भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 486

४७६ भक्तिसुधा विष्णु परमात्माका शापवश मनुष्य बनना, मत्स्य, वराह आदि रूप धारण करना केवल लीला है। शापादि भी उनकी इच्छासे ही निमित्तरूपमें उपस्थित होते हैं। प्रकृतिके साथ परमात्माका खेल या जीवरूपा परा प्रकृतियोंमें परमात्माका रमण किंवा स्वरूपभूत माधुर्याधिष्ठात्री शक्तिमें परमेश्वरका रमण रहस्यमय है। जैसे कृष्णकी चीरहरणलीला और रासलीलामें अज्ञोंको अश्लीलता प्रतीत होती है, वैसे ही भगवान् शिवकी लीलाएँ भी परमरहस्यमयी हैं। अज्ञोंको उनमें अश्लीलताका भान हो सकता है— निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥ राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे॥ (रा०च०मा० ७।७३; २।१२७।७) लिंगरूपसे अतिरिक्त भी भगवान्‌के गंगाधर, चन्द्रशेखर, त्रिलोचन, पंचवक्त्र, नीलकण्ठ, कृत्तिवास, व्याघ्रचर्मासन, त्रिशूलधारी, वृषभध्वज, साम्बसदाशिव आदि रूप हैं, जिनका लोकोत्तर सौन्दर्य, माधुर्य है। ‘नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञम्।’ ‘प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते।’ ‘तमीश्वराणां परमं महेश्वरं, क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरम्।’ ‘तमीशानं वरदं समीड्यम्।’ ‘मायिनं तु महेश्वरम्।’ —इन श्रुतियोंमें परब्रह्म परमात्माको ही हर और मायाको ही प्रकृति या गौरी कहा गया है। सभी जगह संसारमें देह-देही आदिकोंमें आधार-आधेयभाव देखा जाता है। अनन्त चैतन्य परमात्मा शिव है, वही सृष्ट्युन्मुख होनेपर लिंग ही है। उन्हींका आधार योनि प्रकृति है, शिव लिंगरूपमें पिता, प्रकृति योनिरूपमें माता है— ‘मम योनिर्महद्ब्रह्म।’ (गीता १४।३) द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्द्धेन पुरुषोऽभवत्। अर्द्धेन नारी तस्यांस विराजमसृजत्प्रभुः॥ लिंगयोनिभाव ही अर्धनारीश्वर शिवका लिंगयोनिभाव ही अर्धनारीश्वरका भाव है। सृष्टिके बीजको देखनेवाले परमलिंगरूप श्रीशिव प्रकृतिरूपा नारीयोनिमें आधाराधेयभावसे संयुक्त होकर उससे आच्छादित होकर व्यक्त होते हैं। यही जगन्माता- पिताके आदि-सम्बन्धका द्योतक है। काम-वासनारहित शुद्ध मैथुन भी पितृ-ऋणसे उऋण होनेका साधन है। शिवपुराणमें लिखा है—बिन्दु देवी और नाद शिव है। बिन्दुरूपा देवी माता और नादरूपा शिव पिता है, अतः परमानन्द-लाभार्थ शिवलिंगका पूजन परमावश्यक है। ‘भं वृद्धिं गच्छतीत्यार्थाद्भगः प्रकृतिरुच्यते।' वृद्धिको प्राप्त होनेवाली प्रकृति ही भग है। मुख्यो भगस्तु प्रकृतिर्भगवान् शिव उच्यते। भगवान् भोगदाता हि नान्यो भोगप्रदायकः॥ भगके सहित लिंग और लिंगके सहित भग पूजित होकर इहलोक-परलोकमें विविध सुख देनेवाला है। सदाशिवसे उत्पन्न चैतन्यशक्तिद्वारा जायमान चिन्मय आदिपुरुष ही शिवलिंग है। समस्त पीठ अम्बामय है, लिंग चिन्मय है। भगवान् शंकर कहते हैं कि जो संसारके मूल कारण महाचैतन्यको और लोकको लिंगात्मक जानकर लिंगपूजा करता है, मुझे उससे प्रिय अन्य कोई नर नहीं— लोकं लिङ्गात्मकं ज्ञात्वा लिङ्गे योऽर्चयते हि माम्। न मे तस्मात्प्रियतरः प्रियो वा विद्यते क्वचित्॥ लिंग चिह्न है, सर्वस्वरूपकी पूजा कैसे हो, इसलिये लिंगकी कल्पना है। आदि एवं अन्तमें जगत् अण्डाकृति ही रहता है। अतएव ब्रह्माण्डकी आकृति ही शिवलिंग है। शिव-शक्तिके सहवाससे ही पशु, पक्षी, कीट, पतंगादिकोंकी भी उत्पत्ति होती है। शिव स्वयं अलिंग हैं, उनसे लिंगकी उत्पत्ति होती है, शिव लिंगी और शिवा लिंग हैं। ज्ञापक होनेसे, प्राणियोंका आलय होनेसे एवं लयाधिकरण होनेसे भी वही लिंग है— ‘लीयमानमिदं सर्वं ब्रह्मण्येव हि लीयते।'