भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 513, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंवस्तु नहीं रहती, केवल मायाशबलित ब्रह्म ही रहता है, उसे ही अव्यक्त भी कहा जाता है। 'ब्रह्ममायात्मिका रात्रिः परमेशलयात्मिका। तदधिष्ठातृदेवी तु भुवनेशी प्रकीर्तिता ॥' (देवीपुराण) ब्रह्ममायात्मिका रात्रिकी अधिष्ठात्री देवता ही भगवती भुवनेश्वरी है। 'रात्री व्यख्यदायती पुरुत्रा देव्यक्षभिः। विश्वा०' इत्यादिका सारांश यह है कि 'सर्वकारणभूता चिच्छक्ति भगवती पूर्वकल्पीय अनन्त जीवोंके अपरिपक्व अतएव फलानभिमुख सत्-असत् कर्मोंको देखकर फल प्रदानका समय न होनेसे ईश्वरीय प्रपंचको अपनेमें ही प्रलीन कर लेती है। पश्चात् वही रात्रिरूपा चिच्छक्ति फलप्रदानका समय आनेपर महदादिद्वारा प्रपंचका निर्माण करके असांकर्येण तत्तत्प्राणियोंके कर्मोंको देखती है। फिर उन कर्मोंका फल प्रदान करती है। इससे रात्रिरूपा भगवतीकी सर्वज्ञता स्पष्ट है। वह अमर्त्या देवी अन्तरिक्षोपलक्षित समस्त विश्वको अपने स्वरूपसे पूरित कर देती है। नीची वस्तु लता-गुल्मादि और उच्छ्रित वृक्षादिको भी अधिष्ठान चैतन्यसे पूरित कर देती है और वही परा चिद्रूपा देवी स्वाकार-वृत्तिप्रतिबिम्बितस्वरूप चैतन्य ज्योतिसे तम उपलक्षित सम्पूर्ण प्रपंचको बाधित कर देती है। आती हुई देवनशील रात्रि चिच्छक्ति प्रकाशस्वरूपा उषा (प्रातःकाल)-को अर्थात् अविद्याकी आवरण शक्तिको तिरस्कृत करती है। यद्यपि रात्रिद्वारा प्रकाशस्वरूपा उषाका निराकरण असम्भव मालूम पड़ता है तथापि यहाँ चिद्रूपा रात्रि ही परम प्रकाशरूपा है, तदपेक्षया सन्ध्या या उषा अन्धकाररूप ही है। जैसे सूर्यके प्रकट होनेपर सन्ध्या मिट जाती है, वैसे ही चिच्छक्तिके स्वाकार वृत्तिपर प्रतिबिम्बित होनेपर अविद्याकी आवरण-शक्ति मिट जाती है। आवरण-शक्तिके दग्धबीज हो जानेपर प्रारब्धक्षयके अनन्तर मूलाज्ञानरूप तम सर्वथा नष्ट हो जाता है। दोनों शक्तियोंके नष्ट हो जानेपर मूलाज्ञानका भी अवशेष नहीं रहता। वह रात्रिदेवता परा चिच्छक्ति हम सबपर प्रसन्न रहे, जिसकी प्राप्तिमें हम सब सुखस्वरूपमें वैसे स्थित होते हैं, जैसे अपने घोसलेमें पक्षी रात्रिवास करता है। ग्रामके आसपास सभी लोग तथा गवाश्वादि, पक्षी तथा भिन्न प्रयोजनसे चलनेवाले पथिक एवं श्येन आदि उस रात्रिमें प्रविष्ट होकर सुखसे स्थित होते हैं। दिनके संचारसे भ्रान्त प्राणियोंको यह रात्रि ही सुख पहुँचाती है, उस समय सब लोग विश्राम करने लगते हैं। सारांश यह है कि जो प्राणी भुवनेश्वरीके नामतकसे भी परिचित नहीं हैं, वे भी करुणामयी परा चिच्छक्ति अम्बाकी करुणासे ही उसके अंकमें जाकर सुखसे उसी तरह सोते हैं, जिस तरह मूढ़ बालक माताकी करुणासे स्वस्थ सोते हैं। ऐसी करुणामयी यह चिच्छक्ति है। हे ऊर्म्ये ! रात्रिदेवि ! चिच्छक्ते ! आप परम दयामयी हैं, अतः हमारे कृत्योंकी ओर न देखकर हिंसा करनेवाले मारक पापरूप वृक (भेड़िया) और नानावासनारूपी वृकीको हमसे पृथक् कर दो और चित्तवित्तके अपहारक कामादि दोषोंको भी हमसे हटा दो और हमारे लिये आप सुखेन तरणी या और क्षेमकरी हो। सम्पूर्ण वस्तुओंमें फैला हुआ कृष्णवर्ण स्पष्ट अज्ञान हमको घेरे हुए है। हे उषादेवते ! आप ऋणके समान उस अज्ञानको दूर कर दो। जैसे अपने स्तोताओंका ऋण आप दूर करती हैं, वैसे ही हमारे अज्ञानको दूर करें। हे रात्रिदेवते ! चिच्छक्ते ! कामधेनुके समान सर्वाभीष्ट- दायिनी आपको प्राप्त करके स्तुतिजपादिसे अभिमुख करता हूँ। आप प्रकाशरूप परमात्माकी पुत्री हैं।' परमात्मासे ही अन्यत्र चैतन्यशक्तिकी अभिव्यक्ति होती है, इस विवक्षासे भगवतीको दिवोदुहिता कहा गया है। चण्डी एक दृष्टिसे भगवतीको परब्रह्मकी महिषी कहा जाता है— 'त्वमसि परब्रह्ममहिषी।' उसी दृष्टिसे उनका नाम 'चण्डिका' है। 'चण्डभानुः चण्डवातः' इत्यादि स्थानोंमें इयत्तान-