भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
४७८ भक्तिसुधा 'एक एव रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः॥' (तै० सं० १।८।६।१) अर्थात् अन्य देवोंका कारण, विश्वका एकमात्र स्वामी, अतीन्द्रियार्थज्ञानी और हिरण्यगर्भको उत्पन्न करनेवाला रुद्र हमें शुभ बुद्धि दे, जो अग्निमें, जलमें, ओषधियों एवं वनस्पतियोंमें रहता है और जो सबका निर्माता है, उसी तेजस्वी रुद्रको हमारा प्रणाम हो। जो भुवनका पिता है, बड़ा है, प्रेरक और ज्ञानी है, उस अजरकी हम स्तुति करते हैं इत्यादि। जो कहते हैं कि अग्नि ही वेदके रुद्र हैं,उन्हें इस बातपर ध्यान देना चाहिये कि अग्नि, जल क्या सभी प्रपंचमें रुद्र रहते हैं। जब रुद्रसे भिन्न दूसरा तत्त्व ही नहीं है, तब अग्नि आदि सभी रुद्र हों, यह ठीक ही है। एक ही परमात्माके अनेक नाम एक ही परमात्माके अग्नि, वायु, मातरिश्वा आदि अनेक नाम होते ही हैं— 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।' 'अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।' परंतु अग्निसे भिन्न रुद्र हैं ही नहीं, यह कहना संगत नहीं है। ईशानादस्य भुवनस्य भूरेर्न वा उ योषद् रुद्रादसुर्यम्॥ (ऋक्० २।३३।९) इस भुवनके स्वामी रुद्रदेवसे उनकी महाशक्ति पृथक् नहीं हो सकती। अन्तरिच्छन्ति तं जने रुद्रं परो मनीषया। (ऋक्० ८।७२।३) मुमुक्षु उस रुद्र परमात्माको मनुष्यके भीतर बुद्धिद्वारा जानना चाहते हैं। असंख्याता सहस्राणि ये रुद्रा अधि भूम्याम्। (यजु० १६।५४) रुद्रस्य ये मीळ्हुषः सन्ति पुत्रा (ऋक्० ६।६६।३) अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय। युवा पिता स्वपा रुद्र एषाम्०॥ (ऋक्० ५।६०।५)। रुद्रसे उत्पन्न सब रुद्र ही हैं। तत्त्वमस्यादि महावाक्योंके अनुसार उनको भी एक दिन महारुद्र परमात्मा होना पड़ेगा। स रुद्रः स महादेवः। (अथर्व० १३।४।४) इत्यादि मन्त्रोंमें भी परमात्माको ही रुद्र, महादेव आदि कहा गया है। जो कहते हैं कि शिवसे पृथक् रुद्र हैं, उन्हें वेदोंके ही अन्यान्य मन्त्रोंपर ध्यान देना चाहिये, जिनमें स्पष्टरूपसे परमेश्वरके लिये ही शिव, त्र्यम्बक, महादेव, महेशान, परमेश्वर, ईशान, ईश्वर आदि शब्द आये हैं। त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ (ऋक्० ७।५९।१२) ये भूतानामधिपतयो.... कपर्दिनः। (यजु० १६।५९) असंख्याता सहस्त्राणि ये रुद्रा अधि भूम्याम्। नीलग्रीवाः शितिकण्ठाः....। (यजु० १६।५४,५७) तमु ष्टुहि यः स्विषुः सुधन्वा यो विश्वस्य क्षयति भेषजस्य। यक्ष्वा महे सौमनसाय रुद्रं नमोभिर्देवमसुरं दुवस्य॥ (ऋक्० ५।४२।११) क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। (श्वेता० १।१०) सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात् सर्वगतः शिवः॥ (श्वेता० ३।११) आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं होतारं सत्ययजं रोदस्योः। अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम्॥ (साम-कौथुम १।७।७) त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवसत्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे। (ऋक्० २।१।६) इत्यादि मन्त्रोंमें अग्निको ही रुद्र कहा गया है।
शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७९ 'स्थिरैरङ्गैः पुरुरूप उग्रो बभ्रुः शुक्रेभिः पिपिशे हिरण्यैः।' यहाँ रुद्रको पुरुरूप, असाधारण तेजस्वी और बभ्रुवर्ण कहा गया है। शिवको तामसदेवता कहना अनभिज्ञता वैदिकोंके यहाँ शिवपूजाकी सामग्रियोंमें कोई भी तामस पदार्थ नहीं है। बिल्वपत्र, पुष्प, फल, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे ही भगवान्की पूजा होती है। मद्य, मांसका तो शिवलिंगपूजामें कभी भी उपयोग नहीं होता। अतः शिव तामस देवता हैं, यह कहना अनभिज्ञता है। हाँ, त्रिमूर्त्यन्तर्गत शिव कारणावस्थाके नियन्ता माने जाते हैं। कारण या अव्यक्तकी अवस्था अवष्टम्भात्मक होनेसे तमःप्रधाना कही जा सकती है। 'तम आसीत्तमसागूढमग्रे' इस श्रुतिमें तमको ही सबका आदि और कारण कहा गया है। उसीमें वैषम्य होनेसे सत्त्व, रजका उद्भव होता है। तमका नियन्त्रण करना सर्वापेक्षयाऽपि कठिन है। भगवान् शिव तमके नियन्ता हैं, तमके वशमें नहीं हैं। शिव भयानक भी हैं, शान्त भी हैं। सर्व-संहारक, कालकाल, महाकालेश्वर, महामृत्युञ्जय भगवान्में उग्रता उचित ही है। ब्रह्मक्षत्रोपलक्षित समस्त प्रपंच जिसका ओदन है, मृत्यु जिसका दाल-शाक है, मृत्युसहित संसारको जो खा जाता है, उसका उग्र होना स्वाभाविक है। शिवसे भिन्न जो भी कुछ है, उन सबके संहारक शिव हैं। इसीलिये विष्णुको उनका स्वरूप ही माना जाता है। अन्यथा भिन्न होनेपर तो उनमें भी संहार्यता आ जायगी। वस्तुतः हरिहर, शिवविष्णु तो एक ही हैं। उनमें अणुभर भी भेद है ही नहीं। भीषास्माद्वातः पवते। (तैत्तिरीय० २।८) भगवान्के भयसे ही वायु, अग्नि, सूर्य, मृत्यु अपना काम करते हैं। महद्भयं वज्रमुद्यतम् समुद्यत महावज्रके समान भगवान्से सब डरते हैं, तभी भगवान्को मन्यु या चण्ड-कोपरूप माना गया है। 'नमस्ते रुद्र मन्यवे' हे रुद्र! आपके मन्युस्वरूपकी मैं वन्दना करता हूँ। वही शक्तिरूपधारिणी होकर चण्डिका कहलाते हैं, फिर भी वह ज्ञानियों और भक्तोंके लिये रसस्वरूप हैं। रसो वै सः। एष ह्येवानन्दयति॥ (तैत्तिरीय० २।७) भगवान् शिव रसमय, कल्याणमय भगवान् रसस्वरूप हैं, निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्से ही समस्त विश्वको आनन्द प्राप्त होता है, इसीलिये अघोरा शिवतनु घोरतनुसे पृथक् वर्णित है— या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥ (यजु० १६।२) भगवान्की शन्तमा, शिवा तनू परमकल्याणमयी है। शान्तं शिवम् (माण्डूक्योपनिषद् ७) अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽअस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ इस तरह रुद्राध्यायमें उग्र, श्रेष्ठ और भीमरूप वर्णित हैं। नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ (यजु० १६।४१) इस मन्त्रमें शिवको शिवस्वरूप, कल्याणदाता, मोक्षदाता कहा गया है। इस तरह जब अनादि, अपौरुषेय वेदों एवं तन्मूलक इतिहास, पुराण, तन्त्रोंद्वारा शिवका परमेश्वरत्व, शान्तत्व, सर्वपूज्यत्व और अनादि सिद्धत्व सिद्ध होता है, तब शिवकी पूजा अनार्योंसे ली गयी है, इन बेसिर-पैरकी बातोंका क्या मूल्य है ?
४८० भक्तिसुधा श्रीविष्णु-तत्त्व व्याप्त्यर्थक 'विष्लृ' धातुसे विष्णु शब्दकी निष्पत्ति होती है, तथा च व्यापक परब्रह्म परमात्माको ही 'विष्णु' कहा जाता है। 'यतो वा इमानी भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभि संविशन्ति।' (तैत्तिरीय० ३।१) —इस श्रुतिके अनुसार यही मालूम पड़ता है कि सम्पूर्ण जगत्की जिससे उत्पत्ति होती है, जिसमें स्थिति होती है और जिसमें विलय होता है, वही ब्रह्म है। विशेषरूपसे अनन्तकोटिब्रह्माण्डोत्पादिनी शक्तिमें कार्योत्पत्तिके लिये प्रकाशात्मक सत्त्व, चलनात्मक रज तथा अवष्टम्भात्मक तमकी अपेक्षा होती है। तत्तद्गुणोंकी प्रधानतासे ब्रह्म ही रजके सम्बन्धसे ब्रह्मा, तमके सम्बन्धसे रुद्र एवं सत्त्वके सम्बन्धसे विष्णु बन जाता है। प्रकारान्तरसे उत्पादिनीशक्तिविशिष्ट ब्रह्म 'ब्रह्मा', संहारिणीशक्तिविशिष्ट ब्रह्म 'रुद्र' तथा पालिनीशक्तिविशिष्ट ब्रह्म 'विष्णु' शब्दसे व्यवहृत होता है। प्रकारान्तरसे समष्टि-कारणप्रपंचाभिमानी अव्याकृत रुद्र, समष्टि-सूक्ष्मप्रपंचाभिमानी हिरण्यगर्भ विष्णु और समष्टि-स्थूलप्रपंचाभिमानी विराट् ब्रह्मा कहा जाता है। मुख्यरूपसे अव्यक्तादिके नियामक अन्तर्यामीको ही रुद्र, विष्णु, ब्रह्मा आदि कहा जाता है। जहाँ-कहीं उपासना-विशेषके कारण किसी जीवका ब्रह्मा होना सुना जाता है, वह अन्तर्यामी न होकर अभिमानी ही समझा जाना चाहिये। 'स एकाकी न रेमे', 'सोऽबिभेत्' —इत्यादि श्रुतिवचनोंमें जहाँ हिरण्यगर्भमें भय, अरमण आदिका श्रवण है, वहाँ हिरण्यगर्भमें जीवभावका ही निर्णय किया गया है; क्योंकि परमेश्वरमें भय, अरमण आदि कथमपि सम्भव नहीं। अभिमानी जीव भी हो सकता है, परंतु अन्तर्यामी सर्वत्र परमेश्वर ही है। पुराणोंमें ब्रह्माण्डोंकी अनन्तताका पता लगता है, अतएव तदनुसार विराट्, हिरण्यगर्भ आदिकोंकी भी अनन्तता ही मालूम पड़ती है। उत्पादक-पालक- संहारक-दृष्टिसे ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रकी अनन्तता ही सिद्ध होती है। अन्तर्यामी होनेसे सभी परमेश्वर ही हैं। इस विचारसे उपनिषदोंका विराट् पुराणोंका महाविराट् है। अनन्तकोटिब्रह्माण्डात्मक समष्टि- स्थूल प्रपंचका एकमात्र अभिमानी एवं अन्तर्यामी उपनिषदोंका विराट् है। यही बात हिरण्यगर्भ और अव्यक्तके सम्बन्धमें भी समझनी चाहिये। तदनुसार ही अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डात्मक सम्पूर्ण विश्वके उत्पादक ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहारक रुद्र सर्वथा एक ही हैं। वे ही महाविष्णु, महारुद्र आदि नामोंसे भी यत्र- तत्र व्यवहृत होते हैं। जैसे गोधूमादि सस्योंका एक ही किसान उत्पादक, पालक तथा लावक (काटनेवाला) होता है, वैसे ही विश्वका भी उत्पादक, पालक, संहारक एक ही है, अन्यथा सर्वशक्तिमान् विष्णु परमात्मासे पालित जगत्का संहार दूसरा कैसे कर सकता है? यदि सर्वसंहारक रुद्रको ही परमेश्वर मानें, तो फिर संजिहीर्षित विश्वको पालनेवाला कौन हो सकता है? यदि विष्णुसे भिन्न ही रुद्र हैं, तब सर्वसंहारक रुद्रके द्वारा विष्णुके भी संहारका अवसर उपस्थित हो जायगा, अतएव विष्णु एवं रुद्र दोनोंको एक ही परमेश्वर मानना समुचित है। अनेक ईश्वरका मानना युक्तिविरुद्ध कोई भी संहारक अपनी अन्तरात्माका संहार नहीं कर सकता है। तभी सर्वसंहारक शिवका आत्मा होनेसे विष्णु बने रहते हैं। अनेक ईश्वरका मानना सर्वथा युक्तिविरुद्ध भी है; क्योंकि जब दोनोंमें मतभेद होगा और साथ ही विरुद्ध प्रकारके संकल्प होंगे, तब दो ईश्वर कथमपि नहीं टिक सकेंगे। यदि परस्परके विरुद्ध संकल्पसे दोनोंहीके संकल्प प्रतिरुद्ध होकर वितथ हो गये, तब तो दोनों ही अनीश्वर सिद्ध होंगे। यदि एकके संकल्पसे दूसरेका संकल्प कट गया, तो सिद्धसंकल्प ही परमेश्वर हुआ, तदतिरिक्तमें
