तमीशानं पुरातनम्॥ (लिंगपुराण २।१८।३९) लिंग-भगसे ही समस्त विश्वकी उत्पत्ति है, अतएव सभी लिंग और भगसे अंकित हैं। वेद, उपनिषद्, महाभारत, रामायण, पुराण, तन्त्र सर्वत्र ही शिवकी महिमा गायी गयी है। विष्णु, ब्रह्मा, कृष्ण, राम आदि देवाधिदेवोंने भी शिवलिंगकी अर्चा की है। सृष्टि-विस्तारकी दृष्टिसे लिंग-भगका महत्त्व समझमें आ सकता है, काम-प्रयुक्त भोगमात्रकी दृष्टिसे देखना और बात है। शंकरने कामको जलाकर सृष्टिकी बुद्धिसे ही मैथुनद्वारा सृष्टि की है, ऐसा ही औरोंको भी करना युक्त है। किसी अवसरमें दृग् और दृश्य दोनों एक ही रूप होते हैं— 'आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम्।' (श्रीमद्भा० ११।२४।२) सृष्टिसे पहले ज्ञान और अर्थ (दृश्य) एकमेव हो रहे थे। दृश्यशक्तिके उद्भव बिना सर्वसंद्रष्टा चिदात्मा भी अपनेको असत् ही मानने लगता है— 'मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसृप्तदृक्॥' (श्रीमद्भा० ३।५।२४) वह अन्तर्मुख विमर्शरूप सुप्त शक्ति ही माया पदसे कही जाती है— 'सा वा एतस्य संद्रष्टुः शक्तिः सदसदात्मिका। माया नाम महाभाग ययेदं निर्ममे विभुः ॥' (श्रीमद्भा० ३।५।२५) शिव ही शक्ति और शक्ति ही शिव हैं निरधिष्ठान शक्ति नहीं और अशक्त (शक्तिरहित) अधिष्ठान नहीं, अतः उभय उभयस्वरूप ही हैं। इसीलिये शिव ही शक्ति और शक्ति ही शिव हैं, इस दृष्टिसे योनि लिंगात्मक एवं लिंग योन्यात्मक है। फिर भी इस द्वैतमें अद्वैततत्त्व अनुस्यूत है। ईश्वर और महाशक्तिकी अधिष्ठानभूत अद्वैतसत्ता भी निरंजन, निष्कलसत्ताके साथ एकीभूत है। यह सृष्टिका बीज होनेपर भी निःस्पन्द शिवमात्र है। अव्यक्त अवस्था अलिंगावस्था भी है। इसे महालिंगावस्था भी कहा जा सकता है। अव्यक्तसे तेजोमय, ज्योतिर्मय तत्त्व आविर्भूत होता है। वह स्वयं उत्पन्न होनेसे स्वयम्भू लिंग है। वह अव्यक्त अवस्थाका परिचायक होनेसे लिंग है। परमार्थतः द्वैतशून्य तत्त्व है। योनि त्रिकोण

शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७३ है, केन्द्र या मध्यबिन्दु लिंग है— मूलाधारे त्रिकोणाख्ये इच्छाज्ञानक्रियात्मके। मध्ये स्वयम्भुलिङ्कन्तु कोटिसूर्यसमप्रभम् ॥ इस वचनमें इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक योनिमें कोटिसूर्यसमप्रभ स्वयम्भू चिज्ज्योतिस्वरूप शिवलिंग माना गया है। मूलाधार आदि षट्चक्र भी योनि ही है। सर्वत्र यही लिंग भी भिन्न-भिन्न रूपमें विराजमान है। योनिसे अतीत होकर बिन्दु अव्यक्त और लिंग अलिंग हो जाता है। कोई गुण, कर्म, द्रव्य बिना योनि-लिंगके नहीं बन सकते। याज्ञिकोंके यहाँ भी वेदीकी स्त्री-रूपमें, कुण्डकी योनिरूपमें और अग्नि- रुद्रकी लिंगरूपमें उपासना होती है। शिवलिंग योनिरूपा कुण्डलिनीसे परिवेष्टित एक समय देवी पार्वतीने भगवान् शंकरसे प्रश्न किया कि 'इन्द्रियोंसे रहित देव शून्यरूप है, उसका कोई आकार नहीं है, उस शून्यके पूजनसे क्या फल ?' शिवजीने कहा- 'महेशानि ! शक्तिशून्य शिव शव या प्रेतके ही समान है। उसकी पूजा नहीं बन सकती, अतः रौद्री शक्तिसहित ही उनकी पूजा होनी चाहिये। वही ब्रह्मा-विष्णु-शिवात्मिका आद्याशक्ति सार्द्धत्रिवलया (साढ़े तीन फेरेकी) कुण्डलिनीरूपा है। वह शिवतत्त्वको अपने साढ़े तीन फेरेसे वेष्टित किये हुए है। उसी शक्तिके संयोगसे शिव अनन्त ब्रह्माण्डका उत्पादनादि कार्य करते हैं। वही कुण्डलिनी योनि है, उससे परिवेष्टित शिवलिंग है। यही अपर्णालतापरिवेष्टित स्थाणु भी है, अपर्णा पार्वती योनि है, कूटस्थ ब्रह्म ही स्थाणु, हूँठ या लिंग है— देव्युवाच इन्द्रियै रहितो देवः शून्यरूपः सदाशिवः । आकारो नास्ति देवस्य किं तस्य पूजने फलम् ॥ शिव उवाच प्रेते पूजा महेशानि कदाचिन्नास्ति पार्वती । रुद्रस्य परमेशानि रौद्रीशक्तिरितीरिता ॥ रौद्री तु परमेशानि आद्या कुण्डलिनी भवेत् । वर्तते परमेशानि ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका ॥ सार्द्धत्रिवलयाकारैः शिवं वेष्ट्य सदा स्थिता। शक्तिं विना महेशानि प्रेतत्वं तस्य निश्चितम् ॥ शक्तिसंयोगमात्रेण कर्मकर्ता सदाशिवः । अतएव महेशानि पूजयेच्छिवलिङ्गकम् ॥ (लिंगार्चनतन्त्र पटल २) लिंगपूजनसे भुक्ति एवं मुक्ति 'स्कन्दपुराण' के अनुसार लिंगपूजनके बिना महान् अमंगल होता है और उसके पूजनसे भुक्ति, मुक्ति सब कुछ मिलती है— विना लिङ्गार्चनं यस्य कालो गच्छति नित्यशः । महाहानिर्भवेत्तस्य दुर्गतस्य दुरात्मनः ॥ एकतः सर्वदानानि व्रतानि विविधानि च। तीर्थानि नियमा यज्ञा लिङ्गाराधनमेकतः ॥ भुक्तिमुक्तिप्रदं लिङ्गं विविधापन्निवारणम् । यद्यपि शिवलिंग और उसकी पूजा अनादिकालसे ही है तथापि उनके आविर्भावका पुराणोंमें वर्णन है— ब्रह्मा, विष्णु दोनों ही 'मैं बड़ा हूँ' ऐसा कहकर परस्पर लड़ रहे थे। उनका विवाद मिटानेके लिये परमज्योतिर्मय लिंगका आविर्भाव हुआ। ब्रह्मा भगवान्‌के उस ज्योतिर्मयलिंगका पता लगानेके लिये हंसपर आरूढ़ होकर ऊपरकी ओर गये और विष्णु वराहरूप धारणकर नीचे गये। हजारों वर्षतक घोर परिश्रम करनेपर भी दोनोंको उसका कहीं आद्यन्त न मिला। शिवलिंगके मस्तकसे गिरती हुई केतकीने कहा कि 'मैं दस कल्पसे चलते यहाँतक पहुँची हूँ, अभी कुछ ठिकाना नहीं कि कितना जाना पड़ेगा।' इससे शिवलिंगकी अनन्तता मालूम पड़ती है। दिव्यवाणीसे भगवान्‌ने ब्रह्मा, विष्णु दोनोंहीको प्रबोध कराया। अन्यत्र पृथ्वीको पीठ और आकाशको लिंग कहा है। जैसे वेदीपर लिंग विराजता है, वैसे ही पृथ्वीपर आकाश है। जैसे ब्रह्मका एक देश ही प्रकृति-संस्पृष्ट है, वैसे ही आकाशलिंगका भी एक देश ही पृथ्वीसंस्पृष्ट है। इसीलिये कहीं लिंग ठीक पुरुषके जननेन्द्रियके समान ही होता है, कहीं ब्रह्माण्डके आकारका, कहीं पिण्डके आकारका।

केदारेश्वरकी नित्यसिद्ध स्वयम्भू मूर्ति कहीं भी लिंगके आकारकी नहीं है। वही कारणावस्था या पिण्डावस्थाका चिह्न ही लिंग समझना चाहिये। वस्तुदृष्टिसे फिर भी वह लिंग ही है। आधुनिक वैज्ञानिकोंकी भी दृष्टिसे आकाश वक्र है जैसा कि लिंगका स्वरूप है। किं बहुना देश, काल, वस्तु सभी वक्र हैं, ब्रह्मको भी वक्र और स्तब्ध कहा है। फिर उससे उत्पन्न सबको वक्र होना ही चाहिये। अनन्तकोटि विश्व सब लिंगमय ही है। विश्वोंसे परे सगुण ब्रह्मका भी आकार लिंग ही है। शिवशक्तिके सहवासमें अवकाश न मिलनेसे शुक्राचार्यने उन्हें शाप दिया कि तुम योनिस्थ लिंगके रूपमें पूजित होगे। एकबार शंकर दिगम्बर वेशसे स्वलिंग अपने हस्तमें लेकर दारुकवनमें गये। उन्हें देखकर ऋषिपत्नियां मोहित हो गयीं, यह देखकर ऋषियोंने शंकरको शाप दिया कि तुम्हारा लिंग गिर जाय। ऐसा ही हुआ, किंतु लिंगके पृथ्वीपर गिरते ही वह प्रज्वलित होकर अपने तेजसे लोकको जलाने लगा। अन्तमें शिवाने उसे योनिमें स्थापित किया और सब ऋषियों और देवताओंने उसकी पूजा की। यहाँ लिंग-योनि दिव्यप्रकृति और परम पुरुष ही हैं। शिवशक्तिरूप लिंग-योनिको प्राकृत स्त्री-पुरुषके समान चर्मखण्ड मूत्रेन्द्रियमात्र मान लेना बड़ा अपराध होगा। वहीं यह भी कथा है कि मुनियोंके शापसे गिरा हुआ शिवलिंग अग्निके समान जाज्वल्यमान होकर भूमि, स्वर्ग एवं पातालमें फिरा, सभी लोक बड़े दुःखी हुए। ब्रह्माजीने कहा कि 'गिरिजाकी प्रार्थना करो, वे ही योनिरूपसे परमज्योतिर्मय लिंगको धारण कर सकती हैं।' फिर सब देवताओं एवं मुनियोंने जब आराधना की, तब भगवान् और गिरिजा प्रसन्न हुए और गिरिजामें शिवकी प्रतिष्ठा हुई। क्या साधारण लिंगका गिरकर अग्निमय होकर सर्व लोकोंमें घूमना बन सकता है ? और विष्णु, राम, कृष्ण तथा सभी देव, मुनि क्या केवल साधारण लिंग-योनिकी ही पूजा करते थे ? यदि यही बात थी, तो कृष्णकी उपमन्युके यहाँ जाकर दीक्षापूर्वक शिवाराधनके लिये घोर तपस्या करनेकी क्या आवश्यकता थी ? कुछ लोग कथामें आये हुए उक्त शिवलिंगको केवल ब्रह्माण्ड कहते हैं, उसीको हाथमें लिये हुए भगवान् लीलया दारुकवनमें गये थे, वहीं मुनियोंके शापसे उनके हाथसे लिंग गिर पड़ा। अतएव वहाँ उसका 'गिरना' कहा गया है, 'कटना' नहीं। उस ज्योतिर्लिंग ब्राह्म तेजका आधार पंचतत्त्वात्मिका प्रकृति ही योनि है। अतः पार्वतीने योनिरूपसे उस लिंगको धारण किया अर्थात् पंचतत्त्वात्मिका प्रकृति बनकर उन्होंने ब्रह्माण्डको धारण किया। अग्निमय सर्वदाहक लिंगको योनि-प्राकृत चर्मखण्ड मूत्रेन्द्रियमें कौन धारण कर सकता था ? 'बाणरूपा श्रुता लोके पार्वती शिववल्लभा।' योनिरूपाका अर्थ ही बाणरूपा है। 'बाण' शब्द पाँच संख्याका बोधक होता है, पंचशरके अभिप्रायसे काममें, पंचमुखके अभिप्रायसे शिवमें, पंचतत्त्वात्मिकाकी दृष्टिसे पार्वतीमें 'बाण' शब्दका प्रयोग होता है। जैसे विद्युत-पुंज पंचतत्त्वमें व्याप्त होते हुए भी जल और पर्वतश्रेणीमें अधिकतासे रहता है, वैसे ही पार्वती बाणरूपा हुईं अर्थात् पर्वतश्रेणीरूपा हुईं और उन्हींमें वह तेजोमय लिंग समा गया। विद्युत्-पुंज यदि अपनी योनि पृथ्वी या जलमें पड़े तो स्थिर होता है, अन्यथा वृक्ष, मनुष्य सबको भस्म ही करता है। यही बात शिवजीने कहा है- पार्वतीञ्च विना नान्या लिङ्गं धारयितुं क्षमा। तया धृतञ्च मल्लिङ्गं द्रुतं शान्तिं गमिष्यति ॥ अर्थात् पार्वतीके बिना कोई इसे नहीं धारण कर सकता, उनके धारणसे वह शीघ्र ही शान्त हो जायगा। 'सतश्च योनिमसतश्च।' (यजु०) 'यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येकः।' (श्वेता० ४।११) 'यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः।' (श्वेता० ५।५) 'तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीराः।' (यजु०)

शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७५ —इत्यादि मन्त्रोंमें योनिका अर्थ मूत्रेन्द्रिय ही है, यह कहना अज्ञता ही है। श्रीविष्णु आदि देवाधिदेवोंका भी पूज्य यह योनिप्रतिष्ठित लिंग प्राकृत वस्तु कथमपि नहीं हो सकता। यदि विष्णुकर्तृक पूजा आदिको क्षेपक कहें, तब तो समस्त कथाको ही क्षेपक मान सकते हैं। अव्यक्तका लिंग (व्यक्त ब्रह्माण्ड) भृगु (प्रकृति)-के आकर्षण-विकर्षणविशेषके तारतम्यसे द्यावापृथिवीरूपमें दो टूक हो गया— 'वायुरापश्चन्द्रमा इत्येते भृगवः।' (गोपथब्राह्मण पूर्व २।८) शम्भोः पपात भुवि लिङ्गमिदं प्रसिद्धम् शापेन तेन च भृगोर्विपिने गतस्य॥ श्रीशंकरने भी विश्वेश्वरलिंगकी प्रतिष्ठापना और पूजा की है— ब्रह्मणा विष्णुना वापि रुद्रेणान्येन केन वा। लिङ्गप्रतिष्ठामुत्सृज्य क्रियते स्वपदस्थितिः॥ किमन्यदिह वक्तव्यं प्रतिष्ठां प्रति कारणम्। प्रतिष्ठितं शिवेनापि लिङ्गं वैश्वेश्वरं यतः॥ 'नारदपांचरात्र' के तीसरे रात्रमें, जो कि वैष्णवोंका सर्वस्व है, लिखा है कि एक शंकरके सिवा सभी स्त्रैण थे। ब्रह्मा, विष्णु, दक्ष आदिने तपस्यासे कालिका देवीको प्रकट किया। देवीने कहा—'वर माँगो।' देवोंने कहा कि 'आप दक्ष-कन्या होकर शिवको मोहित करो।' जगदीश्वरीने कहा—'शम्भु तो बालक है।' ब्रह्माने कहा—'शम्भुके समान दूसरा कोई पुरुष हो नहीं सकता।' यह सुनकर दक्षके यहाँ देवी सतीरूपसे प्रकट हुईं। देवताओंने विवाह कराया। सती-शिवके रमणसे दोनोंका तेज भूमण्डलमें पड़ा, वही पाताल, भूतल, स्वर्ग सर्वत्र योनिसहित शिवलिंग हुए। लिंगपूजा शाक्त, वैष्णव, सौर, गाणपत्य सभीके लिये है— शाक्तो वा वैष्णवो वापि सौरो वा गाणपोऽथवा। शिवार्चनविहीनस्य कुतः सिद्धिर्भवेत् प्रिये॥ (उत्पत्तितन्त्र) शिवकी पूजाके बिना अन्य देवताकी पूजा करनेसे वह देव शाप देकर चला जाता है— 'अनाराध्य च मां देवि योऽर्चयेद्देवतान्तरम्। न गृह्णाति महादेवि शापं दत्त्वा व्रजेत् पुरम्॥' यद्यपि शुद्ध दार्शनिक और आध्यात्मिक विवेचनोंसे शिवलिंग अनादि ही है, उसकी पूजा भी अनादि ही है तथापि अर्थवादरूपमें अनेक प्रकारसे शिवलिंगकी उत्पत्ति और पूजाका आरम्भ लिखा गया है। जैसे यद्यपि नित्यसिद्ध ही राम, कृष्णका अवतार माना जाता है तथापि अवतारसे पहले भी वे पूज्य थे ही, क्योंकि कल्प-कल्पमें उनके अवतार होते रहते हैं, कोई अवतार नया नहीं है। वैसी ही बात शिवलिंगके विषयमें भी समझनी चाहिये। नित्य होनेपर भी भिन्न-भिन्न कल्पमें उसके आविर्भावके क्रम भिन्न हैं। समष्टि प्रजननशक्तिसम्पन्न शिवतत्त्व ही समष्टि लिंग है। उसीसे समस्त व्यष्टि योनि और लिंगोंका आविर्भाव हुआ है। यही सती-शिवके मैथुनसे प्रादुर्भूत तेजसे सयोनि लिंगोंकी उत्पत्तिका रहस्य है। प्रकृति- पुरुषका संयोग ही शिव-सतीका मैथुन है। प्रकृति- मिश्रित अनन्त पुरुषोंका प्रादुर्भाव ही उनका मिश्रित तेज है। समष्टि लिंगसे ही उत्पन्न होकर व्यष्टि लिंग बनते हैं। अतः सभी व्यष्टि लिंगोंकी योनि भी समष्टि लिंगकी ही योनि है। यही शिवके दारुका वन- विहारका रहस्य है। अनन्त अनंग (कामदेव) जिनके श्रीअंगके सौन्दर्य-बिन्दुपर मोहित हो जाते हैं, उन भगवान् परम शिवकी ओर समष्टि-व्यष्टि प्रकृतिरूप योनियोंका आकर्षण होना स्वाभाविक ही है। यही मुनिपत्नियोंका शिवकी ओर आसक्त होनेका रहस्य है। मुनियों या शुक्राचार्यके शापसे भगवान्‌का योनिस्य लिंगरूपसे पूजित होना या शिवके लिंगका गिर जाना, पुनः उससे जगतताप होना, शिवाका योनिमें स्थापन करना, ब्रह्मा-विष्णु आदि देवताओं और ऋषि-मुनि-गन्धर्व-असुरादिद्वारा पूजित होना—यह सभी स्वतन्त्रेच्छ, निरंकुश भगवान्‌की लीला है, जैसे

४७६ भक्तिसुधा विष्णु परमात्माका शापवश मनुष्य बनना, मत्स्य, वराह आदि रूप धारण करना केवल लीला है। शापादि भी उनकी इच्छासे ही निमित्तरूपमें उपस्थित होते हैं। प्रकृतिके साथ परमात्माका खेल या जीवरूपा परा प्रकृतियोंमें परमात्माका रमण किंवा स्वरूपभूत माधुर्याधिष्ठात्री शक्तिमें परमेश्वरका रमण रहस्यमय है। जैसे कृष्णकी चीरहरणलीला और रासलीलामें अज्ञोंको अश्लीलता प्रतीत होती है, वैसे ही भगवान् शिवकी लीलाएँ भी परमरहस्यमयी हैं। अज्ञोंको उनमें अश्लीलताका भान हो सकता है— निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥ राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे॥ (रा०च०मा० ७।७३; २।१२७।७) लिंगरूपसे अतिरिक्त भी भगवान्‌के गंगाधर, चन्द्रशेखर, त्रिलोचन, पंचवक्त्र, नीलकण्ठ, कृत्तिवास, व्याघ्रचर्मासन, त्रिशूलधारी, वृषभध्वज, साम्बसदाशिव आदि रूप हैं, जिनका लोकोत्तर सौन्दर्य, माधुर्य है। ‘नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञम्।’ ‘प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते।’ ‘तमीश्वराणां परमं महेश्वरं, क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरम्।’ ‘तमीशानं वरदं समीड्यम्।’ ‘मायिनं तु महेश्वरम्।’ —इन श्रुतियोंमें परब्रह्म परमात्माको ही हर और मायाको ही प्रकृति या गौरी कहा गया है। सभी जगह संसारमें देह-देही आदिकोंमें आधार-आधेयभाव देखा जाता है। अनन्त चैतन्य परमात्मा शिव है, वही सृष्ट्युन्मुख होनेपर लिंग ही है। उन्हींका आधार योनि प्रकृति है, शिव लिंगरूपमें पिता, प्रकृति योनिरूपमें माता है— ‘मम योनिर्महद्ब्रह्म।’ (गीता १४।३) द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्द्धेन पुरुषोऽभवत्। अर्द्धेन नारी तस्यांस विराजमसृजत्प्रभुः॥ लिंगयोनिभाव ही अर्धनारीश्वर शिवका लिंगयोनिभाव ही अर्धनारीश्वरका भाव है। सृष्टिके बीजको देखनेवाले परमलिंगरूप श्रीशिव प्रकृतिरूपा नारीयोनिमें आधाराधेयभावसे संयुक्त होकर उससे आच्छादित होकर व्यक्त होते हैं। यही जगन्माता- पिताके आदि-सम्बन्धका द्योतक है। काम-वासनारहित शुद्ध मैथुन भी पितृ-ऋणसे उऋण होनेका साधन है। शिवपुराणमें लिखा है—बिन्दु देवी और नाद शिव है। बिन्दुरूपा देवी माता और नादरूपा शिव पिता है, अतः परमानन्द-लाभार्थ शिवलिंगका पूजन परमावश्यक है। ‘भं वृद्धिं गच्छतीत्यार्थाद्भगः प्रकृतिरुच्यते।' वृद्धिको प्राप्त होनेवाली प्रकृति ही भग है। मुख्यो भगस्तु प्रकृतिर्भगवान् शिव उच्यते। भगवान् भोगदाता हि नान्यो भोगप्रदायकः॥ भगके सहित लिंग और लिंगके सहित भग पूजित होकर इहलोक-परलोकमें विविध सुख देनेवाला है। सदाशिवसे उत्पन्न चैतन्यशक्तिद्वारा जायमान चिन्मय आदिपुरुष ही शिवलिंग है। समस्त पीठ अम्बामय है, लिंग चिन्मय है। भगवान् शंकर कहते हैं कि जो संसारके मूल कारण महाचैतन्यको और लोकको लिंगात्मक जानकर लिंगपूजा करता है, मुझे उससे प्रिय अन्य कोई नर नहीं— लोकं लिङ्गात्मकं ज्ञात्वा लिङ्गे योऽर्चयते हि माम्। न मे तस्मात्प्रियतरः प्रियो वा विद्यते क्वचित्॥ लिंग चिह्न है, सर्वस्वरूपकी पूजा कैसे हो, इसलिये लिंगकी कल्पना है। आदि एवं अन्तमें जगत् अण्डाकृति ही रहता है। अतएव ब्रह्माण्डकी आकृति ही शिवलिंग है। शिव-शक्तिके सहवाससे ही पशु, पक्षी, कीट, पतंगादिकोंकी भी उत्पत्ति होती है। शिव स्वयं अलिंग हैं, उनसे लिंगकी उत्पत्ति होती है, शिव लिंगी और शिवा लिंग हैं। ज्ञापक होनेसे, प्राणियोंका आलय होनेसे एवं लयाधिकरण होनेसे भी वही लिंग है— ‘लीयमानमिदं सर्वं ब्रह्मण्येव हि लीयते।'

शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७७ कामनाभेदसे लिंगके विविध भेद भिन्न-भिन्न कामनासे शिवलिंगके विधान भी पृथक्-पृथक् हैं—यवमय, गोधूममय, सिताखण्डमय, लवणज, हरितालमय, त्रिकटुकमय (शुण्ठी, पिप्पली, मरीचमय) ऐश्वर्य-पुत्रादिकामप्रदायक लिंग हैं। गव्यघृतमय लिंग बुद्धिवर्द्धक है। पार्थिव लिंग सर्वकामप्रद है। तिल-पिष्टमय, तुषज, भस्मोत्थ, गुडमय, गन्धमय, शर्करामय, वंशांकुरज, गोमयज, केशमयज, अस्थिमयज, दधिमय, दुग्धमय, फलमय, धान्यमय, पुष्पमय, धात्रीफलोद्भव, नवनीतमय, दूर्वाकाण्डसमुद्भव, कर्पूरज, अयस्कान्तमय, वज्रमय, मौक्तिकमय, महानीलमय, महेन्द्रनीलमणिमय, चीरसमुद्भव, सूर्यकान्तामणिज, चन्द्रकान्तामणिमय, स्फाटिक, शूलाख्यमणिमय, वैडूर्य, हैम, राजत, आरकूटमय, कांस्यमय, सीसकमय, अष्ट-धातुनिर्मित, ताम्रमय, रक्तचन्दनमय, रंगमय, त्रिलोकमय, दारुज, कस्तूरिकामय, गोरोचनमय, कुमकुममय, श्वेतागुरुमय, कृष्णागुरुमय, पाषाणमय, लाक्षामय, वालुकामय, पारदमय लिंग भिन्न-भिन्न कामनाओंकी पूर्तिके लिये पूजनीय बतलाये गये हैं। पार्थिव पूजनके लिये ब्राह्मणादि वर्णोंको क्रमसे शुक्ल, पीत, रक्त, कृष्णवर्णकी मृत्तिकासे शिवलिंग बनाना चाहिये। तोलाभर मिट्टीसे अंगुष्ठपर्वके परिमाणका लिंग बनाना चाहिये। पूजा भी वैदिक, तान्त्रिक एवं मिश्र विधि या नाममन्त्रोंसे करनी चाहिये। किं बहुना, शिवलिंगकी विशेषताओं, पूजाओं एवं विधियोंपर शास्त्रोंमें बहुत बड़ी सामग्री भरी पड़ी है। बाण और नार्मद लिंगकी परीक्षा बाण और नार्मद लिंगकी परीक्षाके लिये उसे तण्डुलादिसे सात बार तौला जाता है। यदि दूसरी बार तौलनेमें तण्डुल बढ़ जाय, लिंग हलका हो जाय तो वह गृहियोंको पूज्य है। यदि लिंग अधिक ठहरे तो वह विरक्तोंके पूजनेयोग्य है और सात बार तौलनेपर भी बढ़े ही, घटे नहीं तो उसे बाणलिंग अन्यथा नार्मद लिंग जानना चाहिये। प्रायः शिवको अनार्य देवता बतलाया जाता है, परंतु वेदोंमें शिवका बहुत प्रधानरूपसे वर्णन है। एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः। प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः॥ (श्वेता० ३।२) समस्त भुवनोंको अपनी ईशनीशक्तिसे ईशन करते हुए सबमें विराजमान शिव ही अन्तमें सबका संहार करते हैं। बस, वही परमतत्त्व सर्वस्व है, उनसे भिन्न दूसरी वस्तु थी ही नहीं। 'यदा तमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासच्छिव एव केवलः।' जब प्रलयमें रात-दिन, कार्य-कारण कुछ भी नहीं था, तब केवल एक शिव ही थे। 'स्वधया शम्भुः।' 'उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम्॥' 'नमो नीलग्रीवाय च शितिकण्ठाय च॥' (यजु०) यहाँ रुद्रके नील और श्वेत दोनों ही तरहके कण्ठ कहे गये हैं। ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्णपिङ्गलम्। ऊर्ध्वरेतं विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नमः॥ (तैत्तिरीयारण्यक) यहाँ भी कृष्णपिंगल, ऋत-सत्य, ऊर्ध्वरेता विरूपाक्षको नमस्कार किया गया है। भुवनस्य पितरं गीर्भीराभी रुद्रं दिवा वर्धया रुद्रमक्तौ। बृहन्तमृष्वमजरं सुषुम्नमृधग्घुवेम कविनेषितासः॥ (ऋक्० ६।४९।१०) यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः। हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥ (श्वेता० ३।४) यो अग्नौ रुद्रो यो अप्स्वन्तर्य ओषधीर्वीरुध आविवेश। य इमा विश्वा भुवनानि चाक्लृपे तस्मै रुद्राय नमो अस्त्वग्नये॥ (अथर्व० ७।८७।१) 'एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः' (श्वेता० ३।२)

४७८ भक्तिसुधा 'एक एव रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः॥' (तै० सं० १।८।६।१) अर्थात् अन्य देवोंका कारण, विश्वका एकमात्र स्वामी, अतीन्द्रियार्थज्ञानी और हिरण्यगर्भको उत्पन्न करनेवाला रुद्र हमें शुभ बुद्धि दे, जो अग्निमें, जलमें, ओषधियों एवं वनस्पतियोंमें रहता है और जो सबका निर्माता है, उसी तेजस्वी रुद्रको हमारा प्रणाम हो। जो भुवनका पिता है, बड़ा है, प्रेरक और ज्ञानी है, उस अजरकी हम स्तुति करते हैं इत्यादि। जो कहते हैं कि अग्नि ही वेदके रुद्र हैं,उन्हें इस बातपर ध्यान देना चाहिये कि अग्नि, जल क्या सभी प्रपंचमें रुद्र रहते हैं। जब रुद्रसे भिन्न दूसरा तत्त्व ही नहीं है, तब अग्नि आदि सभी रुद्र हों, यह ठीक ही है। एक ही परमात्माके अनेक नाम एक ही परमात्माके अग्नि, वायु, मातरिश्वा आदि अनेक नाम होते ही हैं— 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।' 'अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।' परंतु अग्निसे भिन्न रुद्र हैं ही नहीं, यह कहना संगत नहीं है। ईशानादस्य भुवनस्य भूरेर्न वा उ योषद् रुद्रादसुर्यम्॥ (ऋक्० २।३३।९) इस भुवनके स्वामी रुद्रदेवसे उनकी महाशक्ति पृथक् नहीं हो सकती। अन्तरिच्छन्ति तं जने रुद्रं परो मनीषया। (ऋक्० ८।७२।३) मुमुक्षु उस रुद्र परमात्माको मनुष्यके भीतर बुद्धिद्वारा जानना चाहते हैं। असंख्याता सहस्राणि ये रुद्रा अधि भूम्याम्। (यजु० १६।५४) रुद्रस्य ये मीळ्हुषः सन्ति पुत्रा (ऋक्० ६।६६।३) अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय। युवा पिता स्वपा रुद्र एषाम्०॥ (ऋक्० ५।६०।५)। रुद्रसे उत्पन्न सब रुद्र ही हैं। तत्त्वमस्यादि महावाक्योंके अनुसार उनको भी एक दिन महारुद्र परमात्मा होना पड़ेगा। स रुद्रः स महादेवः। (अथर्व० १३।४।४) इत्यादि मन्त्रोंमें भी परमात्माको ही रुद्र, महादेव आदि कहा गया है। जो कहते हैं कि शिवसे पृथक् रुद्र हैं, उन्हें वेदोंके ही अन्यान्य मन्त्रोंपर ध्यान देना चाहिये, जिनमें स्पष्टरूपसे परमेश्वरके लिये ही शिव, त्र्यम्बक, महादेव, महेशान, परमेश्वर, ईशान, ईश्वर आदि शब्द आये हैं। त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ (ऋक्० ७।५९।१२) ये भूतानामधिपतयो.... कपर्दिनः। (यजु० १६।५९) असंख्याता सहस्त्राणि ये रुद्रा अधि भूम्याम्। नीलग्रीवाः शितिकण्ठाः....। (यजु० १६।५४,५७) तमु ष्टुहि यः स्विषुः सुधन्वा यो विश्वस्य क्षयति भेषजस्य। यक्ष्वा महे सौमनसाय रुद्रं नमोभिर्देवमसुरं दुवस्य॥ (ऋक्० ५।४२।११) क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। (श्वेता० १।१०) सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात् सर्वगतः शिवः॥ (श्वेता० ३।११) आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं होतारं सत्ययजं रोदस्योः। अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम्॥ (साम-कौथुम १।७।७) त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवसत्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे। (ऋक्० २।१।६) इत्यादि मन्त्रोंमें अग्निको ही रुद्र कहा गया है।

शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७९ 'स्थिरैरङ्गैः पुरुरूप उग्रो बभ्रुः शुक्रेभिः पिपिशे हिरण्यैः।' यहाँ रुद्रको पुरुरूप, असाधारण तेजस्वी और बभ्रुवर्ण कहा गया है। शिवको तामसदेवता कहना अनभिज्ञता वैदिकोंके यहाँ शिवपूजाकी सामग्रियोंमें कोई भी तामस पदार्थ नहीं है। बिल्वपत्र, पुष्प, फल, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे ही भगवान्‌की पूजा होती है। मद्य, मांसका तो शिवलिंगपूजामें कभी भी उपयोग नहीं होता। अतः शिव तामस देवता हैं, यह कहना अनभिज्ञता है। हाँ, त्रिमूर्त्यन्तर्गत शिव कारणावस्थाके नियन्ता माने जाते हैं। कारण या अव्यक्तकी अवस्था अवष्टम्भात्मक होनेसे तमःप्रधाना कही जा सकती है। 'तम आसीत्तमसागूढमग्रे' इस श्रुतिमें तमको ही सबका आदि और कारण कहा गया है। उसीमें वैषम्य होनेसे सत्त्व, रजका उद्भव होता है। तमका नियन्त्रण करना सर्वापेक्षयाऽपि कठिन है। भगवान् शिव तमके नियन्ता हैं, तमके वशमें नहीं हैं। शिव भयानक भी हैं, शान्त भी हैं। सर्व-संहारक, कालकाल, महाकालेश्वर, महामृत्युञ्जय भगवान्‌में उग्रता उचित ही है। ब्रह्मक्षत्रोपलक्षित समस्त प्रपंच जिसका ओदन है, मृत्यु जिसका दाल-शाक है, मृत्युसहित संसारको जो खा जाता है, उसका उग्र होना स्वाभाविक है। शिवसे भिन्न जो भी कुछ है, उन सबके संहारक शिव हैं। इसीलिये विष्णुको उनका स्वरूप ही माना जाता है। अन्यथा भिन्न होनेपर तो उनमें भी संहार्यता आ जायगी। वस्तुतः हरिहर, शिवविष्णु तो एक ही हैं। उनमें अणुभर भी भेद है ही नहीं। भीषास्माद्वातः पवते। (तैत्तिरीय० २।८) भगवान्‌के भयसे ही वायु, अग्नि, सूर्य, मृत्यु अपना काम करते हैं। महद्भयं वज्रमुद्यतम् समुद्यत महावज्रके समान भगवान्‌से सब डरते हैं, तभी भगवान्‌को मन्यु या चण्ड-कोपरूप माना गया है। 'नमस्ते रुद्र मन्यवे' हे रुद्र! आपके मन्युस्वरूपकी मैं वन्दना करता हूँ। वही शक्तिरूपधारिणी होकर चण्डिका कहलाते हैं, फिर भी वह ज्ञानियों और भक्तोंके लिये रसस्वरूप हैं। रसो वै सः। एष ह्येवानन्दयति॥ (तैत्तिरीय० २।७) भगवान् शिव रसमय, कल्याणमय भगवान् रसस्वरूप हैं, निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्‌से ही समस्त विश्वको आनन्द प्राप्त होता है, इसीलिये अघोरा शिवतनु घोरतनुसे पृथक् वर्णित है— या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥ (यजु० १६।२) भगवान्‌की शन्तमा, शिवा तनू परमकल्याणमयी है। शान्तं शिवम् (माण्डूक्योपनिषद् ७) अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽअस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ इस तरह रुद्राध्यायमें उग्र, श्रेष्ठ और भीमरूप वर्णित हैं। नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ (यजु० १६।४१) इस मन्त्रमें शिवको शिवस्वरूप, कल्याणदाता, मोक्षदाता कहा गया है। इस तरह जब अनादि, अपौरुषेय वेदों एवं तन्मूलक इतिहास, पुराण, तन्त्रोंद्वारा शिवका परमेश्वरत्व, शान्तत्व, सर्वपूज्यत्व और अनादि सिद्धत्व सिद्ध होता है, तब शिवकी पूजा अनार्योंसे ली गयी है, इन बेसिर-पैरकी बातोंका क्या मूल्य है ?

