भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 504

४९४ भक्तिसुधा संस्कारको चेतनगत मानना विरुद्ध है, परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि घटविषयक ज्ञानसे उत्पन्न संस्कार जैसे घटविषयक होनेसे, न कि घटाधार होनेसे घटसंस्कार कहा जाता है, वैसे यहाँ भी व्रीहिप्रोक्षणादिसे उद्भूत संस्कारकी भी व्रीहिविषयक प्रोक्षणादि क्रियासे उत्पन्न होनेमात्रसे तदीयत्व प्रतीतिकी उपपत्ति हो सकती है, अतः द्वितीया श्रुति या प्रसिद्धि व्रीह्यादिगत शक्तिकी साधिका न होनेसे कहना होगा कि शक्तिकी कल्पनामें कोई भी प्रमाण नहीं है। अतएव लीलावतीकारने भी कहा है कि विवादाध्यासित अग्न्यादि निजरूपमात्रसे सम्बद्ध अतीन्द्रियसापेक्ष नहीं है; क्योंकि प्रमाणद्वारा वैसा उपलभ्यमान नहीं होता। प्रमाणसे जो जैसा उपलब्ध नहीं होता, वह वैसा नहीं होता, जैसे नील पीतरूपमें उपलब्ध न होनेसे पीत नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि शक्तिका साधक कोई प्रमाण नहीं है। शक्ति-समर्थन परंतु यह कहना उचित नहीं है; क्योंकि शक्तिके अस्तित्वमें— परास्य शक्तिर्विविधा सर्गाद्या भावशक्तयः। इति श्रुतिस्मृतिमिता शक्तिः केन निवार्यते ॥ न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥ (श्वेताश्वतरोपनिषद् ६।८) ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्। (श्वेताश्वतरोपनिषद् १।३) य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद् (श्वेताश्वतरोपनिषद् ४।१) शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः। यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः॥ (विष्णुपुराण १।३।२) सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः। अचिन्त्यशक्तिश्च विभोर्विधाज्ञाः षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य॥ (वायुपुराण) इत्यादि सैकड़ों श्रुति-स्मृतियोंसे गीयमान शक्तिका अपह्नव किस तरह किया जा सकता है? उक्त वचनोंमें कार्य-कारणादि सहकारियोंके निरासपूर्वक शक्तिका प्रतिपादन है, अतः यह नहीं कहा जा सकता कि ये वचन स्वरूप सहकारिमात्रके प्रतिपादक हैं। शक्तिकी स्वरूपमात्रता भी नहीं हो सकती; क्योंकि वहाँ 'परा अस्य' इत्यादि षष्ठ्यन्त पदसे स्वरूपातिरिक्तताका प्रतिपादन किया गया है। 'अस्य शक्तिर्विविधाः', 'तास्तु शक्तयः' इत्यादि वचनोंसे उस शक्तिकी अनेकता श्रुत होनेसे उसे एकरूप ब्रह्म भी कहना ठीक नहीं है। उपक्रम, उपसंहार आदि लिंगसे ईश्वरस्वरूपकी निश्चायिका होनेसे उक्त श्रुति- स्मृतियोंको अर्थवाद भी नहीं कहा जा सकता। साथ ही नैयायिक आदिकोंने भी इन वचनोंको ईश्वर- स्वरूपपरक माना है, अतः उन्हें अर्थवाद बतलाना उचित नहीं है। फिर भी यदि किन्हीं तार्किकम्मन्यकी शक्तिके अस्तित्वमें उक्त आगम वचनोंसे ही सन्तोष न होकर वे अर्थापत्ति और अनुमानकी ही अपेक्षा रखते हों तो उनको अग्रिम अर्थापत्ति और अनुमानसे भी सन्तुष्ट किया जा सकता है। पीछे स्फोटादि कार्यकी अन्यथानुपपत्तिसे प्रथम अर्थापत्तिको दिखलाया ही जा चुका है। यदि उस सम्बन्धमें यह कहा जाय कि वहाँपर भी यह कहा गया था कि प्रतिबन्धकके अभावमें सहकृत ही अग्निस্বরূপसे कार्यकी उत्पत्ति होनेसे अन्यथा भी उपपत्ति होती है और प्रागभाव, प्रध्वंसाभावादि विकल्पसे अभावकी अकारणता भी नहीं कही जा सकती; क्योंकि अप्रतिबद्ध ही शक्तिमें भी कारणता बन सकनेसे उसमें भी उक्त प्रसंग समान ही है। परंतु उसपर यह कहना है कि क्या इस प्रकारका यह एक प्रतिकूल तर्कमात्र है कि यदि प्रतिबन्धकाभाव कारण न हो तो शक्ति भी कारण न होगी अथवा शक्ति कारण है, अतः प्रतिबन्धकाभाव