भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
४९२ भक्तिसुधा इन्द्रिय होनेके कारण गुरुत्वजातिविषय नहीं है, वैसे ही योगीका चक्षु इन्द्रिय होनेके कारण गुरुत्वजातिविषय न होगा।' इस अनुमानसे अतीन्द्रियकी सिद्धि करके पूर्वोक्त अतीन्द्रियसामान्यगर्भित अनुमानद्वारा शक्तिसिद्धि हो जायगी, तो यह भी उचित नहीं, क्योंकि वहाँ यह शंका होगी कि ऐसा अनुमान करनेवालेकी दृष्टिमें योगीन्द्रिय प्रसिद्ध है या अप्रसिद्ध? यदि अप्रसिद्ध है, तो योगीको न माननेवाले मीमांसककी दृष्टिमें आश्रयासिद्धि होगी। यदि प्रसिद्ध है, तो धर्मिग्राहक प्रमाणका बाध होगा अर्थात् अस्मदादिकोंके इन्द्रियसे विलक्षण योगीन्द्रियको ग्रहण करता हुआ प्रमाण ऐन्द्रियक-अतीन्द्रियक साधारण ही उसका ग्रहण करायेगा, अतः उस प्रमाणसे गुरुत्वजातिविषयत्वाभावरूप साध्यका बोध हो जायगा। यदि उस अतीन्द्रिय विशेषणको अस्मदादिके अभिप्रायसे मानें, तो भी काम न चलेगा, क्योंकि जब परमाणुको जानता हूँ, आकाशको जानता हूँ, ऐसा अनुव्यवसाय होता है, तब परमाणु और उसका ज्ञान मानसप्रत्यक्षरूप अनुव्यवसायका विषय होता है। इस तरह सभी वस्तु ऐन्द्रियकज्ञानविषय बन जानेसे अस्मदादिकी दृष्टिसे भी अतीन्द्रियत्व अप्रसिद्ध ही रहता है और इस तरह पूर्वोक्त दोष ज्यों-का-त्यों रहनेसे उक्त अनुमानसे शक्तिसिद्धि नहीं हो सकती। यदि उस अनुमानमें, अनुव्यवसायातिरिक्त अस्मदादि ऐन्द्रियकबुद्धिके अगोचर होनेके आशयसे वह अतीन्द्रियत्वरूप विशेषण है, ऐसा कहें, तो भी ठीक नहीं, क्योंकि अन्यप्रमाणसे उपनीत विशेषणावगाहि- विशिष्टज्ञान माननेवालेके मतमें सभी पदार्थोंकी ऐन्द्रियकता सम्भव होनेसे पूर्वोक्त दोष ज्यों-का-त्यों रह जाता है अर्थात् जिनके मतमें ‘सुरभिचन्दनम्’ इत्यादि विशिष्ट ज्ञान प्रमाणान्तर घ्राण आदिसे उपनीत गन्धादिको भी विषय कहते हैं, उनके मतमें यत्किंचित् प्रत्यक्षार्थ विशेषण होनेसे सभी पदार्थ ऐन्द्रियकबुद्धिबाध्य हो सकते हैं, अतः अप्रसिद्ध विशेषणता उक्त अनुमानमें तदवस्थ ही है। यदि पूर्वोक्त— 'अग्निः अतीन्द्रियसामान्यवन्निष्क्रियाश्रयः कारण- त्वाद् गुरुत्वाश्रयवत्।' —इस अनुमानमें विशिष्टज्ञान एवं अनुव्यवसायके अतिरिक्त अस्मदादि ऐन्द्रियकबुद्धिका अविषयत्व ही अतीन्द्रिय माना जाय, तो वहाँ फिर यह शंका हो सकती है कि इस अनुमानमें 'आश्रय' पदसे जो आधाराधेयभाव विवक्षित है, वह संयोगिरूपसे विवक्षित है या समवायिरूपसे? यदि संयोगिरूपसे, तो गुरुत्वाश्रयके दृष्टान्तमें साध्यवैकल्य होता है। यदि 'आश्रय' पदका अर्थ समवायी मानें, तो समवायको न माननेवाले मीमांसकभट्टके मतमें उक्त विशेषण ही अप्रसिद्ध होनेसे वह अनुमान नहीं बन सकेगा और वह्निमें स्थितिस्थापक संस्कारसिद्धि होनेसे सिद्धसाधनता भी होती है। यदि कहा जाय कि सिद्धसाधनताके अस्तित्वमें कोई प्रमाण न होनेसे क्यों मानें ? तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसके अस्तित्वमें— 'विमतः स्थितिस्थापकसंस्कारवान् रूपव- त्त्वात् कटवत्।' यह अनुमान विद्यमान है। इस अनुमानको स्थितिस्थापककार्यवत्त्वरूप उपाधिसे दूषित भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उपाधिकी साध्यव्यापकता होनी आवश्यक है, किंतु उत्पन्न होते ही नष्ट हो गये, कटादिमें स्थितिस्थापकरूप कार्यका उपलम्भ न होनेपर भी यहाँ तथाविध संस्कारका अभ्युपगम होनेसे साध्याव्याप्ति रहती है। अपि च जो मीमांसक अपने सिद्धान्तानुसार सिद्धसाधनता कह रहा है, उसको सैकड़ों अनुमानोंसे भी स्वसिद्धान्तसे किस तरह प्रच्युत किया जा सकता है और कैसे उसके साधनतासिद्ध इस अभिधानको प्रत्युद्धृत किया जा सकता है? यदि इस प्रकार स्वसिद्धान्तके अनुरोधसे सिद्धसाधनता माननेवालेकी अनुमानोंद्वारा तदीय सिद्धान्तसे प्रच्युति अशक्य होने और सिद्धसाधनताके अपरिहार्य होनेसे स्वाभिप्राय- सिद्ध्यर्थ पूर्वोक्त अनुमानगत 'अतीन्द्रियसामान्य-
वन्निष्क्रियाश्रय' में 'स्थितिस्थापकेतर' यह विशेषण जोड़कर दूषणका परिहार किया जाय, तो भी प्रभाकरके मतमें—जो कि कर्मकी अप्रत्यक्षता मानते हैं—कर्मसे अर्थान्तरतापत्ति होगी; क्योंकि उनके मतमें अप्रत्यक्ष एवं निष्क्रिय कर्ममें अतीन्द्रिय सामान्यवत्वादिरूप साध्य विद्यमान ही है। किंतु यह ठीक नहीं है, फिर जो भी कादाचित्क होता है, वह स्वाश्रयातिशयपुरःसर देखा गया है, जैसे संयोग-विभागजन्य कार्य संयोग- विभागरूप स्वाश्रयातिशयपुरःसर होता है। इस व्याप्तिसे कादाचित्क होनेके कारण संयोग-विभागमें भी स्वाश्रयातिशयपुरःसरत्वका अनुमान किया जाता है। जो यह अतिशय है, वह कर्म है, ऐसा माननेवाले प्रभाकरके मतमें कर्मसे अर्थान्तरता होती ही है और वहि भी अतीन्द्रियसामान्यवन्निष्क्रिय कर्माश्रय ही है। अनुमानका 'कारणत्वात्' यह हेतु शक्तिसे अनेकान्त है। यदि कहा जाय कि नहीं, शक्ति भी साध्यवान् होनेसे उससे अनेकान्तता नहीं है, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि शक्तिमें भी यदि शक्त्यन्तर मानें तो अनवस्थाकी प्रसक्ति होगी। यह कहा जाय कि जन-शक्तियुक्त ही अर्थात् शक्तिमान् ही यहाँ कारणत्वेन विवक्षित है, अतः शक्तिमें अनैकान्तिकता नहीं है, तो यह कथन भी उपयुक्त नहीं है; क्योंकि विशेषणीभूत शक्तिके बिना सिद्ध हुए शक्तियुक्ततारूप कारणत्व ही सिद्ध नहीं हो सकता। यदि प्रमाणान्तरसे विशेषणीभूत शक्तिकी सिद्धि करना हो, तो फिर इसके लिये इतने प्रपंचकी क्या आवश्यकता थी? साथ ही गुण आदिमें अनेकान्तता भी आती है। जैसे कि—द्रव्य गुण और कर्ममें ही सामान्य रहता है। वहाँ निष्क्रियत्वरूप विशेषण होनेसे यद्यपि द्रव्याश्रयत्व नहीं आता, क्योंकि सावयव होनेके कारण आश्रित द्रव्य सक्रिय है तथापि गुण और कर्म, इन दोनोंकी अन्यतराश्रयता तो होगी ही और वे दोनों भी द्रव्यलक्षण या द्रव्यत्वव्याप्त हैं, अतः गुणादिमें भी द्रव्यत्वकी प्रसक्ति होगी ही। ऐसा न हो, इसलिये वहाँ तद्रहितत्व कहना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त उसमें कारणत्व होनेसे वह अनैकान्तिक है अर्थात् गुणादिमें यथोक्त शक्त्याश्रयत्व उपपन्न नहीं होता। यदि उपर्युक्त अनुमानको त्यागकर शक्तिसिद्ध्यर्थ 'विवादाध्यासितः स्फोटः उभयवादिसम्प्रतिपन्न- स्फोटकारणातिरिक्तकारणजन्यः कार्यत्वाद् घटवत्' ऐसे अनुमानान्तरको स्वीकार करें; क्योंकि प्रतिवादीसे विप्रतिपन्न होनेके कारण उभयवादिसम्प्रतिपन्न कारणसे अतिरिक्त कारण तो प्रतिबन्धकाभाव होता है, अतः उससे अर्थान्तरता होती है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रतिवादिद्वारा असम्प्रतिपन्न प्रतिबन्धकाभावरूप कारणसे सिद्धसाधन होता है। यदि कहा जाय कि वहाँ भावजन्यरूप विशेषणके न होनेसे अर्थान्तरता नहीं है, तो यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भावजन्यरूप विशेषण होनेपर भी ईश्वरसे सिद्धसाधनता होगी; क्योंकि शक्तिवादी मीमांसक ईश्वरको स्वीकार नहीं करता। इस तरह यद्यपि सहजशक्तिमें न तो अर्थापत्ति और न अनुमान ही प्रमाण हो सकता है तथापि आधेय शक्तिमें 'व्रीहीन् प्रोक्षति, यूपं तक्षति, अग्नीनादधीत' इत्यादि आगम प्रमाण होनेसे तद्बलात् सहजशक्तिकी भी सिद्धि हो सकती है। 'व्रीहीन् प्रोक्षति' इत्यादि वाक्योंमें 'व्रीहीन्' इस द्वितीया श्रुतिसे—'ग्रामं गच्छति' इत्यादि वाक्योंमें जैसे 'ग्रामम्' इस द्वितीयासे ग्रामकी कर्मता अवगत होती है, वैसे ही—व्रीहि आदिकी कर्मता ज्ञात होनेसे यह निश्चित होता है कि उन व्रीह्यादिकोंमें प्रोक्षणादिजन्य कोई अतिशय है; क्योंकि वहाँ कोई अन्य दृष्ट फल दिखलायी नहीं पड़ता। शक्तिवादी उसी अतिशयको शक्ति मानते हैं। किंतु संस्कारसंज्ञक चेतनगत अदृष्टका अचेतन व्रीहि आदिमें समवाय नहीं हो सकता, अर्थात् आत्मगुण अदृष्ट अनात्मभूत व्रीह्यादिमें नहीं हो सकता। कदाचित् यह कहा जाय कि 'व्रीहीन्' इस द्वितीया श्रुतिसे एक तो व्रीहिकी संस्कार्यता बोधित होती है, दूसरे 'व्रीहि प्रोक्षणसे संस्कृत हुए' ऐसी प्रसिद्धि भी है, अतः व्रीहिगत