४८० भक्तिसुधा श्रीविष्णु-तत्त्व व्याप्त्यर्थक 'विष्लृ' धातुसे विष्णु शब्दकी निष्पत्ति होती है, तथा च व्यापक परब्रह्म परमात्माको ही 'विष्णु' कहा जाता है। 'यतो वा इमानी भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभि संविशन्ति।' (तैत्तिरीय० ३।१) —इस श्रुतिके अनुसार यही मालूम पड़ता है कि सम्पूर्ण जगत्की जिससे उत्पत्ति होती है, जिसमें स्थिति होती है और जिसमें विलय होता है, वही ब्रह्म है। विशेषरूपसे अनन्तकोटिब्रह्माण्डोत्पादिनी शक्तिमें कार्योत्पत्तिके लिये प्रकाशात्मक सत्त्व, चलनात्मक रज तथा अवष्टम्भात्मक तमकी अपेक्षा होती है। तत्तद्गुणोंकी प्रधानतासे ब्रह्म ही रजके सम्बन्धसे ब्रह्मा, तमके सम्बन्धसे रुद्र एवं सत्त्वके सम्बन्धसे विष्णु बन जाता है। प्रकारान्तरसे उत्पादिनीशक्तिविशिष्ट ब्रह्म 'ब्रह्मा', संहारिणीशक्तिविशिष्ट ब्रह्म 'रुद्र' तथा पालिनीशक्तिविशिष्ट ब्रह्म 'विष्णु' शब्दसे व्यवहृत होता है। प्रकारान्तरसे समष्टि-कारणप्रपंचाभिमानी अव्याकृत रुद्र, समष्टि-सूक्ष्मप्रपंचाभिमानी हिरण्यगर्भ विष्णु और समष्टि-स्थूलप्रपंचाभिमानी विराट् ब्रह्मा कहा जाता है। मुख्यरूपसे अव्यक्तादिके नियामक अन्तर्यामीको ही रुद्र, विष्णु, ब्रह्मा आदि कहा जाता है। जहाँ-कहीं उपासना-विशेषके कारण किसी जीवका ब्रह्मा होना सुना जाता है, वह अन्तर्यामी न होकर अभिमानी ही समझा जाना चाहिये। 'स एकाकी न रेमे', 'सोऽबिभेत्' —इत्यादि श्रुतिवचनोंमें जहाँ हिरण्यगर्भमें भय, अरमण आदिका श्रवण है, वहाँ हिरण्यगर्भमें जीवभावका ही निर्णय किया गया है; क्योंकि परमेश्वरमें भय, अरमण आदि कथमपि सम्भव नहीं। अभिमानी जीव भी हो सकता है, परंतु अन्तर्यामी सर्वत्र परमेश्वर ही है। पुराणोंमें ब्रह्माण्डोंकी अनन्तताका पता लगता है, अतएव तदनुसार विराट्, हिरण्यगर्भ आदिकोंकी भी अनन्तता ही मालूम पड़ती है। उत्पादक-पालक- संहारक-दृष्टिसे ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रकी अनन्तता ही सिद्ध होती है। अन्तर्यामी होनेसे सभी परमेश्वर ही हैं। इस विचारसे उपनिषदोंका विराट् पुराणोंका महाविराट् है। अनन्तकोटिब्रह्माण्डात्मक समष्टि- स्थूल प्रपंचका एकमात्र अभिमानी एवं अन्तर्यामी उपनिषदोंका विराट् है। यही बात हिरण्यगर्भ और अव्यक्तके सम्बन्धमें भी समझनी चाहिये। तदनुसार ही अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डात्मक सम्पूर्ण विश्वके उत्पादक ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहारक रुद्र सर्वथा एक ही हैं। वे ही महाविष्णु, महारुद्र आदि नामोंसे भी यत्र- तत्र व्यवहृत होते हैं। जैसे गोधूमादि सस्योंका एक ही किसान उत्पादक, पालक तथा लावक (काटनेवाला) होता है, वैसे ही विश्वका भी उत्पादक, पालक, संहारक एक ही है, अन्यथा सर्वशक्तिमान् विष्णु परमात्मासे पालित जगत्‌का संहार दूसरा कैसे कर सकता है? यदि सर्वसंहारक रुद्रको ही परमेश्वर मानें, तो फिर संजिहीर्षित विश्वको पालनेवाला कौन हो सकता है? यदि विष्णुसे भिन्न ही रुद्र हैं, तब सर्वसंहारक रुद्रके द्वारा विष्णुके भी संहारका अवसर उपस्थित हो जायगा, अतएव विष्णु एवं रुद्र दोनोंको एक ही परमेश्वर मानना समुचित है। अनेक ईश्वरका मानना युक्तिविरुद्ध कोई भी संहारक अपनी अन्तरात्माका संहार नहीं कर सकता है। तभी सर्वसंहारक शिवका आत्मा होनेसे विष्णु बने रहते हैं। अनेक ईश्वरका मानना सर्वथा युक्तिविरुद्ध भी है; क्योंकि जब दोनोंमें मतभेद होगा और साथ ही विरुद्ध प्रकारके संकल्प होंगे, तब दो ईश्वर कथमपि नहीं टिक सकेंगे। यदि परस्परके विरुद्ध संकल्पसे दोनोंहीके संकल्प प्रतिरुद्ध होकर वितथ हो गये, तब तो दोनों ही अनीश्वर सिद्ध होंगे। यदि एकके संकल्पसे दूसरेका संकल्प कट गया, तो सिद्धसंकल्प ही परमेश्वर हुआ, तदतिरिक्तमें

श्रीविष्णु-तत्त्व ४८१

असत्यसंकल्पता होनेसे अर्थसिद्ध अनीश्वरता हुई। अतः जगत्का उत्पादक, पालक, संहारक एक ही परमेश्वर है। उसका किसी भी नामसे भले ही व्यवहार हो, परंतु प्रमाणभूत शास्त्रसे जिसमें जगत्कारणत्व, सर्वज्ञत्व, सर्वशक्तिमत्त्वादि अवगत हों, उसे ही परमेश्वर समझा जा सकता है। विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा आदि नामोंके अतिरिक्त आकाशादि शब्दोंसे भी जगत्कारणत्वादि हेतुओंसे परमेश्वरका ही बोध होता है। अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति-स्थिति- प्रलयकारिणी ब्रह्मनिष्ठमहाशक्ति ही सम्पूर्ण अवान्तर अचिन्त्य अनन्त शक्तियोंकी केन्द्र है। उन्हीं शक्तियोंसे अनन्त ब्रह्माण्ड बनते हैं। प्रत्येक ब्रह्माण्डकी शक्तियोंमें तमःप्रधान शक्तिसे भूत—भौतिक प्रपंचकी सृष्टि होती है। तामस भूतोंमें भी सत्त्व, रज, तम आदिका अंश रहता है, अतएव सात्त्विक भूतोंसे अन्तःकरण एवं ज्ञानेन्द्रियाँ, राजससे प्राण एवं कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। तामससे स्थूलभूत बनते हैं। ब्रह्माण्डशक्तिके तामस अंशसे जैसे उपर्युक्त प्रपंच बनता है, वैसे ही रजस्तमोलेशानुविद्ध सत्त्वांशसे अविद्या एवं रज आदिसे अननुविद्ध सत्त्वसे विद्या या मायाका आविर्भाव होता है। अविद्याएँ रज आदिके अनुवेध-वैचित्र्यसे अनन्त हैं, अतः उनमें प्रतिबिम्बित चैतन्यरूप जीव भी अनन्त हैं। जो लोग अविद्याको भी एक ही मानते हैं, उनके मतसे जीव भी एक ही होता है। विशुद्धसत्त्वप्रधाना विद्यामें भी अंशतः सत्त्व, रज, तम होते हैं। उसी सत्त्वप्रधाना शक्तिस्वरूपा विद्याके सात्त्विक अंशसे विष्णु, राजस अंशसे ब्रह्मा और उसी विद्याके तामस अंशसे रुद्रका आविर्भाव होता है। अवान्तरशक्तिके ही विभागके समान ही महाशक्तिके भी विभाग समझने चाहिये। महाशक्तिके तमःप्रधान अंशसे पंच तन्मात्रादि जड़वर्गका, अशुद्ध (मलिन) सत्त्वप्रधान शक्तिसे प्राज्ञसंज्ञक जीववर्गका और विशुद्ध सत्त्वप्रधानशक्तिसे महेश्वरका आविर्भाव होता है। महाशक्तिविशिष्ट ब्रह्म एक ही है, अतः एक ब्रह्मका ही तमःप्रधाना मायाके योगसे भोग्य, मलिन सत्त्वप्रधाना प्रकृतिरूपा अविद्याके योगसे भोक्ता तथा विशुद्ध सत्त्वप्रधाना मायाके योगसे महेश्वरके रूपमें आविर्भाव समझा जाता है। भोग्यवर्ग एवं भोक्तृवर्गकी एकता-अनेकताका प्रश्न उठ सकता है, परंतु महेश्वरकी अनेकताका प्रश्न ही नहीं उठ सकता। उत्पत्ति- स्थिति-लयका कारण एक ही है तथापि उत्पत्तिकारण- त्वादिकी पृथक्-पृथक् विवक्षासे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि कहा जाता है। तमःप्रधानशक्तिविशिष्ट चित्में उपादानता तथा विशुद्धसत्त्वप्रधान विद्याशक्तिविशिष्टमें निमित्तता होनेपर भी एक मूलप्रकृतिविशिष्ट ब्रह्म ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है, उसमें नानात्व नहीं है। उपादानसे कार्यकी सदृशता होती है, अतः जड़कार्यके अनुरूप ही तमःप्रधानशक्तिविशिष्ट पंच तन्मात्राओंमें जड़ताके अनुरोधसे उपादानता मानी गयी है। निमित्तमें कुलालादिके सदृश कार्यसे विलक्षणता होती है, अतः तदनुरूप ही विद्याविशिष्ट महेश्वरमें निमित्तकारणता मानी गयी है। सर्वापेक्षया प्रबल ही सर्वसंहारक होता है, वही पालक भी हो सकता है; वही विश्वका उत्पादक भी है। अनन्त- ब्रह्माण्डनायक भगवान्को ही 'विष्णु', 'पद्म' आदि पुराणोंमें विष्णु; 'रामायण', 'भारत' आदिमें राम, कृष्ण आदि रूपमें गाया गया है। 'शिव-स्कन्दादि' पुराणोंमें वही शिव 'रुद्र' आदि नामोंसे कहा जाता है। शिवपरक पुराणोंमें कार्यविष्णु अर्थात् एक-एक ब्रह्माण्डके विष्णुका वर्णन है, इसीलिये उनका कुछ अपकर्ष भी भासित होता है। विष्णुपरक पुराणोंमें शिव भी कार्यान्तःपाती ही हैं। अनन्तब्रह्माण्डनायककी प्राप्तिमें अपकर्षककी कल्पना भी संगत ही है। फलतः अनन्तब्रह्माण्डनायक परब्रह्म परमात्मा ही वेद, रामायण, भारत, पुराण आदिमें अनेक रूपों एवं नामोंसे गाये गये हैं। वे ही भगवान् 'विष्णु' शब्दसे प्रसिद्ध हैं। जगत्पालनके लिये भगवान् विष्णुमें सर्वातिशायी ऐश्वर्य जगत्के पालनमें सर्वातिशायी ऐश्वर्यकी अपेक्षा