श्रीविष्णु-तत्त्व ४८१
असत्यसंकल्पता होनेसे अर्थसिद्ध अनीश्वरता हुई। अतः जगत्का उत्पादक, पालक, संहारक एक ही परमेश्वर है। उसका किसी भी नामसे भले ही व्यवहार हो, परंतु प्रमाणभूत शास्त्रसे जिसमें जगत्कारणत्व, सर्वज्ञत्व, सर्वशक्तिमत्त्वादि अवगत हों, उसे ही परमेश्वर समझा जा सकता है। विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा आदि नामोंके अतिरिक्त आकाशादि शब्दोंसे भी जगत्कारणत्वादि हेतुओंसे परमेश्वरका ही बोध होता है। अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति-स्थिति- प्रलयकारिणी ब्रह्मनिष्ठमहाशक्ति ही सम्पूर्ण अवान्तर अचिन्त्य अनन्त शक्तियोंकी केन्द्र है। उन्हीं शक्तियोंसे अनन्त ब्रह्माण्ड बनते हैं। प्रत्येक ब्रह्माण्डकी शक्तियोंमें तमःप्रधान शक्तिसे भूत—भौतिक प्रपंचकी सृष्टि होती है। तामस भूतोंमें भी सत्त्व, रज, तम आदिका अंश रहता है, अतएव सात्त्विक भूतोंसे अन्तःकरण एवं ज्ञानेन्द्रियाँ, राजससे प्राण एवं कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। तामससे स्थूलभूत बनते हैं। ब्रह्माण्डशक्तिके तामस अंशसे जैसे उपर्युक्त प्रपंच बनता है, वैसे ही रजस्तमोलेशानुविद्ध सत्त्वांशसे अविद्या एवं रज आदिसे अननुविद्ध सत्त्वसे विद्या या मायाका आविर्भाव होता है। अविद्याएँ रज आदिके अनुवेध-वैचित्र्यसे अनन्त हैं, अतः उनमें प्रतिबिम्बित चैतन्यरूप जीव भी अनन्त हैं। जो लोग अविद्याको भी एक ही मानते हैं, उनके मतसे जीव भी एक ही होता है। विशुद्धसत्त्वप्रधाना विद्यामें भी अंशतः सत्त्व, रज, तम होते हैं। उसी सत्त्वप्रधाना शक्तिस्वरूपा विद्याके सात्त्विक अंशसे विष्णु, राजस अंशसे ब्रह्मा और उसी विद्याके तामस अंशसे रुद्रका आविर्भाव होता है। अवान्तरशक्तिके ही विभागके समान ही महाशक्तिके भी विभाग समझने चाहिये। महाशक्तिके तमःप्रधान अंशसे पंच तन्मात्रादि जड़वर्गका, अशुद्ध (मलिन) सत्त्वप्रधान शक्तिसे प्राज्ञसंज्ञक जीववर्गका और विशुद्ध सत्त्वप्रधानशक्तिसे महेश्वरका आविर्भाव होता है। महाशक्तिविशिष्ट ब्रह्म एक ही है, अतः एक ब्रह्मका ही तमःप्रधाना मायाके योगसे भोग्य, मलिन सत्त्वप्रधाना प्रकृतिरूपा अविद्याके योगसे भोक्ता तथा विशुद्ध सत्त्वप्रधाना मायाके योगसे महेश्वरके रूपमें आविर्भाव समझा जाता है। भोग्यवर्ग एवं भोक्तृवर्गकी एकता-अनेकताका प्रश्न उठ सकता है, परंतु महेश्वरकी अनेकताका प्रश्न ही नहीं उठ सकता। उत्पत्ति- स्थिति-लयका कारण एक ही है तथापि उत्पत्तिकारण- त्वादिकी पृथक्-पृथक् विवक्षासे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि कहा जाता है। तमःप्रधानशक्तिविशिष्ट चित्में उपादानता तथा विशुद्धसत्त्वप्रधान विद्याशक्तिविशिष्टमें निमित्तता होनेपर भी एक मूलप्रकृतिविशिष्ट ब्रह्म ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है, उसमें नानात्व नहीं है। उपादानसे कार्यकी सदृशता होती है, अतः जड़कार्यके अनुरूप ही तमःप्रधानशक्तिविशिष्ट पंच तन्मात्राओंमें जड़ताके अनुरोधसे उपादानता मानी गयी है। निमित्तमें कुलालादिके सदृश कार्यसे विलक्षणता होती है, अतः तदनुरूप ही विद्याविशिष्ट महेश्वरमें निमित्तकारणता मानी गयी है। सर्वापेक्षया प्रबल ही सर्वसंहारक होता है, वही पालक भी हो सकता है; वही विश्वका उत्पादक भी है। अनन्त- ब्रह्माण्डनायक भगवान्को ही 'विष्णु', 'पद्म' आदि पुराणोंमें विष्णु; 'रामायण', 'भारत' आदिमें राम, कृष्ण आदि रूपमें गाया गया है। 'शिव-स्कन्दादि' पुराणोंमें वही शिव 'रुद्र' आदि नामोंसे कहा जाता है। शिवपरक पुराणोंमें कार्यविष्णु अर्थात् एक-एक ब्रह्माण्डके विष्णुका वर्णन है, इसीलिये उनका कुछ अपकर्ष भी भासित होता है। विष्णुपरक पुराणोंमें शिव भी कार्यान्तःपाती ही हैं। अनन्तब्रह्माण्डनायककी प्राप्तिमें अपकर्षककी कल्पना भी संगत ही है। फलतः अनन्तब्रह्माण्डनायक परब्रह्म परमात्मा ही वेद, रामायण, भारत, पुराण आदिमें अनेक रूपों एवं नामोंसे गाये गये हैं। वे ही भगवान् 'विष्णु' शब्दसे प्रसिद्ध हैं। जगत्पालनके लिये भगवान् विष्णुमें सर्वातिशायी ऐश्वर्य जगत्के पालनमें सर्वातिशायी ऐश्वर्यकी अपेक्षा
होती है, अतः विष्णुभगवान्में परमैश्वर्यका अस्तित्व है। समग्र ऐश्वर्य, समग्र धर्म, समग्र यश, समग्र श्री, समग्र ज्ञान, समग्र वैराग्य जिसमें हों, वही भगवान् है, अथवा प्राणियोंकी उत्पत्ति, प्रलय, गति, अगति, विद्या, अविद्याको पूर्णरूपसे जाननेवाला ही भगवान् है। विश्वमात्रको फलित-प्रफुल्लित करना, अनेक ऐश्वर्यसे पूर्ण करना पालकका काम है। इसीलिये विष्णुभगवान्में पराकाष्ठाका ऐश्वर्य पाया जाता है। यद्यपि परमविष्णु साक्षात् चैतन्यघन ही हैं तथापि उपासनामें उनके पदादि अंग-उपांग, गरुड़ादि वाहनों, सुदर्शनादि आयुधों तथा कौस्तुभादि आभूषणोंकी कल्पना की जाती है। भगवान्का स्थूल विराट् स्वरूप माया, सूत्रात्मा, महान्, अहंकार, पंचतन्मात्रासहित पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय और मनोरूप ग्यारह इन्द्रियाँ, पंचमहाभूत—इन षोडश विकारात्मक महाविराट् भगवान्का स्थूल रूप है। भगवान्के उसी सात्त्विक रूपमें तीनों भुवन प्रतिभासित होते हैं। यही पौरुष रूप है। भूलोक ही इस पुरुषका पाद है, द्युलोक ही सिर है, अन्तरिक्षलोक ही नाभि है, सूर्य नेत्र, वायु नासिका, दिशाएँ कान, प्रजापति प्रजनेन्द्रिय, मृत्यु पायु (गुदा), लोकपाल बाहु, चन्द्रमा मन और यम ही भगवान्की भृकुटी है। उत्कृष्टताके अभिप्रायसे द्युलोकको सिर कहा गया है, गम्भीरताके अभिप्रायसे अन्तरिक्षको नाभि कहा गया है, प्रतिष्ठाके अभिप्रायसे भूलोकको पाद कहा गया है, नेत्रानुग्राहक तथा सर्वप्रकाशक होनेके कारण सूर्यको चक्षु कहा गया है। लज्जा भगवान्का उत्तरोष्ठ है। लज्जासे जैसे प्राणी उन्मुख न होकर अवनतानन हो जाता है, तद्वत् उत्तराधर अवनत ही रहता है। लोभ अधरोष्ठ है, ज्योत्स्ना दन्त है, माया ही मन्दहास है, सम्पूर्ण भूरूह (वृक्षादि) लोम हैं, मेघ मूर्धज (केश) हैं। जैसे सप्त वितस्ति (साढ़े तीन हाथ)-का यह व्यष्टि पुरुष है, वैसे ही अपने मानसे समष्टि पुरुष भी सप्त वितस्ति है— 'सप्तवितस्तिकायः।' परमेश्वराधिष्ठित होनेसे वैराजरूपकी उपासना होती है। इसीलिये 'पुरुषसूक्त' में तथा अन्यत्र पुराणोंमें उपर्युक्त सभी अंग-प्रत्यंगोंकी भावना भगवान् विष्णुमें की गयी है। वैसे तो भगवान् विष्णुका अखण्ड सच्चिदानन्द ही स्वरूप है तथापि भक्तानुग्रहार्थ भगवान् विशुद्ध सत्त्वमयी लीलाशक्तिके योगसे चिदानन्दमय विग्रहको भी धारण करते हैं। वही अतसीपुष्पसंकाश तथा नवनीलनीरदश्यामल या नीलकमलकान्ति भगवान्का सगुण, साकार स्वरूप है। उसी स्वरूपको कोई केकीकण्ठाभ कहते हैं, कोई तमालश्यामल कहते हैं। जैसे शैत्यके योगसे निर्मल जल ही शुद्ध बर्फ बनता है, घृतवर्तिकाके योगसे केवल अग्नि ही दाहकत्व प्रकाशकत्वविशिष्ट दीप- शिखाके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही विशुद्ध सत्त्व- मयी लीलाशक्तिके योगसे चिदानन्द ब्रह्म ही सगुण साकार-श्रीविष्णुरूपमें प्रकट होता है। जैसे निराकार तथा अतिगम्भीर आकाशका श्यामलरूप ही तत्त्व- रहस्यज्ञोंको अभिमत है, वैसे ही निराकार, निर्विकार, परम गम्भीर विष्णुतत्त्वका भी श्यामल रूप ही श्रुतिसम्मत है— 'श्यामाच्छबलं प्रपद्ये' (छान्दोग्य० ८।१३।१) तमकी उपाधिसे उपहित, तमके नियामक भगवान् शिवका वर्ण श्यामल है। उन्हींका ध्यान करते-करते विष्णु श्यामल हो जाते हैं। उनका ध्यान करते-करते उनका स्वाभाविक शुक्लरूप शंकरमें प्रकट हो जाता है। ये दोनों ही परस्परानुरक्त एवं परस्परात्मा हैं। युगके अनुरूप भी युगनियामक भगवान्का रूप होता है। जैसे मनुष्योंका नियमन करनेके लिये भगवान्को मनुष्यानुरूप बनना पड़ता है, वैसे ही युगनियमनके लिये भगवान्को युगानुरूप बनना पड़ता है। स्वतः अरूप भगवान्में उपाधिके संसर्गसे ही रूपकी आविर्भूति होती है। सत्त्वप्रधान कृतयुग, रजोमिश्रित सत्त्वप्रधान त्रेता, रजःप्रधान द्वापर और तमःप्रधान कलि होता है। अतः कृतके अनुरूप ही कृतयुगीन भगवान् शुक्लरूपमें प्रकट होते हैं। त्रेताके अनुरूप भगवान्का रक्तरूप है, द्वापरके अनुरूप पीत एवं कलिके अनुरूप भगवान्का
