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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 517

श्रीभगवती-तत्त्व ५०७ नित्या, गौरी, धात्री, ज्योत्स्ना, इन्दुरूपिणी, सुखा, कल्याणी, वृद्धि, सिद्धि, नैर्ऋति, शर्वाणी, दुर्गा, दुर्गपारा, सारा, सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा, धूम्रा, अतिसौम्या, अतिरौद्रा, जगत्प्रतिष्ठा, कृति, विष्णुमाया, चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षान्ति, जाति, लज्जा, शान्ति, श्रद्धा, कान्ति, लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति, दया, तुष्टि, माता, भ्रान्ति, व्याप्ति, चितिरूपसे भगवतीको प्रणाम किया। निर्गुणा, सगुणा तथा सगुणामें भी सात्त्विकी, राजसी, तामसी भेदसे सब शक्तियाँ भगवतीमें ही अन्तर्भूत हो जाती हैं। देवता स्तुति कर ही रहे थे कि हिमाद्रि-कन्या पार्वती जाह्नवीमें स्नान करने आयीं। देवताओंसे उन्होंने प्रश्न किया कि ‘आपलोग किस देवताकी स्तुति कर रहे हैं?’ देवताओंका उत्तर देना ही था कि तबतक पार्वतीके ही शरीरसे प्रकट होकर शिवा भगवतीने पार्वतीसे कहा कि ‘शुम्भसे निराकृत होकर ये सब हमारी ही स्तुति कर रहे हैं।’ पार्वतीके शरीर-कोशसे निकली हुई अम्बिका लोकमें ‘कौशिकी’ नामसे प्रसिद्ध हुईं। कौशिकीके निकलनेपर पार्वती कृष्णवर्णकी हो गयीं। तभीसे वह ‘कालिका’ कहलाने लगीं। परमरूपवती कौशिकी अम्बिकाको कभी शुम्भ-निशुम्भके सेवक चण्ड-मुण्डने देखा और जाकर अपने स्वामीसे उसके रूपकी प्रशंसा की और उसे स्वाधीन बनानेकी सलाह दी। शुम्भ- निशुम्भने दूत भेजकर कहलाया कि ‘हमारी आज्ञा सर्वत्र अप्रतिहत है, संसारके सब रत्न, ऐरावत, उच्चैःश्रवा आदि हमारे पास हैं, तुम भी स्त्रीरत्न हो, हम रत्नभुक् हैं, अतः तुम भी हमारे पास आओ, हमारे पास आनेसे तुम्हें परमैश्वर्य प्राप्त होगा।’ भगवतीने गम्भीर स्मितके साथ कहा—‘ठीक है, परंतु मेरी प्रतिज्ञा है कि जो मुझे संग्राममें जीत लेगा, मेरा दर्प दूर करेगा, मेरे समान बलवान् होगा, वही मेरा भर्ता होगा। अतः शुम्भ या निशुम्भ कोई भी आकर मुझे जीतकर पाणिग्रहण कर ले’— यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति। यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥ तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महासुरः। मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु॥ (श्रीदुर्गासप्तशती ५।१२०-१२१) दूतने बहुत कुछ समझाया, परंतु देवीने कहा— ‘क्या करूँ, मेरी ऐसी प्रतिज्ञा ही है।’ दूतने जाकर सब बात सुना दी। इसपर धूम्रलोचन भेजा गया, घोर युद्धके बाद वह मारा गया। उसके पश्चात् शुम्भने चण्ड-मुण्डको भेजा। महासंग्राम हुआ, अम्बिकाने जब कोप किया, तब उनके ललाटसे करालवदना कालिका प्रकट हुईं। उन्होंने असुरोंके बल (सैन्य)- का भक्षण करना आरम्भ कर दिया। उन्होंने बड़े-बड़े गज, तुरंग, रथ, योद्धाओंको मुँहमें डालकर चबाना आरम्भ किया। सर्वनाश होते देखकर चण्ड आया और अनेक चक्रोंसे कालीको आच्छादित कर दिया। देवीके मुँहमें वे चक्र लीन हो गये। महातलवारसे देवीने चण्डका सिर काट डाला। इसके बाद मुण्ड लड़ने आया। उसकी भी वही गति हुई। चण्ड-मुण्ड दोनोंका सिर लेकर कालीने आकर कौशिकीको दिया। कौशिकीने चण्ड-मुण्डका सिर लानेके कारण कालीका ‘चामुण्डा’ नामकरण किया। चण्ड-मुण्डका वध सुनकर शुम्भने अपनी सब सेनाको आज्ञा दी। महा-महाकुलके भयानक-भयानक दैत्य आये, भयंकर युद्ध होने लगा। देवीने धनुषके टंकारसे धरणी और गगनको पूरित कर दिया। सिंहनाद भी सर्वत्र फैल गया; महाकालीने भी मुख फैलाकर भीषण नाद किया। उस नादको सुनकर दैत्यसेनाने चारों ओरसे देवीको घेर लिया। इसी समय दैत्योंके नाश और देवताओंके अभ्युदयके लिये ब्रह्मा, शिव, विष्णु, इन्द्र आदि देवताओंके शरीरोंसे उनकी शक्तियाँ उसी-उसी रूपमें प्रकट होकर देवीकी सहायताके लिये आयीं। उन शक्तियोंसे परिवृत होकर भगवान् रुद्र आये और चण्डिकासे कहा कि ‘हमारी प्रसन्नताके लिये शीघ्र ही इन दैत्योंको मारो।’ यह सुनते ही देवीके शरीरसे एक अतिभीषण शक्ति प्रकट हुई और उसने रुद्रसे कहा—

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