भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 499, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें३।१४।१) इत्यादि श्रुतिके अनुसार सब कुछ चिन्मात्र ब्रह्म ही है तथापि भक्तोंके चित्तावलम्बनके लिये अनेक प्रकारके स्वरूपोंका उपदेश किया गया है। मलिन, शुद्ध, शुद्धतर, शुद्धतम आदि उपाधियोंका उपदेश किया गया है। जैसे पात्र, मणि, कृपाण,
Right column: दर्पणादिमें शुद्धिके तारतम्यसे प्रतिबिम्बित-प्रतिफलनमें तारतम्य होता है, वैसे ही उपाधियोंके तारतम्यसे ब्रह्मके प्रसाद, प्राकट्यमें भी तारतम्य होता है। इसी अभिप्रायसे विभूतियोंकी उत्कृष्टा, उत्कृष्टतरता आदिका व्यवहार शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है। एक-एक गुणोंकी अपेक्षा गुणोंकी साम्यावस्था उत्कृष्ट है। इसीलिये भगवतीकी उपासना परमोत्कृष्ट है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मका प्रथम सम्बन्ध मायाके ही साथ है। गुणोंका सम्बन्ध मायाद्वारा है। इसीलिये साम्यावस्थामें ब्रह्मका अव्यवहित सम्बन्ध है। अतएव 'सूतसंहिता' में कहा गया है—