श्रीविष्णु-तत्त्व ४८३ कृष्णरूप होता है— ‘शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥’ (श्रीमद्भा० १०।८।१३, १०।२६।१६) इस दृष्टिसे कलिनियामक होनेसे भगवान् श्यामल हैं। भगवान्के आभूषणों एवं आयुधोंका रहस्य भगवान् जीव-चैतन्य ज्योतिःसमूहको ही कौस्तुभमणिके रूपमें धारण करते हैं। वेदान्तसिद्धान्तके अनुसार एक, अखण्ड, अनन्त, सच्चिदानन्द भगवान्के ही समाश्रित सम्पूर्ण जीव-चैतन्य होते हैं, अतः अवश्य ही जीव भगवान्के भूषण हो सकते हैं। विशेषतः भगवत्प्राप्त भगवद्भक्त तो अवश्य ही भगवान्के कण्ठके देदीप्यमान, चमत्कारपूर्ण भूषण बनते ही हैं। भक्त लोग तभी तो इनसे ईर्ष्या करते हैं— अहो सुमनसो मुक्ता वज्राण्यपि हरेरुरः। न त्यजन्ति वयं तत्र का वा स्मरवशाः स्त्रियः ॥ (गोपालचम्पू पूर्व० १७।१०५) अर्थात् अहो! मुक्ता (मोती) एवं सुमनस् (पुष्प) (पक्षान्तरमें मुक्तलोग तथा देवतालोग) वैदूर्यादि वज्रक (पक्षान्तरमें कूटस्थब्रह्मभावापन्न लोग) भी जब श्रीहरिके उरःस्थलको छोड़ना नहीं चाहते, तब भला स्मरवशा गोपांगनाएँ कैसे भगवान्को छोड़ दें? उस कौस्तुभमणिकी व्यापिनी साक्षात् प्रभाको ही श्रीवत्सके रूपमें भगवान् धारण करते हैं। दक्षिण वक्षःस्थलपर कमलनाल-तन्तुके सदृश दक्षिणावर्त श्वेत रोमराजि ‘श्रीवत्स’ कही जाती है। वाम वक्षःस्थलपर वामावर्त सुवर्णवर्णा रोमराजि लक्ष्मीका चिह्न है। एतावता भोक्तृवर्गका सार तथा भोग्यवर्गका सार श्री एवं श्रीवत्सके रूपमें भगवान्के वक्षःस्थलपर विराजमान है। ऐश्वर्याधिष्ठात्री महाशक्ति भगवती लक्ष्मी ‘श्री’ है। परमात्मकर्तृक गर्भाधानकी महिमासे श्रीप्रसूतजीवन चैतन्यसार ‘श्रीवत्स’ है। श्री वामवक्षः- स्थलमें और श्रीवत्स दक्षिणवक्षःस्थलमें है और बीचमें भृगुचरण चिह्न है। एतावता विप्रचरणारविन्दका समादरपूर्वक सेवन करनेसे ही श्री एवं श्रीवत्सकी प्राप्ति सूचित होती है। नाना गुणमयी त्रिगुणात्मिका माया ही ‘वनमाला’ है। परमसौगन्ध्यमय तथा अनेक रंगके तुलसी, कुन्द, मन्दार, पारिजात सरोरुहोंसे विरचित माला त्रिगुणात्मिका प्रकृतिके ही मनोहर पुष्पोंकी बनी समझनी चाहिये। छन्दःसमूह ही भगवान्का पीताम्बर है। जैसे—छन्दोंसे भगवान्का स्वरूप चमत्कृत एवं शोभित होता है, वैसे ही पीताम्बरसे भगवान्का स्वरूप चमत्कृत एवं सुशोभित होता है, किन्हीं- किन्हीं स्थानोंपर मोहिनी मायाको ही पीताम्बर बतलाया गया है। जैसे मायाकी निजी चमक-दमकसे ब्रह्मस्वरूप तिरोहित हो जाता है, वैसे ही पीताम्बरसे भगवान्का मंगलमय श्रीअंग आवृत्त रहता है। मायाके चाकचिक्यसे अनासक्त एवं अप्रभावित ही जैसे भगवत्स्वरूपको जानता है, वैसे ही पीताम्बरकी चमक-दमकको पार करनेपर ही भगवत्स्वरूपका उपलम्भ होता है। छन्दोंको भी पहले छादक बतलाया गया है— ‘छन्दांसि यस्य पर्णानि’ (गीता १५।१) त्रिवृत् अर्थात् त्रिमात्र प्रणव ही भगवान्का उपवीत है। सांख्य एवं योगको भगवान्ने मकराकृत कुण्डलके रूपमें कानोंमें धारण कर रखा है। पारमेष्ठ्य पद ही भगवान्का मुकुट है। अनन्त नामक अव्याकृत ही भगवान्का आसन है। प्रकृतिरूप समष्टि कारणदेहाभिमानी चैतन्य ही अव्याकृत कहलाता है, उसीको शेष भी कहा जाता है। कार्य-प्रपंचके प्रलय हो जानेपर जो अवशिष्ट रहता है, वही शेष है। उन अनन्तशेषरूप अव्याकृतपर ही चतुर्भुज मूर्ति भगवान् विष्णु विराजते हैं। यों भी अव्याकृतके ऊपर ही कार्य-कारणातीत तुरीयतत्त्व विद्यमान रहते हैं। चतुर्वर्गप्रद, चतुर्वेदात्मा, चतुर्युग, चतुरस्र भगवान्की चार भुजाएँ हैं। एक हाथमें वे धर्म-ज्ञानादियुक्त सत्त्वमय पद्मको धारण किये हैं। पद्मकी ही सुन्दरता, मधुरता, सरसता, सुगन्धता धर्मादिमय सत्त्वमें होती है। ओज, बलादियुक्त, प्राणतत्त्व ही भगवान्की गदा है। उन्होंने जलतत्त्वको शंखके रूपमें, तेजस्तत्त्वको सुदर्शनके रूपमें दो हाथोंमें धारण कर रखा है। आकाशतत्त्वको ही
तलवार एवं अन्धकारको ही चर्म (ढाल)-के रूपमें, कालको शार्ङ्गधनुषके रूपमें, कर्मोंको ही निषंगके रूपमें भगवान्ने धारण किया है। इन्द्रियाँ ही भगवान्के तूणीरमें रहनेवाले बाण हैं, क्रियाशक्तियुक्त मन ही रथ है, शब्दादि पंचतन्मात्रा इस रथका अभिव्यक्त रूप है। जैसे रथारूढ़ होकर व्यक्ति तूणीरसे बाण निकालकर धनुषपर रखकर सन्धान करता है, वैसे ही क्रियाशक्तियुक्त मनपर आरूढ़ होकर प्रत्यक्चैतन्याभिन्न भगवान् ही कालरूप धनुषपर इन्द्रियोंको प्रतिष्ठित करके उनका सन्धान करते हैं। वर, अभय आदिकी मुद्राओंके रूपमें भगवान् अर्थ-क्रिया (प्रयोजनसम्पत्ति)-को धारण करते हैं। देव-पूजा स्थल सूर्यमण्डल है, दीक्षा ही पूजा-योग्यता-सम्पत्ति है, भगवान्की परिचर्या ही अपने सम्पूर्ण दुरितोंके क्षयका कारण है। भग शब्दार्थ-ऐश्वर्य-षाड्गुण्य ही भगवान्के श्रीहस्तमें विराजमान लीलाकमल है। इस दृष्टिसे प्रथम वर्णित कमल आसनभूत कमल है। धर्म और यश ही भगवान्के ऊपर डुलनेवाले चमर और व्यजन हैं, अकुतोभय वैकुण्ठधाम ही छत्र है, वेदत्रयीरूप गरुड़ ही यज्ञस्वरूप भगवान्के वाहन हैं, ऋग्यजुःसाम- इन्हीं तीनों वेदोंसे ही यज्ञकी सम्पत्ति होती है, अतः वेदात्मा ही गरुड़ हैं, यज्ञस्वरूप विष्णु ही उनपर विराजमान होकर चलते हैं। चिद्रूपा भागवती शक्ति ही भगवत्प्रिया लक्ष्मी हैं, भगवदुपासना-विधायक पांचरात्रादि आगम ही पार्षदाधिप विष्वक्सेन हैं। अणिमा, महिमा आदि अष्ट विभूतियाँ ही भगवान्के नन्द, सुनन्दादि पार्षद हैं। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्धरूपसे विराट्, हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, ब्रह्म, विश्व, तैजस, प्राज्ञ, तुरीयादि रूपमें भी उन्हीं चतुर्व्यूह, चिन्मूर्ति भगवान्का स्वरूप वर्णित है। ये भगवान् वेदोंके भी कारण हैं। स्वयंदृक् एवं स्वमहिमपूर्ण हैं। परमार्थतः सर्वविध-भेदविवर्जित होनेपर भी भगवान् अपनी शक्तिभूता मायासे ही विश्वका उत्पादन, पालन एवं संहरण करते हैं, अतएव ब्रह्मरूप विष्णु इन आख्याओंसे, अनाच्छन्नज्ञान होते हुए भी विभिन्न रूपोंमें प्रतीत होते हैं। फिर भी वे वस्तुतः भिन्न नहीं हैं; क्योंकि तत्त्वदर्शी विद्वानोंको आत्मरूपसे ही भगवान्का उपलम्भ होता है। भगवद्धाम श्रीभगवान् तुर्य एवं तुर्यातीतरूपसे निर्गुण, निष्क्रिय, निर्मल, निरवद्य, निरंजन, निराकार, निराश्रय, निरतिशयाद्वैत-परमानन्दस्वरूप हैं। सन्देह हो सकता है कि शुद्धाद्वैत परमानन्दपरब्रह्ममें वैकुण्ठ, प्रासाद, प्राकार, विमानादि अनन्त वस्तुभेद कैसे हुए? यदि ये सब हैं, तो निर्विशेषाद्वैत कैसे ? इसका समाधान यह है कि जैसे शुद्ध सुवर्णमें कटक, मुकुट, अंगदादि अनेक भेद होते हैं, जैसे समुद्र-जलमें स्थूल-सूक्ष्म तरंग हैं, जैसे समुद्र-जलमें सूक्ष्म तरंग, फेन, बुद्बुदादि भेद होते हैं, जैसे भूमिमें पर्वत, वृक्ष, तृण, गुल्म, लतादि अनन्त वस्तु-भेद होते हैं, वैसे ही अद्वैत परमानन्द ब्रह्ममें वैकुण्ठादि भेद उपपन्न हो जाते हैं। सब कुछ भगवान्का स्वरूप ही है, भगवद्व्यतिरिक्त अणुभर भी कुछ नहीं है— मत्स्वरूपमेव सर्वमद्व्यतिरिक्तमणुमात्रं न विद्यते। 'परममोक्ष सर्वत्र एक ही है, फिर अनन्तवैकुण्ठ, अनन्त आनन्द-समुद्रादि कैसे संगत होंगे?' इस शंकाका समाधान यह है कि अविद्या पादमें ही जब अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड हैं, तब एक-एक ब्रह्माण्डमें वैकुण्ठ तथा विविध विभूतियोंमें क्या आपत्ति है ? फिर तीनों पादोंके वैकुण्ठोंके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ? निरतिशयानन्दाविर्भाव मोक्ष है, यह त्रिपाद ब्रह्ममें सर्वदा प्रकट रहता है। वह पादत्रय ही परम वैकुण्ठ एवं परम कैवल्य है, इसलिये अविद्या, विद्या, आनन्द और तुर्य—इन चारों पादोंमें अनन्त वैकुण्ठ, अनन्त आनन्द-समुद्रादि ठीक ही है। इस तरह उपासक परम वैकुण्ठमें पहुँचकर भगवान्का ध्यान करके निरतिशयाद्वैत-परमानन्दस्वरूप होकर, सावधानीसे अद्वैत योगमें स्थित होकर, अद्वैत परमानन्दका अनुसन्धान करके स्वयं शुद्धबोधा- नन्दस्वरूप होकर महावाक्यका स्मरण करता हुआ
