भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 516

५०६ भक्तिसुधा कहलाती है। जिस समय भगवान् शेषपर कल्पान्तमें विराजमान थे, उस समय कूर्मपृष्ठपर जलमें विलीन होनेके कारण पृथ्वी नवनीतके समान कोमल हो गयी। सृष्टिकालमें यह प्राणियोंको किस तरह धारण कर सकेगी, यह सोचकर भगवतीने विष्णुको अपनी योगनिद्रा शक्तिसे प्रसुप्त करके अपने वामहस्तकी कनिष्ठिकाके नखाग्र भागसे कर्णमल निकालकर उसीसे मधु नामक दैत्यको और दक्षिण कर्णस्थ मलसे कैटभको बनाया। उत्पन्न होकर वे दोनों दैत्य पहले कीटके समान ही प्रतीत हुए, पश्चात् महाबलवान् हो गये। वरदान देकर देवीके अन्तर्हित होनेपर विष्णुकी नाभिसे उत्पन्न कमलमें उन दोनोंने ब्रह्माको देखा। ब्रह्माको देखकर उन्होंने कहा—'हम तुम्हें मारेंगे। अगर तुम जीना चाहते हो तो विष्णुको जगाओ।' यह सुनकर ब्रह्माने जगत्प्रसू योगनिद्राकी अनेक स्तुतियोंसे प्रार्थना की। भगवतीने प्रसन्न होकर ब्रह्मासे वरदान माँगनेको कहा। ब्रह्माने भगवान्का जागना और दोनों असुरोंको मोह होना माँगा। माताने विष्णुको जगा दिया। विष्णुसे उन दैत्योंका पाँच हजार वर्षतक घोर युद्ध हुआ। महाप्रमत्त उन दैत्योंने महामायासे मोहित होकर विष्णुसे वर माँगनेको कहा। विष्णुने कहा—'तुम दोनों हमारे वध्य हो, हम यही वर माँगते हैं।' उन्होंने कहा—'अच्छा, जहाँ सलिलसे व्याप्त पृथ्वी न हो, वहाँ हमें मारो।' विष्णुने अपने जघन प्रदेशपर उनका सिर रखकर चक्रसे उन्हें काट दिया, पश्चात् उन्हींके मेदका विलेपनकर पृथ्वीको दृढ़ किया गया, इसीलिये पृथ्वीको 'मेदिनी' भी कहा जाता है। इस तरह भगवती ही अनेक रूपमें प्रकट होकर जगत्को धारण करती हैं। यही सृष्टि, स्थिति और संहार करती हैं, यही योगनिद्रा होकर विष्णुको विश्राम देती हैं, यही स्वाहारूपसे देवताओंको, स्वधारूपसे पितरोंको, वषट्काररूपसे श्रौतदेवताओंको तृप्त करती हैं। यही उदात्तादि स्वरों और सुधारूपमें विराजमान होती हैं। ह्रस्व, दीर्घ, प्लुतरूपमें किंवा अ, उ, म् रूपमें यही अक्षररूपा भगवती विराजमान होती हैं। अ, उ, म् इन तीनों वर्णों एवं तद्वाच्य विश्व, तैजस, प्राज्ञ आदिके रूपोंमें भी वे ही भगवती स्थित हैं। वाच्य-वाचकके अधिष्ठानरूप अर्धमात्रास्वरूपसे भी भगवती ही विराजमान हैं।