होती है, अतः विष्णुभगवान्में परमैश्वर्यका अस्तित्व है। समग्र ऐश्वर्य, समग्र धर्म, समग्र यश, समग्र श्री, समग्र ज्ञान, समग्र वैराग्य जिसमें हों, वही भगवान् है, अथवा प्राणियोंकी उत्पत्ति, प्रलय, गति, अगति, विद्या, अविद्याको पूर्णरूपसे जाननेवाला ही भगवान् है। विश्वमात्रको फलित-प्रफुल्लित करना, अनेक ऐश्वर्यसे पूर्ण करना पालकका काम है। इसीलिये विष्णुभगवान्में पराकाष्ठाका ऐश्वर्य पाया जाता है। यद्यपि परमविष्णु साक्षात् चैतन्यघन ही हैं तथापि उपासनामें उनके पदादि अंग-उपांग, गरुड़ादि वाहनों, सुदर्शनादि आयुधों तथा कौस्तुभादि आभूषणोंकी कल्पना की जाती है। भगवान्‌का स्थूल विराट् स्वरूप माया, सूत्रात्मा, महान्, अहंकार, पंचतन्मात्रासहित पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय और मनोरूप ग्यारह इन्द्रियाँ, पंचमहाभूत—इन षोडश विकारात्मक महाविराट् भगवान्‌का स्थूल रूप है। भगवान्‌के उसी सात्त्विक रूपमें तीनों भुवन प्रतिभासित होते हैं। यही पौरुष रूप है। भूलोक ही इस पुरुषका पाद है, द्युलोक ही सिर है, अन्तरिक्षलोक ही नाभि है, सूर्य नेत्र, वायु नासिका, दिशाएँ कान, प्रजापति प्रजनेन्द्रिय, मृत्यु पायु (गुदा), लोकपाल बाहु, चन्द्रमा मन और यम ही भगवान्‌की भृकुटी है। उत्कृष्टताके अभिप्रायसे द्युलोकको सिर कहा गया है, गम्भीरताके अभिप्रायसे अन्तरिक्षको नाभि कहा गया है, प्रतिष्ठाके अभिप्रायसे भूलोकको पाद कहा गया है, नेत्रानुग्राहक तथा सर्वप्रकाशक होनेके कारण सूर्यको चक्षु कहा गया है। लज्जा भगवान्‌का उत्तरोष्ठ है। लज्जासे जैसे प्राणी उन्मुख न होकर अवनतानन हो जाता है, तद्वत् उत्तराधर अवनत ही रहता है। लोभ अधरोष्ठ है, ज्योत्स्ना दन्त है, माया ही मन्दहास है, सम्पूर्ण भूरूह (वृक्षादि) लोम हैं, मेघ मूर्धज (केश) हैं। जैसे सप्त वितस्ति (साढ़े तीन हाथ)-का यह व्यष्टि पुरुष है, वैसे ही अपने मानसे समष्टि पुरुष भी सप्त वितस्ति है— 'सप्तवितस्तिकायः।' परमेश्वराधिष्ठित होनेसे वैराजरूपकी उपासना होती है। इसीलिये 'पुरुषसूक्त' में तथा अन्यत्र पुराणोंमें उपर्युक्त सभी अंग-प्रत्यंगोंकी भावना भगवान् विष्णुमें की गयी है। वैसे तो भगवान् विष्णुका अखण्ड सच्चिदानन्द ही स्वरूप है तथापि भक्तानुग्रहार्थ भगवान् विशुद्ध सत्त्वमयी लीलाशक्तिके योगसे चिदानन्दमय विग्रहको भी धारण करते हैं। वही अतसीपुष्पसंकाश तथा नवनीलनीरदश्यामल या नीलकमलकान्ति भगवान्‌का सगुण, साकार स्वरूप है। उसी स्वरूपको कोई केकीकण्ठाभ कहते हैं, कोई तमालश्यामल कहते हैं। जैसे शैत्यके योगसे निर्मल जल ही शुद्ध बर्फ बनता है, घृतवर्तिकाके योगसे केवल अग्नि ही दाहकत्व प्रकाशकत्वविशिष्ट दीप- शिखाके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही विशुद्ध सत्त्व- मयी लीलाशक्तिके योगसे चिदानन्द ब्रह्म ही सगुण साकार-श्रीविष्णुरूपमें प्रकट होता है। जैसे निराकार तथा अतिगम्भीर आकाशका श्यामलरूप ही तत्त्व- रहस्यज्ञोंको अभिमत है, वैसे ही निराकार, निर्विकार, परम गम्भीर विष्णुतत्त्वका भी श्यामल रूप ही श्रुतिसम्मत है— 'श्यामाच्छबलं प्रपद्ये' (छान्दोग्य० ८।१३।१) तमकी उपाधिसे उपहित, तमके नियामक भगवान् शिवका वर्ण श्यामल है। उन्हींका ध्यान करते-करते विष्णु श्यामल हो जाते हैं। उनका ध्यान करते-करते उनका स्वाभाविक शुक्लरूप शंकरमें प्रकट हो जाता है। ये दोनों ही परस्परानुरक्त एवं परस्परात्मा हैं। युगके अनुरूप भी युगनियामक भगवान्‌का रूप होता है। जैसे मनुष्योंका नियमन करनेके लिये भगवान्‌को मनुष्यानुरूप बनना पड़ता है, वैसे ही युगनियमनके लिये भगवान्‌को युगानुरूप बनना पड़ता है। स्वतः अरूप भगवान्‌में उपाधिके संसर्गसे ही रूपकी आविर्भूति होती है। सत्त्वप्रधान कृतयुग, रजोमिश्रित सत्त्वप्रधान त्रेता, रजःप्रधान द्वापर और तमःप्रधान कलि होता है। अतः कृतके अनुरूप ही कृतयुगीन भगवान् शुक्लरूपमें प्रकट होते हैं। त्रेताके अनुरूप भगवान्‌का रक्तरूप है, द्वापरके अनुरूप पीत एवं कलिके अनुरूप भगवान्‌का

श्रीविष्णु-तत्त्व ४८३ कृष्णरूप होता है— ‘शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥’ (श्रीमद्भा० १०।८।१३, १०।२६।१६) इस दृष्टिसे कलिनियामक होनेसे भगवान् श्यामल हैं। भगवान्‌के आभूषणों एवं आयुधोंका रहस्य भगवान् जीव-चैतन्य ज्योतिःसमूहको ही कौस्तुभमणिके रूपमें धारण करते हैं। वेदान्तसिद्धान्तके अनुसार एक, अखण्ड, अनन्त, सच्चिदानन्द भगवान्‌के ही समाश्रित सम्पूर्ण जीव-चैतन्य होते हैं, अतः अवश्य ही जीव भगवान्‌के भूषण हो सकते हैं। विशेषतः भगवत्प्राप्त भगवद्भक्त तो अवश्य ही भगवान्‌के कण्ठके देदीप्यमान, चमत्कारपूर्ण भूषण बनते ही हैं। भक्त लोग तभी तो इनसे ईर्ष्या करते हैं— अहो सुमनसो मुक्ता वज्राण्यपि हरेरुरः। न त्यजन्ति वयं तत्र का वा स्मरवशाः स्त्रियः ॥ (गोपालचम्पू पूर्व० १७।१०५) अर्थात् अहो! मुक्ता (मोती) एवं सुमनस् (पुष्प) (पक्षान्तरमें मुक्तलोग तथा देवतालोग) वैदूर्यादि वज्रक (पक्षान्तरमें कूटस्थब्रह्मभावापन्न लोग) भी जब श्रीहरिके उरःस्थलको छोड़ना नहीं चाहते, तब भला स्मरवशा गोपांगनाएँ कैसे भगवान्‌को छोड़ दें? उस कौस्तुभमणिकी व्यापिनी साक्षात् प्रभाको ही श्रीवत्सके रूपमें भगवान् धारण करते हैं। दक्षिण वक्षःस्थलपर कमलनाल-तन्तुके सदृश दक्षिणावर्त श्वेत रोमराजि ‘श्रीवत्स’ कही जाती है। वाम वक्षःस्थलपर वामावर्त सुवर्णवर्णा रोमराजि लक्ष्मीका चिह्न है। एतावता भोक्तृवर्गका सार तथा भोग्यवर्गका सार श्री एवं श्रीवत्सके रूपमें भगवान्‌के वक्षःस्थलपर विराजमान है। ऐश्वर्याधिष्ठात्री महाशक्ति भगवती लक्ष्मी ‘श्री’ है। परमात्मकर्तृक गर्भाधानकी महिमासे श्रीप्रसूतजीवन चैतन्यसार ‘श्रीवत्स’ है। श्री वामवक्षः- स्थलमें और श्रीवत्स दक्षिणवक्षःस्थलमें है और बीचमें भृगुचरण चिह्न है। एतावता विप्रचरणारविन्दका समादरपूर्वक सेवन करनेसे ही श्री एवं श्रीवत्सकी प्राप्ति सूचित होती है। नाना गुणमयी त्रिगुणात्मिका माया ही ‘वनमाला’ है। परमसौगन्ध्यमय तथा अनेक रंगके तुलसी, कुन्द, मन्दार, पारिजात सरोरुहोंसे विरचित माला त्रिगुणात्मिका प्रकृतिके ही मनोहर पुष्पोंकी बनी समझनी चाहिये। छन्दःसमूह ही भगवान्‌का पीताम्बर है। जैसे—छन्दोंसे भगवान्‌का स्वरूप चमत्कृत एवं शोभित होता है, वैसे ही पीताम्बरसे भगवान्‌का स्वरूप चमत्कृत एवं सुशोभित होता है, किन्हीं- किन्हीं स्थानोंपर मोहिनी मायाको ही पीताम्बर बतलाया गया है। जैसे मायाकी निजी चमक-दमकसे ब्रह्मस्वरूप तिरोहित हो जाता है, वैसे ही पीताम्बरसे भगवान्‌का मंगलमय श्रीअंग आवृत्त रहता है। मायाके चाकचिक्यसे अनासक्त एवं अप्रभावित ही जैसे भगवत्स्वरूपको जानता है, वैसे ही पीताम्बरकी चमक-दमकको पार करनेपर ही भगवत्स्वरूपका उपलम्भ होता है। छन्दोंको भी पहले छादक बतलाया गया है— ‘छन्दांसि यस्य पर्णानि’ (गीता १५।१) त्रिवृत् अर्थात् त्रिमात्र प्रणव ही भगवान्‌का उपवीत है। सांख्य एवं योगको भगवान्‌ने मकराकृत कुण्डलके रूपमें कानोंमें धारण कर रखा है। पारमेष्ठ्य पद ही भगवान्‌का मुकुट है। अनन्त नामक अव्याकृत ही भगवान्‌का आसन है। प्रकृतिरूप समष्टि कारणदेहाभिमानी चैतन्य ही अव्याकृत कहलाता है, उसीको शेष भी कहा जाता है। कार्य-प्रपंचके प्रलय हो जानेपर जो अवशिष्ट रहता है, वही शेष है। उन अनन्तशेषरूप अव्याकृतपर ही चतुर्भुज मूर्ति भगवान् विष्णु विराजते हैं। यों भी अव्याकृतके ऊपर ही कार्य-कारणातीत तुरीयतत्त्व विद्यमान रहते हैं। चतुर्वर्गप्रद, चतुर्वेदात्मा, चतुर्युग, चतुरस्र भगवान्‌की चार भुजाएँ हैं। एक हाथमें वे धर्म-ज्ञानादियुक्त सत्त्वमय पद्मको धारण किये हैं। पद्मकी ही सुन्दरता, मधुरता, सरसता, सुगन्धता धर्मादिमय सत्त्वमें होती है। ओज, बलादियुक्त, प्राणतत्त्व ही भगवान्‌की गदा है। उन्होंने जलतत्त्वको शंखके रूपमें, तेजस्तत्त्वको सुदर्शनके रूपमें दो हाथोंमें धारण कर रखा है। आकाशतत्त्वको ही

