भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

श्रीभगवती-तत्त्व ४१७ निश्चित होती है। प्रकृतमें स्वपुष्कल कारणसे कार्योत्पत्ति हो सकती है, तब प्रतिबन्धकाभावको कारण मानना आवश्यक नहीं है और इस मतमें अन्योन्याश्रयताका वारण करना भी कठिन होगा। यद्यपि मण्यादिकी कार्यप्रतिकूलताका निश्चय अन्वय-व्यतिरेकसे हो सकता है तथापि विसामग्रीरूपता लक्षणप्रतिबन्धत्व तदीय अभावकी सामग्रीके अन्तर्भाव विज्ञानके सापेक्ष है; क्योंकि विसामग्री प्रतिबन्ध है, यह मान्य है। अतः प्रतिबन्धत्व और सामग्रीत्वका ज्ञान परस्पर सापेक्ष होनेसे अन्योन्याश्रयता दुर्निवार होगी, अर्थात् वैसामग्र्य ही प्रतिबन्ध है और प्रतिबन्धाभावरूप कारण-वैकल्य ही वैसामग्र्य है। ऐसी स्थितिमें मणि आदिके वैसामग्र्यरूप प्रतिबन्धत्वका ज्ञान मन्त्रादि सम्बन्धी अभाव सामग्रीका अन्तर्भाव ज्ञानसापेक्ष है और मन्त्रादिके अभावका सामग्र्यन्तर्भाव ज्ञान, मणि आदिके प्रतिबन्धत्व ज्ञानके अधीन है; क्योंकि प्रतिबन्धाभावरूप कारण-वैकल्यसे वैसामग्र्यका उपपादन होगा, अतएव अन्योन्याश्रयता सुतरां सिद्ध है। यदि कहा जाय कि 'मण्यादिके विसामग्रीत्वका ज्ञान भले ही मण्याद्यभाव-सम्बन्धी सामग्रीके अन्तर्भाव ज्ञानके सापेक्ष रहे, पर वह्निस्वरूपकी तरह अन्वय- व्यतिरेकसे ही मण्यादिके अभावकी सामग्र्यन्त- र्भाव-सम्बन्धी अवगति हो सकती है, अतः अन्योन्या- श्रयता न होगी' तो यह ठीक नहीं; क्योंकि वहाँ यह शंका होगी कि क्या प्रत्येक मण्याद्यभाव अन्वय- व्यतिरेकद्वारा कारणरूपसे निश्चित किये जाते हैं या प्रतिबन्धाभावरूप उपाधिसे क्रोड़ीकृत होकर ? पहली बात हो नहीं सकती; क्योंकि मण्याद्यभाव अनन्त हैं, उनके उपसंग्राहकके बिना प्रत्येकके अन्वय-व्यतिरेकका निश्चय सौ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता। दूसरा पक्ष मानें तो विसामग्रीरूप प्रतिबन्धज्ञानके अधीन प्रतिबन्धाभावत्वरूप उपाधिका ज्ञान हुए बिना मण्याद्य- भाव-सम्बन्धी सामग्र्यन्तर्भावका ज्ञान होना कठिन है, अतः अन्योन्याश्रयताका निराकरण फिर भी बना ही रहेगा, इसलिये द्वितीय पक्ष भी अस्वीकार्य है। शक्ति पक्षमें प्रतिबन्धकी जो असम्भवता पीछे कही गयी, वह भी ठीक नहीं है, अन्यथा शक्तिको न माननेवालोंको भी कारणोंके कार्योदासीन्यको ही प्रतिबन्ध मान लेना पड़ेगा; क्योंकि वैसामग्र्यरूप प्रतिबन्धका तो उपर्युक्त अन्योन्याश्रय दोषरूप रीतिसे खण्डन किया ही जा चुका है। अतः प्रतिबन्धाभावके कारण न बननेसे कार्यार्थापत्तिकी बिना शक्तिको स्वीकृत किये, अन्यथा उपपत्ति हो ही नहीं सकती। शक्तिको स्वीकार किये बिना उपादानोपादेयभाव- नियमकी उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः उसे भी शक्तिमें प्रमाण मानना ही चाहिये। वहाँ स्वभावभेदसे ही उपपत्ति करके जो पहले अन्यथा उपपत्ति कही गयी थी, उसका अभिप्राय क्या है ? क्या शक्तिवादीको भी अन्ततोगत्वा जब स्वभावकी शरण लेनी ही पड़ती है, तब अच्छा है कि पहलेसे ही स्वभाव मान लिया जाय यह अथवा स्वभावातिरिक्त शक्तिमें प्रमाणका न होना। यदि प्रथम पक्ष तो वैसा माननेसे सर्वत्र स्वभाववादका पाद-प्रसार होनेसे सामान्य, समवाय एवं विशेष आदिका भी अपाकरण प्रसक्त हो जायगा। अनवस्था भय सत्तासे जैसे सत्तान्तर माने बिना ही स्वभाव-विशेषवश सद्द्व्यवहारका हेतुत्व मान लिया जाता है, वैसे ही अन्यत्र द्रव्यादिमें भी स्वभावविशेषसे सद्द्व्यवहार उत्पन्न हो जानेसे सत्तासामान्यका अपलाप हो जायगा। इसी तरह— 'समवायवान् अयं घटः।' यहाँ अनवस्था भयसे जैसे समवायान्तर माने बिना ही समवायकी घटके प्रति विशेषणता मान ली जाती है, वैसे ही 'शुक्लः पटः, चलति चैलाञ्चलम्' यहाँ भी गुण-कर्ममें स्वभाव-भेदसे ही विशेषण- विशेष्य भाव होकर समवायका अपलाप हो जायगा। इसी प्रकार जैसे अन्त्यविशेषोंमें स्वभाववशात् परस्पर व्यावृत्ति मानी जाती है, क्योंकि विशेषोंमें विशेषान्तर माननेसे उनकी भी, अनुगतरूपवत्तासे रूपादिकी तरह, एक तो अन्त्यविशेषत्वकी हानि होगी और दूसरे, अनवस्थाप्रसक्त होगी। अगत्या किन्हीं विशेषोंको