भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 512, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 512

५०२ भक्तिसुधा 'तम आसीत्' इत्यादि श्रुतियोंमें तमोरूप भी माना गया है। इस तमको कण्ठतः अनिर्वचनीय कहा गया है— 'नासदासीन्नो सदासीत्तम एवासीत्' (न असत् था, न सत् था, किंतु तम ही था) यह सदसद्विलक्षणता ही अनिर्वचनीयता है। 'अनृतेन हि प्रत्यूढाम्' इत्यादि वचनोंसे तो इस आवरक तमको प्रत्यक्ष ही अनृत कहा है। 'ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।' (गीता ५।१६) 'मायामेतां तरन्ति ते॥' (गीता ७।१४) इत्यादि वचनोंसे माया, अज्ञान आदिकोंकी निवर्त्यता कहनेसे ही अनिर्वचनीयताका बोधन होता है। सत्‌की शक्तिरूप होनेसे भी इसकी अनिर्वचनीयता बोधित होती है; क्योंकि जैसे वह्निकी शक्ति वह्निरूप नहीं होती, किंतु वह्निसे विलक्षण होती है, वैसे ही सत्‌की शक्ति सद्रूप न होकर सत्‌से विलक्षण ही होती है। वह सद्विलक्षणता भी अनिर्वचनीयता है। इस प्रकार मायाकी अनिर्वचनीयता ही सिद्ध होती है।

तान्त्रिक दृष्टिमें शक्ति

तन्त्रोंके अनुसार प्रकाश ही शिव और विमर्श ही शक्ति है। संहारमें शिवका प्राधान्य रहता है, सृष्टिमें शक्तिका प्राधान्य रहता है। प्रभामें इदमंश ग्राह्य होता है, अहमंश ग्राहक होता है। माना यह जाता है कि भीतर वर्तमान पदार्थोंका ही बाह्यरूपमें अवभास होता है— वर्तमानावभासानां भावानामवभासनम्। अन्तःस्थितवतामेव घटते बहिरात्मना॥ प्रकृतिमें ही सूक्ष्मरूपसे सब वस्तुएँ स्थित हैं। परम शिव और शक्ति दोनों ही श्लिष्ट होकर रहते हैं। निस्पन्द परम प्रकाश चिद्धातु शिवतत्त्व है और विमर्शात्मक तत्त्व ही शक्तितत्त्व है। 'आसीज्ज्ञानमयो ह्यर्थः एकमेवाविकल्पितः।' अर्थात् ज्ञान और अर्थ दोनों ही अविकल्पित होकर एकमें रहते हैं, तब साम्यावस्था समझी जाती है।


प्रकृतिकी सत्ता

ज्ञानस्वरूप पुरुषकी सत्ता पारमार्थिक है, अर्थरूप प्रकृतिकी सत्ता अवास्तविक है। उसकी अविद्यमानताका वर्णन बहुत स्थानोंमें मिलता है। अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते। ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा॥ (श्रीमद्भा० ३।२७।४) अर्थके न रहनेपर भी संसृतिकी निवृत्ति नहीं होती, जैसे स्वप्नमें अर्थ न रहनेपर भी वह भासमान होता है, वही स्थिति अर्थकी है। विशेषतः मायाका यही लक्षण 'श्रीमद्भागवत' में किया गया है कि जिसके कारण कोई वस्तु न होनेपर भी प्रतीत हो अथवा वस्तु होती हुई भी न प्रतीत हो, वही माया है; जैसे स्वाप्निक प्रपंच, शुक्तिरूप्य, रज्जुसर्पादि पदार्थ न होनेपर भी भासमान होते हैं, तम-राहु आकाशमें विद्यमान रहनेपर भी नहीं भासित होते— ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः॥ (श्रीमद्भा० २।९।३३)

भगवती और मायाका वैलक्षण्य

शक्ति शब्दसे जैसे अचित् प्रकृतिके अतिरिक्त पराप्रकृतिरूप जीव और अधिष्ठानात्मक उपादानरूप ब्रह्म आदिका भी ग्रहण होता है, वैसे ही भगवती शब्दसे शुद्ध निर्गुण चिच्छक्तिका भी बोध होता है। इसीलिये उपासकोंकी उपास्यशक्ति या भगवतीको केवल प्रकृति या माया न समझना चाहिये, अपितु सच्चिदानन्दात्मिका भगवती ही उपास्य होती हैं।

रात्रिरूपिणी

रात्रिसूक्त रात्रिदेवताका प्रतिपादन करता है। रात्रिदेवता दो हैं, एक जीवसम्बन्धिनी, दूसरी ईश्वरसम्बन्धिनी। प्रथमका अनुभव सभी लोग करते हैं, जिसके सम्बन्धसे प्रतिदिन समस्त व्यवहार लुप्त हुआ करता है। ईश्वररात्रि वह है, जिसमें ईश्वरका व्यवहार भी लुप्त होता है, उसीको महाप्रलय कालस्वरूप कहा जाता है। उस समय दूसरी कोई भी