अपने आत्माको ब्रह्म और ब्रह्मको आत्मा समझ लेता है, अपनेको ब्रह्ममें होम देता है। फिर 'अहं ब्रह्म' की भावनासे निस्तरंग, अद्वैत, अपारनिरतिशय सच्चिदानन्द, ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। जो इस मार्गसे सम्यक् अभ्यास करता है, वह अवश्य ही नारायण हो जाता है। 'त्रिपाद्विभूतिमहानारायणो- पनिषद्' में इस विषयपर बड़ा ही सुन्दर विवेचन है, यहाँ तो उसका सारांशमात्र ही दिया गया है। लोक-लोकान्तरों एवं भगवद्विग्रह विलासादिका निरूपण इसमें साम्प्रदायिक वैष्णवों एवं शैवोंसे भी सुन्दर है। विशेषता यह है कि यहाँ अद्वैतसिद्धान्तके पोषणमें पूर्ण ध्यान रखा गया है। शुद्धसत्त्वमयी शक्तिसंसृष्ट, चिदानन्दप्रधान तत्त्वमें अनन्तानन्तवैकुण्ठादिका सभी तारतम्य मान्य है। शक्त्यतीत तत्त्व सर्वथा निराकार, निर्विकार, निर्विशेष ही है। शक्तिकी अनिर्वचनीयताके कारण वस्तुतः शक्तिसंसृष्ट भी सर्वदा, सर्वथा सर्वातीत ही है, अतः वह सर्वदा, सर्वथा, सर्वदेश, काल एवं वस्तुओंसे अतीत है। इसीलिये उससे व्यतिरिक्त कहीं कुछ भी नहीं है, सब कुछ वही है। इस दृष्टिको लेकर पुराणोंमें भगवल्लोकों एवं स्वरूपोंका वर्णन है। श्रीभागवतमें श्रीकृष्ण-प्रदर्शित विभूतियोंमें ब्रह्माको अपरिगणित विष्णु परिलक्षित हुए थे और उन सभीको मूर्तिमान् चतुर्विंशति तत्त्वोंसे उपासित बतलाया है और सभीको सत्यज्ञानानन्तानन्दैकरस बतलाया है— सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१३।५४) अर्थात् वे सभी स्वरूप सत्यज्ञानानन्तानन्द- मात्रैकरसमूर्ति ही हैं। जैसे शैत्यके कारण निर्मल जल ही बर्फ बनता है, वैसे ही विशुद्ध सत्त्वके कारण निर्मल, निर्विकार, एकरस ब्रह्म ही उन मूर्तियोंके रूपमें व्यक्त है। पुनश्च, वे ऐसे महामहिम वैभवशाली स्वरूप थे, जिनके बहुत-से माहात्म्योंको और तो क्या, उपनिषददर्शी भी नहीं स्पर्श कर सकते। ठीक ही है, भगवान्के अनन्त माहात्म्यको सामस्त्येन कोई भी नहीं जान सकता। अनन्त होनेसे भगवान् भी उनका अन्त नहीं पा सकते। इन्हीं सिद्धान्तोंके अनुसार श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीने वृन्दावन-शतकमें श्रीवृन्दावनधामको चिदानन्दमय कहा है। यहाँकि प्रत्येक वृक्षों, लताओं, दूर्वाओं एवं तृणोंकी भी अपार महिमा कही गयी है, सब वस्तुओंको केवल परमानन्द सुधासमुद्रका विलास कहा है। इतना ही नहीं 'जहाँ प्रवेशमात्रसे सब जन्तु सच्चिदानन्दघनताको प्राप्त हो जाते हैं,' उन्होंने ऐसा भी कहा है—"यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुः आनन्दसच्चिद्घनतामुपैति" (वृन्दावन-शतक)। इतनेसे ही कुछ साम्प्रदायिक कहने लगते हैं कि उन्होंने अद्वैत-सिद्धान्तको छोड़कर मतान्तरका ग्रहण कर लिया है। परंतु जो अद्वैत-सिद्धान्तसे परिचित हैं, वे जानते हैं कि इस तरहका वर्णन अद्वैतवादको छोड़कर अन्यत्र कहीं बन ही नहीं सकता। 'ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले' (मुण्डक० ३।२।६)। —इस श्रुतिमें 'ब्रह्मलोकेषु' इस बहुवचनसे यहाँ मालूम पड़ता है कि सविशेष ब्रह्मलोक एक ही नहीं, किंतु बहुत हैं। दूसरे यह भी मालूम पड़ता है कि सर्वमूर्धन्य, सर्वोत्कृष्ट लोक ही शैवोंको परम शिवलोकके रूपमें, वैष्णवोंको परम वैकुण्ठके रूपमें, कृष्ण-भक्तोंको गोलोकधामके रूपमें, राम-भक्तोंको साकेतधामके रूपमें, परमशाक्तोंको मणिद्वीपके रूपमें भासमान होता है। सगुण, सविशेष ब्रह्मके उपासकोंको उनके इष्टदेवके रूपमें भासमान होता है। वही निर्गुण विष्णुतत्त्व ज्ञानवालोंको निर्विशेष ब्रह्मके रूपमें प्रत्यक्ष होता है।
४८६ भक्तिसुधा श्रीभगवती-तत्त्व महाचिति भगवतीमें सम्पूर्ण विश्व भासित अनन्तकोटिब्रह्माण्डात्मक प्रपंचकी अधिष्ठानभूता सच्चिदानन्दरूपा भगवती ही सम्पूर्ण विश्वको सत्ता, स्फूर्ति तथा सरसता प्रदान करती हैं। विश्वप्रपंच उन्हींमें उत्पन्न होता है, स्थित होता है, अन्तमें उन्हींमें लीन हो जाता है। जैसे दर्पणमें आकाशमण्डल, मेघमण्डल, सूर्य-चन्द्रमण्डल, नक्षत्रमण्डल, भूधर, सागरादि प्रपंच प्रतीत होता है, किंतु दर्पणको स्पर्श करके देखा जाय, तो वास्तवमें कुछ भी नहीं उपलब्ध होता, वैसे ही सदानन्दस्वरूप महाचिति भगवतीमें सम्पूर्ण विश्व भासित होता है। जैसे दर्पणके बिना प्रतिबिम्बका भान नहीं होता, दर्पणके उपलम्भमें ही प्रतिबिम्बका उपलम्भ होता है, वैसे ही अखण्ड, नित्य, निर्विकार महाचितिमें ही, उसके अस्तित्वमें ही प्रमाता, प्रमाण, प्रमेयादि विश्व उपलब्ध होता है। भान न होनेपर भास्यके उपलम्भकी आशा ही नहीं की जा सकती। महाचिति ही भगवती, आत्मा, पुरुष, ब्रह्म आदि शब्दोंसे व्यवहृत सामान्य रूपसे तो यह बात सर्वमान्य है कि प्रमाणाधीन ही किसी भी प्रमेयकी सिद्धि होती है, अतः सम्पूर्ण प्रमेयमें प्रमाण कवलित ही उपलब्ध होता है। प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेय—ये अन्योन्यकी अपेक्षा रखते हैं। प्रमाणका विषय होनेसे ही कोई वस्तु प्रमेय हो सकती है। प्रमेयको विषय करनेवाली अन्तःकरणकी वृत्ति प्रमाण कहला सकती है। प्रमेय- विषयक प्रमाणका आश्रय अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही प्रमाता कहलाता है। प्रमाताश्रित प्रमेयाकार वृत्तिको ही प्रमाण कहा जाता है। परंतु इन सबकी उत्पत्ति, स्थिति, गतिका भासक नित्य बोध आत्मा है। वही साक्षी एवं वही ब्रह्म कहलाता है। यद्यपि वह स्त्री, पुमान् अथवा नपुंसक नहीं है तथापि चिति, भगवती आदि स्त्रीवाचक शब्दोंसे, आत्मा; पुरुष आदि पुंबोधक शब्दोंसे, ब्रह्म, ज्ञान आदि नपुंसक शब्दोंसे व्यवहृत होता है। वस्तुतः स्त्री, पुमान्, नपुंसक—इन सबसे पृथक् होनेपर भी तादृक्-तादृक् (उस-उस) शरीरसम्बन्धसे या वस्तुसम्बन्धसे वही अचिन्त्य, अव्यक्त, स्वप्रकाश सच्चिदानन्दस्वरूपा महाचिति भगवती ही आत्मा, पुरुष, ब्रह्म आदि शब्दोंसे ही व्यवहृत होती हैं। मायाशक्तिका आश्रयण करके वे ही त्रिपुरसुन्दरी, भुवनेश्वरी, विष्णु, शिव, कृष्ण, राम, गणपति, सूर्य आदि रूपमें भी प्रकट होती हैं। स्थूल, सूक्ष्म, कारण—त्रिशरीररूप त्रिपुरके भीतर रहनेवाली सर्वसाक्षिणी चिति ही त्रिपुरसुन्दरी है। उसी मायाविशिष्ट तत्त्वके जैसे राम-कृष्णादि अन्यान्य अवतार होते हैं, वैसे ही महालक्ष्मी, महासरस्वती, महागौरी आदि अवतार होते हैं। यद्यपि श्रीभगवती नित्य ही हैं तथापि देवताओंके कार्यके लिये वे समय-समयपर अनेक रूपोंमें प्रकट होती हैं। वे जगन्मूर्त्ति भगवती नित्य ही हैं, उन्हींसे चराचर प्रपंच व्याप्त है तथापि उनकी उत्पत्ति अनेक प्रकारसे होती है। देवताओंके कार्यके लिये जब वे प्रकट होती हैं, तब वे नित्य होनेपर भी 'उत्पन्न हुईं' कही जाती हैं— नित्यैव सा जगन्मूर्त्तिस्तया सर्वमिदं ततम्॥ तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम। देवानां कार्यसिद्धयर्थमाविर्भवति सा यदा॥ उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते। (श्रीदुर्गासप्तशती १।६४-६६) भगवती मायारूपा नहीं है कुछ लोगोंका कहना है कि 'शास्त्रोंमें मायारूपा भगवतीकी ही उपासना कही गयी है, माया वेदान्त- सिद्धान्तानुसार मिथ्याभूत है, मुक्तिमें उसकी अनुगति नहीं हो सकती, अतः भगवतीकी उपासना अश्रद्धेय है। 'नृसिंहतापनी' में ऐसा स्पष्ट उल्लेख है कि नारसिंही माया ही सब प्रपंचकी सृष्टि करती है, वही सबकी रक्षा करती है, वही सबका संहार करती है, उसी मायाशक्तिको जानना चाहिये। जो उसे जानता है, वह मृत्युको तरता है, पाप्माको तरता है, अमृतत्व
श्रीभगवती-तत्त्व
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एवं महती श्रीको प्राप्त करता है— 'माया वा एषा नारसिंही सर्वमिदं सृजति, सर्वमिदं रक्षति, सर्वमिदं संहरति। तस्मान्मायामेतां शक्तिं विद्यात्। य एतां मायां शक्तिं वेद, स मृत्युं जयति, स पाप्मानं तरति, सोऽमृतत्वं गच्छति, महतीं श्रियमश्नुते।' आप वैष्णवीशक्ति अनन्तवीर्या एवं विश्वकी बीजभूता माया हैं— 'त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया।' (श्रीदुर्गासप्तशती ११।५) इत्यादि वचनोंसे स्पष्ट मालूम पड़ता है कि मायारूपा ही भगवती है। उसीकी उपासनाका तत्र-तत्र स्थानोंमें विधान है। माया स्वयं जड़ है इत्यादि-इत्यादि। परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि यह सब पूर्वोक्त और निम्नलिखित प्रमाणोंसे विरुद्ध है— 'सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः कासि त्वं महादेवीति॥ साब्रवीत्—अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत्।' (श्रीदेव्यथर्वशीर्ष १-२) अर्थात् देवताओंने देवीका उपस्थान करके उनसे प्रश्न किया कि 'आप कौन हैं?' देवीने कहा—'मैं ब्रह्म हूँ, मुझसे ही प्रकृति-पुरुषात्मक जगत् उत्पन्न होता है।' 'अथ ह्येषां ब्रह्मरन्ध्रे ब्रह्मरूपिणीमाजोति, भुवनाधीश्वरी तुर्यातीता' (भुवनेश्वर्युपनिषद्)। 'स्वात्मैव ललिता' (भावनोपनिषद्)। —इत्यादि वचनोंसे तुर्यातीत ब्रह्मात्मस्वरूपा ही भगवती हैं, यह स्पष्ट है। 'त्रिपुरातापनीय', 'सुन्दरीतापनीयादि' उपनिषदोंमें 'परोरजसे' इत्यादि गायत्रीके चतुर्थ चरणसे प्रतिपाद्य ब्रह्मके वाचकरूपसे 'ह्रीं' बीजको बतलाया है। 'काली' एवं 'तारोपनिषदों' में भी ब्रह्मरूपिणी भगवतीकी ही उपासना प्रतिपादित है। अतः संसारनाशाय साक्षिणीमात्मरूपिणीम्। आराधयेत् परां शक्तिं प्रपञ्चोल्लासवर्जीताम्॥ (सूतसंहिता) अर्थात् संसारनिवृत्तिके लिये प्रपंचस्फुरणशून्य, सर्वसाक्षिणी, आत्मरूपिणी, पराशक्तिकी ही आराधना करनी चाहिये। परा तु सच्चिदानन्दरूपिणी जगदम्बिका। सर्वाधिष्ठानरूपा स्याज्जगद्भ्रान्तिश्चिदात्मनि॥ (स्कन्दपुराण) अर्थात् सच्चिदानन्दरूपिणी परा जगदम्बिका ही विश्वकी अधिष्ठानभूता हैं, उन्हीं चिदात्मस्वरूपा भगवतीमें ही जगत्की भ्रान्ति होती है। सर्ववेदान्तवेद्येषु निश्चितं ब्रह्मवादिभिः॥ एकं सर्वगतं सूक्ष्मं कूटस्थमचलं ध्रुवम्। योगिनस्तत् प्रपश्यन्ति महादेव्याः परं पदम्॥ परात्परतरं तत्त्वं शाश्वतं शिवमच्युतम्। अनन्तप्रकृतौ लीनं देव्यास्तत् परमं पदम्॥ शुभं निरञ्जनं शुद्धं निर्गुणं द्वैतवर्जितम्॥ आत्मोपलब्धिविषयं देव्यास्तत् परमं पदम्। (कूर्मपुराण पू०वि० अ० १९।४८-४९, ५१-५२) —इत्यादि वचनोंसे निर्विकार, अनन्त, अच्युत, निरंजन, निर्गुण ब्रह्मको ही भगवतीका वास्तविक स्वरूप बतलाया गया है। देवीभागवतमें भी कहा है कि— निर्गुणा सगुणा चेति द्विधा प्रोक्ता मनीषिभिः। सगुणा रागिभिः सेव्या निर्गुणा तु विरागिभिः॥ अर्थात् निर्गुणा-सगुणा दो प्रकारकी भगवती हैं, रागिजनोंको सगुणा सेव्या हैं, विरागियोंको निर्गुणा सेव्या हैं। ब्रह्माण्डपुराणके 'ललितापाख्यान' में भी कहा है— 'चितिस्तत्पदलक्ष्यार्था चिदेकरसरूपिणी।' अर्थात् चिदेकरसरूपिणी चिति ही तत्पदकी लक्ष्यार्थस्वरूपा हैं। कहा जा सकता है कि 'फिर तो ब्रह्मस्वरूपता- बोधक वचनोंसे भगवतीके मायात्वबोधक वचनोंका विरोध अवश्य होगा।' परंतु ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि वेदान्तमें मायाको मिथ्या कहा गया है। मिथ्यापदार्थ
