भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिया जाय, तो भी ज्ञानाभावका ज्ञान नहीं हो सकता और यदि स्वीकार कर लिया जाय तो भी ज्ञानाभावका बोध नहीं हो सकता; क्योंकि जैसे भूतलमें एक भी घट होनेपर घटाभाव नहीं कहा जा सकता, वैसे ही एक भी ज्ञान रहे तो ज्ञानाभावका अनुभव नहीं कहा जा सकता। परंतु जब भावरूप अज्ञान मानते हैं, तब तो साक्षीसे उसका बोध हो जाता है। फिर अनुयोगी- प्रतियोगीके ग्रहणाग्रहणका कोई भी विकल्प नहीं उठता; क्योंकि भावरूप अज्ञान साक्षीके द्वारा प्रकाशित हो सकता है। यद्यपि भावरूप अज्ञानके प्रत्यक्षमें भी विशेषण या निरूपकरूपसे घटादि विषयका भान होना आवश्यक होता है, फिर उसके भी ज्ञान रहनेपर उसका अज्ञान नहीं कहा जा सकता और उसके ज्ञान न रहनेसे विशेषण ज्ञानके बिना विशिष्ट अज्ञानका अनुभव भी नहीं हो सकेगा तथापि साक्षीके द्वारा ही अज्ञान और उसके विशेषण घटादिका भी भान होनेसे किसी भी दोषकी प्रसक्ति नहीं होती। ज्ञानरूपसे सर्ववस्तु साक्षिभास्य होती है, यह निगमान्तविदोंका सिद्धान्त है— 'ज्ञाततया अज्ञाततया वा सर्वं वस्तु साक्षिभास्यम्।' 'घटो ज्ञात:' यहाँ जैसे ज्ञानका विषय होकर साक्षीद्वारा घट भासित होता है, वैसे ही 'घटो न ज्ञायते' यहाँ भी अज्ञानके विषयरूपसे घट साक्षीरूपमें भासित होता है। योगनिद्रा, जड़शक्ति, अचित्, अज्ञान, अविद्या, माया, प्रकृति इत्यादि सभी शब्द एक ही अर्थके बोधक हैं। 'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते' (श्वेता० ६।८) (परमात्माकी पराशक्ति विविध प्रकारकी सुनी जाती है) इत्यादि स्थलोंकी शक्ति भी तद्रूप ही है। 'शक्तिकी अन्तरंगता-बहिरंगता'—कुछ लोग इस शक्तिको अन्तरंगा और माया, प्रकृति आदिको बहिरंगा शक्ति कहते हैं। भगवल्लोक, भगवद्विग्रहादिमें अन्तरंगा दिव्य शक्तिका उपयोग मानते हैं। जगन्निर्माणमें माया, अविद्यादि बहिरंग शक्तिका उपयोग मानते हैं। कुछ लोग अचित्को प्राकृत-अप्राकृत भेदसे दो प्रकारका मानते हैं। प्राकृत अचित्से जगत्की और अप्राकृत अचित्से भगवल्लोकादिकी रचना मानते हैं। कुछ लोग जगन्निर्माण अथवा लीलामयके लीलोपयोगी पदार्थोंकी सृष्टिके लिये भगवत्स्वरूपभूत ही अघटितघटनापटीयान् भगवदीयस्वात्मवैभव स्वीकार करते हैं। वही परमात्मा अविकृतपरिणामद्वारा सर्वरूपमें व्यक्त होता है। जैसे कल्पवृक्ष, चिन्तामणि, कामधेनु आदिसे तत्तत् अभीष्ट पदार्थकी सृष्टि होनेपर भी वे निर्विकार रहते हैं, वैसे ही परमात्मासे भी विविध विश्व बननेपर भी परमेश्वर निर्विकार ही रहता है। विचार करनेसे मालूम होगा कि यह स्वात्मवैभव यदि भगवत्स्वरूप ही है, तब तो फिर पृथक् नामरूप कल्पनाकी अपेक्षा नहीं हो सकती, तब कृत्स्नप्रसक्ति, निरवयवत्वव्याकोपादि शंकाओंका समाधान भी न हो सकेगा। सम्पूर्ण ब्रह्म यदि प्रपंच बन जायगा, तब तो मुक्तोपसृप्य ब्रह्म अवशिष्ट न रहेगा। यदि एकदेशेन ब्रह्म विश्व बनेगा, तब तो सावयवत्व, विकारित्व आदि दोष अनिवार्य ही होंगे। कल्पवृक्षादिकोंकी विलक्षण शक्तिकी महिमासे ही तादृक् विलक्षण कार्यकारिता सिद्ध होती है। मायाकी अनिर्वचनीयता इस तरह स्वात्मवैभव अथवा अचित् किंवा अन्तरंगा शक्ति यदि अधिष्ठानसे पृथक् होकर सत् है, तब तो श्रुति-सिद्धान्त बाधित होगा। यदि अत्यन्त असत् है, तो कार्यकारिता न बन सकेगी। विरुद्ध होनेसे सदसद्रूपता भी नहीं कही जा सकती। फिर तो पारिशेष्यात् अनिर्वचनीय मानना होगा। इस तरह अवान्तर चाहे कितने भी भेद मान लिये जायें, परंतु अनिर्वचनीयत्वेन रूपेण उन सबकी एकता ही है। 'देवदत्तनिष्ठप्रमा तन्निष्ठप्रमाप्रागभावातिरिक्ता- नादिप्रध्वंसिनी प्रमात्वात्, यज्ञदत्तनिष्ठप्रमावत्।' अर्थात् देवदत्तनिष्ठ प्रमा अपने प्रमाके प्रागभावसे अतिरिक्त किसी अनादिकी प्रध्वंसिनी है, प्रागभावसे अतिरिक्त अनादि भावरूप अज्ञान ही हो सकता है, इस अनुमानसे भी अनादि अज्ञान सिद्ध होता है। इसीको