भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 502

४९२ भक्तिसुधा इन्द्रिय होनेके कारण गुरुत्वजातिविषय नहीं है, वैसे ही योगीका चक्षु इन्द्रिय होनेके कारण गुरुत्वजातिविषय न होगा।' इस अनुमानसे अतीन्द्रियकी सिद्धि करके पूर्वोक्त अतीन्द्रियसामान्यगर्भित अनुमानद्वारा शक्तिसिद्धि हो जायगी, तो यह भी उचित नहीं, क्योंकि वहाँ यह शंका होगी कि ऐसा अनुमान करनेवालेकी दृष्टिमें योगीन्द्रिय प्रसिद्ध है या अप्रसिद्ध? यदि अप्रसिद्ध है, तो योगीको न माननेवाले मीमांसककी दृष्टिमें आश्रयासिद्धि होगी। यदि प्रसिद्ध है, तो धर्मिग्राहक प्रमाणका बाध होगा अर्थात् अस्मदादिकोंके इन्द्रियसे विलक्षण योगीन्द्रियको ग्रहण करता हुआ प्रमाण ऐन्द्रियक-अतीन्द्रियक साधारण ही उसका ग्रहण करायेगा, अतः उस प्रमाणसे गुरुत्वजातिविषयत्वाभावरूप साध्यका बोध हो जायगा। यदि उस अतीन्द्रिय विशेषणको अस्मदादिके अभिप्रायसे मानें, तो भी काम न चलेगा, क्योंकि जब परमाणुको जानता हूँ, आकाशको जानता हूँ, ऐसा अनुव्यवसाय होता है, तब परमाणु और उसका ज्ञान मानसप्रत्यक्षरूप अनुव्यवसायका विषय होता है। इस तरह सभी वस्तु ऐन्द्रियकज्ञानविषय बन जानेसे अस्मदादिकी दृष्टिसे भी अतीन्द्रियत्व अप्रसिद्ध ही रहता है और इस तरह पूर्वोक्त दोष ज्यों-का-त्यों रहनेसे उक्त अनुमानसे शक्तिसिद्धि नहीं हो सकती। यदि उस अनुमानमें, अनुव्यवसायातिरिक्त अस्मदादि ऐन्द्रियकबुद्धिके अगोचर होनेके आशयसे वह अतीन्द्रियत्वरूप विशेषण है, ऐसा कहें, तो भी ठीक नहीं, क्योंकि अन्यप्रमाणसे उपनीत विशेषणावगाहि- विशिष्टज्ञान माननेवालेके मतमें सभी पदार्थोंकी ऐन्द्रियकता सम्भव होनेसे पूर्वोक्त दोष ज्यों-का-त्यों रह जाता है अर्थात् जिनके मतमें ‘सुरभिचन्दनम्’ इत्यादि विशिष्ट ज्ञान प्रमाणान्तर घ्राण आदिसे उपनीत गन्धादिको भी विषय कहते हैं, उनके मतमें यत्किंचित् प्रत्यक्षार्थ विशेषण होनेसे सभी पदार्थ ऐन्द्रियकबुद्धिबाध्य हो सकते हैं, अतः अप्रसिद्ध विशेषणता उक्त अनुमानमें तदवस्थ ही है। यदि पूर्वोक्त— 'अग्निः अतीन्द्रियसामान्यवन्निष्क्रियाश्रयः कारण- त्वाद् गुरुत्वाश्रयवत्।' —इस अनुमानमें विशिष्टज्ञान एवं अनुव्यवसायके अतिरिक्त अस्मदादि ऐन्द्रियकबुद्धिका अविषयत्व ही अतीन्द्रिय माना जाय, तो वहाँ फिर यह शंका हो सकती है कि इस अनुमानमें 'आश्रय' पदसे जो आधाराधेयभाव विवक्षित है, वह संयोगिरूपसे विवक्षित है या समवायिरूपसे? यदि संयोगिरूपसे, तो गुरुत्वाश्रयके दृष्टान्तमें साध्यवैकल्य होता है। यदि 'आश्रय' पदका अर्थ समवायी मानें, तो समवायको न माननेवाले मीमांसकभट्टके मतमें उक्त विशेषण ही अप्रसिद्ध होनेसे वह अनुमान नहीं बन सकेगा और वह्निमें स्थितिस्थापक संस्कारसिद्धि होनेसे सिद्धसाधनता भी होती है। यदि कहा जाय कि सिद्धसाधनताके अस्तित्वमें कोई प्रमाण न होनेसे क्यों मानें ? तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसके अस्तित्वमें— 'विमतः स्थितिस्थापकसंस्कारवान् रूपव- त्त्वात् कटवत्।' यह अनुमान विद्यमान है। इस अनुमानको स्थितिस्थापककार्यवत्त्वरूप उपाधिसे दूषित भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उपाधिकी साध्यव्यापकता होनी आवश्यक है, किंतु उत्पन्न होते ही नष्ट हो गये, कटादिमें स्थितिस्थापकरूप कार्यका उपलम्भ न होनेपर भी यहाँ तथाविध संस्कारका अभ्युपगम होनेसे साध्याव्याप्ति रहती है। अपि च जो मीमांसक अपने सिद्धान्तानुसार सिद्धसाधनता कह रहा है, उसको सैकड़ों अनुमानोंसे भी स्वसिद्धान्तसे किस तरह प्रच्युत किया जा सकता है और कैसे उसके साधनतासिद्ध इस अभिधानको प्रत्युद्धृत किया जा सकता है? यदि इस प्रकार स्वसिद्धान्तके अनुरोधसे सिद्धसाधनता माननेवालेकी अनुमानोंद्वारा तदीय सिद्धान्तसे प्रच्युति अशक्य होने और सिद्धसाधनताके अपरिहार्य होनेसे स्वाभिप्राय- सिद्ध्यर्थ पूर्वोक्त अनुमानगत 'अतीन्द्रियसामान्य-