भारतकोश
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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

श्रीभगवती-तत्त्व ५०७ नित्या, गौरी, धात्री, ज्योत्स्ना, इन्दुरूपिणी, सुखा, कल्याणी, वृद्धि, सिद्धि, नैर्ऋति, शर्वाणी, दुर्गा, दुर्गपारा, सारा, सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा, धूम्रा, अतिसौम्या, अतिरौद्रा, जगत्प्रतिष्ठा, कृति, विष्णुमाया, चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षान्ति, जाति, लज्जा, शान्ति, श्रद्धा, कान्ति, लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति, दया, तुष्टि, माता, भ्रान्ति, व्याप्ति, चितिरूपसे भगवतीको प्रणाम किया। निर्गुणा, सगुणा तथा सगुणामें भी सात्त्विकी, राजसी, तामसी भेदसे सब शक्तियाँ भगवतीमें ही अन्तर्भूत हो जाती हैं। देवता स्तुति कर ही रहे थे कि हिमाद्रि-कन्या पार्वती जाह्नवीमें स्नान करने आयीं। देवताओंसे उन्होंने प्रश्न किया कि ‘आपलोग किस देवताकी स्तुति कर रहे हैं?’ देवताओंका उत्तर देना ही था कि तबतक पार्वतीके ही शरीरसे प्रकट होकर शिवा भगवतीने पार्वतीसे कहा कि ‘शुम्भसे निराकृत होकर ये सब हमारी ही स्तुति कर रहे हैं।’ पार्वतीके शरीर-कोशसे निकली हुई अम्बिका लोकमें ‘कौशिकी’ नामसे प्रसिद्ध हुईं। कौशिकीके निकलनेपर पार्वती कृष्णवर्णकी हो गयीं। तभीसे वह ‘कालिका’ कहलाने लगीं। परमरूपवती कौशिकी अम्बिकाको कभी शुम्भ-निशुम्भके सेवक चण्ड-मुण्डने देखा और जाकर अपने स्वामीसे उसके रूपकी प्रशंसा की और उसे स्वाधीन बनानेकी सलाह दी। शुम्भ- निशुम्भने दूत भेजकर कहलाया कि ‘हमारी आज्ञा सर्वत्र अप्रतिहत है, संसारके सब रत्न, ऐरावत, उच्चैःश्रवा आदि हमारे पास हैं, तुम भी स्त्रीरत्न हो, हम रत्नभुक् हैं, अतः तुम भी हमारे पास आओ, हमारे पास आनेसे तुम्हें परमैश्वर्य प्राप्त होगा।’ भगवतीने गम्भीर स्मितके साथ कहा—‘ठीक है, परंतु मेरी प्रतिज्ञा है कि जो मुझे संग्राममें जीत लेगा, मेरा दर्प दूर करेगा, मेरे समान बलवान् होगा, वही मेरा भर्ता होगा। अतः शुम्भ या निशुम्भ कोई भी आकर मुझे जीतकर पाणिग्रहण कर ले’— यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति। यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥ तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महासुरः। मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु॥ (श्रीदुर्गासप्तशती ५।१२०-१२१) दूतने बहुत कुछ समझाया, परंतु देवीने कहा— ‘क्या करूँ, मेरी ऐसी प्रतिज्ञा ही है।’ दूतने जाकर सब बात सुना दी। इसपर धूम्रलोचन भेजा गया, घोर युद्धके बाद वह मारा गया। उसके पश्चात् शुम्भने चण्ड-मुण्डको भेजा। महासंग्राम हुआ, अम्बिकाने जब कोप किया, तब उनके ललाटसे करालवदना कालिका प्रकट हुईं। उन्होंने असुरोंके बल (सैन्य)- का भक्षण करना आरम्भ कर दिया। उन्होंने बड़े-बड़े गज, तुरंग, रथ, योद्धाओंको मुँहमें डालकर चबाना आरम्भ किया। सर्वनाश होते देखकर चण्ड आया और अनेक चक्रोंसे कालीको आच्छादित कर दिया। देवीके मुँहमें वे चक्र लीन हो गये। महातलवारसे देवीने चण्डका सिर काट डाला। इसके बाद मुण्ड लड़ने आया। उसकी भी वही गति हुई। चण्ड-मुण्ड दोनोंका सिर लेकर कालीने आकर