भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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शाक्तागम मतके अनुयायियोंकी दृष्टिसे अत्यन्त अन्तर्मुख होकर शक्ति शिवस्वरूप ही रहती है। वेदान्तकी दृष्टिसे सर्वोपाधिविनिर्मुक्त स्वप्रकाश चिति ही रहती हैं। वे ही परब्रह्म, आत्मा आदि शब्दोंसे लक्षित होती हैं। शक्ति का खण्डन भगवतीका ही शक्तिस्वरूपसे भी आराधन होता है। हर एक कार्यकी उत्पादनानुकूल शक्ति उसके कारणमें होती है। कार्यके अनन्त होनेसे वह शक्ति भी अनन्त है— 'शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः।' शक्तिके सम्बन्धमें तार्किकोंका कहना है कि 'कोई प्रमाण न होनेसे स्वरूप सहकारिमेलनके अतिरिक्त 'शक्ति' नामका कोई पदार्थ नहीं है। स्फोटादिरूप कार्यकी अन्यथानुपपत्तिको शक्तिमें प्रमाण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जब प्रतिबन्धकाभाव आदि सहकारीसे सहकृत अग्न्यादिके स्वरूपसे ही स्फोटादिरूप कर्मोपपत्ति हो जाती है, तब अतीन्द्रिय शक्तिकी कल्पना करना व्यर्थ है। अभावकी अकारणता होनेसे प्रतिबन्धकाभावको सहकारी मानना ठीक नहीं है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अभावको कारण माननेमें न तो अन्वय-व्यतिरेकित्वमें कोई बाधा पड़ती है, न किसी अनिष्टकी प्रसक्ति ही होती है। भावकी तरह अभावका भी कार्यसे अन्वय- व्यतिरेक दृष्ट है और अभावकी प्रमितिमें योग्यकी अनुपलब्धि एवं विभ्रममें विवेकाग्रहकी हेतुता भी स्पष्ट ही है। यदि कहा जाय कि क्या प्रतिबन्धकका प्रागभाव कारण है या उसका प्रध्वंसाभाव, तो दोनोंकी कारणता नहीं बनती, क्योंकि उत्तम्भकको प्रतिबन्धकके पास ले जानेपर प्रतिबन्धकके रहनेपर भी प्रागभावके बिना ही कार्योत्पत्ति देखी जाती है, अतः प्रागभावको कारण नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार प्रतिबन्धककी अनुदयदशामें भी अर्थात् उसका प्रागभाव रहनेपर भी कार्योत्पत्ति होती है, अतः प्रध्वंसाभावकी भी कारणता नहीं कही जा सकती। परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि उत्तम्भक मणि, मन्त्र आदिके अभावसे सहकृत ही प्रतिबन्धक वस्तुतः प्रतिबन्धक होता है, न कि केवल मणि आदि। अतः वहाँ प्रतिबन्धकसे सहकृतकी ही कारणता होनेसे उक्त दोष नहीं रह जाता। सर्वत्र प्रतिबन्धक-संसर्गा- भावविशिष्टकी ही कारणता मानी गयी है, अतः अनियतहेतुकत्वदोष भी नहीं कहा जा सकता। अन्यथा उपलब्धिमें भी उपलब्धिके प्रागभाव एवं प्रध्वंसाभावके विकल्पसे अभावप्रमितिकी अनियतहेतुकता दुष्परिहार्य होगी। शक्तिपक्षमें भी अप्रतिबद्ध ही शक्तिको कारण माननेसे अभावविकल्पसे उत्पन्न दोष एवं उसका परिहार तुल्य है। 'प्रतिबन्धो विसामग्री तद्धेतुः प्रतिबन्धकः।' इस कुसुमांजलिके वचनानुसार सामग्री-वैकल्य प्रतिबन्ध है और उसका हेतु प्रतिबन्धक है। यहाँ प्रतिबन्धपक्ष प्रतिबन्धकाभावके कारण होने और कारणापेक्ष ही प्रतिबन्धकाभावके प्रतिबन्ध होनेके कारण अन्योन्याश्रयग्रस्त होनेसे यदि कहा जाय कि 'प्रतिबन्धके अभावमें कारणता मानना ठीक नहीं है,' तो यह अनुचित है, क्योंकि अभावकी कारणता मानकर ही कार्यानुदयमात्रसेही मन्त्रादिमें कार्य- प्रतिकूलताका बोध होता है और मणि, मन्त्रादिमें कार्यकी प्रतिबन्धकताका निर्धारण किये बिना ही मन्त्रादिके अभावमें अन्वय-व्यतिरेकसे ही कारणताका निश्चय होता है। इसके अतिरिक्त यह भी विचारणीय है कि अन्योन्याश्रयत्व उत्पत्ति या ज्ञप्तिमें हुआ करता है। यहाँ मन्त्र एवं तद्भाव (प्रागभाव)-की परस्परहेतुता न होनेसे अज्ञात भी मन्त्र तथा तदभावकी कार्यके प्रति प्रतिकूलता एवं कारणता होनेसे दोनों प्रकारका अन्योन्याश्रय नहीं है। यदि कहा जाय कि 'कार्याभावसे मन्त्रादि कारणाभावरूप माने जाते हैं, अतएव मन्त्रादिका अभाव भी कारण माना जाता है। इस प्रकार मन्त्र