४९४ भक्तिसुधा संस्कारको चेतनगत मानना विरुद्ध है, परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि घटविषयक ज्ञानसे उत्पन्न संस्कार जैसे घटविषयक होनेसे, न कि घटाधार होनेसे घटसंस्कार कहा जाता है, वैसे यहाँ भी व्रीहिप्रोक्षणादिसे उद्भूत संस्कारकी भी व्रीहिविषयक प्रोक्षणादि क्रियासे उत्पन्न होनेमात्रसे तदीयत्व प्रतीतिकी उपपत्ति हो सकती है, अतः द्वितीया श्रुति या प्रसिद्धि व्रीह्यादिगत शक्तिकी साधिका न होनेसे कहना होगा कि शक्तिकी कल्पनामें कोई भी प्रमाण नहीं है। अतएव लीलावतीकारने भी कहा है कि विवादाध्यासित अग्न्यादि निजरूपमात्रसे सम्बद्ध अतीन्द्रियसापेक्ष नहीं है; क्योंकि प्रमाणद्वारा वैसा उपलभ्यमान नहीं होता। प्रमाणसे जो जैसा उपलब्ध नहीं होता, वह वैसा नहीं होता, जैसे नील पीतरूपमें उपलब्ध न होनेसे पीत नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि शक्तिका साधक कोई प्रमाण नहीं है। शक्ति-समर्थन परंतु यह कहना उचित नहीं है; क्योंकि शक्तिके अस्तित्वमें— परास्य शक्तिर्विविधा सर्गाद्या भावशक्तयः। इति श्रुतिस्मृतिमिता शक्तिः केन निवार्यते ॥ न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥ (श्वेताश्वतरोपनिषद् ६।८) ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्। (श्वेताश्वतरोपनिषद् १।३) य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद् (श्वेताश्वतरोपनिषद् ४।१) शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः। यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः॥ (विष्णुपुराण १।३।२) सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः। अचिन्त्यशक्तिश्च विभोर्विधाज्ञाः षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य॥ (वायुपुराण) इत्यादि सैकड़ों श्रुति-स्मृतियोंसे गीयमान शक्तिका अपह्नव किस तरह किया जा सकता है? उक्त वचनोंमें कार्य-कारणादि सहकारियोंके निरासपूर्वक शक्तिका प्रतिपादन है, अतः यह नहीं कहा जा सकता कि ये वचन स्वरूप सहकारिमात्रके प्रतिपादक हैं। शक्तिकी स्वरूपमात्रता भी नहीं हो सकती; क्योंकि वहाँ 'परा अस्य' इत्यादि षष्ठ्यन्त पदसे स्वरूपातिरिक्तताका प्रतिपादन किया गया है। 'अस्य शक्तिर्विविधाः', 'तास्तु शक्तयः' इत्यादि वचनोंसे उस शक्तिकी अनेकता श्रुत होनेसे उसे एकरूप ब्रह्म भी कहना ठीक नहीं है। उपक्रम, उपसंहार आदि लिंगसे ईश्वरस्वरूपकी निश्चायिका होनेसे उक्त श्रुति- स्मृतियोंको अर्थवाद भी नहीं कहा जा सकता। साथ ही नैयायिक आदिकोंने भी इन वचनोंको ईश्वर- स्वरूपपरक माना है, अतः उन्हें अर्थवाद बतलाना उचित नहीं है। फिर भी यदि किन्हीं तार्किकम्मन्यकी शक्तिके अस्तित्वमें उक्त आगम वचनोंसे ही सन्तोष न होकर वे अर्थापत्ति और अनुमानकी ही अपेक्षा रखते हों तो उनको अग्रिम अर्थापत्ति और अनुमानसे भी सन्तुष्ट किया जा सकता है। पीछे स्फोटादि कार्यकी अन्यथानुपपत्तिसे प्रथम अर्थापत्तिको दिखलाया ही जा चुका है। यदि उस सम्बन्धमें यह कहा जाय कि वहाँपर भी यह कहा गया था कि प्रतिबन्धकके अभावमें सहकृत ही अग्निस্বরূপसे कार्यकी उत्पत्ति होनेसे अन्यथा भी उपपत्ति होती है और प्रागभाव, प्रध्वंसाभावादि विकल्पसे अभावकी अकारणता भी नहीं कही जा सकती; क्योंकि अप्रतिबद्ध ही शक्तिमें भी कारणता बन सकनेसे उसमें भी उक्त प्रसंग समान ही है। परंतु उसपर यह कहना है कि क्या इस प्रकारका यह एक प्रतिकूल तर्कमात्र है कि यदि प्रतिबन्धकाभाव कारण न हो तो शक्ति भी कारण न होगी अथवा शक्ति कारण है, अतः प्रतिबन्धकाभाव
भी कारण है, इस तरह विपर्ययमें पर्यवसान होनेसे अभावका कारणत्व सिद्ध किया जा रहा है ? पहली बात नहीं कही जा सकती, क्योंकि केवल तर्कसे उपालम्भ नहीं किया जा सकता, उसका विपर्ययमें भी पर्यवसान होना चाहिये, अन्यथा वह तर्काभास हो जाता है और ऐसे तर्काभासद्वारा प्रतिपक्षका निराकरण नहीं किया जा सकता। दूसरी बात भी संगत नहीं है; क्योंकि जो शक्तिका अंगीकार नहीं करता, वह उक्त रीतिसे प्रतिबन्धकाभावमें कारणता दिखलाते हुए विपर्ययमें पर्यवसान कैसे कर सकता है ? तर्क दो प्रकारका होता है—एक स्वपक्ष- साधकानुकूल और दूसरा प्रतिपक्षदूषक। पहलेमें विपर्यय पर्यवसानकी अपेक्षा हुआ करती है, अन्यथा साधनानुकूलत्व सिद्ध नहीं होता। दूसरेमें उसकी अपेक्षा नहीं होती, वहाँ परमतासिद्ध व्याप्तिसे ही परपक्षकी अनिष्ट सिद्धि की जा सकती है। यहाँ भी यही स्थिति मानकर यदि यह कहा जाय कि परासिद्ध शक्तिसे परपक्षका अनिष्टसाधन किया जा रहा है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जो ऐसा मानता है कि प्रमितमें अर्थात् अधिकरणमें प्रमित प्रतियोगिक ही निषेध होता है, न कि अप्रमितप्रतियोगिक, वह— 'यदि प्रतिबन्धकाभाव कारण न हो तो शक्ति भी कारण न होगी, इस तरह शक्तिकी कारणताका निषेध नहीं कर सकता; क्योंकि शक्ति और उसकी कारणता, दोनों अप्रमित हैं। यदि उन्हें प्रमित कहें तो स्वरूपसे उनका निषेध नहीं किया जा सकता। तात्पर्य यह हुआ कि भले ही यहाँ तर्कका भी पर्यवसान विपर्ययमें न हो, पर शक्तिकारणत्वका निषेध ही नहीं सिद्ध किया जा सकता। फिर भी जल्पकथा छोड़कर यदि सुहृद्भावसे कोई यह पूछे कि प्रतिबन्धभाव यदि कारण न हो तो प्रतिबन्ध रहनेपर भी शक्ति कार्यको क्यों न उत्पन्न करेगी ? तो इसका उत्तर यह है कि शक्तिवादीके मतानुसार प्रतिबन्धक वह कहा जाता है, जो पुष्कल कारण रहते हुए भी कार्योत्पत्तिका विरोधी हो। अतः वह यह नहीं कहा जा सकता कि सामग्रीवैकल्यसे कार्यका उदय नहीं हुआ, अपितु यही कहना होगा कि विरोधी रहनेसे ही कार्योदय नहीं हुआ। लोकप्रसिद्ध विरुद्ध होनेसे सामग्रीवैकल्यको ही प्रतिबन्ध नहीं कहा जा सकता। कोई भी लौकिक पुरुष भूमि, वायु, जल एवं तेजके संसर्गसे विरहित कोठीमें भरे हुए बीजोंको या तुरी, वेमा, कुविन्द आदिसे विरहित पेटीमें रखे हुए तन्तुओंको प्रतिबद्ध नहीं समझता। सामग्रीराहित्यमात्रको यदि प्रतिबन्ध कहा जाय तो समस्त कारणोंकी केवल प्रतिबन्धभावमें ही उपक्षीणता हो जानेसे यह इस कारण है, यह प्रतिबन्धाभाव है—इस तरह परीक्षकोंके विभक्तरूपसे दोनोंका विशेषावधारण ही न होना चाहिये। अभावको कारण न माननेपर कार्यके साथ अन्वय-व्यतिरेक विरोध होगा, यह कथन भी असंगत होगा; क्योंकि अन्वय-व्यतिरेक कार्य-प्रतिबन्धकाभावके विषय होनेसे प्रतिबन्धकाभाव अन्यथा सिद्ध है। यहाँ यदि यह कहा जाय तो फिर अनुपलब्धि भी अभावके उपलम्भकी हेतु नहीं हो सकती; क्योंकि विरोधिनीभावोपलब्धिका अभाव होनेसे उनके अन्वय- व्यतिरेकको भी अन्यथासिद्ध कहना सहज है, तो यह भी उचित नहीं है, क्योंकि वहाँ कारणान्तर न होनेसे अगत्या अनन्यथासिद्ध अनुपलब्धिको कारण मानना पड़ा है, किंतु यहाँ ऐसी बात नहीं है। यहाँ उसके बिना अभावोपलम्भके कारणका निरूपण नहीं किया जा सकता। इन्द्रियको ही यदि अभावोपलम्भका कारण कहें तो भी ठीक नहीं; क्योंकि उसके अभावमें सन्निकर्ष न होगा। वहाँ संयोग तथा समवायका अभाव होने और सम्बन्धान्तरगर्भ ही विशेषण-विशेष्यभावके प्रत्यक्षांग होनेसे वहाँ अभाव प्रत्यक्षगम्य नहीं, अपितु अनुपलब्धिगम्य ही है। अन्यथा 'पर्वतो वह्निमान्' यहाँ संयुक्त विशेषण होनेके कारण अग्निका भी प्रत्यक्षत्व होने लगेगा।
४१६ भक्तिसुधा यदि यह कहा जाय कि 'असम्बद्ध ही अभाव इन्द्रियग्राह्य हो तो क्या हानि है; क्योंकि उसकी प्रतीति इन्द्रियान्वय-व्यतिरेककी अनुविधायिनी होनेसे अपरोक्ष है और इसके अतिरिक्त दूसरी गति भी नहीं है' तो यह कहना भी उचित नहीं है; क्योंकि अयोगिप्रत्यक्षकी प्रमितिमें इन्द्रियोंसे सम्बद्ध अर्थग्राहकत्व-नियमका निराकरण नहीं किया जा सकता और अभावकी प्रतीतिका अपरोक्षत्व सिद्ध न होनेसे इन्द्रियान्वय और व्यतिरेक अधिकरणके ग्रहणमात्रमें उपक्षीण हो जानेसे अन्यथासिद्ध भी हो जाते हैं। इसपर यह कहा जा सकता है कि 'नहीं, अधिकरणके ग्रहणमात्रमें अन्वय-व्यतिरेककी उपक्षीणता कहना ठीक नहीं है; क्योंकि अभावको इन्द्रियग्राह्य न माना जायगा' तो अन्धद्वारा त्वगादिसे घटादिरूप अधिकरणके गृहीत होनेपर उसको रूपाभावकी प्रतीति मान लेना पड़ेगा; क्योंकि अधिकरण तो उस अन्धसे गृहीत ही है। यदि कहें कि 'चक्षुरिन्द्रियके न होनेसे वहाँ अन्धेको रूपाभावका प्रत्यक्ष न होगा' तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि इन्द्रिय अभावका ग्राहक है ही नहीं, अतएव यह कहा जाय कि 'अन्धेको प्रतियोगी ग्राहक इन्द्रिय न होनेसे ही रूपाभावकी प्रतीति न होगी। तथा च अभावकी ऐन्द्रियकत्वसिद्धि हो जाती है।' परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि फिर अभावको प्रतियोगिग्राहक इन्द्रियग्राह्य माननेवालेके मतमें भी अनन्धको भी असन्निहित मेरु आदिमें घट एवं उसके रूपादिके अभावकी चाक्षुषता क्यों न होगी? यदि कहा जाय कि 'वहाँ प्रतियोगीके चाक्षुष होनेपर भी अधिकरणके चाक्षुष न होनेसे रूपाभावका चाक्षुषत्व नहीं होता' तो इधरसे भी कहा जा सकता है कि इसीलिये त्वगिन्द्रियसे गृहीत घटादिमें अन्धेको रूपाभावकी प्रतीति नहीं होती; क्योंकि प्रतियोगिग्राहक इन्द्रियद्वारा घटादिरूप अधिकरणका वहाँ ग्रहण नहीं होता। यदि कहा जाय कि 'तब तो घ्राणेन्द्रियके अगोचर कुसुमादि या चक्षुरिन्द्रियग्राह्य वायुमें गन्ध या रूपके अभावका प्रत्यक्ष न होगा' तो इसपर यही कहना होगा कि भले न हो, वहाँ वायु आदिमें रूपादिका अभाव चाक्षुष न होनेपर भी उनमें रूपाभाव ज्ञानरूप व्यवहारमें कोई बाधा नहीं पड़ती। षष्ठ प्रमाणवादियोंके यहाँ सर्वत्र यह नियम नहीं है कि अभाव अनुपलब्धिगम्य ही है; क्योंकि व्यापकाभावसे व्याप्यके अभावको और कारणाभावसे कार्याभावको अनुमेय मान लिया गया है अर्थात् यदि वक्ष्यमाण तत्तत् भट्टपादादि वृद्धोंकी सम्मतिसे अभावकी प्रमाणान्तरगम्यता भी है तो योग्यानुपलब्धिगम्यस्थलमें ही प्रतियोगिग्राहकद्वारा अधिकरणके ग्रहणका नियम है; क्योंकि अभावकी उपलब्धिका व्यापकीभूत जो अनुपलब्धि आदि कारण है, उसके अतिरिक्त इन्द्रियादिरूप कारणकी पुष्कलता ही योग्यता है और इन्द्रियके उसका अन्तःपाती होनेके कारण उसके अभावमें भी योग्यता न बनेगी। जहाँ प्रमाणान्तरगम्यता होती है, वहाँ उसके बिना भी अभावका ग्रहण हो सकता है, जैसे व्यापकाभावसे व्याप्याभावका अनुमान। इस विषयमें भट्टपाद लिखते हैं कि अग्नि और धूमरूप भावके नियम्यत्व-नियन्तृत्व जैसे माने जाते हैं, वे ही नियम्यत्व और नियन्तृत्व अग्नि-धूम-सम्बन्धी अभावके विपरीत प्रतीत होता है। भावावस्थामें धूम नियन्ता और अग्नि नियम्य होता है और अभावमें इसके विपरीत स्थिति होती है अर्थात् तब धूमाभाव नियम्य और अग्निका अभाव नियन्ता होता है— नियम्यत्वनियन्तृत्वे भावयोर्यादृशी मते। विपरीते प्रतीयते त एव तदभावयोः ॥ कारणाभावसे कार्याभावके अनुमान विषयमें श्रीमण्डनमिश्रने ब्रह्मसिद्धिमें बतलाया है कि हेतुके अभावसे फलाभावका नियम होनेसे दोषाभावसे विपर्ययाभावका अनुमान किया जा सकता है— 'विपर्ययाभावस्तु युक्तोऽनुमातुं हेत्वभावे फलाभाव इति।' अतएव स्थलविशेषमें अनन्यथा सिद्धि अन्वय- व्यतिरेकबलसे अनुपलब्धिकी अभाव-प्रतीतिमें कारणता