अधिष्ठानमें कल्पित होता है। अधिष्ठान सत्तासे अतिरिक्त कल्पितकी सत्ता नहीं हुआ करती। मायामें अधिष्ठानकी ही सत्ताका प्रवेश रहता है, अतः मायास्वरूपकी उपासनासे भी सत्तास्वरूप ब्रह्मकी ही उपासना होगी। इस आशयसे मायास्वरूपत्वबोधक वचनोंका भी कोई विरोध नहीं है। जैसे ब्रह्मकी उपासनामें भी केवल ब्रह्मकी उपासना नहीं होती, अपितु शक्तिविशिष्ट ही ब्रह्मकी उपासना होती है, क्योंकि ब्रह्मसे पृथक् होकर शक्ति नहीं रह सकती और केवल ब्रह्मकी उपासना हो नहीं सकती, वैसे ही केवल मायाकी भी उपासना सम्भव नहीं हो सकती। केवल मायाकी स्थिति ही नहीं बन सकती, फिर उपासना तो दूर रही। मायाविशिष्ट ब्रह्म ही भगवती है अधिष्ठानभूत ब्रह्मसे युक्त होकर ही माया रहती है, अतः भगवतीकी मायारूपता वर्णन करनेपर भी फलतः ब्रह्मरूपता ही सिद्ध होती है। पावकस्योष्णतावेयमुष्णांशोरिव दीधितिः। चन्द्रस्य चन्द्रिकेवेयं शिवस्य सहजा ध्रुवा॥ अर्थात् जैसे पावकमें उष्णता रहती है, सूर्यमें किरण रहती है, चन्द्रमामें चन्द्रिका रहती है, वैसे ही शिवमें उनकी सहज शक्ति रहती है। इस तरह विश्वस्वरूपभूता शक्तिके रूपमें भगवतीका वर्णन मिलता है। जैसे अग्निमें होम करनेपर भी अग्नि- शक्तिमें होम समझा जाता है, वैसे ही अग्नि-शक्तिमें होम करनेसे अग्निमें होम समझा जाता है। इसी तरह मायाको भगवती कहनेपर भी ब्रह्मको भगवती समझा जा सकता है, अतः ब्रह्मकी ही उपासना समझनी चाहिये। जो वाक्य मायाको मिथ्या प्रतिपादित करते हैं, उनमें तो केवल मायाका ही ग्रहण होता है, क्योंकि ब्रह्मका मिथ्यात्व नहीं है, वह तो त्रिकालाबाध्य, सत्स्वरूप अधिष्ठान है। उपास्य मायापदार्थान्तर्गत ब्रह्मांश मोक्षदशामें भी अनुस्यूत रहेगा, अतः मुक्तिमें उपास्य-स्वरूपका त्याग भी नहीं होगा। 'अन्तर्यामिब्राह्मण' में पृथ्वीसे लेकर मायापर्यन्त सभी पदार्थोंको चेतन सम्बन्धसे देवता बतलाया गया है। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छान्दोग्य० ३।१४।१)- इस श्रुतिके अनुसार भी सब कुछ ब्रह्म ही है, ऐसा कहा गया है। 'सूतसंहिता' में कहा है- चिन्मात्राश्रयमायायाः शक्त्याकारो द्विजोत्तमाः। अनुप्रविष्टा या संविन्निर्विकल्पा स्वयम्प्रभा॥ सदाकारा सदानन्दा संसारोच्छेदकारिणी। सा शिवा परमा देवी शिवाभिन्ना शिवङ्करी॥ अर्थात् चिन्मात्र परब्रह्मके आश्रित रहनेवाली मायाके शक्त्याकारमें अनुप्रविष्ट स्वयंप्रभा, निर्विकल्पा, सदाकारा, सदानन्दा, संविद् ही शिवाभिन्न शिवस्वरूपा परमा देवी है अथवा भगवतीस्वरूपप्रतिपादक वाक्योंमें जो माया, शक्ति, कला आदि शब्द हैं, वे सब लक्षणासे मायाविशिष्ट, कलाविशिष्ट ब्रह्मके बोधक समझने चाहिये। तथा च मायाविशिष्ट ब्रह्म ही 'भगवती' शब्दका अर्थ है। यही बात शिवने कही थी- नाहं सुमुखि मायाया उपास्यत्वं ब्रुवे क्वचित्। मायाधिष्ठानचैतन्यमुपास्यत्वेन कीर्तितम्॥ मायाशक्त्यादिशब्दाश्च विशिष्टस्यैव लक्षकाः। तस्मान्मायादिशब्दैस्तद् ब्रह्मैवोपास्यमुच्यते ॥ यहाँ एक-एक पक्षमें केवल चैतन्य ही मायादि शब्दोंसे उपास्य कहा गया है, द्वितीय पक्षमें मायाविशिष्ट ब्रह्म मायादि शब्दसे कहा गया है। साकार देवताविग्रह सर्वत्र ही शक्तिविशिष्ट ब्रह्मरूपसे ही उपास्य होता है। भगवतीविग्रहमें भी भाषण, दर्शन, अनुकम्पा आदि व्यवहार देखा ही जाता है, फिर उसमें जड़त्वकी कल्पना किस तरह की जा सकती है? विराट्, हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, ब्रह्म, विष्णु, रुद्रादिकोंके स्वरूपमें एक-एक गुणकी प्रधानता है, माया गुणत्रयकी ही साम्यावस्था है, वह केवल शुद्ध ब्रह्मके आश्रित है। मायाविशिष्ट तुरीयब्रह्म ही भगवतीकी उपासनामें ग्राह्य है, यह दिखलानेके लिये माया, प्रकृति आदि शब्दोंसे कहीं-कहीं भगवतीको बोधित
३।१४।१) इत्यादि श्रुतिके अनुसार सब कुछ चिन्मात्र ब्रह्म ही है तथापि भक्तोंके चित्तावलम्बनके लिये अनेक प्रकारके स्वरूपोंका उपदेश किया गया है। मलिन, शुद्ध, शुद्धतर, शुद्धतम आदि उपाधियोंका उपदेश किया गया है। जैसे पात्र, मणि, कृपाण,
Right column: दर्पणादिमें शुद्धिके तारतम्यसे प्रतिबिम्बित-प्रतिफलनमें तारतम्य होता है, वैसे ही उपाधियोंके तारतम्यसे ब्रह्मके प्रसाद, प्राकट्यमें भी तारतम्य होता है। इसी अभिप्रायसे विभूतियोंकी उत्कृष्टा, उत्कृष्टतरता आदिका व्यवहार शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है। एक-एक गुणोंकी अपेक्षा गुणोंकी साम्यावस्था उत्कृष्ट है। इसीलिये भगवतीकी उपासना परमोत्कृष्ट है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मका प्रथम सम्बन्ध मायाके ही साथ है। गुणोंका सम्बन्ध मायाद्वारा है। इसीलिये साम्यावस्थामें ब्रह्मका अव्यवहित सम्बन्ध है। अतएव 'सूतसंहिता' में कहा गया है—
शाक्तागम मतके अनुयायियोंकी दृष्टिसे अत्यन्त अन्तर्मुख होकर शक्ति शिवस्वरूप ही रहती है। वेदान्तकी दृष्टिसे सर्वोपाधिविनिर्मुक्त स्वप्रकाश चिति ही रहती हैं। वे ही परब्रह्म, आत्मा आदि शब्दोंसे लक्षित होती हैं। शक्ति का खण्डन भगवतीका ही शक्तिस्वरूपसे भी आराधन होता है। हर एक कार्यकी उत्पादनानुकूल शक्ति उसके कारणमें होती है। कार्यके अनन्त होनेसे वह शक्ति भी अनन्त है— 'शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः।' शक्तिके सम्बन्धमें तार्किकोंका कहना है कि 'कोई प्रमाण न होनेसे स्वरूप सहकारिमेलनके अतिरिक्त 'शक्ति' नामका कोई पदार्थ नहीं है। स्फोटादिरूप कार्यकी अन्यथानुपपत्तिको शक्तिमें प्रमाण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जब प्रतिबन्धकाभाव आदि सहकारीसे सहकृत अग्न्यादिके स्वरूपसे ही स्फोटादिरूप कर्मोपपत्ति हो जाती है, तब अतीन्द्रिय शक्तिकी कल्पना करना व्यर्थ है। अभावकी अकारणता होनेसे प्रतिबन्धकाभावको सहकारी मानना ठीक नहीं है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अभावको कारण माननेमें न तो अन्वय-व्यतिरेकित्वमें कोई बाधा पड़ती है, न किसी अनिष्टकी प्रसक्ति ही होती है। भावकी तरह अभावका भी कार्यसे अन्वय- व्यतिरेक दृष्ट है और अभावकी प्रमितिमें योग्यकी अनुपलब्धि एवं विभ्रममें विवेकाग्रहकी हेतुता भी स्पष्ट ही है। यदि कहा जाय कि क्या प्रतिबन्धकका प्रागभाव कारण है या उसका प्रध्वंसाभाव, तो दोनोंकी कारणता नहीं बनती, क्योंकि उत्तम्भकको प्रतिबन्धकके पास ले जानेपर प्रतिबन्धकके रहनेपर भी प्रागभावके बिना ही कार्योत्पत्ति देखी जाती है, अतः प्रागभावको कारण नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार प्रतिबन्धककी अनुदयदशामें भी अर्थात् उसका प्रागभाव रहनेपर भी कार्योत्पत्ति होती है, अतः प्रध्वंसाभावकी भी कारणता नहीं कही जा सकती। परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि उत्तम्भक मणि, मन्त्र आदिके अभावसे सहकृत ही प्रतिबन्धक वस्तुतः प्रतिबन्धक होता है, न कि केवल मणि आदि। अतः वहाँ प्रतिबन्धकसे सहकृतकी ही कारणता होनेसे उक्त दोष नहीं रह जाता। सर्वत्र प्रतिबन्धक-संसर्गा- भावविशिष्टकी ही कारणता मानी गयी है, अतः अनियतहेतुकत्वदोष भी नहीं कहा जा सकता। अन्यथा उपलब्धिमें भी उपलब्धिके प्रागभाव एवं प्रध्वंसाभावके विकल्पसे अभावप्रमितिकी अनियतहेतुकता दुष्परिहार्य होगी। शक्तिपक्षमें भी अप्रतिबद्ध ही शक्तिको कारण माननेसे अभावविकल्पसे उत्पन्न दोष एवं उसका परिहार तुल्य है। 'प्रतिबन्धो विसामग्री तद्धेतुः प्रतिबन्धकः।' इस कुसुमांजलिके वचनानुसार सामग्री-वैकल्य प्रतिबन्ध है और उसका हेतु प्रतिबन्धक है। यहाँ प्रतिबन्धपक्ष प्रतिबन्धकाभावके कारण होने और कारणापेक्ष ही प्रतिबन्धकाभावके प्रतिबन्ध होनेके कारण अन्योन्याश्रयग्रस्त होनेसे यदि कहा जाय कि 'प्रतिबन्धके अभावमें कारणता मानना ठीक नहीं है,' तो यह अनुचित है, क्योंकि अभावकी कारणता मानकर ही कार्यानुदयमात्रसेही मन्त्रादिमें कार्य- प्रतिकूलताका बोध होता है और मणि, मन्त्रादिमें कार्यकी प्रतिबन्धकताका निर्धारण किये बिना ही मन्त्रादिके अभावमें अन्वय-व्यतिरेकसे ही कारणताका निश्चय होता है। इसके अतिरिक्त यह भी विचारणीय है कि अन्योन्याश्रयत्व उत्पत्ति या ज्ञप्तिमें हुआ करता है। यहाँ मन्त्र एवं तद्भाव (प्रागभाव)-की परस्परहेतुता न होनेसे अज्ञात भी मन्त्र तथा तदभावकी कार्यके प्रति प्रतिकूलता एवं कारणता होनेसे दोनों प्रकारका अन्योन्याश्रय नहीं है। यदि कहा जाय कि 'कार्याभावसे मन्त्रादि कारणाभावरूप माने जाते हैं, अतएव मन्त्रादिका अभाव भी कारण माना जाता है। इस प्रकार मन्त्र
