भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 488

४७८ भक्तिसुधा 'एक एव रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः॥' (तै० सं० १।८।६।१) अर्थात् अन्य देवोंका कारण, विश्वका एकमात्र स्वामी, अतीन्द्रियार्थज्ञानी और हिरण्यगर्भको उत्पन्न करनेवाला रुद्र हमें शुभ बुद्धि दे, जो अग्निमें, जलमें, ओषधियों एवं वनस्पतियोंमें रहता है और जो सबका निर्माता है, उसी तेजस्वी रुद्रको हमारा प्रणाम हो। जो भुवनका पिता है, बड़ा है, प्रेरक और ज्ञानी है, उस अजरकी हम स्तुति करते हैं इत्यादि। जो कहते हैं कि अग्नि ही वेदके रुद्र हैं,उन्हें इस बातपर ध्यान देना चाहिये कि अग्नि, जल क्या सभी प्रपंचमें रुद्र रहते हैं। जब रुद्रसे भिन्न दूसरा तत्त्व ही नहीं है, तब अग्नि आदि सभी रुद्र हों, यह ठीक ही है। एक ही परमात्माके अनेक नाम एक ही परमात्माके अग्नि, वायु, मातरिश्वा आदि अनेक नाम होते ही हैं— 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।' 'अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।' परंतु अग्निसे भिन्न रुद्र हैं ही नहीं, यह कहना संगत नहीं है। ईशानादस्य भुवनस्य भूरेर्न वा उ योषद् रुद्रादसुर्यम्॥ (ऋक्० २।३३।९) इस भुवनके स्वामी रुद्रदेवसे उनकी महाशक्ति पृथक् नहीं हो सकती। अन्तरिच्छन्ति तं जने रुद्रं परो मनीषया। (ऋक्० ८।७२।३) मुमुक्षु उस रुद्र परमात्माको मनुष्यके भीतर बुद्धिद्वारा जानना चाहते हैं। असंख्याता सहस्राणि ये रुद्रा अधि भूम्याम्। (यजु० १६।५४) रुद्रस्य ये मीळ्हुषः सन्ति पुत्रा (ऋक्० ६।६६।३) अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय। युवा पिता स्वपा रुद्र एषाम्०॥ (ऋक्० ५।६०।५)। रुद्रसे उत्पन्न सब रुद्र ही हैं। तत्त्वमस्यादि महावाक्योंके अनुसार उनको भी एक दिन महारुद्र परमात्मा होना पड़ेगा। स रुद्रः स महादेवः। (अथर्व० १३।४।४) इत्यादि मन्त्रोंमें भी परमात्माको ही रुद्र, महादेव आदि कहा गया है। जो कहते हैं कि शिवसे पृथक् रुद्र हैं, उन्हें वेदोंके ही अन्यान्य मन्त्रोंपर ध्यान देना चाहिये, जिनमें स्पष्टरूपसे परमेश्वरके लिये ही शिव, त्र्यम्बक, महादेव, महेशान, परमेश्वर, ईशान, ईश्वर आदि शब्द आये हैं। त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ (ऋक्० ७।५९।१२) ये भूतानामधिपतयो.... कपर्दिनः। (यजु० १६।५९) असंख्याता सहस्त्राणि ये रुद्रा अधि भूम्याम्। नीलग्रीवाः शितिकण्ठाः....। (यजु० १६।५४,५७) तमु ष्टुहि यः स्विषुः सुधन्वा यो विश्वस्य क्षयति भेषजस्य। यक्ष्वा महे सौमनसाय रुद्रं नमोभिर्देवमसुरं दुवस्य॥ (ऋक्० ५।४२।११) क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। (श्वेता० १।१०) सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात् सर्वगतः शिवः॥ (श्वेता० ३।११) आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं होतारं सत्ययजं रोदस्योः। अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम्॥ (साम-कौथुम १।७।७) त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवसत्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे। (ऋक्० २।१।६) इत्यादि मन्त्रोंमें अग्निको ही रुद्र कहा गया है।