भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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अर्थात् हे निर्धूतनिखिलध्वान्ते ! हे नित्यमुक्ते ! हे परातपरतरे ! चित्सदानन्दरूपिणि माँ ! मैं अखण्ड ब्रह्मविद्याके लिये आपका अपने हृदयकमलमें अनुसन्धान करता हूँ। 'ऐं' इस वाग्बीजसे चित्स्वरूपा सरस्वती बोधित होती हैं; क्योंकि ज्ञानसे ही अज्ञानकी निवृत्ति होती है। महावाक्यजन्य परब्रह्माकारवृत्तिपर प्रतिबिम्बित होकर वही चिद्रूपा भगवती अज्ञानको मिटाती हैं। 'ह्रीं' इस मायाबीजसे सद्रूपा महालक्ष्मी विवक्षित हैं। त्रिकालाबाध्य वस्तु ही नित्य है। कल्पित आकाशादि प्रपंचके अपवादका अधिष्ठान होनेसे सद्रूपा भगवती ही नित्यमुक्ता हैं। 'क्लीं' इस कामबीजसे परमानन्दस्वरूपा महाकाली विवक्षित हैं, सर्वानुभवसंवेद्य आनन्द ही परम पुरुषार्थ है। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' इस श्रुतिसे सिद्ध है कि सब कुछ आत्माके लिये ही प्रिय होता है, इसलिये आत्मस्वरूपा आनन्द ही शेषी है, तदितर सब शेष है। मानुषानन्दसे लेकर गन्धर्व, देवगन्धर्व, आजानजदेव, श्रौतदेव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति, ब्रह्मान्त उत्तरोत्तरशतगुणित आनन्द जिसका बिन्दुमात्र है, वह परमातिशायी ब्रह्मरूप आनन्द कहा गया है। वही परात्पर आनन्द महाकालीरूप है। 'चामुण्डायै' शब्दसे मोक्षकारणीभूत निर्विकल्पक ब्रह्माकार वृत्ति विवक्षित है। विपदादिरूप चमू (आकाशादिरूप सेना)-को जो नष्ट करके आत्मरूप कर लेती है, वही 'चामुण्डा' ब्रह्मविद्या है। अधिदैव (समष्टि)-के मूलाज्ञान और मूलाज्ञानरूप चण्ड- मुण्डको वशमें करनेवाली भगवती भी चामुण्डा कही गयी हैं— यस्माच्चण्डञ्च मुण्डञ्च गृहीत्वा त्वमुपागता। चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि॥ 'विच्चे' में 'वित्', 'च', 'इ' ये तीन पद क्रमेण चित्, सत्, आनन्दके वाचक हैं। 'वित्' का ज्ञान अर्थ स्पष्ट ही है, 'च' नपुंसकलिंग 'सत्' का बोधक है, 'इ' आनन्दब्रह्ममहिषीका बोधक है। इसका सारांश यही है कि हे चित्- सत्-परमानन्दरूपे ! निर्धूतनिखिलध्वान्ते ! नित्यमुक्ते ! परातपरे महासरस्वति ! महालक्ष्मि ! महाकालि ! हम आपके तत्त्वज्ञानको प्राप्त करनेके लिये आपका हृदयकमलमें ध्यान करते हैं। प्रथम चरित्र 'श्रीदुर्गासप्तशती' में यह स्पष्ट बतलाया गया है कि भगवतीकी कृपासे ही सम्यक् तत्त्वज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञानकी प्रशंसा सर्वत्र है, ज्ञानके होनेसे अज्ञान-मोहादि मिट जाते हैं। ज्ञान-सम्पादनके लिये ही श्रवणादि किये जाते हैं। जप, तप, यज्ञादि सबका परम उपयोग ज्ञानमें ही है। परंतु वह ज्ञान साधारण ज्ञान नहीं है, क्योंकि शब्दादि विषयोंका ज्ञान तो प्राणिमात्रको होता है। उलूकादि दिनमें अन्धे होते हैं, रात्रिमें नहीं; कोकादि रात्रिमें अन्धे होते हैं, दिनमें नहीं। लता, जलजन्तु आदि दिन-रात समान रूपसे अन्धे ही रहते हैं। राक्षस, मार्जार, तुरगादि दिन-रात समान चाक्षुष ज्ञानवाले होते हैं और सबकी अपेक्षा मनुष्योंमें अधिक ज्ञान होता है, परंतु अज्ञान उनमें भी होता है। पशु, पक्षी आदि सभी बहुत ज्ञानवाले होते हैं। व्यवहारज्ञान मनुष्यों-जैसा ही पशु-पक्षियोंमें भी दिखायी देता है। पक्षिगण स्वयं भूखे रहकर भी इतस्ततः से कणोंको लाकर अपने बच्चोंके मुँहमें छोड़ते हैं। मनुष्य भी प्रत्युपकारकी आशासे बच्चोंके भरण-पोषणमें तल्लीन रहते हैं, यह सब ज्ञान सामान्य ज्ञान है। इनसे संसारके मूलभूत अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती। यह महामायाका प्रभाव है, जिससे सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाश परब्रह्मका बोध नहीं होता। वही उपनिषज्ज्ञाननिष्ठ वसिष्ठ, भरत, विश्वामित्रादिकोंके भी चित्तको बलात् मोहित कर देती है। वही चराचर प्रपंचका निर्माण करती है, वही प्रसन्न होकर मुक्ति प्रदान करती है, विद्यारूपा होकर वही मुक्तिप्रदा है, अविद्यारूपसे वही संसारबन्धका हेतु है, वही भगवान् विष्णुकी योगनिद्रा