तथा तदभावमें रहनेवाले प्रतिबन्धकत्व और कारणत्वके अन्योन्यनिमित्तक होनेसे उत्पत्ति या ज्ञप्तिमें अन्योन्याश्रयता दुर्वार है,' तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि अभावकी कारणताका अवगम हुए बिना भी कार्याभावमात्रसे मन्त्रादिकी कार्यप्रतिकूलताका ज्ञान हो सकता है, अतएव तदभावकी कारणताका भी ज्ञान अन्वय-व्यतिरेकसे ही सुकर है। यदि कहा जाय कि 'मणि-मन्त्रादिके सान्निध्यमें, उभयथापि अग्न्यादिके रूपमें कोई अन्तर नहीं पड़ता, फिर भी दाहादिका प्रतिबन्ध होता ही है, अतः यदि स्वरूपातिरिक्त शक्ति न मानें, तो प्रतिबन्ध असम्भव हो जायगा, इसलिये शक्ति माननी चाहिये,' यह भी ठीक नहीं, क्योंकि 'प्रतिबन्ध' शब्दसे बोधित होनेवाला कार्यके प्रति औदासीन्य ही अग्न्यादिमें विशेषरूपसे उपलब्ध होता है। यदि ऐसा न मानें, तो शक्ति माननेपर भी प्रतिबन्धका विवेक कठिन हो जायेगा। शक्तिका नाश प्रतिबन्ध नहीं कहा जा सकता, अन्यथा प्रतिबन्ध हट जानेपर कार्याभावकी प्रशक्ति होगी। स्फोटरूप कार्यकी उत्पत्तिके लिये वहाँ शक्त्यन्तरकी उत्पत्ति मानना भी उचित नहीं है; क्योंकि उसके किसी कारणका वहाँ निरूपण नहीं किया जा सकता। अग्निसामग्रीसे वहाँ कार्योत्पत्ति नहीं कही जा सकती; क्योंकि वह तो नष्ट ही हो चुकी है। अशक्त अग्नि उत्पादक न होनेसे उस आश्रयभूत अग्निसे भी कार्योत्पत्ति नहीं कही जा सकती। यदि उत्पादकत्व मानें, तो कार्यमें भी वह वैसे ही विद्यमान होनेसे शक्तिका मानना निष्प्रयोजन है। यदि वह शक्त है, तो उस शक्तिकी कार्यके विषयमें भी मान लेनेसे काम चल जाता है। ऐसी स्थितिमें कारणान्तरका निरूपण न होनेसे शक्त्यन्तरकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती। प्रतिबन्धाभावको भी कारण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अभावकी कारणता अस्वीकृत है। यदि अभावको कारण माना जाय, तो उसीसे स्फोटादि (दाहादि) कार्योंकी उत्पत्ति हो जायगी, फिर अतीन्द्रिय शक्तिकी कल्पनासे क्या लाभ? एक शक्तिसे दूसरी शक्तिका प्रतिबन्ध माननेसे अनवस्था- प्रसंग प्राप्त होगा, क्योंकि उसमें भी उक्त दूषणके परिहारार्थ शक्तिप्रतिबन्ध कहना पड़ेगा। अतः शक्तिके बिना भी कार्यके अन्यथापि उपपन्न हो जानेसे अतीन्द्रिय शक्तिकी कल्पनाका कोई अवकाश नहीं है। उपादानोपादेय भावरूप नियमकी अनुपपत्ति भी शक्तिमें प्रमाण नहीं कही जा सकती अर्थात् दुग्धादि जैसे दध्यादिका उपादान है, न कि तिलादि, इसी प्रकार तिलादि ही तैलादिका उपादान है, न कि दुग्धादि, ऐसा जो नियम है, उसकी शक्तिको बिना स्वीकार किये आपत्ति न होनेके कारण शक्ति मानना आवश्यक है, ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि शक्तिके बिना माने ही अनादिसिद्ध वृद्धव्यवहारसे निर्णीत तत्तत्कार्यानुकूल स्वभावकी विशेषतासे ही उपादानोपादेय-नियमकी सिद्धि हो जाती है। यदि स्वभावको नियामक न माना जाय तो शक्तिमें भी नियम न रह सकेगा। 'यह शक्ति यहीं क्यों है, अन्यत्र क्यों नहीं है, इसका समाधान स्वभावभेदके अतिरिक्त और क्या हो सकता है ? अतः कहना होगा कि दोनों प्रकारकी अर्थापत्तियोंको उपर्युक्त रीतिसे शक्तिमें प्रमाण नहीं कहा जा सकता। यदि— विमतं ( अग्न्यादि ) अजनकदशातो जनकदशाया- मतिशययोगिकार्यकत्वात् कुण्ठकुठारवत् । इस अनुमानको शक्तिसाधक कहें, तो यह भी नहीं हो सकता, क्योंकि सहकारिसमवधानके अतिशयसे ही सिद्ध-साधनता है। यदि— 'अग्निः अतीन्द्रियसामान्यवन्निष्क्रियाश्रयः कारण- त्वाद् गुरुत्वाश्रयवत् । ' इस अनुमानद्वारा शक्तिको सिद्ध करें, तो भी जो योगीको मानता है, उसके मतमें किसी वस्तुके अतीन्द्रिय न होनेसे उक्त अनुमानमें दिया हुआ 'अतीन्द्रिय' विशेषण सिद्ध नहीं होता, अतः वैसे विशेषणसे गर्भित अनुमानसे शक्तिकी सिद्धि कैसे हो सकती है ? यदि कहा जाय कि जैसे हमारा चक्षु
४९२ भक्तिसुधा इन्द्रिय होनेके कारण गुरुत्वजातिविषय नहीं है, वैसे ही योगीका चक्षु इन्द्रिय होनेके कारण गुरुत्वजातिविषय न होगा।' इस अनुमानसे अतीन्द्रियकी सिद्धि करके पूर्वोक्त अतीन्द्रियसामान्यगर्भित अनुमानद्वारा शक्तिसिद्धि हो जायगी, तो यह भी उचित नहीं, क्योंकि वहाँ यह शंका होगी कि ऐसा अनुमान करनेवालेकी दृष्टिमें योगीन्द्रिय प्रसिद्ध है या अप्रसिद्ध? यदि अप्रसिद्ध है, तो योगीको न माननेवाले मीमांसककी दृष्टिमें आश्रयासिद्धि होगी। यदि प्रसिद्ध है, तो धर्मिग्राहक प्रमाणका बाध होगा अर्थात् अस्मदादिकोंके इन्द्रियसे विलक्षण योगीन्द्रियको ग्रहण करता हुआ प्रमाण ऐन्द्रियक-अतीन्द्रियक साधारण ही उसका ग्रहण करायेगा, अतः उस प्रमाणसे गुरुत्वजातिविषयत्वाभावरूप साध्यका बोध हो जायगा। यदि उस अतीन्द्रिय विशेषणको अस्मदादिके अभिप्रायसे मानें, तो भी काम न चलेगा, क्योंकि जब परमाणुको जानता हूँ, आकाशको जानता हूँ, ऐसा अनुव्यवसाय होता है, तब परमाणु और उसका ज्ञान मानसप्रत्यक्षरूप अनुव्यवसायका विषय होता है। इस तरह सभी वस्तु ऐन्द्रियकज्ञानविषय बन जानेसे अस्मदादिकी दृष्टिसे भी अतीन्द्रियत्व अप्रसिद्ध ही रहता है और इस तरह पूर्वोक्त दोष ज्यों-का-त्यों रहनेसे उक्त अनुमानसे शक्तिसिद्धि नहीं हो सकती। यदि उस अनुमानमें, अनुव्यवसायातिरिक्त अस्मदादि ऐन्द्रियकबुद्धिके अगोचर होनेके आशयसे वह अतीन्द्रियत्वरूप विशेषण है, ऐसा कहें, तो भी ठीक नहीं, क्योंकि अन्यप्रमाणसे उपनीत विशेषणावगाहि- विशिष्टज्ञान माननेवालेके मतमें सभी पदार्थोंकी ऐन्द्रियकता सम्भव होनेसे पूर्वोक्त दोष ज्यों-का-त्यों रह जाता है अर्थात् जिनके मतमें ‘सुरभिचन्दनम्’ इत्यादि विशिष्ट ज्ञान प्रमाणान्तर घ्राण आदिसे उपनीत गन्धादिको भी विषय कहते हैं, उनके मतमें यत्किंचित् प्रत्यक्षार्थ विशेषण होनेसे सभी पदार्थ ऐन्द्रियकबुद्धिबाध्य हो सकते हैं, अतः अप्रसिद्ध विशेषणता उक्त अनुमानमें तदवस्थ ही है। यदि पूर्वोक्त— 'अग्निः अतीन्द्रियसामान्यवन्निष्क्रियाश्रयः कारण- त्वाद् गुरुत्वाश्रयवत्।' —इस अनुमानमें विशिष्टज्ञान एवं अनुव्यवसायके अतिरिक्त अस्मदादि ऐन्द्रियकबुद्धिका अविषयत्व ही अतीन्द्रिय माना जाय, तो वहाँ फिर यह शंका हो सकती है कि इस अनुमानमें 'आश्रय' पदसे जो आधाराधेयभाव विवक्षित है, वह संयोगिरूपसे विवक्षित है या समवायिरूपसे? यदि संयोगिरूपसे, तो गुरुत्वाश्रयके दृष्टान्तमें साध्यवैकल्य होता है। यदि 'आश्रय' पदका अर्थ समवायी मानें, तो समवायको न माननेवाले मीमांसकभट्टके मतमें उक्त विशेषण ही अप्रसिद्ध होनेसे वह अनुमान नहीं बन सकेगा और वह्निमें स्थितिस्थापक संस्कारसिद्धि होनेसे सिद्धसाधनता भी होती है। यदि कहा जाय कि सिद्धसाधनताके अस्तित्वमें कोई प्रमाण न होनेसे क्यों मानें ? तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसके अस्तित्वमें— 'विमतः स्थितिस्थापकसंस्कारवान् रूपव- त्त्वात् कटवत्।' यह अनुमान विद्यमान है। इस अनुमानको स्थितिस्थापककार्यवत्त्वरूप उपाधिसे दूषित भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उपाधिकी साध्यव्यापकता होनी आवश्यक है, किंतु उत्पन्न होते ही नष्ट हो गये, कटादिमें स्थितिस्थापकरूप कार्यका उपलम्भ न होनेपर भी यहाँ तथाविध संस्कारका अभ्युपगम होनेसे साध्याव्याप्ति रहती है। अपि च जो मीमांसक अपने सिद्धान्तानुसार सिद्धसाधनता कह रहा है, उसको सैकड़ों अनुमानोंसे भी स्वसिद्धान्तसे किस तरह प्रच्युत किया जा सकता है और कैसे उसके साधनतासिद्ध इस अभिधानको प्रत्युद्धृत किया जा सकता है? यदि इस प्रकार स्वसिद्धान्तके अनुरोधसे सिद्धसाधनता माननेवालेकी अनुमानोंद्वारा तदीय सिद्धान्तसे प्रच्युति अशक्य होने और सिद्धसाधनताके अपरिहार्य होनेसे स्वाभिप्राय- सिद्ध्यर्थ पूर्वोक्त अनुमानगत 'अतीन्द्रियसामान्य-