तलवार एवं अन्धकारको ही चर्म (ढाल)-के रूपमें, कालको शार्ङ्गधनुषके रूपमें, कर्मोंको ही निषंगके रूपमें भगवान्‌ने धारण किया है। इन्द्रियाँ ही भगवान्‌के तूणीरमें रहनेवाले बाण हैं, क्रियाशक्तियुक्त मन ही रथ है, शब्दादि पंचतन्मात्रा इस रथका अभिव्यक्त रूप है। जैसे रथारूढ़ होकर व्यक्ति तूणीरसे बाण निकालकर धनुषपर रखकर सन्धान करता है, वैसे ही क्रियाशक्तियुक्त मनपर आरूढ़ होकर प्रत्यक्चैतन्याभिन्न भगवान् ही कालरूप धनुषपर इन्द्रियोंको प्रतिष्ठित करके उनका सन्धान करते हैं। वर, अभय आदिकी मुद्राओंके रूपमें भगवान् अर्थ-क्रिया (प्रयोजनसम्पत्ति)-को धारण करते हैं। देव-पूजा स्थल सूर्यमण्डल है, दीक्षा ही पूजा-योग्यता-सम्पत्ति है, भगवान्‌की परिचर्या ही अपने सम्पूर्ण दुरितोंके क्षयका कारण है। भग शब्दार्थ-ऐश्वर्य-षाड्गुण्य ही भगवान्‌के श्रीहस्तमें विराजमान लीलाकमल है। इस दृष्टिसे प्रथम वर्णित कमल आसनभूत कमल है। धर्म और यश ही भगवान्‌के ऊपर डुलनेवाले चमर और व्यजन हैं, अकुतोभय वैकुण्ठधाम ही छत्र है, वेदत्रयीरूप गरुड़ ही यज्ञस्वरूप भगवान्‌के वाहन हैं, ऋग्यजुःसाम- इन्हीं तीनों वेदोंसे ही यज्ञकी सम्पत्ति होती है, अतः वेदात्मा ही गरुड़ हैं, यज्ञस्वरूप विष्णु ही उनपर विराजमान होकर चलते हैं। चिद्रूपा भागवती शक्ति ही भगवत्प्रिया लक्ष्मी हैं, भगवदुपासना-विधायक पांचरात्रादि आगम ही पार्षदाधिप विष्वक्सेन हैं। अणिमा, महिमा आदि अष्ट विभूतियाँ ही भगवान्‌के नन्द, सुनन्दादि पार्षद हैं। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्धरूपसे विराट्, हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, ब्रह्म, विश्व, तैजस, प्राज्ञ, तुरीयादि रूपमें भी उन्हीं चतुर्व्यूह, चिन्मूर्ति भगवान्‌का स्वरूप वर्णित है। ये भगवान् वेदोंके भी कारण हैं। स्वयंदृक् एवं स्वमहिमपूर्ण हैं। परमार्थतः सर्वविध-भेदविवर्जित होनेपर भी भगवान् अपनी शक्तिभूता मायासे ही विश्वका उत्पादन, पालन एवं संहरण करते हैं, अतएव ब्रह्मरूप विष्णु इन आख्याओंसे, अनाच्छन्नज्ञान होते हुए भी विभिन्न रूपोंमें प्रतीत होते हैं। फिर भी वे वस्तुतः भिन्न नहीं हैं; क्योंकि तत्त्वदर्शी विद्वानोंको आत्मरूपसे ही भगवान्‌का उपलम्भ होता है। भगवद्धाम श्रीभगवान् तुर्य एवं तुर्यातीतरूपसे निर्गुण, निष्क्रिय, निर्मल, निरवद्य, निरंजन, निराकार, निराश्रय, निरतिशयाद्वैत-परमानन्दस्वरूप हैं। सन्देह हो सकता है कि शुद्धाद्वैत परमानन्दपरब्रह्ममें वैकुण्ठ, प्रासाद, प्राकार, विमानादि अनन्त वस्तुभेद कैसे हुए? यदि ये सब हैं, तो निर्विशेषाद्वैत कैसे ? इसका समाधान यह है कि जैसे शुद्ध सुवर्णमें कटक, मुकुट, अंगदादि अनेक भेद होते हैं, जैसे समुद्र-जलमें स्थूल-सूक्ष्म तरंग हैं, जैसे समुद्र-जलमें सूक्ष्म तरंग, फेन, बुद्बुदादि भेद होते हैं, जैसे भूमिमें पर्वत, वृक्ष, तृण, गुल्म, लतादि अनन्त वस्तु-भेद होते हैं, वैसे ही अद्वैत परमानन्द ब्रह्ममें वैकुण्ठादि भेद उपपन्न हो जाते हैं। सब कुछ भगवान्‌का स्वरूप ही है, भगवद्व्यतिरिक्त अणुभर भी कुछ नहीं है— मत्स्वरूपमेव सर्वमद्व्यतिरिक्तमणुमात्रं न विद्यते। 'परममोक्ष सर्वत्र एक ही है, फिर अनन्तवैकुण्ठ, अनन्त आनन्द-समुद्रादि कैसे संगत होंगे?' इस शंकाका समाधान यह है कि अविद्या पादमें ही जब अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड हैं, तब एक-एक ब्रह्माण्डमें वैकुण्ठ तथा विविध विभूतियोंमें क्या आपत्ति है ? फिर तीनों पादोंके वैकुण्ठोंके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ? निरतिशयानन्दाविर्भाव मोक्ष है, यह त्रिपाद ब्रह्ममें सर्वदा प्रकट रहता है। वह पादत्रय ही परम वैकुण्ठ एवं परम कैवल्य है, इसलिये अविद्या, विद्या, आनन्द और तुर्य—इन चारों पादोंमें अनन्त वैकुण्ठ, अनन्त आनन्द-समुद्रादि ठीक ही है। इस तरह उपासक परम वैकुण्ठमें पहुँचकर भगवान्‌का ध्यान करके निरतिशयाद्वैत-परमानन्दस्वरूप होकर, सावधानीसे अद्वैत योगमें स्थित होकर, अद्वैत परमानन्दका अनुसन्धान करके स्वयं शुद्धबोधा- नन्दस्वरूप होकर महावाक्यका स्मरण करता हुआ

अपने आत्माको ब्रह्म और ब्रह्मको आत्मा समझ लेता है, अपनेको ब्रह्ममें होम देता है। फिर 'अहं ब्रह्म' की भावनासे निस्तरंग, अद्वैत, अपारनिरतिशय सच्चिदानन्द, ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। जो इस मार्गसे सम्यक् अभ्यास करता है, वह अवश्य ही नारायण हो जाता है। 'त्रिपाद्विभूतिमहानारायणो- पनिषद्' में इस विषयपर बड़ा ही सुन्दर विवेचन है, यहाँ तो उसका सारांशमात्र ही दिया गया है। लोक-लोकान्तरों एवं भगवद्विग्रह विलासादिका निरूपण इसमें साम्प्रदायिक वैष्णवों एवं शैवोंसे भी सुन्दर है। विशेषता यह है कि यहाँ अद्वैतसिद्धान्तके पोषणमें पूर्ण ध्यान रखा गया है। शुद्धसत्त्वमयी शक्तिसंसृष्ट, चिदानन्दप्रधान तत्त्वमें अनन्तानन्तवैकुण्ठादिका सभी तारतम्य मान्य है। शक्त्यतीत तत्त्व सर्वथा निराकार, निर्विकार, निर्विशेष ही है। शक्तिकी अनिर्वचनीयताके कारण वस्तुतः शक्तिसंसृष्ट भी सर्वदा, सर्वथा सर्वातीत ही है, अतः वह सर्वदा, सर्वथा, सर्वदेश, काल एवं वस्तुओंसे अतीत है। इसीलिये उससे व्यतिरिक्त कहीं कुछ भी नहीं है, सब कुछ वही है। इस दृष्टिको लेकर पुराणोंमें भगवल्लोकों एवं स्वरूपोंका वर्णन है। श्रीभागवतमें श्रीकृष्ण-प्रदर्शित विभूतियोंमें ब्रह्माको अपरिगणित विष्णु परिलक्षित हुए थे और उन सभीको मूर्तिमान् चतुर्विंशति तत्त्वोंसे उपासित बतलाया है और सभीको सत्यज्ञानानन्तानन्दैकरस बतलाया है— सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१३।५४) अर्थात् वे सभी स्वरूप सत्यज्ञानानन्तानन्द- मात्रैकरसमूर्ति ही हैं। जैसे शैत्यके कारण निर्मल जल ही बर्फ बनता है, वैसे ही विशुद्ध सत्त्वके कारण निर्मल, निर्विकार, एकरस ब्रह्म ही उन मूर्तियोंके रूपमें व्यक्त है। पुनश्च, वे ऐसे महामहिम वैभवशाली स्वरूप थे, जिनके बहुत-से माहात्म्योंको और तो क्या, उपनिषददर्शी भी नहीं स्पर्श कर सकते। ठीक ही है, भगवान्‌के अनन्त माहात्म्यको सामस्त्येन कोई भी नहीं जान सकता। अनन्त होनेसे भगवान् भी उनका अन्त नहीं पा सकते। इन्हीं सिद्धान्तोंके अनुसार श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीने वृन्दावन-शतकमें श्रीवृन्दावनधामको चिदानन्दमय कहा है। यहाँकि प्रत्येक वृक्षों, लताओं, दूर्वाओं एवं तृणोंकी भी अपार महिमा कही गयी है, सब वस्तुओंको केवल परमानन्द सुधासमुद्रका विलास कहा है। इतना ही नहीं 'जहाँ प्रवेशमात्रसे सब जन्तु सच्चिदानन्दघनताको प्राप्त हो जाते हैं,' उन्होंने ऐसा भी कहा है—"यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुः आनन्दसच्चिद्घनतामुपैति" (वृन्दावन-शतक)। इतनेसे ही कुछ साम्प्रदायिक कहने लगते हैं कि उन्होंने अद्वैत-सिद्धान्तको छोड़कर मतान्तरका ग्रहण कर लिया है। परंतु जो अद्वैत-सिद्धान्तसे परिचित हैं, वे जानते हैं कि इस तरहका वर्णन अद्वैतवादको छोड़कर अन्यत्र कहीं बन ही नहीं सकता। 'ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले' (मुण्डक० ३।२।६)। —इस श्रुतिमें 'ब्रह्मलोकेषु' इस बहुवचनसे यहाँ मालूम पड़ता है कि सविशेष ब्रह्मलोक एक ही नहीं, किंतु बहुत हैं। दूसरे यह भी मालूम पड़ता है कि सर्वमूर्धन्य, सर्वोत्कृष्ट लोक ही शैवोंको परम शिवलोकके रूपमें, वैष्णवोंको परम वैकुण्ठके रूपमें, कृष्ण-भक्तोंको गोलोकधामके रूपमें, राम-भक्तोंको साकेतधामके रूपमें, परमशाक्तोंको मणिद्वीपके रूपमें भासमान होता है। सगुण, सविशेष ब्रह्मके उपासकोंको उनके इष्टदेवके रूपमें भासमान होता है। वही निर्गुण विष्णुतत्त्व ज्ञानवालोंको निर्विशेष ब्रह्मके रूपमें प्रत्यक्ष होता है।