श्रीभगवती-तत्त्व ४१७ निश्चित होती है। प्रकृतमें स्वपुष्कल कारणसे कार्योत्पत्ति हो सकती है, तब प्रतिबन्धकाभावको कारण मानना आवश्यक नहीं है और इस मतमें अन्योन्याश्रयताका वारण करना भी कठिन होगा। यद्यपि मण्यादिकी कार्यप्रतिकूलताका निश्चय अन्वय-व्यतिरेकसे हो सकता है तथापि विसामग्रीरूपता लक्षणप्रतिबन्धत्व तदीय अभावकी सामग्रीके अन्तर्भाव विज्ञानके सापेक्ष है; क्योंकि विसामग्री प्रतिबन्ध है, यह मान्य है। अतः प्रतिबन्धत्व और सामग्रीत्वका ज्ञान परस्पर सापेक्ष होनेसे अन्योन्याश्रयता दुर्निवार होगी, अर्थात् वैसामग्र्य ही प्रतिबन्ध है और प्रतिबन्धाभावरूप कारण-वैकल्य ही वैसामग्र्य है। ऐसी स्थितिमें मणि आदिके वैसामग्र्यरूप प्रतिबन्धत्वका ज्ञान मन्त्रादि सम्बन्धी अभाव सामग्रीका अन्तर्भाव ज्ञानसापेक्ष है और मन्त्रादिके अभावका सामग्र्यन्तर्भाव ज्ञान, मणि आदिके प्रतिबन्धत्व ज्ञानके अधीन है; क्योंकि प्रतिबन्धाभावरूप कारण-वैकल्यसे वैसामग्र्यका उपपादन होगा, अतएव अन्योन्याश्रयता सुतरां सिद्ध है। यदि कहा जाय कि 'मण्यादिके विसामग्रीत्वका ज्ञान भले ही मण्याद्यभाव-सम्बन्धी सामग्रीके अन्तर्भाव ज्ञानके सापेक्ष रहे, पर वह्निस्वरूपकी तरह अन्वय- व्यतिरेकसे ही मण्यादिके अभावकी सामग्र्यन्त- र्भाव-सम्बन्धी अवगति हो सकती है, अतः अन्योन्या- श्रयता न होगी' तो यह ठीक नहीं; क्योंकि वहाँ यह शंका होगी कि क्या प्रत्येक मण्याद्यभाव अन्वय- व्यतिरेकद्वारा कारणरूपसे निश्चित किये जाते हैं या प्रतिबन्धाभावरूप उपाधिसे क्रोड़ीकृत होकर ? पहली बात हो नहीं सकती; क्योंकि मण्याद्यभाव अनन्त हैं, उनके उपसंग्राहकके बिना प्रत्येकके अन्वय-व्यतिरेकका निश्चय सौ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता। दूसरा पक्ष मानें तो विसामग्रीरूप प्रतिबन्धज्ञानके अधीन प्रतिबन्धाभावत्वरूप उपाधिका ज्ञान हुए बिना मण्याद्य- भाव-सम्बन्धी सामग्र्यन्तर्भावका ज्ञान होना कठिन है, अतः अन्योन्याश्रयताका निराकरण फिर भी बना ही रहेगा, इसलिये द्वितीय पक्ष भी अस्वीकार्य है। शक्ति पक्षमें प्रतिबन्धकी जो असम्भवता पीछे कही गयी, वह भी ठीक नहीं है, अन्यथा शक्तिको न माननेवालोंको भी कारणोंके कार्योदासीन्यको ही प्रतिबन्ध मान लेना पड़ेगा; क्योंकि वैसामग्र्यरूप प्रतिबन्धका तो उपर्युक्त अन्योन्याश्रय दोषरूप रीतिसे खण्डन किया ही जा चुका है। अतः प्रतिबन्धाभावके कारण न बननेसे कार्यार्थापत्तिकी बिना शक्तिको स्वीकृत किये, अन्यथा उपपत्ति हो ही नहीं सकती। शक्तिको स्वीकार किये बिना उपादानोपादेयभाव- नियमकी उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः उसे भी शक्तिमें प्रमाण मानना ही चाहिये। वहाँ स्वभावभेदसे ही उपपत्ति करके जो पहले अन्यथा उपपत्ति कही गयी थी, उसका अभिप्राय क्या है ? क्या शक्तिवादीको भी अन्ततोगत्वा जब स्वभावकी शरण लेनी ही पड़ती है, तब अच्छा है कि पहलेसे ही स्वभाव मान लिया जाय यह अथवा स्वभावातिरिक्त शक्तिमें प्रमाणका न होना। यदि प्रथम पक्ष तो वैसा माननेसे सर्वत्र स्वभाववादका पाद-प्रसार होनेसे सामान्य, समवाय एवं विशेष आदिका भी अपाकरण प्रसक्त हो जायगा। अनवस्था भय सत्तासे जैसे सत्तान्तर माने बिना ही स्वभाव-विशेषवश सद्द्व्यवहारका हेतुत्व मान लिया जाता है, वैसे ही अन्यत्र द्रव्यादिमें भी स्वभावविशेषसे सद्द्व्यवहार उत्पन्न हो जानेसे सत्तासामान्यका अपलाप हो जायगा। इसी तरह— 'समवायवान् अयं घटः।' यहाँ अनवस्था भयसे जैसे समवायान्तर माने बिना ही समवायकी घटके प्रति विशेषणता मान ली जाती है, वैसे ही 'शुक्लः पटः, चलति चैलाञ्चलम्' यहाँ भी गुण-कर्ममें स्वभाव-भेदसे ही विशेषण- विशेष्य भाव होकर समवायका अपलाप हो जायगा। इसी प्रकार जैसे अन्त्यविशेषोंमें स्वभाववशात् परस्पर व्यावृत्ति मानी जाती है, क्योंकि विशेषोंमें विशेषान्तर माननेसे उनकी भी, अनुगतरूपवत्तासे रूपादिकी तरह, एक तो अन्त्यविशेषत्वकी हानि होगी और दूसरे, अनवस्थाप्रसक्त होगी। अगत्या किन्हीं विशेषोंको
निर्विशेष माननेपर उन्हींको अन्त्यविशेष मानना पड़ता है, वैसे ही नित्य द्रव्योंको भी स्वभाववशात् व्यावृत्ति- बुद्धिजनकत्व होनेसे अन्त्यविशेषका अपलाप हो जायगा। इसी तरह कालादिका भी अपलाप प्रसक्त होगा। अतः स्वभावाश्रयणसे काम नहीं चल सकता। यदि स्वभावातिरिक्त शक्तिमें कहीं भी प्रमाण नहीं है, यह कहा जाय तो यह भी ठीक नहीं है। यदि कहा जाय कि जहाँ प्रमाण है, वहाँ-वहाँ वस्त्वन्तराधीन ही प्रमाण-व्यवहार हुआ करता है और जहाँ वह नहीं है, वहाँ उसके स्वभाव-भेदसे ही व्यवहार होता है, ऐसी व्यवस्था है तो यहाँ भी प्रमाण होनेसे ही स्वरूपसे अतिरिक्त शक्तिका अंगीकार कर लेना चाहिये, ऐसी स्थितिमें स्वभाववादका अवलम्बन अनावश्यक है। इस तरह अर्थापत्तिके अतिरिक्त— 'वह्निः अदृष्टातीन्द्रियस्थितस्थापकेतरभावाश्रयः गुणवत्त्वाद् घटवत्।' यह अनुमान भी शक्तिके अस्तित्वमें प्रमाण है। 'ईश्वर माननेवालोंके मतमें अतीन्द्रियता सिद्ध नहीं है', यह भी कहना ठीक नहीं; क्योंकि अतीन्द्रिय शब्दका अर्थ है प्रमाणान्तरसे उपनीत विशेषणके अतिरिक्त और अनुव्यवसायके अतिरिक्त अस्मदादि प्रत्यक्षका अविषय होना। वह अतीन्द्रियत्व गुरुत्वादि और भावनादिमें प्रसिद्ध होनेसे प्रशस्तपादने कहा है कि गुरुत्व, धर्माधर्म और भावना अतीन्द्रिय है— 'गुरुत्वधर्माधर्मभावना अतीन्द्रियाः।' यहाँ भावना पद स्थितिस्थापकका भी उपलक्षण है। प्रश्न हो सकता है कि 'यहाँ आश्रय शब्दसे आधारमात्र विवक्षित है या उसका समवायित्व? वह्नि कदाचित् परमाणु या वायुका आधार होकर सिद्धसाधनता होनेसे प्रथम पक्ष नहीं माना जा सकता। दूसरी बात भी नहीं कही जा सकती; क्योंकि समवाय न माननेवाले भाट्टके मतमें विशेषण अप्रसिद्ध हो जायगा।' परंतु ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि समवाय न मानते हुए भी स्वीय रूपादिके समान अयुत सिद्ध होनेके कारण अग्निकी विशिष्ट धर्माधारता ही आश्रय शब्दका अर्थ है। अतीन्द्रिय कर्माश्रय होनेसे मीमांसककी अर्थान्तरता कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि प्रभाकरकी तरह शक्ति माननेवाले भाट्ट और वेदान्ती भी कर्मकी अतीन्द्रियता नहीं मानते। विपक्षमें वह्निस्वरूप ही कारण होनेसे प्रतिबन्धके भावकी कारणताका पहले ही निराकरण किया जा चुका है, अतः मन्त्रादिके रहनेपर समान रूपसे कार्य-जननप्रसंग बाधक है। यह भी कहना ठीक नहीं कि 'एवंविध धर्माश्रय होनेसे गुण-कर्मादि भी द्रव्य कहे जायेंगे'; क्योंकि वे गुणके अधिकरण नहीं हैं। यदि कहा जाय कि 'एतादृश धर्माश्रय होनेसे गुणाधिकरण भी हो जाय' तो यह ठीक नहीं; क्योंकि इसका विपर्ययमें पर्यवसान नहीं होता। यदि कहा जाय कि 'जो गुणका अधिकरण नहीं है, वह एवंविध धर्मका अधिकरण नहीं होता, ऐसा प्रतिवादिसम्मत उदाहरण होनेसे उक्त प्रसंगका विपर्ययमें पर्यवसान हो जायगा; क्योंकि शक्तिके अतिरिक्त सभी पक्ष कोटिमें निक्षिप्त हैं।' इस तरह प्रथम अनुमानका समर्थन किया गया। अब यदि दूसरे अनुमानके सम्बन्धमें कहा जाय कि 'वेदान्ती ईश्वरको मानते हैं, इसलिये उभयवादिसम्मत होनेके कारण तदतिरिक्त न होनेसे ईश्वर अर्थान्तर न हो, पर ईश्वर न माननेवाले मीमांसकोंको तो ईश्वरसे अर्थान्तरता होती है' तो यह ठीक नहीं; क्योंकि जन्यभावसे जन्य ऐसा दूसरा विशेषण देकर भाट्टके मतमें अर्थान्तरका परिहार किया जा सकता है। यदि कहा जाय कि 'ऐसी स्थितिमें नित्य पदार्थोंमें शक्तिका समर्थन न किया जा सकेगा, तो यह भी उचित नहीं', क्योंकि अनित्य पदार्थोंमें शक्ति सिद्ध हो जानेपर उसी दृष्टान्तसे नित्य पदार्थोंमें भी शक्तिकी सिद्धि हो सकती है। शक्ति एक ही नहीं, अपितु प्रत्येक पदार्थमें भिन्न-भिन्न है। जैसे कि अवयवावयविमें अनित्य होनेपर भी जल, तेज आदिके परमाणुओंमें रूप जैसे