वन्निष्क्रियाश्रय' में 'स्थितिस्थापकेतर' यह विशेषण जोड़कर दूषणका परिहार किया जाय, तो भी प्रभाकरके मतमें—जो कि कर्मकी अप्रत्यक्षता मानते हैं—कर्मसे अर्थान्तरतापत्ति होगी; क्योंकि उनके मतमें अप्रत्यक्ष एवं निष्क्रिय कर्ममें अतीन्द्रिय सामान्यवत्वादिरूप साध्य विद्यमान ही है। किंतु यह ठीक नहीं है, फिर जो भी कादाचित्क होता है, वह स्वाश्रयातिशयपुरःसर देखा गया है, जैसे संयोग-विभागजन्य कार्य संयोग- विभागरूप स्वाश्रयातिशयपुरःसर होता है। इस व्याप्तिसे कादाचित्क होनेके कारण संयोग-विभागमें भी स्वाश्रयातिशयपुरःसरत्वका अनुमान किया जाता है। जो यह अतिशय है, वह कर्म है, ऐसा माननेवाले प्रभाकरके मतमें कर्मसे अर्थान्तरता होती ही है और वहि भी अतीन्द्रियसामान्यवन्निष्क्रिय कर्माश्रय ही है। अनुमानका 'कारणत्वात्' यह हेतु शक्तिसे अनेकान्त है। यदि कहा जाय कि नहीं, शक्ति भी साध्यवान् होनेसे उससे अनेकान्तता नहीं है, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि शक्तिमें भी यदि शक्त्यन्तर मानें तो अनवस्थाकी प्रसक्ति होगी। यह कहा जाय कि जन-शक्तियुक्त ही अर्थात् शक्तिमान् ही यहाँ कारणत्वेन विवक्षित है, अतः शक्तिमें अनैकान्तिकता नहीं है, तो यह कथन भी उपयुक्त नहीं है; क्योंकि विशेषणीभूत शक्तिके बिना सिद्ध हुए शक्तियुक्ततारूप कारणत्व ही सिद्ध नहीं हो सकता। यदि प्रमाणान्तरसे विशेषणीभूत शक्तिकी सिद्धि करना हो, तो फिर इसके लिये इतने प्रपंचकी क्या आवश्यकता थी? साथ ही गुण आदिमें अनेकान्तता भी आती है। जैसे कि—द्रव्य गुण और कर्ममें ही सामान्य रहता है। वहाँ निष्क्रियत्वरूप विशेषण होनेसे यद्यपि द्रव्याश्रयत्व नहीं आता, क्योंकि सावयव होनेके कारण आश्रित द्रव्य सक्रिय है तथापि गुण और कर्म, इन दोनोंकी अन्यतराश्रयता तो होगी ही और वे दोनों भी द्रव्यलक्षण या द्रव्यत्वव्याप्त हैं, अतः गुणादिमें भी द्रव्यत्वकी प्रसक्ति होगी ही। ऐसा न हो, इसलिये वहाँ तद्रहितत्व कहना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त उसमें कारणत्व होनेसे वह अनैकान्तिक है अर्थात् गुणादिमें यथोक्त शक्त्याश्रयत्व उपपन्न नहीं होता। यदि उपर्युक्त अनुमानको त्यागकर शक्तिसिद्ध्यर्थ 'विवादाध्यासितः स्फोटः उभयवादिसम्प्रतिपन्न- स्फोटकारणातिरिक्तकारणजन्यः कार्यत्वाद् घटवत्' ऐसे अनुमानान्तरको स्वीकार करें; क्योंकि प्रतिवादीसे विप्रतिपन्न होनेके कारण उभयवादिसम्प्रतिपन्न कारणसे अतिरिक्त कारण तो प्रतिबन्धकाभाव होता है, अतः उससे अर्थान्तरता होती है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रतिवादिद्वारा असम्प्रतिपन्न प्रतिबन्धकाभावरूप कारणसे सिद्धसाधन होता है। यदि कहा जाय कि वहाँ भावजन्यरूप विशेषणके न होनेसे अर्थान्तरता नहीं है, तो यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भावजन्यरूप विशेषण होनेपर भी ईश्वरसे सिद्धसाधनता होगी; क्योंकि शक्तिवादी मीमांसक ईश्वरको स्वीकार नहीं करता। इस तरह यद्यपि सहजशक्तिमें न तो अर्थापत्ति और न अनुमान ही प्रमाण हो सकता है तथापि आधेय शक्तिमें 'व्रीहीन् प्रोक्षति, यूपं तक्षति, अग्नीनादधीत' इत्यादि आगम प्रमाण होनेसे तद्बलात् सहजशक्तिकी भी सिद्धि हो सकती है। 'व्रीहीन् प्रोक्षति' इत्यादि वाक्योंमें 'व्रीहीन्' इस द्वितीया श्रुतिसे—'ग्रामं गच्छति' इत्यादि वाक्योंमें जैसे 'ग्रामम्' इस द्वितीयासे ग्रामकी कर्मता अवगत होती है, वैसे ही—व्रीहि आदिकी कर्मता ज्ञात होनेसे यह निश्चित होता है कि उन व्रीह्यादिकोंमें प्रोक्षणादिजन्य कोई अतिशय है; क्योंकि वहाँ कोई अन्य दृष्ट फल दिखलायी नहीं पड़ता। शक्तिवादी उसी अतिशयको शक्ति मानते हैं। किंतु संस्कारसंज्ञक चेतनगत अदृष्टका अचेतन व्रीहि आदिमें समवाय नहीं हो सकता, अर्थात् आत्मगुण अदृष्ट अनात्मभूत व्रीह्यादिमें नहीं हो सकता। कदाचित् यह कहा जाय कि 'व्रीहीन्' इस द्वितीया श्रुतिसे एक तो व्रीहिकी संस्कार्यता बोधित होती है, दूसरे 'व्रीहि प्रोक्षणसे संस्कृत हुए' ऐसी प्रसिद्धि भी है, अतः व्रीहिगत
४९४ भक्तिसुधा संस्कारको चेतनगत मानना विरुद्ध है, परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि घटविषयक ज्ञानसे उत्पन्न संस्कार जैसे घटविषयक होनेसे, न कि घटाधार होनेसे घटसंस्कार कहा जाता है, वैसे यहाँ भी व्रीहिप्रोक्षणादिसे उद्भूत संस्कारकी भी व्रीहिविषयक प्रोक्षणादि क्रियासे उत्पन्न होनेमात्रसे तदीयत्व प्रतीतिकी उपपत्ति हो सकती है, अतः द्वितीया श्रुति या प्रसिद्धि व्रीह्यादिगत शक्तिकी साधिका न होनेसे कहना होगा कि शक्तिकी कल्पनामें कोई भी प्रमाण नहीं है। अतएव लीलावतीकारने भी कहा है कि विवादाध्यासित अग्न्यादि निजरूपमात्रसे सम्बद्ध अतीन्द्रियसापेक्ष नहीं है; क्योंकि प्रमाणद्वारा वैसा उपलभ्यमान नहीं होता। प्रमाणसे जो जैसा उपलब्ध नहीं होता, वह वैसा नहीं होता, जैसे नील पीतरूपमें उपलब्ध न होनेसे पीत नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि शक्तिका साधक कोई प्रमाण नहीं है। शक्ति-समर्थन परंतु यह कहना उचित नहीं है; क्योंकि शक्तिके अस्तित्वमें— परास्य शक्तिर्विविधा सर्गाद्या भावशक्तयः। इति श्रुतिस्मृतिमिता शक्तिः केन निवार्यते ॥ न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥ (श्वेताश्वतरोपनिषद् ६।८) ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्। (श्वेताश्वतरोपनिषद् १।३) य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद् (श्वेताश्वतरोपनिषद् ४।१) शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः। यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः॥ (विष्णुपुराण १।३।२) सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः। अचिन्त्यशक्तिश्च विभोर्विधाज्ञाः षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य॥ (वायुपुराण) इत्यादि सैकड़ों श्रुति-स्मृतियोंसे गीयमान शक्तिका अपह्नव किस तरह किया जा सकता है? उक्त वचनोंमें कार्य-कारणादि सहकारियोंके निरासपूर्वक शक्तिका प्रतिपादन है, अतः यह नहीं कहा जा सकता कि ये वचन स्वरूप सहकारिमात्रके प्रतिपादक हैं। शक्तिकी स्वरूपमात्रता भी नहीं हो सकती; क्योंकि वहाँ 'परा अस्य' इत्यादि षष्ठ्यन्त पदसे स्वरूपातिरिक्तताका प्रतिपादन किया गया है। 'अस्य शक्तिर्विविधाः', 'तास्तु शक्तयः' इत्यादि वचनोंसे उस शक्तिकी अनेकता श्रुत होनेसे उसे एकरूप ब्रह्म भी कहना ठीक नहीं है। उपक्रम, उपसंहार आदि लिंगसे ईश्वरस्वरूपकी निश्चायिका होनेसे उक्त श्रुति- स्मृतियोंको अर्थवाद भी नहीं कहा जा सकता। साथ ही नैयायिक आदिकोंने भी इन वचनोंको ईश्वर- स्वरूपपरक माना है, अतः उन्हें अर्थवाद बतलाना उचित नहीं है। फिर भी यदि किन्हीं तार्किकम्मन्यकी शक्तिके अस्तित्वमें उक्त आगम वचनोंसे ही सन्तोष न होकर वे अर्थापत्ति और अनुमानकी ही अपेक्षा रखते हों तो उनको अग्रिम अर्थापत्ति और अनुमानसे भी सन्तुष्ट किया जा सकता है। पीछे स्फोटादि कार्यकी अन्यथानुपपत्तिसे प्रथम अर्थापत्तिको दिखलाया ही जा चुका है। यदि उस सम्बन्धमें यह कहा जाय कि वहाँपर भी यह कहा गया था कि प्रतिबन्धकके अभावमें सहकृत ही अग्निस্বরূপसे कार्यकी उत्पत्ति होनेसे अन्यथा भी उपपत्ति होती है और प्रागभाव, प्रध्वंसाभावादि विकल्पसे अभावकी अकारणता भी नहीं कही जा सकती; क्योंकि अप्रतिबद्ध ही शक्तिमें भी कारणता बन सकनेसे उसमें भी उक्त प्रसंग समान ही है। परंतु उसपर यह कहना है कि क्या इस प्रकारका यह एक प्रतिकूल तर्कमात्र है कि यदि प्रतिबन्धकाभाव कारण न हो तो शक्ति भी कारण न होगी अथवा शक्ति कारण है, अतः प्रतिबन्धकाभाव
भी कारण है, इस तरह विपर्ययमें पर्यवसान होनेसे अभावका कारणत्व सिद्ध किया जा रहा है ? पहली बात नहीं कही जा सकती, क्योंकि केवल तर्कसे उपालम्भ नहीं किया जा सकता, उसका विपर्ययमें भी पर्यवसान होना चाहिये, अन्यथा वह तर्काभास हो जाता है और ऐसे तर्काभासद्वारा प्रतिपक्षका निराकरण नहीं किया जा सकता। दूसरी बात भी संगत नहीं है; क्योंकि जो शक्तिका अंगीकार नहीं करता, वह उक्त रीतिसे प्रतिबन्धकाभावमें कारणता दिखलाते हुए विपर्ययमें पर्यवसान कैसे कर सकता है ? तर्क दो प्रकारका होता है—एक स्वपक्ष- साधकानुकूल और दूसरा प्रतिपक्षदूषक। पहलेमें विपर्यय पर्यवसानकी अपेक्षा हुआ करती है, अन्यथा साधनानुकूलत्व सिद्ध नहीं होता। दूसरेमें उसकी अपेक्षा नहीं होती, वहाँ परमतासिद्ध व्याप्तिसे ही परपक्षकी अनिष्ट सिद्धि की जा सकती है। यहाँ भी यही स्थिति मानकर यदि यह कहा जाय कि परासिद्ध शक्तिसे परपक्षका अनिष्टसाधन किया जा रहा है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जो ऐसा मानता है कि प्रमितमें अर्थात् अधिकरणमें प्रमित प्रतियोगिक ही निषेध होता है, न कि अप्रमितप्रतियोगिक, वह— 'यदि प्रतिबन्धकाभाव कारण न हो तो शक्ति भी कारण न होगी, इस तरह शक्तिकी कारणताका निषेध नहीं कर सकता; क्योंकि शक्ति और उसकी कारणता, दोनों अप्रमित हैं। यदि उन्हें प्रमित कहें तो स्वरूपसे उनका निषेध नहीं किया जा सकता। तात्पर्य यह हुआ कि भले ही यहाँ तर्कका भी पर्यवसान विपर्ययमें न हो, पर शक्तिकारणत्वका निषेध ही नहीं सिद्ध किया जा सकता। फिर भी जल्पकथा छोड़कर यदि सुहृद्भावसे कोई यह पूछे कि प्रतिबन्धभाव यदि कारण न हो तो प्रतिबन्ध रहनेपर भी शक्ति कार्यको क्यों न उत्पन्न करेगी ? तो इसका उत्तर यह है कि शक्तिवादीके मतानुसार प्रतिबन्धक वह कहा जाता है, जो पुष्कल कारण रहते हुए भी कार्योत्पत्तिका विरोधी हो। अतः वह यह नहीं कहा जा सकता कि सामग्रीवैकल्यसे कार्यका उदय नहीं हुआ, अपितु यही कहना होगा कि विरोधी रहनेसे ही कार्योदय नहीं हुआ। लोकप्रसिद्ध विरुद्ध होनेसे सामग्रीवैकल्यको ही प्रतिबन्ध नहीं कहा जा सकता। कोई भी लौकिक पुरुष भूमि, वायु, जल एवं तेजके संसर्गसे विरहित कोठीमें भरे हुए बीजोंको या तुरी, वेमा, कुविन्द आदिसे विरहित पेटीमें रखे हुए तन्तुओंको प्रतिबद्ध नहीं समझता। सामग्रीराहित्यमात्रको यदि प्रतिबन्ध कहा जाय तो समस्त कारणोंकी केवल प्रतिबन्धभावमें ही उपक्षीणता हो जानेसे यह इस कारण है, यह प्रतिबन्धाभाव है—इस तरह परीक्षकोंके विभक्तरूपसे दोनोंका विशेषावधारण ही न होना चाहिये। अभावको कारण न माननेपर कार्यके साथ अन्वय-व्यतिरेक विरोध होगा, यह कथन भी असंगत होगा; क्योंकि अन्वय-व्यतिरेक कार्य-प्रतिबन्धकाभावके विषय होनेसे प्रतिबन्धकाभाव अन्यथा सिद्ध है। यहाँ यदि यह कहा जाय तो फिर अनुपलब्धि भी अभावके उपलम्भकी हेतु नहीं हो सकती; क्योंकि विरोधिनीभावोपलब्धिका अभाव होनेसे उनके अन्वय- व्यतिरेकको भी अन्यथासिद्ध कहना सहज है, तो यह भी उचित नहीं है, क्योंकि वहाँ कारणान्तर न होनेसे अगत्या अनन्यथासिद्ध अनुपलब्धिको कारण मानना पड़ा है, किंतु यहाँ ऐसी बात नहीं है। यहाँ उसके बिना अभावोपलम्भके कारणका निरूपण नहीं किया जा सकता। इन्द्रियको ही यदि अभावोपलम्भका कारण कहें तो भी ठीक नहीं; क्योंकि उसके अभावमें सन्निकर्ष न होगा। वहाँ संयोग तथा समवायका अभाव होने और सम्बन्धान्तरगर्भ ही विशेषण-विशेष्यभावके प्रत्यक्षांग होनेसे वहाँ अभाव प्रत्यक्षगम्य नहीं, अपितु अनुपलब्धिगम्य ही है। अन्यथा 'पर्वतो वह्निमान्' यहाँ संयुक्त विशेषण होनेके कारण अग्निका भी प्रत्यक्षत्व होने लगेगा।
