भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 510, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें५०० भक्तिसुधा सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥ (गीता १४।४) गुणमयी प्रकृतिका अतिक्रमण बहुत ही कठिन है। अधिष्ठान ब्रह्मके साक्षात्कारसे ही उसका अतिक्रमण हो सकता है, अन्यथा नहीं— 'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।' (गीता ७।१४) भूतप्रकृतिको बाधित करके ही परप्राप्ति होती है— 'भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥' (गीता १३।३४) कहीं-कहीं अविद्याको 'क्षर' और विद्याको 'अमृत' कहा है— 'क्षरन्त्वविद्याऽमृतं तु विद्या विद्याऽविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः।' पुराणोंमें 'जो सृष्टिमें परमा है, वही प्रकृति है', ऐसा प्रकृतिका अर्थ किया गया है— 'प्रकृष्टवाचकः प्रश्च कृतिश्च सृष्टिवाचकः। सृष्टौ या परमा देवी प्रकृतिः सा प्रकीर्तिता॥' चतुष्कपर्दा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते। तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतु- र्यत्र देवा दधिरे भागधेयम्॥ —इस मन्त्रमें उसी भगवतीके अविद्यारूपका वर्णन है। माया स्थूल, सूक्ष्म, कारण और समाधिरूप तुरीय—इन चार रूपोंमें प्रकट होती है, युवती रहती है, सुपेशा—सुन्दर रूपवाली, घृतके समान प्रतीत होती है, ज्ञानोंको ढँकनेवाली है, जीव, ईश्वर दोनों ही उससे सम्बन्ध रखते हैं। तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽ- प्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्। तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्- पसस्तन्महिना जायतैकम्॥ इस वचनसे भी एक तत्त्वावरक तमके अस्तित्वका पता लगता है। सा च ब्रह्मस्वरूपा च नित्या सा च सनातनी। यथात्मा च तथा शक्तिर्यथाग्नौ दाहिका स्थिता॥ अतएव च योगीन्द्रैः स्त्रीपुम्भेदो न मन्यते॥ 'सर्वं ब्रह्ममयं जगत्' अहमेवासपूर्वन्तु नान्यत्किञ्चिन्नगाधिप। तदात्मरूपं चित्संवित्परब्रह्मैकनामकम्॥ आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्। अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं प्रसुप्तमिव सर्वतः॥ आदि वचनोंसे भी उसी तत्त्वकी सिद्धि होती है। माया और अविद्या मायाको ही कहीं-कहीं अविद्या और अज्ञान शब्दसे भी कहा गया है। यहाँ अज्ञान ज्ञानका अभावरूप नहीं, किंतु ज्ञाननिवर्त्य, भावरूप, अनिर्वचनीय पदार्थ ही है। तभी उसमें आवरणहेतुता बन सकती है। 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम् (गीता ५।१५)' इस वचनमें अज्ञानको ब्रह्मस्वरूप ज्ञानका आवरक कहा गया है। यह तभी बन सकता है, जब अज्ञान भी भावरूप हो; क्योंकि असत् किसीका आवरक नहीं हो सकता। जैसे अज्ञानको आवरक कहा गया है, वैसे ही मायाको भी आवरक कहा गया है— 'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७।२५) 'मैं' अर्थात् अस्मत्पदलक्ष्य परब्रह्म योगमायासे आवृत है, इसीलिये स्वप्रकाश होनेपर भी उसे लोग नहीं जानते। 'अहमज्ञः', 'मामहं न जानामि' इस रूपसे अज्ञानका प्रत्यक्ष अनुभव होता है। 'त्वामहं न जानामि' इस रूपसे भी अज्ञानका अनुभव होता है। यदि अज्ञान, ज्ञानाभाव ही हो, तब तो उसका ऐसा अनुभव ही न बन सकेगा; क्योंकि अभावके ग्रहणमें अनुयोगी-प्रतियोगी दोनोंके ग्रहणकी अपेक्षा होती है। जैसे घट और भूतलके ज्ञानके बिना भूतलनिष्ठ घटाभावका ज्ञान नहीं हो सकता, वैसे ही आत्मा और ज्ञानरूप अनुयोगी-प्रतियोगीके ज्ञानके बिना ज्ञानाभावका बोध भी नहीं हो सकेगा। यदि अनुयोगी-प्रतियोगीका ज्ञान स्वीकार न