श्रीभगवती-तत्त्व ४९९ नित्य है, वैसे ही नित्य-अनित्यरूपसे शक्ति भी दो अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते प्रकारकी माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। आधेय जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ शक्तिको भी अप्रमाण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि (श्वेताश्वतरोपनिषद् ४।५) ‘व्रीहीन् प्रोक्षति’ इत्यादि द्वितीया श्रुतियोंसे व्रीहि अर्थात् जैसे कोई लोहित-शुक्लकृष्ण रंगकी आदिमें अतीन्द्रिय शक्तिका अस्तित्व सिद्ध होता है। कबरी बकरी अपने समान ही बहुत-से बच्चोंको ‘चेतन धर्म अदृष्टका अचेतन व्रीहि आदिमें उत्पन्न करती है, वैसे ही सत्त्व, रज, तम तीनों रहना सम्भव न होनेसे व्रीह्यादिविषयकक्रियाजन्यमात्र गुणोंवाली प्रकृति भी अपने समान ही त्रिगुण महदादि होनेसे ही तदीयत्वकी प्रतिपत्ति हो सकती है, अतः प्रपंचका निर्माण करती है। आवरणात्मक होनेसे वहाँ ‘व्रीहीन् प्रोक्षति’ में ‘ग्रामं गच्छति’ में प्रयुक्त उसका तमोगुण ही कृष्णरूप है, प्रकाशात्मक होनेसे ‘ग्रामम्’ इस द्वितीया विभक्तिके तुल्य व्रीहीन् द्वितीया सत्त्वगुण ही शुक्ल रंग है, रंजनात्मक होनेसे रजोगुण श्रुति गौण है, ऐसा जो कहा गया था, वह भी ठीक ही लोहित रंग है। जैसे कबरे बच्चोंवाली कबरी नहीं; क्योंकि धर्माधर्मरूप अदृष्टसे अतिरिक्त ही कोई बकरीका उपभोग करते हुए कोई बकरे उसका एक अतिशय मान्य है, जो तण्डुल, पिष्ट, पुरोडाशादि- अनुगमन करते हैं, कोई उससे भोग प्राप्तकर विरक्त परम्परासे प्रधानापूर्व उत्पन्न करता है। इसे न मानें होकर उसे त्याग देते हैं, वैसे ही कोई जीव महदादि अर्थात् व्रीह्यादि स्वरूपसे ही यदि उस प्रधानापूर्वको प्रपंचवती त्रिगुणा प्रकृतिका उपभोग करते हुए उसका उत्पन्न कर सकते तो प्रोक्षणादि विधान व्यर्थ हो अनुगमन करते हैं, कोई उससे भोगापवर्ग प्राप्त करके जायगा। दृष्ट फल न दिखलायी पड़नेपर अदृष्ट उसको त्याग देते हैं। यह अजा भी माया ही है। फलकी कल्पना करनी पड़ती है और मुख्य अर्थ ईश्वरको कोई भी कार्य करनेके लिये प्रकृतिकी सम्भव होनेपर लक्षणा करनेका अवकाश नहीं रहता। अपेक्षा होती है। इस प्रकार लीलावतीकारके दिये हुए दूषणका ‘प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥’ भी निराकरण किया गया। शक्तिके अस्तित्वमें उपर्युक्त (गीता ४।६) रीतिसे आगम, अर्थापत्ति और अनुमानरूप प्रमाणोंका अर्थात् ईश्वर अपनी प्रकृतिका ही सहारा लेकर संक्षिप्त दिग्दर्शन करनेसे यह नहीं कहा जा सकता अवतीर्ण होते हैं। ईश्वरकी अध्यक्षतामें प्रकृति ही कि किसी प्रमाणसे शक्ति सिद्ध नहीं होती। चराचर प्रपंचका निर्माण करती है- मायारूपिणी भगवती ‘मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।’ मायारूपमें भी उसी भगवतीके ही एक स्वरूपका (गीता ९।१०) वर्णन होता है- भगवान् स्वयं कहते हैं कि प्रकृति मेरी योनि ‘मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।’ है, उसीमें मैं गर्भाधान करके विश्वका निर्माण (श्वेताश्वतरोपनिषद् ४।१०) करता हूँ- अर्थात् मायाको ही विश्वकी प्रकृति समझना मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। चाहिये और मायाविशिष्ट ब्रह्मको ही परमेश्वर सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥ समझना चाहिये। उसीको अन्यत्र ‘अजा’ शब्दसे (गीता १४।३) निरूपित किया गया है- सम्पूर्ण प्राणियोंमें जो मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां उन सबकी प्रकृति ही जननी है और मैं बीज प्रदान बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः। करनेवाला पिता हूँ-
५०० भक्तिसुधा सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥ (गीता १४।४) गुणमयी प्रकृतिका अतिक्रमण बहुत ही कठिन है। अधिष्ठान ब्रह्मके साक्षात्कारसे ही उसका अतिक्रमण हो सकता है, अन्यथा नहीं— 'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।' (गीता ७।१४) भूतप्रकृतिको बाधित करके ही परप्राप्ति होती है— 'भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥' (गीता १३।३४) कहीं-कहीं अविद्याको 'क्षर' और विद्याको 'अमृत' कहा है— 'क्षरन्त्वविद्याऽमृतं तु विद्या विद्याऽविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः।' पुराणोंमें 'जो सृष्टिमें परमा है, वही प्रकृति है', ऐसा प्रकृतिका अर्थ किया गया है— 'प्रकृष्टवाचकः प्रश्च कृतिश्च सृष्टिवाचकः। सृष्टौ या परमा देवी प्रकृतिः सा प्रकीर्तिता॥' चतुष्कपर्दा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते। तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतु- र्यत्र देवा दधिरे भागधेयम्॥ —इस मन्त्रमें उसी भगवतीके अविद्यारूपका वर्णन है। माया स्थूल, सूक्ष्म, कारण और समाधिरूप तुरीय—इन चार रूपोंमें प्रकट होती है, युवती रहती है, सुपेशा—सुन्दर रूपवाली, घृतके समान प्रतीत होती है, ज्ञानोंको ढँकनेवाली है, जीव, ईश्वर दोनों ही उससे सम्बन्ध रखते हैं। तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽ- प्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्। तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्- पसस्तन्महिना जायतैकम्॥ इस वचनसे भी एक तत्त्वावरक तमके अस्तित्वका पता लगता है। सा च ब्रह्मस्वरूपा च नित्या सा च सनातनी। यथात्मा च तथा शक्तिर्यथाग्नौ दाहिका स्थिता॥ अतएव च योगीन्द्रैः स्त्रीपुम्भेदो न मन्यते॥ 'सर्वं ब्रह्ममयं जगत्' अहमेवासपूर्वन्तु नान्यत्किञ्चिन्नगाधिप। तदात्मरूपं चित्संवित्परब्रह्मैकनामकम्॥ आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्। अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं प्रसुप्तमिव सर्वतः॥ आदि वचनोंसे भी उसी तत्त्वकी सिद्धि होती है। माया और अविद्या मायाको ही कहीं-कहीं अविद्या और अज्ञान शब्दसे भी कहा गया है। यहाँ अज्ञान ज्ञानका अभावरूप नहीं, किंतु ज्ञाननिवर्त्य, भावरूप, अनिर्वचनीय पदार्थ ही है। तभी उसमें आवरणहेतुता बन सकती है। 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम् (गीता ५।१५)' इस वचनमें अज्ञानको ब्रह्मस्वरूप ज्ञानका आवरक कहा गया है। यह तभी बन सकता है, जब अज्ञान भी भावरूप हो; क्योंकि असत् किसीका आवरक नहीं हो सकता। जैसे अज्ञानको आवरक कहा गया है, वैसे ही मायाको भी आवरक कहा गया है— 'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७।२५) 'मैं' अर्थात् अस्मत्पदलक्ष्य परब्रह्म योगमायासे आवृत है, इसीलिये स्वप्रकाश होनेपर भी उसे लोग नहीं जानते। 'अहमज्ञः', 'मामहं न जानामि' इस रूपसे अज्ञानका प्रत्यक्ष अनुभव होता है। 'त्वामहं न जानामि' इस रूपसे भी अज्ञानका अनुभव होता है। यदि अज्ञान, ज्ञानाभाव ही हो, तब तो उसका ऐसा अनुभव ही न बन सकेगा; क्योंकि अभावके ग्रहणमें अनुयोगी-प्रतियोगी दोनोंके ग्रहणकी अपेक्षा होती है। जैसे घट और भूतलके ज्ञानके बिना भूतलनिष्ठ घटाभावका ज्ञान नहीं हो सकता, वैसे ही आत्मा और ज्ञानरूप अनुयोगी-प्रतियोगीके ज्ञानके बिना ज्ञानाभावका बोध भी नहीं हो सकेगा। यदि अनुयोगी-प्रतियोगीका ज्ञान स्वीकार न
किया जाय, तो भी ज्ञानाभावका ज्ञान नहीं हो सकता और यदि स्वीकार कर लिया जाय तो भी ज्ञानाभावका बोध नहीं हो सकता; क्योंकि जैसे भूतलमें एक भी घट होनेपर घटाभाव नहीं कहा जा सकता, वैसे ही एक भी ज्ञान रहे तो ज्ञानाभावका अनुभव नहीं कहा जा सकता। परंतु जब भावरूप अज्ञान मानते हैं, तब तो साक्षीसे उसका बोध हो जाता है। फिर अनुयोगी- प्रतियोगीके ग्रहणाग्रहणका कोई भी विकल्प नहीं उठता; क्योंकि भावरूप अज्ञान साक्षीके द्वारा प्रकाशित हो सकता है। यद्यपि भावरूप अज्ञानके प्रत्यक्षमें भी विशेषण या निरूपकरूपसे घटादि विषयका भान होना आवश्यक होता है, फिर उसके भी ज्ञान रहनेपर उसका अज्ञान नहीं कहा जा सकता और उसके ज्ञान न रहनेसे विशेषण ज्ञानके बिना विशिष्ट अज्ञानका अनुभव भी नहीं हो सकेगा तथापि साक्षीके द्वारा ही अज्ञान और उसके विशेषण घटादिका भी भान होनेसे किसी भी दोषकी प्रसक्ति नहीं होती। ज्ञानरूपसे सर्ववस्तु साक्षिभास्य होती है, यह निगमान्तविदोंका सिद्धान्त है— 'ज्ञाततया अज्ञाततया वा सर्वं वस्तु साक्षिभास्यम्।' 'घटो ज्ञात:' यहाँ जैसे ज्ञानका विषय होकर साक्षीद्वारा घट भासित होता है, वैसे ही 'घटो न ज्ञायते' यहाँ भी अज्ञानके विषयरूपसे घट साक्षीरूपमें भासित होता है। योगनिद्रा, जड़शक्ति, अचित्, अज्ञान, अविद्या, माया, प्रकृति इत्यादि सभी शब्द एक ही अर्थके बोधक हैं। 'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते' (श्वेता० ६।८) (परमात्माकी पराशक्ति विविध प्रकारकी सुनी जाती है) इत्यादि स्थलोंकी शक्ति भी तद्रूप ही है। 'शक्तिकी अन्तरंगता-बहिरंगता'—कुछ लोग इस शक्तिको अन्तरंगा और माया, प्रकृति आदिको बहिरंगा शक्ति कहते हैं। भगवल्लोक, भगवद्विग्रहादिमें अन्तरंगा दिव्य शक्तिका उपयोग मानते हैं। जगन्निर्माणमें माया, अविद्यादि बहिरंग शक्तिका उपयोग मानते हैं। कुछ लोग अचित्को प्राकृत-अप्राकृत भेदसे दो प्रकारका मानते हैं। प्राकृत अचित्से जगत्की और अप्राकृत अचित्से भगवल्लोकादिकी रचना मानते हैं। कुछ लोग जगन्निर्माण अथवा लीलामयके लीलोपयोगी पदार्थोंकी सृष्टिके लिये भगवत्स्वरूपभूत ही अघटितघटनापटीयान् भगवदीयस्वात्मवैभव स्वीकार करते हैं। वही परमात्मा अविकृतपरिणामद्वारा सर्वरूपमें व्यक्त होता है। जैसे कल्पवृक्ष, चिन्तामणि, कामधेनु आदिसे तत्तत् अभीष्ट पदार्थकी सृष्टि होनेपर भी वे निर्विकार रहते हैं, वैसे ही परमात्मासे भी विविध विश्व बननेपर भी परमेश्वर निर्विकार ही रहता है। विचार करनेसे मालूम होगा कि यह स्वात्मवैभव यदि भगवत्स्वरूप ही है, तब तो फिर पृथक् नामरूप कल्पनाकी अपेक्षा नहीं हो सकती, तब कृत्स्नप्रसक्ति, निरवयवत्वव्याकोपादि शंकाओंका समाधान भी न हो सकेगा। सम्पूर्ण ब्रह्म यदि प्रपंच बन जायगा, तब तो मुक्तोपसृप्य ब्रह्म अवशिष्ट न रहेगा। यदि एकदेशेन ब्रह्म विश्व बनेगा, तब तो सावयवत्व, विकारित्व आदि दोष अनिवार्य ही होंगे। कल्पवृक्षादिकोंकी विलक्षण शक्तिकी महिमासे ही तादृक् विलक्षण कार्यकारिता सिद्ध होती है। मायाकी अनिर्वचनीयता इस तरह स्वात्मवैभव अथवा अचित् किंवा अन्तरंगा शक्ति यदि अधिष्ठानसे पृथक् होकर सत् है, तब तो श्रुति-सिद्धान्त बाधित होगा। यदि अत्यन्त असत् है, तो कार्यकारिता न बन सकेगी। विरुद्ध होनेसे सदसद्रूपता भी नहीं कही जा सकती। फिर तो पारिशेष्यात् अनिर्वचनीय मानना होगा। इस तरह अवान्तर चाहे कितने भी भेद मान लिये जायें, परंतु अनिर्वचनीयत्वेन रूपेण उन सबकी एकता ही है। 'देवदत्तनिष्ठप्रमा तन्निष्ठप्रमाप्रागभावातिरिक्ता- नादिप्रध्वंसिनी प्रमात्वात्, यज्ञदत्तनिष्ठप्रमावत्।' अर्थात् देवदत्तनिष्ठ प्रमा अपने प्रमाके प्रागभावसे अतिरिक्त किसी अनादिकी प्रध्वंसिनी है, प्रागभावसे अतिरिक्त अनादि भावरूप अज्ञान ही हो सकता है, इस अनुमानसे भी अनादि अज्ञान सिद्ध होता है। इसीको