४१६ भक्तिसुधा यदि यह कहा जाय कि 'असम्बद्ध ही अभाव इन्द्रियग्राह्य हो तो क्या हानि है; क्योंकि उसकी प्रतीति इन्द्रियान्वय-व्यतिरेककी अनुविधायिनी होनेसे अपरोक्ष है और इसके अतिरिक्त दूसरी गति भी नहीं है' तो यह कहना भी उचित नहीं है; क्योंकि अयोगिप्रत्यक्षकी प्रमितिमें इन्द्रियोंसे सम्बद्ध अर्थग्राहकत्व-नियमका निराकरण नहीं किया जा सकता और अभावकी प्रतीतिका अपरोक्षत्व सिद्ध न होनेसे इन्द्रियान्वय और व्यतिरेक अधिकरणके ग्रहणमात्रमें उपक्षीण हो जानेसे अन्यथासिद्ध भी हो जाते हैं। इसपर यह कहा जा सकता है कि 'नहीं, अधिकरणके ग्रहणमात्रमें अन्वय-व्यतिरेककी उपक्षीणता कहना ठीक नहीं है; क्योंकि अभावको इन्द्रियग्राह्य न माना जायगा' तो अन्धद्वारा त्वगादिसे घटादिरूप अधिकरणके गृहीत होनेपर उसको रूपाभावकी प्रतीति मान लेना पड़ेगा; क्योंकि अधिकरण तो उस अन्धसे गृहीत ही है। यदि कहें कि 'चक्षुरिन्द्रियके न होनेसे वहाँ अन्धेको रूपाभावका प्रत्यक्ष न होगा' तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि इन्द्रिय अभावका ग्राहक है ही नहीं, अतएव यह कहा जाय कि 'अन्धेको प्रतियोगी ग्राहक इन्द्रिय न होनेसे ही रूपाभावकी प्रतीति न होगी। तथा च अभावकी ऐन्द्रियकत्वसिद्धि हो जाती है।' परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि फिर अभावको प्रतियोगिग्राहक इन्द्रियग्राह्य माननेवालेके मतमें भी अनन्धको भी असन्निहित मेरु आदिमें घट एवं उसके रूपादिके अभावकी चाक्षुषता क्यों न होगी? यदि कहा जाय कि 'वहाँ प्रतियोगीके चाक्षुष होनेपर भी अधिकरणके चाक्षुष न होनेसे रूपाभावका चाक्षुषत्व नहीं होता' तो इधरसे भी कहा जा सकता है कि इसीलिये त्वगिन्द्रियसे गृहीत घटादिमें अन्धेको रूपाभावकी प्रतीति नहीं होती; क्योंकि प्रतियोगिग्राहक इन्द्रियद्वारा घटादिरूप अधिकरणका वहाँ ग्रहण नहीं होता। यदि कहा जाय कि 'तब तो घ्राणेन्द्रियके अगोचर कुसुमादि या चक्षुरिन्द्रियग्राह्य वायुमें गन्ध या रूपके अभावका प्रत्यक्ष न होगा' तो इसपर यही कहना होगा कि भले न हो, वहाँ वायु आदिमें रूपादिका अभाव चाक्षुष न होनेपर भी उनमें रूपाभाव ज्ञानरूप व्यवहारमें कोई बाधा नहीं पड़ती। षष्ठ प्रमाणवादियोंके यहाँ सर्वत्र यह नियम नहीं है कि अभाव अनुपलब्धिगम्य ही है; क्योंकि व्यापकाभावसे व्याप्यके अभावको और कारणाभावसे कार्याभावको अनुमेय मान लिया गया है अर्थात् यदि वक्ष्यमाण तत्तत् भट्टपादादि वृद्धोंकी सम्मतिसे अभावकी प्रमाणान्तरगम्यता भी है तो योग्यानुपलब्धिगम्यस्थलमें ही प्रतियोगिग्राहकद्वारा अधिकरणके ग्रहणका नियम है; क्योंकि अभावकी उपलब्धिका व्यापकीभूत जो अनुपलब्धि आदि कारण है, उसके अतिरिक्त इन्द्रियादिरूप कारणकी पुष्कलता ही योग्यता है और इन्द्रियके उसका अन्तःपाती होनेके कारण उसके अभावमें भी योग्यता न बनेगी। जहाँ प्रमाणान्तरगम्यता होती है, वहाँ उसके बिना भी अभावका ग्रहण हो सकता है, जैसे व्यापकाभावसे व्याप्याभावका अनुमान। इस विषयमें भट्टपाद लिखते हैं कि अग्नि और धूमरूप भावके नियम्यत्व-नियन्तृत्व जैसे माने जाते हैं, वे ही नियम्यत्व और नियन्तृत्व अग्नि-धूम-सम्बन्धी अभावके विपरीत प्रतीत होता है। भावावस्थामें धूम नियन्ता और अग्नि नियम्य होता है और अभावमें इसके विपरीत स्थिति होती है अर्थात् तब धूमाभाव नियम्य और अग्निका अभाव नियन्ता होता है— नियम्यत्वनियन्तृत्वे भावयोर्यादृशी मते। विपरीते प्रतीयते त एव तदभावयोः ॥ कारणाभावसे कार्याभावके अनुमान विषयमें श्रीमण्डनमिश्रने ब्रह्मसिद्धिमें बतलाया है कि हेतुके अभावसे फलाभावका नियम होनेसे दोषाभावसे विपर्ययाभावका अनुमान किया जा सकता है— 'विपर्ययाभावस्तु युक्तोऽनुमातुं हेत्वभावे फलाभाव इति।' अतएव स्थलविशेषमें अनन्यथा सिद्धि अन्वय- व्यतिरेकबलसे अनुपलब्धिकी अभाव-प्रतीतिमें कारणता
श्रीभगवती-तत्त्व ४१७ निश्चित होती है। प्रकृतमें स्वपुष्कल कारणसे कार्योत्पत्ति हो सकती है, तब प्रतिबन्धकाभावको कारण मानना आवश्यक नहीं है और इस मतमें अन्योन्याश्रयताका वारण करना भी कठिन होगा। यद्यपि मण्यादिकी कार्यप्रतिकूलताका निश्चय अन्वय-व्यतिरेकसे हो सकता है तथापि विसामग्रीरूपता लक्षणप्रतिबन्धत्व तदीय अभावकी सामग्रीके अन्तर्भाव विज्ञानके सापेक्ष है; क्योंकि विसामग्री प्रतिबन्ध है, यह मान्य है। अतः प्रतिबन्धत्व और सामग्रीत्वका ज्ञान परस्पर सापेक्ष होनेसे अन्योन्याश्रयता दुर्निवार होगी, अर्थात् वैसामग्र्य ही प्रतिबन्ध है और प्रतिबन्धाभावरूप कारण-वैकल्य ही वैसामग्र्य है। ऐसी स्थितिमें मणि आदिके वैसामग्र्यरूप प्रतिबन्धत्वका ज्ञान मन्त्रादि सम्बन्धी अभाव सामग्रीका अन्तर्भाव ज्ञानसापेक्ष है और मन्त्रादिके अभावका सामग्र्यन्तर्भाव ज्ञान, मणि आदिके प्रतिबन्धत्व ज्ञानके अधीन है; क्योंकि प्रतिबन्धाभावरूप कारण-वैकल्यसे वैसामग्र्यका उपपादन होगा, अतएव अन्योन्याश्रयता सुतरां सिद्ध है। यदि कहा जाय कि 'मण्यादिके विसामग्रीत्वका ज्ञान भले ही मण्याद्यभाव-सम्बन्धी सामग्रीके अन्तर्भाव ज्ञानके सापेक्ष रहे, पर वह्निस्वरूपकी तरह अन्वय- व्यतिरेकसे ही मण्यादिके अभावकी सामग्र्यन्त- र्भाव-सम्बन्धी अवगति हो सकती है, अतः अन्योन्या- श्रयता न होगी' तो यह ठीक नहीं; क्योंकि वहाँ यह शंका होगी कि क्या प्रत्येक मण्याद्यभाव अन्वय- व्यतिरेकद्वारा कारणरूपसे निश्चित किये जाते हैं या प्रतिबन्धाभावरूप उपाधिसे क्रोड़ीकृत होकर ? पहली बात हो नहीं सकती; क्योंकि मण्याद्यभाव अनन्त हैं, उनके उपसंग्राहकके बिना प्रत्येकके अन्वय-व्यतिरेकका निश्चय सौ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता। दूसरा पक्ष मानें तो विसामग्रीरूप प्रतिबन्धज्ञानके अधीन प्रतिबन्धाभावत्वरूप उपाधिका ज्ञान हुए बिना मण्याद्य- भाव-सम्बन्धी सामग्र्यन्तर्भावका ज्ञान होना कठिन है, अतः अन्योन्याश्रयताका निराकरण फिर भी बना ही रहेगा, इसलिये द्वितीय पक्ष भी अस्वीकार्य है। शक्ति पक्षमें प्रतिबन्धकी जो असम्भवता पीछे कही गयी, वह भी ठीक नहीं है, अन्यथा शक्तिको न माननेवालोंको भी कारणोंके कार्योदासीन्यको ही प्रतिबन्ध मान लेना पड़ेगा; क्योंकि वैसामग्र्यरूप प्रतिबन्धका तो उपर्युक्त अन्योन्याश्रय दोषरूप रीतिसे खण्डन किया ही जा चुका है। अतः प्रतिबन्धाभावके कारण न बननेसे कार्यार्थापत्तिकी बिना शक्तिको स्वीकृत किये, अन्यथा उपपत्ति हो ही नहीं सकती। शक्तिको स्वीकार किये बिना उपादानोपादेयभाव- नियमकी उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः उसे भी शक्तिमें प्रमाण मानना ही चाहिये। वहाँ स्वभावभेदसे ही उपपत्ति करके जो पहले अन्यथा उपपत्ति कही गयी थी, उसका अभिप्राय क्या है ? क्या शक्तिवादीको भी अन्ततोगत्वा जब स्वभावकी शरण लेनी ही पड़ती है, तब अच्छा है कि पहलेसे ही स्वभाव मान लिया जाय यह अथवा स्वभावातिरिक्त शक्तिमें प्रमाणका न होना। यदि प्रथम पक्ष तो वैसा माननेसे सर्वत्र स्वभाववादका पाद-प्रसार होनेसे सामान्य, समवाय एवं विशेष आदिका भी अपाकरण प्रसक्त हो जायगा। अनवस्था भय सत्तासे जैसे सत्तान्तर माने बिना ही स्वभाव-विशेषवश सद्द्व्यवहारका हेतुत्व मान लिया जाता है, वैसे ही अन्यत्र द्रव्यादिमें भी स्वभावविशेषसे सद्द्व्यवहार उत्पन्न हो जानेसे सत्तासामान्यका अपलाप हो जायगा। इसी तरह— 'समवायवान् अयं घटः।' यहाँ अनवस्था भयसे जैसे समवायान्तर माने बिना ही समवायकी घटके प्रति विशेषणता मान ली जाती है, वैसे ही 'शुक्लः पटः, चलति चैलाञ्चलम्' यहाँ भी गुण-कर्ममें स्वभाव-भेदसे ही विशेषण- विशेष्य भाव होकर समवायका अपलाप हो जायगा। इसी प्रकार जैसे अन्त्यविशेषोंमें स्वभाववशात् परस्पर व्यावृत्ति मानी जाती है, क्योंकि विशेषोंमें विशेषान्तर माननेसे उनकी भी, अनुगतरूपवत्तासे रूपादिकी तरह, एक तो अन्त्यविशेषत्वकी हानि होगी और दूसरे, अनवस्थाप्रसक्त होगी। अगत्या किन्हीं विशेषोंको