कौशिकीको दिया। कौशिकीने चण्ड-मुण्डका सिर लानेके कारण कालीका ‘चामुण्डा’ नामकरण किया। चण्ड-मुण्डका वध सुनकर शुम्भने अपनी सब सेनाको आज्ञा दी। महा-महाकुलके भयानक-भयानक दैत्य आये, भयंकर युद्ध होने लगा। देवीने धनुषके टंकारसे धरणी और गगनको पूरित कर दिया। सिंहनाद भी सर्वत्र फैल गया; महाकालीने भी मुख फैलाकर भीषण नाद किया। उस नादको सुनकर दैत्यसेनाने चारों ओरसे देवीको घेर लिया। इसी समय दैत्योंके नाश और देवताओंके अभ्युदयके लिये ब्रह्मा, शिव, विष्णु, इन्द्र आदि देवताओंके शरीरोंसे उनकी शक्तियाँ उसी-उसी रूपमें प्रकट होकर देवीकी सहायताके लिये आयीं। उन शक्तियोंसे परिवृत होकर भगवान् रुद्र आये और चण्डिकासे कहा कि ‘हमारी प्रसन्नताके लिये शीघ्र ही इन दैत्योंको मारो।’ यह सुनते ही देवीके शरीरसे एक अतिभीषण शक्ति प्रकट हुई और उसने रुद्रसे कहा—

'आप हमारे दूत बनकर जाओ और शुम्भ- निशुम्भसे कहो कि त्रैलोक्य इन्द्रको दे दो, देवता हविर्भुक् हों और तुमलोग यदि जीना चाहते हो तो पाताल चले जाओ। यदि बलके घमण्डसे लड़ना चाहते हो तो आओ, तुम्हारे मांससे हमारे शृगाल तृप्त हों।' देवीने शिवको दूत बनाया, अतः उनका नाम 'शिवदूती' प्रसिद्ध हुआ। दैत्य शिवके द्वारा देवीका सन्देश सुनकर क्रुद्ध होकर वहाँ आये, जहाँ देवी स्थित थीं और अस्त्र-शस्त्रसे देवीके ऊपर खूब प्रहार किया। देवीने लीलामात्रसे सबको नष्ट कर डाला। कौशिकीके आगे-आगे काली शूल और खट्वांगसे शत्रुओंको नष्ट करती चलती थीं। ब्रह्माणी, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, ऐन्द्री आदि अपने शस्त्रास्त्रोंसे सहस्रों दैत्योंको मारती थीं। असुरोंका संहार करती हुई नादसे दिशाओंको पूर्ण कर रही थीं। जब मातृगणोंसे पीड़ित होकर असुर भाग चले, तब रक्तबीज नामका एक महान् असुर आया। रक्तबीजके शरीरसे जितने रक्तबिन्दु भूमिपर गिरते थे, उतनी ही संख्यामें वैसे ही रक्तबीज उत्पन्न होते थे। वह रक्तबीज गदा लेकर इन्द्रशक्तिसे युद्ध करने लगा। उससे महाभयंकर संग्राम हुआ। इन्द्रशक्तिके वज्रप्रहारसे उस दैत्यके शरीरसे बहुत-सा रक्त बहा, जिससे असंख्य रक्तबीजोंसे संसार व्याप्त हो गया। देवीने अपनी जिह्वा भूमिपर फैला दी और सब रक्त पान करने लगी। अन्तमें वह दैत्य क्षीणरक्त होकर मर गया। फिर शुम्भ-निशुम्भका भी देवीसे घोर युद्ध हुआ। महायुद्धके बाद निशुम्भ मारा गया। उस समय शुम्भने आकर देवीसे डाँटकर कहा—हे दुर्गे! तू घमण्ड न कर, दूसरोंका बल लेकर तू लड़ती है। इसपर देवीने कहा—इस जगत्में मैं ही एक हूँ, दूसरा कोई नहीं। देख, ये सब मेरी विभूतियाँ हैं, जो मुझमें प्रविष्ट हो रही हैं। यह कहते ही ब्रह्माणीप्रमुखा देवी उनमें लीन हो गयीं, वे अकेली रह गयीं— एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा। पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः॥ ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम्। तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका॥ (श्रीदुर्गासप्तशती १०।