भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 503, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंवन्निष्क्रियाश्रय' में 'स्थितिस्थापकेतर' यह विशेषण जोड़कर दूषणका परिहार किया जाय, तो भी प्रभाकरके मतमें—जो कि कर्मकी अप्रत्यक्षता मानते हैं—कर्मसे अर्थान्तरतापत्ति होगी; क्योंकि उनके मतमें अप्रत्यक्ष एवं निष्क्रिय कर्ममें अतीन्द्रिय सामान्यवत्वादिरूप साध्य विद्यमान ही है। किंतु यह ठीक नहीं है, फिर जो भी कादाचित्क होता है, वह स्वाश्रयातिशयपुरःसर देखा गया है, जैसे संयोग-विभागजन्य कार्य संयोग- विभागरूप स्वाश्रयातिशयपुरःसर होता है। इस व्याप्तिसे कादाचित्क होनेके कारण संयोग-विभागमें भी स्वाश्रयातिशयपुरःसरत्वका अनुमान किया जाता है। जो यह अतिशय है, वह कर्म है, ऐसा माननेवाले प्रभाकरके मतमें कर्मसे अर्थान्तरता होती ही है और वहि भी अतीन्द्रियसामान्यवन्निष्क्रिय कर्माश्रय ही है। अनुमानका 'कारणत्वात्' यह हेतु शक्तिसे अनेकान्त है। यदि कहा जाय कि नहीं, शक्ति भी साध्यवान् होनेसे उससे अनेकान्तता नहीं है, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि शक्तिमें भी यदि शक्त्यन्तर मानें तो अनवस्थाकी प्रसक्ति होगी। यह कहा जाय कि जन-शक्तियुक्त ही अर्थात् शक्तिमान् ही यहाँ कारणत्वेन विवक्षित है, अतः शक्तिमें अनैकान्तिकता नहीं है, तो यह कथन भी उपयुक्त नहीं है; क्योंकि विशेषणीभूत शक्तिके बिना सिद्ध हुए शक्तियुक्ततारूप कारणत्व ही सिद्ध नहीं हो सकता। यदि प्रमाणान्तरसे विशेषणीभूत शक्तिकी सिद्धि करना हो, तो फिर इसके लिये इतने प्रपंचकी क्या आवश्यकता थी? साथ ही गुण आदिमें अनेकान्तता भी आती है। जैसे कि—द्रव्य गुण और कर्ममें ही सामान्य रहता है। वहाँ निष्क्रियत्वरूप विशेषण होनेसे यद्यपि द्रव्याश्रयत्व नहीं आता, क्योंकि सावयव होनेके कारण आश्रित द्रव्य सक्रिय है तथापि गुण और कर्म, इन दोनोंकी अन्यतराश्रयता तो होगी ही और वे दोनों भी द्रव्यलक्षण या द्रव्यत्वव्याप्त हैं, अतः गुणादिमें भी द्रव्यत्वकी प्रसक्ति होगी ही। ऐसा न हो, इसलिये वहाँ तद्रहितत्व कहना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त उसमें कारणत्व होनेसे वह अनैकान्तिक है अर्थात् गुणादिमें यथोक्त शक्त्याश्रयत्व उपपन्न नहीं होता। यदि उपर्युक्त अनुमानको त्यागकर शक्तिसिद्ध्यर्थ 'विवादाध्यासितः स्फोटः उभयवादिसम्प्रतिपन्न- स्फोटकारणातिरिक्तकारणजन्यः कार्यत्वाद् घटवत्' ऐसे अनुमानान्तरको स्वीकार करें; क्योंकि प्रतिवादीसे विप्रतिपन्न होनेके कारण उभयवादिसम्प्रतिपन्न कारणसे अतिरिक्त कारण तो प्रतिबन्धकाभाव होता है, अतः उससे अर्थान्तरता होती है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रतिवादिद्वारा असम्प्रतिपन्न प्रतिबन्धकाभावरूप कारणसे सिद्धसाधन होता है। यदि कहा जाय कि वहाँ भावजन्यरूप विशेषणके न होनेसे अर्थान्तरता नहीं है, तो यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भावजन्यरूप विशेषण होनेपर भी ईश्वरसे सिद्धसाधनता होगी; क्योंकि शक्तिवादी मीमांसक ईश्वरको स्वीकार नहीं करता। इस तरह यद्यपि सहजशक्तिमें न तो अर्थापत्ति और न अनुमान ही प्रमाण हो सकता है तथापि आधेय शक्तिमें 'व्रीहीन् प्रोक्षति, यूपं तक्षति, अग्नीनादधीत' इत्यादि आगम प्रमाण होनेसे तद्बलात् सहजशक्तिकी भी सिद्धि हो सकती है। 'व्रीहीन् प्रोक्षति' इत्यादि वाक्योंमें 'व्रीहीन्' इस द्वितीया श्रुतिसे—'ग्रामं गच्छति' इत्यादि वाक्योंमें जैसे 'ग्रामम्' इस द्वितीयासे ग्रामकी कर्मता अवगत होती है, वैसे ही—व्रीहि आदिकी कर्मता ज्ञात होनेसे यह निश्चित होता है कि उन व्रीह्यादिकोंमें प्रोक्षणादिजन्य कोई अतिशय है; क्योंकि वहाँ कोई अन्य दृष्ट फल दिखलायी नहीं पड़ता। शक्तिवादी उसी अतिशयको शक्ति मानते हैं। किंतु संस्कारसंज्ञक चेतनगत अदृष्टका अचेतन व्रीहि आदिमें समवाय नहीं हो सकता, अर्थात् आत्मगुण अदृष्ट अनात्मभूत व्रीह्यादिमें नहीं हो सकता। कदाचित् यह कहा जाय कि 'व्रीहीन्' इस द्वितीया श्रुतिसे एक तो व्रीहिकी संस्कार्यता बोधित होती है, दूसरे 'व्रीहि प्रोक्षणसे संस्कृत हुए' ऐसी प्रसिद्धि भी है, अतः व्रीहिगत