भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७७ कामनाभेदसे लिंगके विविध भेद भिन्न-भिन्न कामनासे शिवलिंगके विधान भी पृथक्-पृथक् हैं—यवमय, गोधूममय, सिताखण्डमय, लवणज, हरितालमय, त्रिकटुकमय (शुण्ठी, पिप्पली, मरीचमय) ऐश्वर्य-पुत्रादिकामप्रदायक लिंग हैं। गव्यघृतमय लिंग बुद्धिवर्द्धक है। पार्थिव लिंग सर्वकामप्रद है। तिल-पिष्टमय, तुषज, भस्मोत्थ, गुडमय, गन्धमय, शर्करामय, वंशांकुरज, गोमयज, केशमयज, अस्थिमयज, दधिमय, दुग्धमय, फलमय, धान्यमय, पुष्पमय, धात्रीफलोद्भव, नवनीतमय, दूर्वाकाण्डसमुद्भव, कर्पूरज, अयस्कान्तमय, वज्रमय, मौक्तिकमय, महानीलमय, महेन्द्रनीलमणिमय, चीरसमुद्भव, सूर्यकान्तामणिज, चन्द्रकान्तामणिमय, स्फाटिक, शूलाख्यमणिमय, वैडूर्य, हैम, राजत, आरकूटमय, कांस्यमय, सीसकमय, अष्ट-धातुनिर्मित, ताम्रमय, रक्तचन्दनमय, रंगमय, त्रिलोकमय, दारुज, कस्तूरिकामय, गोरोचनमय, कुमकुममय, श्वेतागुरुमय, कृष्णागुरुमय, पाषाणमय, लाक्षामय, वालुकामय, पारदमय लिंग भिन्न-भिन्न कामनाओंकी पूर्तिके लिये पूजनीय बतलाये गये हैं। पार्थिव पूजनके लिये ब्राह्मणादि वर्णोंको क्रमसे शुक्ल, पीत, रक्त, कृष्णवर्णकी मृत्तिकासे शिवलिंग बनाना चाहिये। तोलाभर मिट्टीसे अंगुष्ठपर्वके परिमाणका लिंग बनाना चाहिये। पूजा भी वैदिक, तान्त्रिक एवं मिश्र विधि या नाममन्त्रोंसे करनी चाहिये। किं बहुना, शिवलिंगकी विशेषताओं, पूजाओं एवं विधियोंपर शास्त्रोंमें बहुत बड़ी सामग्री भरी पड़ी है। बाण और नार्मद लिंगकी परीक्षा बाण और नार्मद लिंगकी परीक्षाके लिये उसे तण्डुलादिसे सात बार तौला जाता है। यदि दूसरी बार तौलनेमें तण्डुल बढ़ जाय, लिंग हलका हो जाय तो वह गृहियोंको पूज्य है। यदि लिंग अधिक ठहरे तो वह विरक्तोंके पूजनेयोग्य है और सात बार तौलनेपर भी बढ़े ही, घटे नहीं तो उसे बाणलिंग अन्यथा नार्मद लिंग जानना चाहिये। प्रायः शिवको अनार्य देवता बतलाया जाता है, परंतु वेदोंमें शिवका बहुत प्रधानरूपसे वर्णन है। एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः। प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः॥ (श्वेता० ३।२) समस्त भुवनोंको अपनी ईशनीशक्तिसे ईशन करते हुए सबमें विराजमान शिव ही अन्तमें सबका संहार करते हैं। बस, वही परमतत्त्व सर्वस्व है, उनसे भिन्न दूसरी वस्तु थी ही नहीं। 'यदा तमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासच्छिव एव केवलः।' जब प्रलयमें रात-दिन, कार्य-कारण कुछ भी नहीं था, तब केवल एक शिव ही थे। 'स्वधया शम्भुः।' 'उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम्॥' 'नमो नीलग्रीवाय च शितिकण्ठाय च॥' (यजु०) यहाँ रुद्रके नील और श्वेत दोनों ही तरहके कण्ठ कहे गये हैं। ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्णपिङ्गलम्। ऊर्ध्वरेतं विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नमः॥ (तैत्तिरीयारण्यक) यहाँ भी कृष्णपिंगल, ऋत-सत्य, ऊर्ध्वरेता विरूपाक्षको नमस्कार किया गया है। भुवनस्य पितरं गीर्भीराभी रुद्रं दिवा वर्धया रुद्रमक्तौ। बृहन्तमृष्वमजरं सुषुम्नमृधग्घुवेम कविनेषितासः॥ (ऋक्० ६।४९।१०) यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः। हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥ (श्वेता० ३।४) यो अग्नौ रुद्रो यो अप्स्वन्तर्य ओषधीर्वीरुध आविवेश। य इमा विश्वा भुवनानि चाक्लृपे तस्मै रुद्राय नमो अस्त्वग्नये॥ (अथर्व० ७।८७।१) 'एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः' (श्वेता० ३।२)