भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१६ भक्तिसुधा यदि यह कहा जाय कि 'असम्बद्ध ही अभाव इन्द्रियग्राह्य हो तो क्या हानि है; क्योंकि उसकी प्रतीति इन्द्रियान्वय-व्यतिरेककी अनुविधायिनी होनेसे अपरोक्ष है और इसके अतिरिक्त दूसरी गति भी नहीं है' तो यह कहना भी उचित नहीं है; क्योंकि अयोगिप्रत्यक्षकी प्रमितिमें इन्द्रियोंसे सम्बद्ध अर्थग्राहकत्व-नियमका निराकरण नहीं किया जा सकता और अभावकी प्रतीतिका अपरोक्षत्व सिद्ध न होनेसे इन्द्रियान्वय और व्यतिरेक अधिकरणके ग्रहणमात्रमें उपक्षीण हो जानेसे अन्यथासिद्ध भी हो जाते हैं। इसपर यह कहा जा सकता है कि 'नहीं, अधिकरणके ग्रहणमात्रमें अन्वय-व्यतिरेककी उपक्षीणता कहना ठीक नहीं है; क्योंकि अभावको इन्द्रियग्राह्य न माना जायगा' तो अन्धद्वारा त्वगादिसे घटादिरूप अधिकरणके गृहीत होनेपर उसको रूपाभावकी प्रतीति मान लेना पड़ेगा; क्योंकि अधिकरण तो उस अन्धसे गृहीत ही है। यदि कहें कि 'चक्षुरिन्द्रियके न होनेसे वहाँ अन्धेको रूपाभावका प्रत्यक्ष न होगा' तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि इन्द्रिय अभावका ग्राहक है ही नहीं, अतएव यह कहा जाय कि 'अन्धेको प्रतियोगी ग्राहक इन्द्रिय न होनेसे ही रूपाभावकी प्रतीति न होगी। तथा च अभावकी ऐन्द्रियकत्वसिद्धि हो जाती है।' परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि फिर अभावको प्रतियोगिग्राहक इन्द्रियग्राह्य माननेवालेके मतमें भी अनन्धको भी असन्निहित मेरु आदिमें घट एवं उसके रूपादिके अभावकी चाक्षुषता क्यों न होगी? यदि कहा जाय कि 'वहाँ प्रतियोगीके चाक्षुष होनेपर भी अधिकरणके चाक्षुष न होनेसे रूपाभावका चाक्षुषत्व नहीं होता' तो इधरसे भी कहा जा सकता है कि इसीलिये त्वगिन्द्रियसे गृहीत घटादिमें अन्धेको रूपाभावकी प्रतीति नहीं होती; क्योंकि प्रतियोगिग्राहक इन्द्रियद्वारा घटादिरूप अधिकरणका वहाँ ग्रहण नहीं होता। यदि कहा जाय कि 'तब तो घ्राणेन्द्रियके अगोचर कुसुमादि या चक्षुरिन्द्रियग्राह्य वायुमें गन्ध या रूपके अभावका प्रत्यक्ष न होगा' तो इसपर यही कहना होगा कि भले न हो, वहाँ वायु आदिमें रूपादिका अभाव चाक्षुष न होनेपर भी उनमें रूपाभाव ज्ञानरूप व्यवहारमें कोई बाधा नहीं पड़ती। षष्ठ प्रमाणवादियोंके यहाँ सर्वत्र यह नियम नहीं है कि अभाव अनुपलब्धिगम्य ही है; क्योंकि व्यापकाभावसे व्याप्यके अभावको और कारणाभावसे कार्याभावको अनुमेय मान लिया गया है अर्थात् यदि वक्ष्यमाण तत्तत् भट्टपादादि वृद्धोंकी सम्मतिसे अभावकी प्रमाणान्तरगम्यता भी है तो योग्यानुपलब्धिगम्यस्थलमें ही प्रतियोगिग्राहकद्वारा अधिकरणके ग्रहणका नियम है; क्योंकि अभावकी उपलब्धिका व्यापकीभूत जो अनुपलब्धि आदि कारण है, उसके अतिरिक्त इन्द्रियादिरूप कारणकी पुष्कलता ही योग्यता है और इन्द्रियके उसका अन्तःपाती होनेके कारण उसके अभावमें भी योग्यता न बनेगी। जहाँ प्रमाणान्तरगम्यता होती है, वहाँ उसके बिना भी अभावका ग्रहण हो सकता है, जैसे व्यापकाभावसे व्याप्याभावका अनुमान। इस विषयमें भट्टपाद लिखते हैं कि अग्नि और धूमरूप भावके नियम्यत्व-नियन्तृत्व जैसे माने जाते हैं, वे ही नियम्यत्व और नियन्तृत्व अग्नि-धूम-सम्बन्धी अभावके विपरीत प्रतीत होता है। भावावस्थामें धूम नियन्ता और अग्नि नियम्य होता है और अभावमें इसके विपरीत स्थिति होती है अर्थात् तब धूमाभाव नियम्य और अग्निका अभाव नियन्ता होता है— नियम्यत्वनियन्तृत्वे भावयोर्यादृशी मते। विपरीते प्रतीयते त एव तदभावयोः ॥ कारणाभावसे कार्याभावके अनुमान विषयमें श्रीमण्डनमिश्रने ब्रह्मसिद्धिमें बतलाया है कि हेतुके अभावसे फलाभावका नियम होनेसे दोषाभावसे विपर्ययाभावका अनुमान किया जा सकता है— 'विपर्ययाभावस्तु युक्तोऽनुमातुं हेत्वभावे फलाभाव इति।' अतएव स्थलविशेषमें अनन्यथा सिद्धि अन्वय- व्यतिरेकबलसे अनुपलब्धिकी अभाव-प्रतीतिमें कारणता