भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 509

श्रीभगवती-तत्त्व ४९९ नित्य है, वैसे ही नित्य-अनित्यरूपसे शक्ति भी दो अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते प्रकारकी माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। आधेय जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ शक्तिको भी अप्रमाण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि (श्वेताश्वतरोपनिषद् ४।५) ‘व्रीहीन् प्रोक्षति’ इत्यादि द्वितीया श्रुतियोंसे व्रीहि अर्थात् जैसे कोई लोहित-शुक्लकृष्ण रंगकी आदिमें अतीन्द्रिय शक्तिका अस्तित्व सिद्ध होता है। कबरी बकरी अपने समान ही बहुत-से बच्चोंको ‘चेतन धर्म अदृष्टका अचेतन व्रीहि आदिमें उत्पन्न करती है, वैसे ही सत्त्व, रज, तम तीनों रहना सम्भव न होनेसे व्रीह्यादिविषयकक्रियाजन्यमात्र गुणोंवाली प्रकृति भी अपने समान ही त्रिगुण महदादि होनेसे ही तदीयत्वकी प्रतिपत्ति हो सकती है, अतः प्रपंचका निर्माण करती है। आवरणात्मक होनेसे वहाँ ‘व्रीहीन् प्रोक्षति’ में ‘ग्रामं गच्छति’ में प्रयुक्त उसका तमोगुण ही कृष्णरूप है, प्रकाशात्मक होनेसे ‘ग्रामम्’ इस द्वितीया विभक्तिके तुल्य व्रीहीन् द्वितीया सत्त्वगुण ही शुक्ल रंग है, रंजनात्मक होनेसे रजोगुण श्रुति गौण है, ऐसा जो कहा गया था, वह भी ठीक ही लोहित रंग है। जैसे कबरे बच्चोंवाली कबरी नहीं; क्योंकि धर्माधर्मरूप अदृष्टसे अतिरिक्त ही कोई बकरीका उपभोग करते हुए कोई बकरे उसका एक अतिशय मान्य है, जो तण्डुल, पिष्ट, पुरोडाशादि- अनुगमन करते हैं, कोई उससे भोग प्राप्तकर विरक्त परम्परासे प्रधानापूर्व उत्पन्न करता है। इसे न मानें होकर उसे त्याग देते हैं, वैसे ही कोई जीव महदादि अर्थात् व्रीह्यादि स्वरूपसे ही यदि उस प्रधानापूर्वको प्रपंचवती त्रिगुणा प्रकृतिका उपभोग करते हुए उसका उत्पन्न कर सकते तो प्रोक्षणादि विधान व्यर्थ हो अनुगमन करते हैं, कोई उससे भोगापवर्ग प्राप्त करके जायगा। दृष्ट फल न दिखलायी पड़नेपर अदृष्ट उसको त्याग देते हैं। यह अजा भी माया ही है। फलकी कल्पना करनी पड़ती है और मुख्य अर्थ ईश्वरको कोई भी कार्य करनेके लिये प्रकृतिकी सम्भव होनेपर लक्षणा करनेका अवकाश नहीं रहता। अपेक्षा होती है। इस प्रकार लीलावतीकारके दिये हुए दूषणका ‘प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥’ भी निराकरण किया गया। शक्तिके अस्तित्वमें उपर्युक्त (गीता ४।६) रीतिसे आगम, अर्थापत्ति और अनुमानरूप प्रमाणोंका अर्थात् ईश्वर अपनी प्रकृतिका ही सहारा लेकर संक्षिप्त दिग्दर्शन करनेसे यह नहीं कहा जा सकता अवतीर्ण होते हैं। ईश्वरकी अध्यक्षतामें प्रकृति ही कि किसी प्रमाणसे शक्ति सिद्ध नहीं होती। चराचर प्रपंचका निर्माण करती है- मायारूपिणी भगवती ‘मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।’ मायारूपमें भी उसी भगवतीके ही एक स्वरूपका (गीता ९।१०) वर्णन होता है- भगवान् स्वयं कहते हैं कि प्रकृति मेरी योनि ‘मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।’ है, उसीमें मैं गर्भाधान करके विश्वका निर्माण (श्वेताश्वतरोपनिषद् ४।१०) करता हूँ- अर्थात् मायाको ही विश्वकी प्रकृति समझना मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। चाहिये और मायाविशिष्ट ब्रह्मको ही परमेश्वर सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥ समझना चाहिये। उसीको अन्यत्र ‘अजा’ शब्दसे (गीता १४।३) निरूपित किया गया है- सम्पूर्ण प्राणियोंमें जो मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां उन सबकी प्रकृति ही जननी है और मैं बीज प्रदान बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः। करनेवाला पिता हूँ-