४८६ भक्तिसुधा श्रीभगवती-तत्त्व महाचिति भगवतीमें सम्पूर्ण विश्व भासित अनन्तकोटिब्रह्माण्डात्मक प्रपंचकी अधिष्ठानभूता सच्चिदानन्दरूपा भगवती ही सम्पूर्ण विश्वको सत्ता, स्फूर्ति तथा सरसता प्रदान करती हैं। विश्वप्रपंच उन्हींमें उत्पन्न होता है, स्थित होता है, अन्तमें उन्हींमें लीन हो जाता है। जैसे दर्पणमें आकाशमण्डल, मेघमण्डल, सूर्य-चन्द्रमण्डल, नक्षत्रमण्डल, भूधर, सागरादि प्रपंच प्रतीत होता है, किंतु दर्पणको स्पर्श करके देखा जाय, तो वास्तवमें कुछ भी नहीं उपलब्ध होता, वैसे ही सदानन्दस्वरूप महाचिति भगवतीमें सम्पूर्ण विश्व भासित होता है। जैसे दर्पणके बिना प्रतिबिम्बका भान नहीं होता, दर्पणके उपलम्भमें ही प्रतिबिम्बका उपलम्भ होता है, वैसे ही अखण्ड, नित्य, निर्विकार महाचितिमें ही, उसके अस्तित्वमें ही प्रमाता, प्रमाण, प्रमेयादि विश्व उपलब्ध होता है। भान न होनेपर भास्यके उपलम्भकी आशा ही नहीं की जा सकती। महाचिति ही भगवती, आत्मा, पुरुष, ब्रह्म आदि शब्दोंसे व्यवहृत सामान्य रूपसे तो यह बात सर्वमान्य है कि प्रमाणाधीन ही किसी भी प्रमेयकी सिद्धि होती है, अतः सम्पूर्ण प्रमेयमें प्रमाण कवलित ही उपलब्ध होता है। प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेय—ये अन्योन्यकी अपेक्षा रखते हैं। प्रमाणका विषय होनेसे ही कोई वस्तु प्रमेय हो सकती है। प्रमेयको विषय करनेवाली अन्तःकरणकी वृत्ति प्रमाण कहला सकती है। प्रमेय- विषयक प्रमाणका आश्रय अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही प्रमाता कहलाता है। प्रमाताश्रित प्रमेयाकार वृत्तिको ही प्रमाण कहा जाता है। परंतु इन सबकी उत्पत्ति, स्थिति, गतिका भासक नित्य बोध आत्मा है। वही साक्षी एवं वही ब्रह्म कहलाता है। यद्यपि वह स्त्री, पुमान् अथवा नपुंसक नहीं है तथापि चिति, भगवती आदि स्त्रीवाचक शब्दोंसे, आत्मा; पुरुष आदि पुंबोधक शब्दोंसे, ब्रह्म, ज्ञान आदि नपुंसक शब्दोंसे व्यवहृत होता है। वस्तुतः स्त्री, पुमान्, नपुंसक—इन सबसे पृथक् होनेपर भी तादृक्-तादृक् (उस-उस) शरीरसम्बन्धसे या वस्तुसम्बन्धसे वही अचिन्त्य, अव्यक्त, स्वप्रकाश सच्चिदानन्दस्वरूपा महाचिति भगवती ही आत्मा, पुरुष, ब्रह्म आदि शब्दोंसे ही व्यवहृत होती हैं। मायाशक्तिका आश्रयण करके वे ही त्रिपुरसुन्दरी, भुवनेश्वरी, विष्णु, शिव, कृष्ण, राम, गणपति, सूर्य आदि रूपमें भी प्रकट होती हैं। स्थूल, सूक्ष्म, कारण—त्रिशरीररूप त्रिपुरके भीतर रहनेवाली सर्वसाक्षिणी चिति ही त्रिपुरसुन्दरी है। उसी मायाविशिष्ट तत्त्वके जैसे राम-कृष्णादि अन्यान्य अवतार होते हैं, वैसे ही महालक्ष्मी, महासरस्वती, महागौरी आदि अवतार होते हैं। यद्यपि श्रीभगवती नित्य ही हैं तथापि देवताओंके कार्यके लिये वे समय-समयपर अनेक रूपोंमें प्रकट होती हैं। वे जगन्मूर्त्ति भगवती नित्य ही हैं, उन्हींसे चराचर प्रपंच व्याप्त है तथापि उनकी उत्पत्ति अनेक प्रकारसे होती है। देवताओंके कार्यके लिये जब वे प्रकट होती हैं, तब वे नित्य होनेपर भी 'उत्पन्न हुईं' कही जाती हैं— नित्यैव सा जगन्मूर्त्तिस्तया सर्वमिदं ततम्॥ तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम। देवानां कार्यसिद्धयर्थमाविर्भवति सा यदा॥ उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते। (श्रीदुर्गासप्तशती १।६४-६६) भगवती मायारूपा नहीं है कुछ लोगोंका कहना है कि 'शास्त्रोंमें मायारूपा भगवतीकी ही उपासना कही गयी है, माया वेदान्त- सिद्धान्तानुसार मिथ्याभूत है, मुक्तिमें उसकी अनुगति नहीं हो सकती, अतः भगवतीकी उपासना अश्रद्धेय है। 'नृसिंहतापनी' में ऐसा स्पष्ट उल्लेख है कि नारसिंही माया ही सब प्रपंचकी सृष्टि करती है, वही सबकी रक्षा करती है, वही सबका संहार करती है, उसी मायाशक्तिको जानना चाहिये। जो उसे जानता है, वह मृत्युको तरता है, पाप्माको तरता है, अमृतत्व

श्रीभगवती-तत्त्व

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एवं महती श्रीको प्राप्त करता है— 'माया वा एषा नारसिंही सर्वमिदं सृजति, सर्वमिदं रक्षति, सर्वमिदं संहरति। तस्मान्मायामेतां शक्तिं विद्यात्। य एतां मायां शक्तिं वेद, स मृत्युं जयति, स पाप्मानं तरति, सोऽमृतत्वं गच्छति, महतीं श्रियमश्नुते।' आप वैष्णवीशक्ति अनन्तवीर्या एवं विश्वकी बीजभूता माया हैं— 'त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया।' (श्रीदुर्गासप्तशती ११।५) इत्यादि वचनोंसे स्पष्ट मालूम पड़ता है कि मायारूपा ही भगवती है। उसीकी उपासनाका तत्र-तत्र स्थानोंमें विधान है। माया स्वयं जड़ है इत्यादि-इत्यादि। परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि यह सब पूर्वोक्त और निम्नलिखित प्रमाणोंसे विरुद्ध है— 'सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः कासि त्वं महादेवीति॥ साब्रवीत्—अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत्।' (श्रीदेव्यथर्वशीर्ष १-२) अर्थात् देवताओंने देवीका उपस्थान करके उनसे प्रश्न किया कि 'आप कौन हैं?' देवीने कहा—'मैं ब्रह्म हूँ, मुझसे ही प्रकृति-पुरुषात्मक जगत् उत्पन्न होता है।' 'अथ ह्येषां ब्रह्मरन्ध्रे ब्रह्मरूपिणीमाजोति, भुवनाधीश्वरी तुर्यातीता' (भुवनेश्वर्युपनिषद्)। 'स्वात्मैव ललिता' (भावनोपनिषद्)। —इत्यादि वचनोंसे तुर्यातीत ब्रह्मात्मस्वरूपा ही भगवती हैं, यह स्पष्ट है। 'त्रिपुरातापनीय', 'सुन्दरीतापनीयादि' उपनिषदोंमें 'परोरजसे' इत्यादि गायत्रीके चतुर्थ चरणसे प्रतिपाद्य ब्रह्मके वाचकरूपसे 'ह्रीं' बीजको बतलाया है। 'काली' एवं 'तारोपनिषदों' में भी ब्रह्मरूपिणी भगवतीकी ही उपासना प्रतिपादित है। अतः संसारनाशाय साक्षिणीमात्मरूपिणीम्। आराधयेत् परां शक्तिं प्रपञ्चोल्लासवर्जीताम्॥ (सूतसंहिता) अर्थात् संसारनिवृत्तिके लिये प्रपंचस्फुरणशून्य, सर्वसाक्षिणी, आत्मरूपिणी, पराशक्तिकी ही आराधना करनी चाहिये। परा तु सच्चिदानन्दरूपिणी जगदम्बिका। सर्वाधिष्ठानरूपा स्याज्जगद्भ्रान्तिश्चिदात्मनि॥ (स्कन्दपुराण) अर्थात् सच्चिदानन्दरूपिणी परा जगदम्बिका ही विश्वकी अधिष्ठानभूता हैं, उन्हीं चिदात्मस्वरूपा भगवतीमें ही जगत्की भ्रान्ति होती है। सर्ववेदान्तवेद्येषु निश्चितं ब्रह्मवादिभिः॥ एकं सर्वगतं सूक्ष्मं कूटस्थमचलं ध्रुवम्। योगिनस्तत् प्रपश्यन्ति महादेव्याः परं पदम्॥ परात्परतरं तत्त्वं शाश्वतं शिवमच्युतम्। अनन्तप्रकृतौ लीनं देव्यास्तत् परमं पदम्॥ शुभं निरञ्जनं शुद्धं निर्गुणं द्वैतवर्जितम्॥ आत्मोपलब्धिविषयं देव्यास्तत् परमं पदम्। (कूर्मपुराण पू०वि० अ० १९।४८-४९, ५१-५२) —इत्यादि वचनोंसे निर्विकार, अनन्त, अच्युत, निरंजन, निर्गुण ब्रह्मको ही भगवतीका वास्तविक स्वरूप बतलाया गया है। देवीभागवतमें भी कहा है कि— निर्गुणा सगुणा चेति द्विधा प्रोक्ता मनीषिभिः। सगुणा रागिभिः सेव्या निर्गुणा तु विरागिभिः॥ अर्थात् निर्गुणा-सगुणा दो प्रकारकी भगवती हैं, रागिजनोंको सगुणा सेव्या हैं, विरागियोंको निर्गुणा सेव्या हैं। ब्रह्माण्डपुराणके 'ललितापाख्यान' में भी कहा है— 'चितिस्तत्पदलक्ष्यार्था चिदेकरसरूपिणी।' अर्थात् चिदेकरसरूपिणी चिति ही तत्पदकी लक्ष्यार्थस्वरूपा हैं। कहा जा सकता है कि 'फिर तो ब्रह्मस्वरूपता- बोधक वचनोंसे भगवतीके मायात्वबोधक वचनोंका विरोध अवश्य होगा।' परंतु ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि वेदान्तमें मायाको मिथ्या कहा गया है। मिथ्यापदार्थ

