भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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तथा तदभावमें रहनेवाले प्रतिबन्धकत्व और कारणत्वके अन्योन्यनिमित्तक होनेसे उत्पत्ति या ज्ञप्तिमें अन्योन्याश्रयता दुर्वार है,' तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि अभावकी कारणताका अवगम हुए बिना भी कार्याभावमात्रसे मन्त्रादिकी कार्यप्रतिकूलताका ज्ञान हो सकता है, अतएव तदभावकी कारणताका भी ज्ञान अन्वय-व्यतिरेकसे ही सुकर है। यदि कहा जाय कि 'मणि-मन्त्रादिके सान्निध्यमें, उभयथापि अग्न्यादिके रूपमें कोई अन्तर नहीं पड़ता, फिर भी दाहादिका प्रतिबन्ध होता ही है, अतः यदि स्वरूपातिरिक्त शक्ति न मानें, तो प्रतिबन्ध असम्भव हो जायगा, इसलिये शक्ति माननी चाहिये,' यह भी ठीक नहीं, क्योंकि 'प्रतिबन्ध' शब्दसे बोधित होनेवाला कार्यके प्रति औदासीन्य ही अग्न्यादिमें विशेषरूपसे उपलब्ध होता है। यदि ऐसा न मानें, तो शक्ति माननेपर भी प्रतिबन्धका विवेक कठिन हो जायेगा। शक्तिका नाश प्रतिबन्ध नहीं कहा जा सकता, अन्यथा प्रतिबन्ध हट जानेपर कार्याभावकी प्रशक्ति होगी। स्फोटरूप कार्यकी उत्पत्तिके लिये वहाँ शक्त्यन्तरकी उत्पत्ति मानना भी उचित नहीं है; क्योंकि उसके किसी कारणका वहाँ निरूपण नहीं किया जा सकता। अग्निसामग्रीसे वहाँ कार्योत्पत्ति नहीं कही जा सकती; क्योंकि वह तो नष्ट ही हो चुकी है। अशक्त अग्नि उत्पादक न होनेसे उस आश्रयभूत अग्निसे भी कार्योत्पत्ति नहीं कही जा सकती। यदि उत्पादकत्व मानें, तो कार्यमें भी वह वैसे ही विद्यमान होनेसे शक्तिका मानना निष्प्रयोजन है। यदि वह शक्त है, तो उस शक्तिकी कार्यके विषयमें भी मान लेनेसे काम चल जाता है। ऐसी स्थितिमें कारणान्तरका निरूपण न होनेसे शक्त्यन्तरकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती। प्रतिबन्धाभावको भी कारण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अभावकी कारणता अस्वीकृत है। यदि अभावको कारण माना जाय, तो उसीसे स्फोटादि (दाहादि) कार्योंकी उत्पत्ति हो जायगी, फिर अतीन्द्रिय शक्तिकी कल्पनासे क्या लाभ? एक शक्तिसे दूसरी शक्तिका प्रतिबन्ध माननेसे अनवस्था- प्रसंग प्राप्त होगा, क्योंकि उसमें भी उक्त दूषणके परिहारार्थ शक्तिप्रतिबन्ध कहना पड़ेगा। अतः शक्तिके बिना भी कार्यके अन्यथापि उपपन्न हो जानेसे अतीन्द्रिय शक्तिकी कल्पनाका कोई अवकाश नहीं है। उपादानोपादेय भावरूप नियमकी अनुपपत्ति भी शक्तिमें प्रमाण नहीं कही जा सकती अर्थात् दुग्धादि जैसे दध्यादिका उपादान है, न कि तिलादि, इसी प्रकार तिलादि ही तैलादिका उपादान है, न कि दुग्धादि, ऐसा जो नियम है, उसकी शक्तिको बिना स्वीकार किये आपत्ति न होनेके कारण शक्ति मानना आवश्यक है, ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि शक्तिके बिना माने ही अनादिसिद्ध वृद्धव्यवहारसे निर्णीत तत्तत्कार्यानुकूल स्वभावकी विशेषतासे ही उपादानोपादेय-नियमकी सिद्धि हो जाती है। यदि स्वभावको नियामक न माना जाय तो शक्तिमें भी नियम न रह सकेगा। 'यह शक्ति यहीं क्यों है, अन्यत्र क्यों नहीं है, इसका समाधान स्वभावभेदके अतिरिक्त और क्या हो सकता है ? अतः कहना होगा कि दोनों प्रकारकी अर्थापत्तियोंको उपर्युक्त रीतिसे शक्तिमें प्रमाण नहीं कहा जा सकता। यदि— विमतं ( अग्न्यादि ) अजनकदशातो जनकदशाया- मतिशययोगिकार्यकत्वात् कुण्ठकुठारवत् । इस अनुमानको शक्तिसाधक कहें, तो यह भी नहीं हो सकता, क्योंकि सहकारिसमवधानके अतिशयसे ही सिद्ध-साधनता है। यदि— 'अग्निः अतीन्द्रियसामान्यवन्निष्क्रियाश्रयः कारण- त्वाद् गुरुत्वाश्रयवत् । ' इस अनुमानद्वारा शक्तिको सिद्ध करें, तो भी जो योगीको मानता है, उसके मतमें किसी वस्तुके अतीन्द्रिय न होनेसे उक्त अनुमानमें दिया हुआ 'अतीन्द्रिय' विशेषण सिद्ध नहीं होता, अतः वैसे विशेषणसे गर्भित अनुमानसे शक्तिकी सिद्धि कैसे हो सकती है ? यदि कहा जाय कि जैसे हमारा चक्षु