५०२ भक्तिसुधा 'तम आसीत्' इत्यादि श्रुतियोंमें तमोरूप भी माना गया है। इस तमको कण्ठतः अनिर्वचनीय कहा गया है— 'नासदासीन्नो सदासीत्तम एवासीत्' (न असत् था, न सत् था, किंतु तम ही था) यह सदसद्विलक्षणता ही अनिर्वचनीयता है। 'अनृतेन हि प्रत्यूढाम्' इत्यादि वचनोंसे तो इस आवरक तमको प्रत्यक्ष ही अनृत कहा है। 'ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।' (गीता ५।१६) 'मायामेतां तरन्ति ते॥' (गीता ७।१४) इत्यादि वचनोंसे माया, अज्ञान आदिकोंकी निवर्त्यता कहनेसे ही अनिर्वचनीयताका बोधन होता है। सत्की शक्तिरूप होनेसे भी इसकी अनिर्वचनीयता बोधित होती है; क्योंकि जैसे वह्निकी शक्ति वह्निरूप नहीं होती, किंतु वह्निसे विलक्षण होती है, वैसे ही सत्की शक्ति सद्रूप न होकर सत्से विलक्षण ही होती है। वह सद्विलक्षणता भी अनिर्वचनीयता है। इस प्रकार मायाकी अनिर्वचनीयता ही सिद्ध होती है।
तान्त्रिक दृष्टिमें शक्ति
तन्त्रोंके अनुसार प्रकाश ही शिव और विमर्श ही शक्ति है। संहारमें शिवका प्राधान्य रहता है, सृष्टिमें शक्तिका प्राधान्य रहता है। प्रभामें इदमंश ग्राह्य होता है, अहमंश ग्राहक होता है। माना यह जाता है कि भीतर वर्तमान पदार्थोंका ही बाह्यरूपमें अवभास होता है— वर्तमानावभासानां भावानामवभासनम्। अन्तःस्थितवतामेव घटते बहिरात्मना॥ प्रकृतिमें ही सूक्ष्मरूपसे सब वस्तुएँ स्थित हैं। परम शिव और शक्ति दोनों ही श्लिष्ट होकर रहते हैं। निस्पन्द परम प्रकाश चिद्धातु शिवतत्त्व है और विमर्शात्मक तत्त्व ही शक्तितत्त्व है। 'आसीज्ज्ञानमयो ह्यर्थः एकमेवाविकल्पितः।' अर्थात् ज्ञान और अर्थ दोनों ही अविकल्पित होकर एकमें रहते हैं, तब साम्यावस्था समझी जाती है।
प्रकृतिकी सत्ता
ज्ञानस्वरूप पुरुषकी सत्ता पारमार्थिक है, अर्थरूप प्रकृतिकी सत्ता अवास्तविक है। उसकी अविद्यमानताका वर्णन बहुत स्थानोंमें मिलता है। अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते। ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा॥ (श्रीमद्भा० ३।२७।४) अर्थके न रहनेपर भी संसृतिकी निवृत्ति नहीं होती, जैसे स्वप्नमें अर्थ न रहनेपर भी वह भासमान होता है, वही स्थिति अर्थकी है। विशेषतः मायाका यही लक्षण 'श्रीमद्भागवत' में किया गया है कि जिसके कारण कोई वस्तु न होनेपर भी प्रतीत हो अथवा वस्तु होती हुई भी न प्रतीत हो, वही माया है; जैसे स्वाप्निक प्रपंच, शुक्तिरूप्य, रज्जुसर्पादि पदार्थ न होनेपर भी भासमान होते हैं, तम-राहु आकाशमें विद्यमान रहनेपर भी नहीं भासित होते— ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः॥ (श्रीमद्भा० २।९।३३)
भगवती और मायाका वैलक्षण्य
शक्ति शब्दसे जैसे अचित् प्रकृतिके अतिरिक्त पराप्रकृतिरूप जीव और अधिष्ठानात्मक उपादानरूप ब्रह्म आदिका भी ग्रहण होता है, वैसे ही भगवती शब्दसे शुद्ध निर्गुण चिच्छक्तिका भी बोध होता है। इसीलिये उपासकोंकी उपास्यशक्ति या भगवतीको केवल प्रकृति या माया न समझना चाहिये, अपितु सच्चिदानन्दात्मिका भगवती ही उपास्य होती हैं।
रात्रिरूपिणी
रात्रिसूक्त रात्रिदेवताका प्रतिपादन करता है। रात्रिदेवता दो हैं, एक जीवसम्बन्धिनी, दूसरी ईश्वरसम्बन्धिनी। प्रथमका अनुभव सभी लोग करते हैं, जिसके सम्बन्धसे प्रतिदिन समस्त व्यवहार लुप्त हुआ करता है। ईश्वररात्रि वह है, जिसमें ईश्वरका व्यवहार भी लुप्त होता है, उसीको महाप्रलय कालस्वरूप कहा जाता है। उस समय दूसरी कोई भी
वस्तु नहीं रहती, केवल मायाशबलित ब्रह्म ही रहता है, उसे ही अव्यक्त भी कहा जाता है। 'ब्रह्ममायात्मिका रात्रिः परमेशलयात्मिका। तदधिष्ठातृदेवी तु भुवनेशी प्रकीर्तिता ॥' (देवीपुराण) ब्रह्ममायात्मिका रात्रिकी अधिष्ठात्री देवता ही भगवती भुवनेश्वरी है। 'रात्री व्यख्यदायती पुरुत्रा देव्यक्षभिः। विश्वा०' इत्यादिका सारांश यह है कि 'सर्वकारणभूता चिच्छक्ति भगवती पूर्वकल्पीय अनन्त जीवोंके अपरिपक्व अतएव फलानभिमुख सत्-असत् कर्मोंको देखकर फल प्रदानका समय न होनेसे ईश्वरीय प्रपंचको अपनेमें ही प्रलीन कर लेती है। पश्चात् वही रात्रिरूपा चिच्छक्ति फलप्रदानका समय आनेपर महदादिद्वारा प्रपंचका निर्माण करके असांकर्येण तत्तत्प्राणियोंके कर्मोंको देखती है। फिर उन कर्मोंका फल प्रदान करती है। इससे रात्रिरूपा भगवतीकी सर्वज्ञता स्पष्ट है। वह अमर्त्या देवी अन्तरिक्षोपलक्षित समस्त विश्वको अपने स्वरूपसे पूरित कर देती है। नीची वस्तु लता-गुल्मादि और उच्छ्रित वृक्षादिको भी अधिष्ठान चैतन्यसे पूरित कर देती है और वही परा चिद्रूपा देवी स्वाकार-वृत्तिप्रतिबिम्बितस्वरूप चैतन्य ज्योतिसे तम उपलक्षित सम्पूर्ण प्रपंचको बाधित कर देती है। आती हुई देवनशील रात्रि चिच्छक्ति प्रकाशस्वरूपा उषा (प्रातःकाल)-को अर्थात् अविद्याकी आवरण शक्तिको तिरस्कृत करती है। यद्यपि रात्रिद्वारा प्रकाशस्वरूपा उषाका निराकरण असम्भव मालूम पड़ता है तथापि यहाँ चिद्रूपा रात्रि ही परम प्रकाशरूपा है, तदपेक्षया सन्ध्या या उषा अन्धकाररूप ही है। जैसे सूर्यके प्रकट होनेपर सन्ध्या मिट जाती है, वैसे ही चिच्छक्तिके स्वाकार वृत्तिपर प्रतिबिम्बित होनेपर अविद्याकी आवरण-शक्ति मिट जाती है। आवरण-शक्तिके दग्धबीज हो जानेपर प्रारब्धक्षयके अनन्तर मूलाज्ञानरूप तम सर्वथा नष्ट हो जाता है। दोनों शक्तियोंके नष्ट हो जानेपर मूलाज्ञानका भी अवशेष नहीं रहता। वह रात्रिदेवता परा चिच्छक्ति हम सबपर प्रसन्न रहे, जिसकी प्राप्तिमें हम सब सुखस्वरूपमें वैसे स्थित होते हैं, जैसे अपने घोसलेमें पक्षी रात्रिवास करता है। ग्रामके आसपास सभी लोग तथा गवाश्वादि, पक्षी तथा भिन्न प्रयोजनसे चलनेवाले पथिक एवं श्येन आदि उस रात्रिमें प्रविष्ट होकर सुखसे स्थित होते हैं। दिनके संचारसे भ्रान्त प्राणियोंको यह रात्रि ही सुख पहुँचाती है, उस समय सब लोग विश्राम करने लगते हैं। सारांश यह है कि जो प्राणी भुवनेश्वरीके नामतकसे भी परिचित नहीं हैं, वे भी करुणामयी परा चिच्छक्ति अम्बाकी करुणासे ही उसके अंकमें जाकर सुखसे उसी तरह सोते हैं, जिस तरह मूढ़ बालक माताकी करुणासे स्वस्थ सोते हैं। ऐसी करुणामयी यह चिच्छक्ति है। हे ऊर्म्ये ! रात्रिदेवि ! चिच्छक्ते ! आप परम दयामयी हैं, अतः हमारे कृत्योंकी ओर न देखकर हिंसा करनेवाले मारक पापरूप वृक (भेड़िया) और नानावासनारूपी वृकीको हमसे पृथक् कर दो और चित्तवित्तके अपहारक कामादि दोषोंको भी हमसे हटा दो और हमारे लिये आप सुखेन तरणी या और क्षेमकरी हो। सम्पूर्ण वस्तुओंमें फैला हुआ कृष्णवर्ण स्पष्ट अज्ञान हमको घेरे हुए है। हे उषादेवते ! आप ऋणके समान उस अज्ञानको दूर कर दो। जैसे अपने स्तोताओंका ऋण आप दूर करती हैं, वैसे ही हमारे अज्ञानको दूर करें। हे रात्रिदेवते ! चिच्छक्ते ! कामधेनुके समान सर्वाभीष्ट- दायिनी आपको प्राप्त करके स्तुतिजपादिसे अभिमुख करता हूँ। आप प्रकाशरूप परमात्माकी पुत्री हैं।' परमात्मासे ही अन्यत्र चैतन्यशक्तिकी अभिव्यक्ति होती है, इस विवक्षासे भगवतीको दिवोदुहिता कहा गया है। चण्डी एक दृष्टिसे भगवतीको परब्रह्मकी महिषी कहा जाता है— 'त्वमसि परब्रह्ममहिषी।' उसी दृष्टिसे उनका नाम 'चण्डिका' है। 'चण्डभानुः चण्डवातः' इत्यादि स्थानोंमें इयत्तान-
५०४ भक्तिसुधा विच्छिन्न असाधारण-गुणशाली वस्तुमें 'चण्ड' शब्दका प्रयोग होता है। देश-कालवस्तुपरिच्छेदशून्य वस्तु परमात्मा ही है। भानु, वात आदिका विशेषण होनेसे वह संकुचित वृत्ति हो जाता है। 'चडि कोपे' धातुसे 'चण्ड' शब्दकी निष्पत्ति है। 'कस्य बिभ्यति देवाश्च कृतरोषस्य संयुगे।' किसका रोष उत्पन्न होनेसे देवताओंको भी डर होता है? प्रसादो निष्फलो यस्य कोपोऽपि च निरर्थकः। न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्ढं पतिमिव प्रजाः॥ अर्थात् जिसका क्रोध और प्रसाद निष्फल होता है, उसे प्रजा उसी तरह स्वामी नहीं मानती, जिस तरह षण्ढ पुरुषोंको स्त्रियाँ पति नहीं बनातीं। इसीलिये सफल उग्रक्रोध या उग्र क्रोधवाला पुरुष भी 'चण्ड' कहलाता है। महाभयजनक कोप ही 'चण्ड' कहा जाता है और वह भयजनक कोप परमेश्वरका ही है। 'नमस्ते रुद्र मन्यवे' इस वचनमें रुद्रके मन्यु-कोपको प्रणाम किया गया है। संसारमें चण्डसे ही सब डरते हैं। स्पष्ट है कि जिसका दण्ड प्रबल होता है, उसीका शासन चलता है। सर्वसंहारकसे सब डरते हैं, सर्वसंहारक मृत्युसे भी सब डरते हैं, मृत्यु भी चण्ड है। भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चमः॥ (तैत्तिरीय० २।