अधिष्ठानमें कल्पित होता है। अधिष्ठान सत्तासे अतिरिक्त कल्पितकी सत्ता नहीं हुआ करती। मायामें अधिष्ठानकी ही सत्ताका प्रवेश रहता है, अतः मायास्वरूपकी उपासनासे भी सत्तास्वरूप ब्रह्मकी ही उपासना होगी। इस आशयसे मायास्वरूपत्वबोधक वचनोंका भी कोई विरोध नहीं है। जैसे ब्रह्मकी उपासनामें भी केवल ब्रह्मकी उपासना नहीं होती, अपितु शक्तिविशिष्ट ही ब्रह्मकी उपासना होती है, क्योंकि ब्रह्मसे पृथक् होकर शक्ति नहीं रह सकती और केवल ब्रह्मकी उपासना हो नहीं सकती, वैसे ही केवल मायाकी भी उपासना सम्भव नहीं हो सकती। केवल मायाकी स्थिति ही नहीं बन सकती, फिर उपासना तो दूर रही। मायाविशिष्ट ब्रह्म ही भगवती है अधिष्ठानभूत ब्रह्मसे युक्त होकर ही माया रहती है, अतः भगवतीकी मायारूपता वर्णन करनेपर भी फलतः ब्रह्मरूपता ही सिद्ध होती है। पावकस्योष्णतावेयमुष्णांशोरिव दीधितिः। चन्द्रस्य चन्द्रिकेवेयं शिवस्य सहजा ध्रुवा॥ अर्थात् जैसे पावकमें उष्णता रहती है, सूर्यमें किरण रहती है, चन्द्रमामें चन्द्रिका रहती है, वैसे ही शिवमें उनकी सहज शक्ति रहती है। इस तरह विश्वस्वरूपभूता शक्तिके रूपमें भगवतीका वर्णन मिलता है। जैसे अग्निमें होम करनेपर भी अग्नि- शक्तिमें होम समझा जाता है, वैसे ही अग्नि-शक्तिमें होम करनेसे अग्निमें होम समझा जाता है। इसी तरह मायाको भगवती कहनेपर भी ब्रह्मको भगवती समझा जा सकता है, अतः ब्रह्मकी ही उपासना समझनी चाहिये। जो वाक्य मायाको मिथ्या प्रतिपादित करते हैं, उनमें तो केवल मायाका ही ग्रहण होता है, क्योंकि ब्रह्मका मिथ्यात्व नहीं है, वह तो त्रिकालाबाध्य, सत्स्वरूप अधिष्ठान है। उपास्य मायापदार्थान्तर्गत ब्रह्मांश मोक्षदशामें भी अनुस्यूत रहेगा, अतः मुक्तिमें उपास्य-स्वरूपका त्याग भी नहीं होगा। 'अन्तर्यामिब्राह्मण' में पृथ्‍वीसे लेकर मायापर्यन्त सभी पदार्थोंको चेतन सम्बन्धसे देवता बतलाया गया है। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छान्दोग्य० ३।१४।१)- इस श्रुतिके अनुसार भी सब कुछ ब्रह्म ही है, ऐसा कहा गया है। 'सूतसंहिता' में कहा है- चिन्मात्राश्रयमायायाः शक्त्याकारो द्विजोत्तमाः। अनुप्रविष्टा या संविन्निर्विकल्पा स्वयम्प्रभा॥ सदाकारा सदानन्दा संसारोच्छेदकारिणी। सा शिवा परमा देवी शिवाभिन्ना शिवङ्करी॥ अर्थात् चिन्मात्र परब्रह्मके आश्रित रहनेवाली मायाके शक्त्याकारमें अनुप्रविष्ट स्वयंप्रभा, निर्विकल्पा, सदाकारा, सदानन्दा, संविद् ही शिवाभिन्न शिवस्वरूपा परमा देवी है अथवा भगवतीस्वरूपप्रतिपादक वाक्योंमें जो माया, शक्ति, कला आदि शब्द हैं, वे सब लक्षणासे मायाविशिष्ट, कलाविशिष्ट ब्रह्मके बोधक समझने चाहिये। तथा च मायाविशिष्ट ब्रह्म ही 'भगवती' शब्दका अर्थ है। यही बात शिवने कही थी- नाहं सुमुखि मायाया उपास्यत्वं ब्रुवे क्वचित्। मायाधिष्ठानचैतन्यमुपास्यत्वेन कीर्तितम्॥ मायाशक्त्यादिशब्दाश्च विशिष्टस्यैव लक्षकाः। तस्मान्मायादिशब्दैस्तद् ब्रह्मैवोपास्यमुच्यते ॥ यहाँ एक-एक पक्षमें केवल चैतन्य ही मायादि शब्दोंसे उपास्य कहा गया है, द्वितीय पक्षमें मायाविशिष्ट ब्रह्म मायादि शब्दसे कहा गया है। साकार देवताविग्रह सर्वत्र ही शक्तिविशिष्ट ब्रह्मरूपसे ही उपास्य होता है। भगवतीविग्रहमें भी भाषण, दर्शन, अनुकम्पा आदि व्यवहार देखा ही जाता है, फिर उसमें जड़त्वकी कल्पना किस तरह की जा सकती है? विराट्, हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, ब्रह्म, विष्णु, रुद्रादिकोंके स्वरूपमें एक-एक गुणकी प्रधानता है, माया गुणत्रयकी ही साम्यावस्था है, वह केवल शुद्ध ब्रह्मके आश्रित है। मायाविशिष्ट तुरीयब्रह्म ही भगवतीकी उपासनामें ग्राह्य है, यह दिखलानेके लिये माया, प्रकृति आदि शब्दोंसे कहीं-कहीं भगवतीको बोधित

३।१४।१) इत्यादि श्रुतिके अनुसार सब कुछ चिन्मात्र ब्रह्म ही है तथापि भक्तोंके चित्तावलम्बनके लिये अनेक प्रकारके स्वरूपोंका उपदेश किया गया है। मलिन, शुद्ध, शुद्धतर, शुद्धतम आदि उपाधियोंका उपदेश किया गया है। जैसे पात्र, मणि, कृपाण,

Right column: दर्पणादिमें शुद्धिके तारतम्यसे प्रतिबिम्बित-प्रतिफलनमें तारतम्य होता है, वैसे ही उपाधियोंके तारतम्यसे ब्रह्मके प्रसाद, प्राकट्यमें भी तारतम्य होता है। इसी अभिप्रायसे विभूतियोंकी उत्कृष्टा, उत्कृष्टतरता आदिका व्यवहार शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है। एक-एक गुणोंकी अपेक्षा गुणोंकी साम्यावस्था उत्कृष्ट है। इसीलिये भगवतीकी उपासना परमोत्कृष्ट है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मका प्रथम सम्बन्ध मायाके ही साथ है। गुणोंका सम्बन्ध मायाद्वारा है। इसीलिये साम्यावस्थामें ब्रह्मका अव्यवहित सम्बन्ध है। अतएव 'सूतसंहिता' में कहा गया है—

शाक्तागम मतके अनुयायियोंकी दृष्टिसे अत्यन्त अन्तर्मुख होकर शक्ति शिवस्वरूप ही रहती है। वेदान्तकी दृष्टिसे सर्वोपाधिविनिर्मुक्त स्वप्रकाश चिति ही रहती हैं। वे ही परब्रह्म, आत्मा आदि शब्दोंसे लक्षित होती हैं। शक्ति का खण्डन भगवतीका ही शक्तिस्वरूपसे भी आराधन होता है। हर एक कार्यकी उत्पादनानुकूल शक्ति उसके कारणमें होती है। कार्यके अनन्त होनेसे वह शक्ति भी अनन्त है— 'शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः।' शक्तिके सम्बन्धमें तार्किकोंका कहना है कि 'कोई प्रमाण न होनेसे स्वरूप सहकारिमेलनके अतिरिक्त 'शक्ति' नामका कोई पदार्थ नहीं है। स्फोटादिरूप कार्यकी अन्यथानुपपत्तिको शक्तिमें प्रमाण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जब प्रतिबन्धकाभाव आदि सहकारीसे सहकृत अग्न्यादिके स्वरूपसे ही स्फोटादिरूप कर्मोपपत्ति हो जाती है, तब अतीन्द्रिय शक्तिकी कल्पना करना व्यर्थ है। अभावकी अकारणता होनेसे प्रतिबन्धकाभावको सहकारी मानना ठीक नहीं है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अभावको कारण माननेमें न तो अन्वय-व्यतिरेकित्वमें कोई बाधा पड़ती है, न किसी अनिष्टकी प्रसक्ति ही होती है। भावकी तरह अभावका भी कार्यसे अन्वय- व्यतिरेक दृष्ट है और अभावकी प्रमितिमें योग्यकी अनुपलब्धि एवं विभ्रममें विवेकाग्रहकी हेतुता भी स्पष्ट ही है। यदि कहा जाय कि क्या प्रतिबन्धकका प्रागभाव कारण है या उसका प्रध्वंसाभाव, तो दोनोंकी कारणता नहीं बनती, क्योंकि उत्तम्भकको प्रतिबन्धकके पास ले जानेपर प्रतिबन्धकके रहनेपर भी प्रागभावके बिना ही कार्योत्पत्ति देखी जाती है, अतः प्रागभावको कारण नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार प्रतिबन्धककी अनुदयदशामें भी अर्थात् उसका प्रागभाव रहनेपर भी कार्योत्पत्ति होती है, अतः प्रध्वंसाभावकी भी कारणता नहीं कही जा सकती। परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि उत्तम्भक मणि, मन्त्र आदिके अभावसे सहकृत ही प्रतिबन्धक वस्तुतः प्रतिबन्धक होता है, न कि केवल मणि आदि। अतः वहाँ प्रतिबन्धकसे सहकृतकी ही कारणता होनेसे उक्त दोष नहीं रह जाता। सर्वत्र प्रतिबन्धक-संसर्गा- भावविशिष्टकी ही कारणता मानी गयी है, अतः अनियतहेतुकत्वदोष भी नहीं कहा जा सकता। अन्यथा उपलब्धिमें भी उपलब्धिके प्रागभाव एवं प्रध्वंसाभावके विकल्पसे अभावप्रमितिकी अनियतहेतुकता दुष्परिहार्य होगी। शक्तिपक्षमें भी अप्रतिबद्ध ही शक्तिको कारण माननेसे अभावविकल्पसे उत्पन्न दोष एवं उसका परिहार तुल्य है। 'प्रतिबन्धो विसामग्री तद्धेतुः प्रतिबन्धकः।' इस कुसुमांजलिके वचनानुसार सामग्री-वैकल्य प्रतिबन्ध है और उसका हेतु प्रतिबन्धक है। यहाँ प्रतिबन्धपक्ष प्रतिबन्धकाभावके कारण होने और कारणापेक्ष ही प्रतिबन्धकाभावके प्रतिबन्ध होनेके कारण अन्योन्याश्रयग्रस्त होनेसे यदि कहा जाय कि 'प्रतिबन्धके अभावमें कारणता मानना ठीक नहीं है,' तो यह अनुचित है, क्योंकि अभावकी कारणता मानकर ही कार्यानुदयमात्रसेही मन्त्रादिमें कार्य- प्रतिकूलताका बोध होता है और मणि, मन्त्रादिमें कार्यकी प्रतिबन्धकताका निर्धारण किये बिना ही मन्त्रादिके अभावमें अन्वय-व्यतिरेकसे ही कारणताका निश्चय होता है। इसके अतिरिक्त यह भी विचारणीय है कि अन्योन्याश्रयत्व उत्पत्ति या ज्ञप्तिमें हुआ करता है। यहाँ मन्त्र एवं तद्भाव (प्रागभाव)-की परस्परहेतुता न होनेसे अज्ञात भी मन्त्र तथा तदभावकी कार्यके प्रति प्रतिकूलता एवं कारणता होनेसे दोनों प्रकारका अन्योन्याश्रय नहीं है। यदि कहा जाय कि 'कार्याभावसे मन्त्रादि कारणाभावरूप माने जाते हैं, अतएव मन्त्रादिका अभाव भी कारण माना जाता है। इस प्रकार मन्त्र