५-६) देवीने कहा—'मैं ही अपनी विभूतिसे अनेक रूपोंमें स्थित थी। अब उन सबका उपसंहार करके अकेली ही संग्राममें स्थित हूँ। तू सावधान स्थिर हो।' अनन्तर देवी और शुम्भका देवताओंके समक्ष महाघोर युद्ध हुआ। बड़े-बड़े दिव्यातिदिव्य शस्त्रास्त्रोंका प्रयोग हुआ। कभी गगनमें, कभी भूपर महान् आश्चर्यकर युद्ध हुआ। उस महासंग्रामके बाद भगवतीने उसके हृदयको विशाल शूलसे विदीर्णकर भूमिपर मार गिराया। देवता तथा ऋषियोंने देवीकी इस प्रकार स्तुति की। देवताओंने कहा—'हे मातः! आप प्रपन्न प्राणियोंकी आर्ति दूर करनेवाली हैं, आप अखिल ब्रह्माण्डकी माता हैं, आप ही चराचर विश्वकी ईश्वरी हैं, आप ही पृथ्विरूपमें स्थित होकर सबकी आधारभूता हैं, जलरूपसे भी स्थित होकर सम्पूर्ण विश्वका आप्यायन करती हैं, आप अनन्त वीर्यवाली वैष्णवी शक्ति हैं, आप ही विश्वकी बीजभूता माया हैं, सम्पूर्ण विश्व आपसे ही मोहित है, प्रसन्न होकर आप ही मुक्तिकी हेतु बन जाती हैं, संसारकी समस्त विद्याएँ आपका ही अंश हैं, समस्त स्त्रियाँ भी आपका ही अंश हैं, एक आपसे ही सारा विश्व पूरित है, फिर आपकी क्या स्तुति की जाय? स्तुतिसाधन परा, अपरा वाक् भी तो आप ही हैं। स्पष्टोच्चरित वाक् 'वैखरी' है, स्मृतिगोचर वाक् 'मध्यमा' है, अर्थकी द्योतिका 'पश्यन्ती' है, ब्रह्म ही 'परा' वाक् है— वैखरी शब्दनिष्पत्तिर्मध्यमा स्मृतिगोचरा। द्योतिकार्थस्य पश्यन्ती सूक्ष्मा ब्रह्मैव केवलम्॥ स्थान, करण, प्रयल तथा वर्णविभागशून्य, स्वयंप्रकाश ज्योति 'परा' वाक् है। सूक्ष्म बीजसे

उत्पन्न अंकुरके समान किंचित् विकसित शक्ति ही 'पश्यन्ती' है। अतः संकल्परूपा वाक् 'मध्यमा' है, व्यक्त वर्णादिरूप 'वैखरी' है। 'स्वर्ग-मुक्तिदायिनी आप ही हैं। बुद्धिरूपसे पुरुषार्थप्रदा, कालरूपसे परिणामप्रदायिनी, अवसानसमयमें कालरात्रिरूपसे आप ही विराजती हैं। सर्वमंगलदायी, सर्वार्थसाधिका, शरणागतवत्सला, सृष्ट्यादिकारिणी, सनातनी, गुणाश्रया, गुणमयी, शरणागत-दीनार्त-परित्राणपरायणा, आर्तिहरा, ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, चामुण्डा, लक्ष्मी, लज्जा, विद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, महारात्रि, महाविद्या, मेधा, ध्रुवा, सरस्वती, वरा, भूति, वाभ्रवि (राजसी), तामसी, नियन्ता आप ही हैं। कहाँतक कहा जाय, आप ही सर्वस्वरूपा हैं, आप ही सर्वशक्तिसमन्विता हैं। आप और आपके आयुध हमें सब भीतिसे बचायें। आप सर्वानर्थनिवारिणी, सर्वाभीष्ट- दायिनी हैं, सर्वस्तुत्या हैं। आपके आश्रितोंको विपत्ति नहीं आती, आपके आश्रित दूसरोंके आश्रय होते हैं। आप विश्वेश्वरी, विश्वपालिनी एवं विश्वरूपा हैं, विश्वेशवन्द्या हैं। जो आपको प्रणाम करते हैं, वे विश्वके आश्रय बनते हैं।' देवीने प्रसन्न होकर वर माँगनेको कहा। देवताओंने यह वर माँगा कि 'अखिलेश्वरी! आप सर्वदा त्रैलोक्यकी सर्वबाधाओंका प्रशमन करें और समय-समयपर इसी तरह असुरोंका संहार करें।' देवीने कहा—'ये शुम्भ-निशुम्भ आदि दैत्य फिर अट्ठाईसवीं चतुर्युगीमें उत्पन्न होंगे, वहाँ भी नन्दगोपके गृहमें यशोदासे उत्पन्न हो विन्ध्यवासिनीरूपसे मैं उनका संहार करूँगी। उसी रूपसे वैप्रचित्त दानवोंको मारकर उनका भक्षण करूँगी। दन्तोंके रक्त होनेसे उस समय मेरा 'रक्तदन्तिका' नाम प्रसिद्ध होगा। पुनश्च शतवार्षिकी अनावृष्टि होनेपर 'शताक्षी' रूपसे प्रकट होकर मुनियोंपर अनुग्रह करूँगी। अपने देहसे उद्भूत प्राणधारक शाकोंद्वारा लोकका रक्षण करूँगी, इसीलिये मेरा 