भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 514

५०४ भक्तिसुधा विच्छिन्न असाधारण-गुणशाली वस्तुमें 'चण्ड' शब्दका प्रयोग होता है। देश-कालवस्तुपरिच्छेदशून्य वस्तु परमात्मा ही है। भानु, वात आदिका विशेषण होनेसे वह संकुचित वृत्ति हो जाता है। 'चडि कोपे' धातुसे 'चण्ड' शब्दकी निष्पत्ति है। 'कस्य बिभ्यति देवाश्च कृतरोषस्य संयुगे।' किसका रोष उत्पन्न होनेसे देवताओंको भी डर होता है? प्रसादो निष्फलो यस्य कोपोऽपि च निरर्थकः। न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्ढं पतिमिव प्रजाः॥ अर्थात् जिसका क्रोध और प्रसाद निष्फल होता है, उसे प्रजा उसी तरह स्वामी नहीं मानती, जिस तरह षण्ढ पुरुषोंको स्त्रियाँ पति नहीं बनातीं। इसीलिये सफल उग्रक्रोध या उग्र क्रोधवाला पुरुष भी 'चण्ड' कहलाता है। महाभयजनक कोप ही 'चण्ड' कहा जाता है और वह भयजनक कोप परमेश्वरका ही है। 'नमस्ते रुद्र मन्यवे' इस वचनमें रुद्रके मन्यु-कोपको प्रणाम किया गया है। संसारमें चण्डसे ही सब डरते हैं। स्पष्ट है कि जिसका दण्ड प्रबल होता है, उसीका शासन चलता है। सर्वसंहारकसे सब डरते हैं, सर्वसंहारक मृत्युसे भी सब डरते हैं, मृत्यु भी चण्ड है। भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चमः॥ (तैत्तिरीय० २।८) अर्थात् परमेश्वरके डरसे वायु चलता है, उसीके भयसे सूर्य उदित होता है और उसीके भयसे अग्नि और इन्द्र भी अपना-अपना काम करते हैं। सर्वभयकारण मृत्यु भी जिससे डरता है, वही भगवान् परमात्मा है। उसको मृत्युका भी मृत्यु, कालका भी काल या महाकाल किंवा चण्ड कहा जा सकता है, वही सर्वसंहारक है। उससे भिन्न सब संहार्य कोटिमें आ जाता है। उत्पादक, पालक, ब्रह्मा, विष्णु आदि उसके स्वरूप ही हैं, इसीलिये वे भी असंहार्य हैं। यदि भिन्न होते तो अवश्य संहार्य होते, अन्यथा इसीको एकोनसर्वसंहारक (अमुकके अतिरिक्त सबका नाशक) कहना पड़ेगा। इसीलिये जिसका विश्व, वही उसका उत्पादक, वही पालक और वही संहारक है। एकेश्वरवाद सर्वत्र मान्य है ही, उसीको महद्भय वज्ररूप भी कहा गया है- 'महद्भयं वज्रमुद्यतम्' जैसे उद्यतवज्रके डरसे भृत्य लोग तत्परतासे काम करते हैं, वैसे ही परमात्माके डरसे सूर्य, इन्द्र, चन्द्र आदि सावधानीसे अपने-अपने कार्यमें संलग्न होते हैं। उसी चण्डकी स्वरूपभूता शक्ति पत्नी चण्डिका है। जैसे परमेश्वरके ही घोर रूपसे पृथक् शान्त रूप भी है 'घोरान्या शिवान्या' वैसे ही भगवतीके भी उग्र और शान्त दोनों ही रूप हैं। कुछ लोगोंका कहना है कि एक ही परब्रह्म मायासे धर्मी और धर्म दो रूपमें प्रकट होता है। सृष्टिके आरम्भमें जो 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय' 'सोऽकामयत', 'तत्तपोऽकुरुत'-इत्यादिसे ज्ञान, इच्छा और क्रियाका श्रवण है, यही तीनों ब्रह्मके धर्म हैं। यह सब धर्मीरूप ब्रह्मसे अभिन्न ही हैं; क्योंकि श्रुतिने ही इन्हें स्वाभाविकी कहा है-'स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।' यहाँ 'बल' से इच्छाका ग्रहण समझना चाहिये। ज्ञानेच्छाक्रियारूप धर्मको ही शक्ति कहा जाता है और वैसे ही समष्टि ज्ञानेच्छाक्रियारूप ब्रह्मधर्मरूपा शक्ति ही चण्डी है; यही महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती है। कार्यवशात् इसीका अनेक रूपमें प्राकट्य होता है। वस्तुतस्तु उसी चण्डरूप परमात्मामें ही पुंस्त्व, स्त्रीत्व भक्तभावनाके अनुसार है। पुंस्त्वविवक्षासे वही महारुद्र आदि शब्दोंसे, स्त्रीत्वविवक्षासे वही चण्डी, दुर्गा आदि शब्दोंसे व्यवहृत होता है। नवार्णमन्त्रार्थ नवार्णमन्त्रका भी अभिप्राय यही है। 'डामरतन्त्र' में उसका अर्थ इस प्रकार बतलाया गया है- निर्धूतनिखिलध्वान्ते नित्यमुक्ते परात्परे। अखण्डब्रह्मविद्यायै चित्सदानन्दरूपिणि। अनुसन्दध्महे नित्यं वयं त्वां हृदयाम्बुजे।