८) अर्थात् परमेश्वरके डरसे वायु चलता है, उसीके भयसे सूर्य उदित होता है और उसीके भयसे अग्नि और इन्द्र भी अपना-अपना काम करते हैं। सर्वभयकारण मृत्यु भी जिससे डरता है, वही भगवान् परमात्मा है। उसको मृत्युका भी मृत्यु, कालका भी काल या महाकाल किंवा चण्ड कहा जा सकता है, वही सर्वसंहारक है। उससे भिन्न सब संहार्य कोटिमें आ जाता है। उत्पादक, पालक, ब्रह्मा, विष्णु आदि उसके स्वरूप ही हैं, इसीलिये वे भी असंहार्य हैं। यदि भिन्न होते तो अवश्य संहार्य होते, अन्यथा इसीको एकोनसर्वसंहारक (अमुकके अतिरिक्त सबका नाशक) कहना पड़ेगा। इसीलिये जिसका विश्व, वही उसका उत्पादक, वही पालक और वही संहारक है। एकेश्वरवाद सर्वत्र मान्य है ही, उसीको महद्भय वज्ररूप भी कहा गया है- 'महद्भयं वज्रमुद्यतम्' जैसे उद्यतवज्रके डरसे भृत्य लोग तत्परतासे काम करते हैं, वैसे ही परमात्माके डरसे सूर्य, इन्द्र, चन्द्र आदि सावधानीसे अपने-अपने कार्यमें संलग्न होते हैं। उसी चण्डकी स्वरूपभूता शक्ति पत्नी चण्डिका है। जैसे परमेश्वरके ही घोर रूपसे पृथक् शान्त रूप भी है 'घोरान्या शिवान्या' वैसे ही भगवतीके भी उग्र और शान्त दोनों ही रूप हैं। कुछ लोगोंका कहना है कि एक ही परब्रह्म मायासे धर्मी और धर्म दो रूपमें प्रकट होता है। सृष्टिके आरम्भमें जो 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय' 'सोऽकामयत', 'तत्तपोऽकुरुत'-इत्यादिसे ज्ञान, इच्छा और क्रियाका श्रवण है, यही तीनों ब्रह्मके धर्म हैं। यह सब धर्मीरूप ब्रह्मसे अभिन्न ही हैं; क्योंकि श्रुतिने ही इन्हें स्वाभाविकी कहा है-'स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।' यहाँ 'बल' से इच्छाका ग्रहण समझना चाहिये। ज्ञानेच्छाक्रियारूप धर्मको ही शक्ति कहा जाता है और वैसे ही समष्टि ज्ञानेच्छाक्रियारूप ब्रह्मधर्मरूपा शक्ति ही चण्डी है; यही महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती है। कार्यवशात् इसीका अनेक रूपमें प्राकट्य होता है। वस्तुतस्तु उसी चण्डरूप परमात्मामें ही पुंस्त्व, स्त्रीत्व भक्तभावनाके अनुसार है। पुंस्त्वविवक्षासे वही महारुद्र आदि शब्दोंसे, स्त्रीत्वविवक्षासे वही चण्डी, दुर्गा आदि शब्दोंसे व्यवहृत होता है। नवार्णमन्त्रार्थ नवार्णमन्त्रका भी अभिप्राय यही है। 'डामरतन्त्र' में उसका अर्थ इस प्रकार बतलाया गया है- निर्धूतनिखिलध्वान्ते नित्यमुक्ते परात्परे। अखण्डब्रह्मविद्यायै चित्सदानन्दरूपिणि। अनुसन्दध्महे नित्यं वयं त्वां हृदयाम्बुजे।
अर्थात् हे निर्धूतनिखिलध्वान्ते ! हे नित्यमुक्ते ! हे परातपरतरे ! चित्सदानन्दरूपिणि माँ ! मैं अखण्ड ब्रह्मविद्याके लिये आपका अपने हृदयकमलमें अनुसन्धान करता हूँ। 'ऐं' इस वाग्बीजसे चित्स्वरूपा सरस्वती बोधित होती हैं; क्योंकि ज्ञानसे ही अज्ञानकी निवृत्ति होती है। महावाक्यजन्य परब्रह्माकारवृत्तिपर प्रतिबिम्बित होकर वही चिद्रूपा भगवती अज्ञानको मिटाती हैं। 'ह्रीं' इस मायाबीजसे सद्रूपा महालक्ष्मी विवक्षित हैं। त्रिकालाबाध्य वस्तु ही नित्य है। कल्पित आकाशादि प्रपंचके अपवादका अधिष्ठान होनेसे सद्रूपा भगवती ही नित्यमुक्ता हैं। 'क्लीं' इस कामबीजसे परमानन्दस्वरूपा महाकाली विवक्षित हैं, सर्वानुभवसंवेद्य आनन्द ही परम पुरुषार्थ है। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' इस श्रुतिसे सिद्ध है कि सब कुछ आत्माके लिये ही प्रिय होता है, इसलिये आत्मस्वरूपा आनन्द ही शेषी है, तदितर सब शेष है। मानुषानन्दसे लेकर गन्धर्व, देवगन्धर्व, आजानजदेव, श्रौतदेव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति, ब्रह्मान्त उत्तरोत्तरशतगुणित आनन्द जिसका बिन्दुमात्र है, वह परमातिशायी ब्रह्मरूप आनन्द कहा गया है। वही परात्पर आनन्द महाकालीरूप है। 'चामुण्डायै' शब्दसे मोक्षकारणीभूत निर्विकल्पक ब्रह्माकार वृत्ति विवक्षित है। विपदादिरूप चमू (आकाशादिरूप सेना)-को जो नष्ट करके आत्मरूप कर लेती है, वही 'चामुण्डा' ब्रह्मविद्या है। अधिदैव (समष्टि)-के मूलाज्ञान और मूलाज्ञानरूप चण्ड- मुण्डको वशमें करनेवाली भगवती भी चामुण्डा कही गयी हैं— यस्माच्चण्डञ्च मुण्डञ्च गृहीत्वा त्वमुपागता। चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि॥ 'विच्चे' में 'वित्', 'च', 'इ' ये तीन पद क्रमेण चित्, सत्, आनन्दके वाचक हैं। 'वित्' का ज्ञान अर्थ स्पष्ट ही है, 'च' नपुंसकलिंग 'सत्' का बोधक है, 'इ' आनन्दब्रह्ममहिषीका बोधक है। इसका सारांश यही है कि हे चित्- सत्-परमानन्दरूपे ! निर्धूतनिखिलध्वान्ते ! नित्यमुक्ते ! परातपरे महासरस्वति ! महालक्ष्मि ! महाकालि ! हम आपके तत्त्वज्ञानको प्राप्त करनेके लिये आपका हृदयकमलमें ध्यान करते हैं। प्रथम चरित्र 'श्रीदुर्गासप्तशती' में यह स्पष्ट बतलाया गया है कि भगवतीकी कृपासे ही सम्यक् तत्त्वज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञानकी प्रशंसा सर्वत्र है, ज्ञानके होनेसे अज्ञान-मोहादि मिट जाते हैं। ज्ञान-सम्पादनके लिये ही श्रवणादि किये जाते हैं। जप, तप, यज्ञादि सबका परम उपयोग ज्ञानमें ही है। परंतु वह ज्ञान साधारण ज्ञान नहीं है, क्योंकि शब्दादि विषयोंका ज्ञान तो प्राणिमात्रको होता है। उलूकादि दिनमें अन्धे होते हैं, रात्रिमें नहीं; कोकादि रात्रिमें अन्धे होते हैं, दिनमें नहीं। लता, जलजन्तु आदि दिन-रात समान रूपसे अन्धे ही रहते हैं। राक्षस, मार्जार, तुरगादि दिन-रात समान चाक्षुष ज्ञानवाले होते हैं और सबकी अपेक्षा मनुष्योंमें अधिक ज्ञान होता है, परंतु अज्ञान उनमें भी होता है। पशु, पक्षी आदि सभी बहुत ज्ञानवाले होते हैं। व्यवहारज्ञान मनुष्यों-जैसा ही पशु-पक्षियोंमें भी दिखायी देता है। पक्षिगण स्वयं भूखे रहकर भी इतस्ततः से कणोंको लाकर अपने बच्चोंके मुँहमें छोड़ते हैं। मनुष्य भी प्रत्युपकारकी आशासे बच्चोंके भरण-पोषणमें तल्लीन रहते हैं, यह सब ज्ञान सामान्य ज्ञान है। इनसे संसारके मूलभूत अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती। यह महामायाका प्रभाव है, जिससे सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाश परब्रह्मका बोध नहीं होता। वही उपनिषज्ज्ञाननिष्ठ वसिष्ठ, भरत, विश्वामित्रादिकोंके भी चित्तको बलात् मोहित कर देती है। वही चराचर प्रपंचका निर्माण करती है, वही प्रसन्न होकर मुक्ति प्रदान करती है, विद्यारूपा होकर वही मुक्तिप्रदा है, अविद्यारूपसे वही संसारबन्धका हेतु है, वही भगवान् विष्णुकी योगनिद्रा
५०६ भक्तिसुधा कहलाती है। जिस समय भगवान् शेषपर कल्पान्तमें विराजमान थे, उस समय कूर्मपृष्ठपर जलमें विलीन होनेके कारण पृथ्वी नवनीतके समान कोमल हो गयी। सृष्टिकालमें यह प्राणियोंको किस तरह धारण कर सकेगी, यह सोचकर भगवतीने विष्णुको अपनी योगनिद्रा शक्तिसे प्रसुप्त करके अपने वामहस्तकी कनिष्ठिकाके नखाग्र भागसे कर्णमल निकालकर उसीसे मधु नामक दैत्यको और दक्षिण कर्णस्थ मलसे कैटभको बनाया। उत्पन्न होकर वे दोनों दैत्य पहले कीटके समान ही प्रतीत हुए, पश्चात् महाबलवान् हो गये। वरदान देकर देवीके अन्तर्हित होनेपर विष्णुकी नाभिसे उत्पन्न कमलमें उन दोनोंने ब्रह्माको देखा। ब्रह्माको देखकर उन्होंने कहा—'हम तुम्हें मारेंगे। अगर तुम जीना चाहते हो तो विष्णुको जगाओ।' यह सुनकर ब्रह्माने जगत्प्रसू योगनिद्राकी अनेक स्तुतियोंसे प्रार्थना की। भगवतीने प्रसन्न होकर ब्रह्मासे वरदान माँगनेको कहा। ब्रह्माने भगवान्का जागना और दोनों असुरोंको मोह होना माँगा। माताने विष्णुको जगा दिया। विष्णुसे उन दैत्योंका पाँच हजार वर्षतक घोर युद्ध हुआ। महाप्रमत्त उन दैत्योंने महामायासे मोहित होकर विष्णुसे वर माँगनेको कहा। विष्णुने कहा—'तुम दोनों हमारे वध्य हो, हम यही वर माँगते हैं।' उन्होंने कहा—'अच्छा, जहाँ सलिलसे व्याप्त पृथ्वी न हो, वहाँ हमें मारो।' विष्णुने अपने जघन प्रदेशपर उनका सिर रखकर चक्रसे उन्हें काट दिया, पश्चात् उन्हींके मेदका विलेपनकर पृथ्वीको दृढ़ किया गया, इसीलिये पृथ्वीको 'मेदिनी' भी कहा जाता है। इस तरह भगवती ही अनेक रूपमें प्रकट होकर जगत्को धारण करती हैं। यही सृष्टि, स्थिति और संहार करती हैं, यही योगनिद्रा होकर विष्णुको विश्राम देती हैं, यही स्वाहारूपसे देवताओंको, स्वधारूपसे पितरोंको, वषट्काररूपसे श्रौतदेवताओंको तृप्त करती हैं। यही उदात्तादि स्वरों और सुधारूपमें विराजमान होती हैं। ह्रस्व, दीर्घ, प्लुतरूपमें किंवा अ, उ, म् रूपमें यही अक्षररूपा भगवती विराजमान होती हैं। अ, उ, म् इन तीनों वर्णों एवं तद्वाच्य विश्व, तैजस, प्राज्ञ आदिके रूपोंमें भी वे ही भगवती स्थित हैं। वाच्य-वाचकके अधिष्ठानरूप अर्धमात्रास्वरूपसे भी भगवती ही विराजमान हैं।
