भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 508

निर्विशेष माननेपर उन्हींको अन्त्यविशेष मानना पड़ता है, वैसे ही नित्य द्रव्योंको भी स्वभाववशात् व्यावृत्ति- बुद्धिजनकत्व होनेसे अन्त्यविशेषका अपलाप हो जायगा। इसी तरह कालादिका भी अपलाप प्रसक्त होगा। अतः स्वभावाश्रयणसे काम नहीं चल सकता। यदि स्वभावातिरिक्त शक्तिमें कहीं भी प्रमाण नहीं है, यह कहा जाय तो यह भी ठीक नहीं है। यदि कहा जाय कि जहाँ प्रमाण है, वहाँ-वहाँ वस्त्वन्तराधीन ही प्रमाण-व्यवहार हुआ करता है और जहाँ वह नहीं है, वहाँ उसके स्वभाव-भेदसे ही व्यवहार होता है, ऐसी व्यवस्था है तो यहाँ भी प्रमाण होनेसे ही स्वरूपसे अतिरिक्त शक्तिका अंगीकार कर लेना चाहिये, ऐसी स्थितिमें स्वभाववादका अवलम्बन अनावश्यक है। इस तरह अर्थापत्तिके अतिरिक्त— 'वह्निः अदृष्टातीन्द्रियस्थितस्थापकेतरभावाश्रयः गुणवत्त्वाद् घटवत्।' यह अनुमान भी शक्तिके अस्तित्वमें प्रमाण है। 'ईश्वर माननेवालोंके मतमें अतीन्द्रियता सिद्ध नहीं है', यह भी कहना ठीक नहीं; क्योंकि अतीन्द्रिय शब्दका अर्थ है प्रमाणान्तरसे उपनीत विशेषणके अतिरिक्त और अनुव्यवसायके अतिरिक्त अस्मदादि प्रत्यक्षका अविषय होना। वह अतीन्द्रियत्व गुरुत्वादि और भावनादिमें प्रसिद्ध होनेसे प्रशस्तपादने कहा है कि गुरुत्व, धर्माधर्म और भावना अतीन्द्रिय है— 'गुरुत्वधर्माधर्मभावना अतीन्द्रियाः।' यहाँ भावना पद स्थितिस्थापकका भी उपलक्षण है। प्रश्न हो सकता है कि 'यहाँ आश्रय शब्दसे आधारमात्र विवक्षित है या उसका समवायित्व? वह्नि कदाचित् परमाणु या वायुका आधार होकर सिद्धसाधनता होनेसे प्रथम पक्ष नहीं माना जा सकता। दूसरी बात भी नहीं कही जा सकती; क्योंकि समवाय न माननेवाले भाट्टके मतमें विशेषण अप्रसिद्ध हो जायगा।' परंतु ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि समवाय न मानते हुए भी स्वीय रूपादिके समान अयुत सिद्ध होनेके कारण अग्निकी विशिष्ट धर्माधारता ही आश्रय शब्दका अर्थ है। अतीन्द्रिय कर्माश्रय होनेसे मीमांसककी अर्थान्तरता कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि प्रभाकरकी तरह शक्ति माननेवाले भाट्ट और वेदान्ती भी कर्मकी अतीन्द्रियता नहीं मानते। विपक्षमें वह्निस्वरूप ही कारण होनेसे प्रतिबन्धके भावकी कारणताका पहले ही निराकरण किया जा चुका है, अतः मन्त्रादिके रहनेपर समान रूपसे कार्य-जननप्रसंग बाधक है। यह भी कहना ठीक नहीं कि 'एवंविध धर्माश्रय होनेसे गुण-कर्मादि भी द्रव्य कहे जायेंगे'; क्योंकि वे गुणके अधिकरण नहीं हैं। यदि कहा जाय कि 'एतादृश धर्माश्रय होनेसे गुणाधिकरण भी हो जाय' तो यह ठीक नहीं; क्योंकि इसका विपर्ययमें पर्यवसान नहीं होता। यदि कहा जाय कि 'जो गुणका अधिकरण नहीं है, वह एवंविध धर्मका अधिकरण नहीं होता, ऐसा प्रतिवादिसम्मत उदाहरण होनेसे उक्त प्रसंगका विपर्ययमें पर्यवसान हो जायगा; क्योंकि शक्तिके अतिरिक्त सभी पक्ष कोटिमें निक्षिप्त हैं।' इस तरह प्रथम अनुमानका समर्थन किया गया। अब यदि दूसरे अनुमानके सम्बन्धमें कहा जाय कि 'वेदान्ती ईश्वरको मानते हैं, इसलिये उभयवादिसम्मत होनेके कारण तदतिरिक्त न होनेसे ईश्वर अर्थान्तर न हो, पर ईश्वर न माननेवाले मीमांसकोंको तो ईश्वरसे अर्थान्तरता होती है' तो यह ठीक नहीं; क्योंकि जन्यभावसे जन्य ऐसा दूसरा विशेषण देकर भाट्टके मतमें अर्थान्तरका परिहार किया जा सकता है। यदि कहा जाय कि 'ऐसी स्थितिमें नित्य पदार्थोंमें शक्तिका समर्थन न किया जा सकेगा, तो यह भी उचित नहीं', क्योंकि अनित्य पदार्थोंमें शक्ति सिद्ध हो जानेपर उसी दृष्टान्तसे नित्य पदार्थोंमें भी शक्तिकी सिद्धि हो सकती है। शक्ति एक ही नहीं, अपितु प्रत्येक पदार्थमें भिन्न-भिन्न है। जैसे कि अवयवावयविमें अनित्य होनेपर भी जल, तेज आदिके परमाणुओंमें रूप जैसे