श्रीभगवती-तत्त्व ५०७ नित्या, गौरी, धात्री, ज्योत्स्ना, इन्दुरूपिणी, सुखा, कल्याणी, वृद्धि, सिद्धि, नैर्ऋति, शर्वाणी, दुर्गा, दुर्गपारा, सारा, सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा, धूम्रा, अतिसौम्या, अतिरौद्रा, जगत्प्रतिष्ठा, कृति, विष्णुमाया, चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षान्ति, जाति, लज्जा, शान्ति, श्रद्धा, कान्ति, लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति, दया, तुष्टि, माता, भ्रान्ति, व्याप्ति, चितिरूपसे भगवतीको प्रणाम किया। निर्गुणा, सगुणा तथा सगुणामें भी सात्त्विकी, राजसी, तामसी भेदसे सब शक्तियाँ भगवतीमें ही अन्तर्भूत हो जाती हैं। देवता स्तुति कर ही रहे थे कि हिमाद्रि-कन्या पार्वती जाह्नवीमें स्नान करने आयीं। देवताओंसे उन्होंने प्रश्न किया कि ‘आपलोग किस देवताकी स्तुति कर रहे हैं?’ देवताओंका उत्तर देना ही था कि तबतक पार्वतीके ही शरीरसे प्रकट होकर शिवा भगवतीने पार्वतीसे कहा कि ‘शुम्भसे निराकृत होकर ये सब हमारी ही स्तुति कर रहे हैं।’ पार्वतीके शरीर-कोशसे निकली हुई अम्बिका लोकमें ‘कौशिकी’ नामसे प्रसिद्ध हुईं। कौशिकीके निकलनेपर पार्वती कृष्णवर्णकी हो गयीं। तभीसे वह ‘कालिका’ कहलाने लगीं। परमरूपवती कौशिकी अम्बिकाको कभी शुम्भ-निशुम्भके सेवक चण्ड-मुण्डने देखा और जाकर अपने स्वामीसे उसके रूपकी प्रशंसा की और उसे स्वाधीन बनानेकी सलाह दी। शुम्भ- निशुम्भने दूत भेजकर कहलाया कि ‘हमारी आज्ञा सर्वत्र अप्रतिहत है, संसारके सब रत्न, ऐरावत, उच्चैःश्रवा आदि हमारे पास हैं, तुम भी स्त्रीरत्न हो, हम रत्नभुक् हैं, अतः तुम भी हमारे पास आओ, हमारे पास आनेसे तुम्हें परमैश्वर्य प्राप्त होगा।’ भगवतीने गम्भीर स्मितके साथ कहा—‘ठीक है, परंतु मेरी प्रतिज्ञा है कि जो मुझे संग्राममें जीत लेगा, मेरा दर्प दूर करेगा, मेरे समान बलवान् होगा, वही मेरा भर्ता होगा। अतः शुम्भ या निशुम्भ कोई भी आकर मुझे जीतकर पाणिग्रहण कर ले’— यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति। यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥ तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महासुरः। मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु॥ (श्रीदुर्गासप्तशती ५।१२०-१२१) दूतने बहुत कुछ समझाया, परंतु देवीने कहा— ‘क्या करूँ, मेरी ऐसी प्रतिज्ञा ही है।’ दूतने जाकर सब बात सुना दी। इसपर धूम्रलोचन भेजा गया, घोर युद्धके बाद वह मारा गया। उसके पश्चात् शुम्भने चण्ड-मुण्डको भेजा। महासंग्राम हुआ, अम्बिकाने जब कोप किया, तब उनके ललाटसे करालवदना कालिका प्रकट हुईं। उन्होंने असुरोंके बल (सैन्य)- का भक्षण करना आरम्भ कर दिया। उन्होंने बड़े-बड़े गज, तुरंग, रथ, योद्धाओंको मुँहमें डालकर चबाना आरम्भ किया। सर्वनाश होते देखकर चण्ड आया और अनेक चक्रोंसे कालीको आच्छादित कर दिया। देवीके मुँहमें वे चक्र लीन हो गये। महातलवारसे देवीने चण्डका सिर काट डाला। इसके बाद मुण्ड लड़ने आया। उसकी भी वही गति हुई। चण्ड-मुण्ड दोनोंका सिर लेकर कालीने आकर कौशिकीको दिया। कौशिकीने चण्ड-मुण्डका सिर लानेके कारण कालीका ‘चामुण्डा’ नामकरण किया। चण्ड-मुण्डका वध सुनकर शुम्भने अपनी सब सेनाको आज्ञा दी। महा-महाकुलके भयानक-भयानक दैत्य आये, भयंकर युद्ध होने लगा। देवीने धनुषके टंकारसे धरणी और गगनको पूरित कर दिया। सिंहनाद भी सर्वत्र फैल गया; महाकालीने भी मुख फैलाकर भीषण नाद किया। उस नादको सुनकर दैत्यसेनाने चारों ओरसे देवीको घेर लिया। इसी समय दैत्योंके नाश और देवताओंके अभ्युदयके लिये ब्रह्मा, शिव, विष्णु, इन्द्र आदि देवताओंके शरीरोंसे उनकी शक्तियाँ उसी-उसी रूपमें प्रकट होकर देवीकी सहायताके लिये आयीं। उन शक्तियोंसे परिवृत होकर भगवान् रुद्र आये और चण्डिकासे कहा कि ‘हमारी प्रसन्नताके लिये शीघ्र ही इन दैत्योंको मारो।’ यह सुनते ही देवीके शरीरसे एक अतिभीषण शक्ति प्रकट हुई और उसने रुद्रसे कहा—
'आप हमारे दूत बनकर जाओ और शुम्भ- निशुम्भसे कहो कि त्रैलोक्य इन्द्रको दे दो, देवता हविर्भुक् हों और तुमलोग यदि जीना चाहते हो तो पाताल चले जाओ। यदि बलके घमण्डसे लड़ना चाहते हो तो आओ, तुम्हारे मांससे हमारे शृगाल तृप्त हों।' देवीने शिवको दूत बनाया, अतः उनका नाम 'शिवदूती' प्रसिद्ध हुआ। दैत्य शिवके द्वारा देवीका सन्देश सुनकर क्रुद्ध होकर वहाँ आये, जहाँ देवी स्थित थीं और अस्त्र-शस्त्रसे देवीके ऊपर खूब प्रहार किया। देवीने लीलामात्रसे सबको नष्ट कर डाला। कौशिकीके आगे-आगे काली शूल और खट्वांगसे शत्रुओंको नष्ट करती चलती थीं। ब्रह्माणी, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, ऐन्द्री आदि अपने शस्त्रास्त्रोंसे सहस्रों दैत्योंको मारती थीं। असुरोंका संहार करती हुई नादसे दिशाओंको पूर्ण कर रही थीं। जब मातृगणोंसे पीड़ित होकर असुर भाग चले, तब रक्तबीज नामका एक महान् असुर आया। रक्तबीजके शरीरसे जितने रक्तबिन्दु भूमिपर गिरते थे, उतनी ही संख्यामें वैसे ही रक्तबीज उत्पन्न होते थे। वह रक्तबीज गदा लेकर इन्द्रशक्तिसे युद्ध करने लगा। उससे महाभयंकर संग्राम हुआ। इन्द्रशक्तिके वज्रप्रहारसे उस दैत्यके शरीरसे बहुत-सा रक्त बहा, जिससे असंख्य रक्तबीजोंसे संसार व्याप्त हो गया। देवीने अपनी जिह्वा भूमिपर फैला दी और सब रक्त पान करने लगी। अन्तमें वह दैत्य क्षीणरक्त होकर मर गया। फिर शुम्भ-निशुम्भका भी देवीसे घोर युद्ध हुआ। महायुद्धके बाद निशुम्भ मारा गया। उस समय शुम्भने आकर देवीसे डाँटकर कहा—हे दुर्गे! तू घमण्ड न कर, दूसरोंका बल लेकर तू लड़ती है। इसपर देवीने कहा—इस जगत्में मैं ही एक हूँ, दूसरा कोई नहीं। देख, ये सब मेरी विभूतियाँ हैं, जो मुझमें प्रविष्ट हो रही हैं। यह कहते ही ब्रह्माणीप्रमुखा देवी उनमें लीन हो गयीं, वे अकेली रह गयीं— एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा। पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः॥ ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम्। तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका॥ (श्रीदुर्गासप्तशती १०।५-६) देवीने कहा—'मैं ही अपनी विभूतिसे अनेक रूपोंमें स्थित थी। अब उन सबका उपसंहार करके अकेली ही संग्राममें स्थित हूँ। तू सावधान स्थिर हो।' अनन्तर देवी और शुम्भका देवताओंके समक्ष महाघोर युद्ध हुआ। बड़े-बड़े दिव्यातिदिव्य शस्त्रास्त्रोंका प्रयोग हुआ। कभी गगनमें, कभी भूपर महान् आश्चर्यकर युद्ध हुआ। उस महासंग्रामके बाद भगवतीने उसके हृदयको विशाल शूलसे विदीर्णकर भूमिपर मार गिराया। देवता तथा ऋषियोंने देवीकी इस प्रकार स्तुति की। देवताओंने कहा—'हे मातः! आप प्रपन्न प्राणियोंकी आर्ति दूर करनेवाली हैं, आप अखिल ब्रह्माण्डकी माता हैं, आप ही चराचर विश्वकी ईश्वरी हैं, आप ही पृथ्विरूपमें स्थित होकर सबकी आधारभूता हैं, जलरूपसे भी स्थित होकर सम्पूर्ण विश्वका आप्यायन करती हैं, आप अनन्त वीर्यवाली वैष्णवी शक्ति हैं, आप ही विश्वकी बीजभूता माया हैं, सम्पूर्ण विश्व आपसे ही मोहित है, प्रसन्न होकर आप ही मुक्तिकी हेतु बन जाती हैं, संसारकी समस्त विद्याएँ आपका ही अंश हैं, समस्त स्त्रियाँ भी आपका ही अंश हैं, एक आपसे ही सारा विश्व पूरित है, फिर आपकी क्या स्तुति की जाय? स्तुतिसाधन परा, अपरा वाक् भी तो आप ही हैं। स्पष्टोच्चरित वाक् 'वैखरी' है, स्मृतिगोचर वाक् 'मध्यमा' है, अर्थकी द्योतिका 'पश्यन्ती' है, ब्रह्म ही 'परा' वाक् है— वैखरी शब्दनिष्पत्तिर्मध्यमा स्मृतिगोचरा। द्योतिकार्थस्य पश्यन्ती सूक्ष्मा ब्रह्मैव केवलम्॥ स्थान, करण, प्रयल तथा वर्णविभागशून्य, स्वयंप्रकाश ज्योति 'परा' वाक् है। सूक्ष्म बीजसे
उत्पन्न अंकुरके समान किंचित् विकसित शक्ति ही 'पश्यन्ती' है। अतः संकल्परूपा वाक् 'मध्यमा' है, व्यक्त वर्णादिरूप 'वैखरी' है। 'स्वर्ग-मुक्तिदायिनी आप ही हैं। बुद्धिरूपसे पुरुषार्थप्रदा, कालरूपसे परिणामप्रदायिनी, अवसानसमयमें कालरात्रिरूपसे आप ही विराजती हैं। सर्वमंगलदायी, सर्वार्थसाधिका, शरणागतवत्सला, सृष्ट्यादिकारिणी, सनातनी, गुणाश्रया, गुणमयी, शरणागत-दीनार्त-परित्राणपरायणा, आर्तिहरा, ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, चामुण्डा, लक्ष्मी, लज्जा, विद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, महारात्रि, महाविद्या, मेधा, ध्रुवा, सरस्वती, वरा, भूति, वाभ्रवि (राजसी), तामसी, नियन्ता आप ही हैं। कहाँतक कहा जाय, आप ही सर्वस्वरूपा हैं, आप ही सर्वशक्तिसमन्विता हैं। आप और आपके आयुध हमें सब भीतिसे बचायें। आप सर्वानर्थनिवारिणी, सर्वाभीष्ट- दायिनी हैं, सर्वस्तुत्या हैं। आपके आश्रितोंको विपत्ति नहीं आती, आपके आश्रित दूसरोंके आश्रय होते हैं। आप विश्वेश्वरी, विश्वपालिनी एवं विश्वरूपा हैं, विश्वेशवन्द्या हैं। जो आपको प्रणाम करते हैं, वे विश्वके आश्रय बनते हैं।' देवीने प्रसन्न होकर वर माँगनेको कहा। देवताओंने यह वर माँगा कि 'अखिलेश्वरी! आप सर्वदा त्रैलोक्यकी सर्वबाधाओंका प्रशमन करें और समय-समयपर इसी तरह असुरोंका संहार करें।' देवीने कहा—'ये शुम्भ-निशुम्भ आदि दैत्य फिर अट्ठाईसवीं चतुर्युगीमें उत्पन्न होंगे, वहाँ भी नन्दगोपके गृहमें यशोदासे उत्पन्न हो विन्ध्यवासिनीरूपसे मैं उनका संहार करूँगी। उसी रूपसे वैप्रचित्त दानवोंको मारकर उनका भक्षण करूँगी। दन्तोंके रक्त होनेसे उस समय मेरा 'रक्तदन्तिका' नाम प्रसिद्ध होगा। पुनश्च शतवार्षिकी अनावृष्टि होनेपर 'शताक्षी' रूपसे प्रकट होकर मुनियोंपर अनुग्रह करूँगी। अपने देहसे उद्भूत प्राणधारक शाकोंद्वारा लोकका रक्षण करूँगी, इसीलिये मेरा 'शाकम्भरी' नाम होगा। उसी अवतारमें दुर्गम दैत्यको मारनेसे मेरा 'दुर्गा' भी नाम पड़ेगा। भीमरूप धारण करके हिमाचलके राक्षसोंका भक्षण करूँगी, तब मेरा 'भीमा' नाम पड़ेगा। भ्रमररूप धारणकर अरुणासुरको मारनेसे मेरा 'भ्रामरी' नाम होगा। इस तरह जब- जब दानवोंकी बाधा फैलेगी, तब-तब मैं अवतार लेकर धर्म और देवताओंके शत्रुओंका क्षय करूँगी। जो इन स्तुतियोंसे मेरा स्तवन और श्रद्धा-भक्तिसे पूजन करेगा, उसकी सब विपत्तियोंको दूरकर सर्वाभीष्ट-सम्पादन करूँगी।' 'सप्तशती' के चरित्रोंसे विविध शिक्षाएँ मिलती हैं। मधु-कैटभ बड़े बलवान् थे, परंतु बुद्धि-बलसे विष्णुने उनका वध किया, इससे यह स्पष्ट हो गया कि पशु-बलपर सर्वदा बुद्धि-बलकी विजय होती है। महिषासुरके वधमें देवताओंके संगसे उद्भूत तेजःसमूहसे भगवतीका आविर्भाव हुआ। तृतीय चरित्रसे यह भी व्यक्त होता है कि एक शक्तिके अग्रसर होनेपर सभी शक्तियाँ उस कार्यमें लग जाती हैं, इत्यादि-इत्यादि बहुत-सी शिक्षाएँ प्राप्त होती हैं। 'देवीसूक्त' में भगवतीका स्वरूप 'देवीसूक्त' से विदित होता है कि साक्षात् परब्रह्म ही देवी आदि नामोंसे प्रख्यात है। स्वयं देवी कहती हैं— 'अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।' अर्थात् मैं ही रुद्र, वसु, आदित्यादिरूपसे विहरण करती हूँ। इन्द्र, अग्नि एवं अश्विनीकुमारोंको मैं ही धारण करती हूँ। सोम, त्वष्टा, पूषा, भग आदिको भी मैं ही धारण करती हूँ। देवताओंको हविः प्रदान करनेवाले यजमानको फल-प्रदान भी मैं ही करती हूँ। अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्। तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्॥ (वेदोक्त देवीसूक्त ३) अर्थात् सब जगत्की ईश्वरी, धन प्राप्त करानेवाली, तत्त्वज्ञानिनी एवं यज्ञार्होंमें मैं ही मुख्य हूँ, मैं ही प्रपंचरूपसे स्थित हूँ। अतएव देवताओंने अनेक स्थानोंमें अनेक रूपसे मेरा ही विधान किया है, विश्वरूपसे मैं ही स्थित हूँ। जहाँ भी, जो भी किया
५१० भक्तिसुधा जाता है, सब मेरी ही तत्र-तत्र, तेन-तेन रूपेण सम्पत्ति है। खाना, देखना, प्राणन करना, श्वासो- च्छ्वासादि व्यापार करना सब मेरी ही शक्तिसे सम्भव है। जो मुझ अन्तर्यामिणीको नहीं जानते, वे उपक्षीण हो जाते हैं। हे विश्रुत ! श्रद्धायुक्त होकर सुनो, यह ब्रह्मवस्तु तुम्हें बतला रही हूँ— मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्। अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि॥ मैं ही देव-मनुष्यसेवित ब्रह्मका उपदेश करती हूँ। मैं ही जिसको चाहती हूँ, उग्र—अधिक बनाती हूँ। ब्रह्मा (स्रष्टा), ऋषि (ज्ञानवान्) तथा शोभनप्रज्ञ बनाती हूँ। त्रिपुर-विजयके समय हिंसक, ब्रह्मद्विट् असुरके लिये रुद्रके धनुषको मैं ही विस्तृत करती हूँ, स्तोता जनोंके सुखार्थ मैं ही शत्रुओंसे संग्राम करती हूँ, मैं ही परमात्माके सर्वोपरि स्वरूपमें आकाशको बनाती हूँ। जैसे तन्तुमें पट होता है, वैसे ही आकाशादि कार्यजगत् परमात्मासे ही उत्पन्न होता है। समुद्र ('समुद्रवन्ति प्राणिनोऽस्मादिति समुद्रः परमात्मा')-रूप परमात्मामें जो व्याप्त बुद्धिवृत्तिरूप अप् (जल) है, उनके भीतर, बाहर, मध्यमें फैला हुआ जो अनन्त चैतन्य है, वही मुझ भगवतीका विश्वकारणभूत रूप है। अतएव मैं समस्त प्राणियोंमें व्याप्त होकर स्थित हूँ। कारणभूत मायामय निज देहसे द्युलोकादिको स्पर्शकर मैं स्थित हूँ। अथवा भूलोकके ऊपर पितर अर्थात् आकाशकी मैं रचना करती हूँ। समुद्रमें जलके भीतर मेरे कारणभूत अम्मय ऋषि हैं, उन्हीं महर्षिकी पुत्री होकर मैं देवीसूक्तका दर्शन करती हूँ। अथवा समुद्र अर्थात् अन्तरिक्षमें अपने अर्थात् अम्मय देवशरीरोंमें मेरा कारणभूत ब्रह्म चैतन्य रहता है, अतः मैं कारणभूत होकर सर्वत्र व्याप्त हूँ। मैं ही सम्पूर्ण भूतों और सभी कार्योंका आरम्भ करती हूँ। जैसे वात अन्य प्रेरणाके ही स्वयं कार्य करता है, वैसे ही परशक्तिरूपा मैं स्वेच्छासे ही सब काम करती हूँ। आकाश और पृथिवीसे पर मैं हूँ। असंग, उदासीन ब्रह्मचैतन्यरूपा मैं हूँ। भगवतीकी विविध विभूतियाँ सर्वप्रपंच एवं अवतारोंकी मूलभूता प्रथमा महालक्ष्मी हैं। तीनों गुणोंकी साम्यावस्थारूपा त्रिगुणा वे ही भगवती परमेश्वरी हैं। वे लक्ष्य-अलक्ष्य दो रूपवाली हैं। मायारूप लक्ष्य है, ब्रह्मरूप अलक्ष्य है। मायाशबल ब्रह्मरूपा भगवती ही त्रिगुणा परमेश्वरी हैं। जैसे घटादि कार्यमें कारणभूत मृत्तिका व्याप्त है, वैसे ही सम्पूर्ण विश्वमें वे व्याप्त हैं। हर एक पदार्थमें अस्ति, भाति, प्रिय यह तीन ब्रह्मके और नाम, रूप यह दो मायाके रूप हैं। उपर्युक्त सूक्ष्मरूपके अतिरिक्त उपासकोंके अनुग्रहार्थ भगवतीके अवतारस्वरूप स्थूलरूप भी प्रकट होते हैं। वे दक्षिण भागके नीचेके हाथमें पानपात्र, ऊपरके हाथमें गदा, वामभागके ऊपरके हाथमें खेटक, नीचेके हाथमें श्रीफल तथा नाग, लिंग एवं योनिको सिरमें धारण किये हुए, तप्त कांचनके समान दिव्य वर्णवाली हैं, तप्त ज्ञानशक्ति खेटक है, तुर्यावृत्ति (समाधि) पानपात्र है, लिंग पुरुषतत्त्व है, योनि प्रकृतितत्त्व है, नाग काल है। मातुलिंग (फल) ग्रहणसे भगवती यह सूचित करती हैं कि मैं ही सर्वकर्मफलदात्री हूँ। गदाधारणसे क्रियास्वरूप विक्षेपशक्ति और खेटधारणसे ज्ञान-शक्तिका अधिष्ठातृत्व ही बोधित किया गया है। नाग, लिंग, योनिधारणसे यह सूचित किया गया है कि प्रकृति, पुरुष और काल तीनोंका अधिष्ठान परब्रह्मरूपा मैं ही हूँ। 'ह्रीं' बीजका अभिप्राय भी यही है। ये ही भुवनेश्वरी हैं। सूक्तरूप भुवनेश्वरी और महालक्ष्मी दोनों एक ही हैं तथापि पाश, अंकुश, अभय, वरादि आयुधधारणसे भेद है। भगवती और सृष्टि प्राणियोंके परिपक्व कर्मोंका भोगद्वारा क्षय हो जानेपर प्रलय होता है। उस समय सब प्रपंच मायाके ही उदरमें लीन रहता है। माया भी स्वप्रतिष्ठ निर्गुण ब्रह्ममें लीन रहती है—'अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन् निर्गुणे
श्रीभगवती-तत्त्व ५११
सम्प्रलीयते।' विष्णुपुराणके इन वचनोंसे अव्यक्तका भी ब्रह्ममें लय स्मृत है। अव्यक्तका माया ही अर्थ है, प्राणियोंके कर्म-फल-भोगका जब समय आता है, तब चिदात्मिका भगवतीमें सिसृक्षा (सृष्टिकी इच्छा) उत्पन्न होती है। मायाकी उसी अवस्थाको विचिकीर्षा आदि शब्दोंसे कहा जाता है। कर्मपरिपाकका विनश्यद अवस्थावाला प्रागभाव ही विचिकीर्षा है। यद्यपि गुणसाम्यदशामें कर्मपरिपाकादिके अनुकूल कोई भी व्यापार नहीं होते, अतः साम्यावस्था-भंगका क्या कारण है, यह जानना बहुत कठिन है तथापि जैसे निद्राके अव्यवहित प्राक्कालके प्रबोधानुकूल दृढ़ संकल्पकी महिमासे ही नियत समयपर निद्रा भंग होती है, वैसे ही प्रलयके अव्यवहित प्राक्कालिक ईश्वरीय संकल्पसे ही नियत समयपर जागता है। विभागको न प्राप्त हुआ यह बिन्दु ही 'अव्यक्त' कहलाता है। यह मायाकी ही अवस्था है, अतः यह मायापदवाच्य होता है। यद्यपि यह महदादिके समान तत्त्वान्तररूपसे उत्पन्न नहीं होता, अतएव माया ही है तथापि मायाकी एक विशिष्टाकारसे उत्पत्ति हुई है, अतः 'तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिविधं द्विजसत्तम' इत्यादि वचनोंसे उसकी उत्पत्ति भी कही गयी है। केवल ब्रह्ममें कारणता नहीं बन सकती, अतएव उसे भी सूक्ष्मावस्थाविशिष्ट मायासे युक्त ब्रह्ममें ही कारणता समझनी चाहिये। बीज और अंकुरके बीचकी उच्छूनावस्थाको ही और जिसमें बीज धरणि, अनिल और जलके सम्पर्कसे क्लिन्न होकर कुछ फूलता है, अव्यक्तावस्था समझनी चाहिये। गुणसाम्य बीजावस्था है, वही शुद्ध माया है। बीजका अंकुरित होना कार्यावस्था है। स्पष्ट ईक्षण और अहंकार आदि ही महत्तत्त्व, अहन्तत्त्व आदि हैं। व्यष्टि जगत्में समझ सकते हैं कि निद्रावस्था बीजावस्था है, निद्राका प्रबोधोन्मुख होना अव्यक्तावस्था है, विकल्प- विशेषविरहित प्रबोध महत्तत्त्वकी अवस्था है, अहंकारका उल्लेख होना ही अहंतत्त्वकी अवस्था है, तदनन्तर स्थूल कार्यादि सम्पत्ति होती है। अन्तर्मुख अव्यक्तकी 'तुरीय' संज्ञा है, बहिर्मुख अव्यक्तकी 'कारण देह' संज्ञा है। बहिर्मुख अव्यक्तसे सूक्ष्म-स्थूल देहकी उत्पत्ति होती है, इसीमें सम्पूर्ण विश्व आ जाता है। समष्टि-व्यष्टि स्थूल देह और ज्ञानेन्द्रिय तथा अन्तःकरणके अधिपति सरस्वती-सहित ब्रह्मा हैं। कर्मेन्द्रियसहित प्राणसंज्ञक क्रियाशक्त्यात्मक लिंगदेहके अधिपति लक्ष्मी-सहित विष्णु हैं। कारणदेहके अधिपति गौरीसहित रुद्र हैं। तुरीयदेहकी अभिमानिनी भुवनेश्वरी और महालक्ष्मी हैं। मूर्तिरहस्य प्रथम महालक्ष्मी भगवतीने सम्पूर्ण जगत्को अधिष्ठातासे रहित देखकर केवल तमोगुणरूप उपाधिका आश्रय लेकर बड़ा सुन्दर एक दूसरा रूप धारण किया। साम्यावस्थाभिमानिनी महालक्ष्मी हैं। किंचिच्चलितसदृश तमोगुणविशिष्ट अव्यक्तमें अभिमान करके उसीने महाकालीरूप धारण कर लिया। यद्यपि वह मूल देवीसे अभिन्न ही है तथापि रूपमें भेद है। कज्जलके समान नीलवर्णवाली, सुन्दर दंष्ट्रासे युक्त मनोहर आननवाली, विशाल लोचनवाली, सूक्ष्म कटिवाली वह देवी खड्ग, पात्र, शिरः, खेटको धारण किये कबन्ध, हार और मुण्डकी माला अथवा शवके शिरोंकी माला पहने थी। उस महाकालीने महालक्ष्मीसे कहा कि—'मेरे लिये नाम और कर्म बतलाओ।' महालक्ष्मीने ब्रह्मादिमोहिका होनेसे 'महामाया', उन सबका संख्यान और संहार करनेसे 'महाकाली' और सर्वविध भक्षणकी इच्छावाली होनेसे 'क्षुधा', सर्वविध पानकी इच्छावाली होनेसे 'तृषा', योगकी अधिष्ठात्री होनेसे 'योगनिद्रा', भक्तकृत भक्तिकी इच्छावाली होनेसे 'तृष्णा', महापराक्रमवती होनेसे 'एकवीरा' इत्यादि नाम और नामानुरूप ही कर्म बतलाये हैं। अनन्तर महालक्ष्मीने अतिशुद्ध सत्त्वके द्वारा चन्द्रप्रभाके समान अतिसुन्दर एक और रूप धारण किया। अक्षमाला, अंकुश, वीणा, पुस्तक धारण किये हुए वह बड़ी सुन्दरी देवी प्रकट हुई। उसके लिये भी महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती, आर्या,