'शाकम्भरी' नाम होगा। उसी अवतारमें दुर्गम दैत्यको मारनेसे मेरा 'दुर्गा' भी नाम पड़ेगा। भीमरूप धारण करके हिमाचलके राक्षसोंका भक्षण करूँगी, तब मेरा 'भीमा' नाम पड़ेगा। भ्रमररूप धारणकर अरुणासुरको मारनेसे मेरा 'भ्रामरी' नाम होगा। इस तरह जब- जब दानवोंकी बाधा फैलेगी, तब-तब मैं अवतार लेकर धर्म और देवताओंके शत्रुओंका क्षय करूँगी। जो इन स्तुतियोंसे मेरा स्तवन और श्रद्धा-भक्तिसे पूजन करेगा, उसकी सब विपत्तियोंको दूरकर सर्वाभीष्ट-सम्पादन करूँगी।' 'सप्तशती' के चरित्रोंसे विविध शिक्षाएँ मिलती हैं। मधु-कैटभ बड़े बलवान् थे, परंतु बुद्धि-बलसे विष्णुने उनका वध किया, इससे यह स्पष्ट हो गया कि पशु-बलपर सर्वदा बुद्धि-बलकी विजय होती है। महिषासुरके वधमें देवताओंके संगसे उद्भूत तेजःसमूहसे भगवतीका आविर्भाव हुआ। तृतीय चरित्रसे यह भी व्यक्त होता है कि एक शक्तिके अग्रसर होनेपर सभी शक्तियाँ उस कार्यमें लग जाती हैं, इत्यादि-इत्यादि बहुत-सी शिक्षाएँ प्राप्त होती हैं। 'देवीसूक्त' में भगवतीका स्वरूप 'देवीसूक्त' से विदित होता है कि साक्षात् परब्रह्म ही देवी आदि नामोंसे प्रख्यात है। स्वयं देवी कहती हैं— 'अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।' अर्थात् मैं ही रुद्र, वसु, आदित्यादिरूपसे विहरण करती हूँ। इन्द्र, अग्नि एवं अश्विनीकुमारोंको मैं ही धारण करती हूँ। सोम, त्वष्टा, पूषा, भग आदिको भी मैं ही धारण करती हूँ। देवताओंको हविः प्रदान करनेवाले यजमानको फल-प्रदान भी मैं ही करती हूँ। अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्। तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्॥ (वेदोक्त देवीसूक्त ३) अर्थात् सब जगत्की ईश्वरी, धन प्राप्त करानेवाली, तत्त्वज्ञानिनी एवं यज्ञार्होंमें मैं ही मुख्य हूँ, मैं ही प्रपंचरूपसे स्थित हूँ। अतएव देवताओंने अनेक स्थानोंमें अनेक रूपसे मेरा ही विधान किया है, विश्वरूपसे मैं ही स्थित हूँ। जहाँ भी, जो भी किया

५१० भक्तिसुधा जाता है, सब मेरी ही तत्र-तत्र, तेन-तेन रूपेण सम्पत्ति है। खाना, देखना, प्राणन करना, श्वासो- च्छ्वासादि व्यापार करना सब मेरी ही शक्तिसे सम्भव है। जो मुझ अन्तर्यामिणीको नहीं जानते, वे उपक्षीण हो जाते हैं। हे विश्रुत ! श्रद्धायुक्त होकर सुनो, यह ब्रह्मवस्तु तुम्हें बतला रही हूँ— मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्। अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि॥ मैं ही देव-मनुष्यसेवित ब्रह्मका उपदेश करती हूँ। मैं ही जिसको चाहती हूँ, उग्र—अधिक बनाती हूँ। ब्रह्मा (स्रष्टा), ऋषि (ज्ञानवान्) तथा शोभनप्रज्ञ बनाती हूँ। त्रिपुर-विजयके समय हिंसक, ब्रह्मद्विट् असुरके लिये रुद्रके धनुषको मैं ही विस्तृत करती हूँ, स्तोता जनोंके सुखार्थ मैं ही शत्रुओंसे संग्राम करती हूँ, मैं ही परमात्माके सर्वोपरि स्वरूपमें आकाशको बनाती हूँ। जैसे तन्तुमें पट होता है, वैसे ही आकाशादि कार्यजगत् परमात्मासे ही उत्पन्न होता है। समुद्र ('समुद्रवन्ति प्राणिनोऽस्मादिति समुद्रः परमात्मा')-रूप परमात्मामें जो व्याप्त बुद्धिवृत्तिरूप अप् (जल) है, उनके भीतर, बाहर, मध्यमें फैला हुआ जो अनन्त चैतन्य है, वही मुझ भगवतीका विश्वकारणभूत रूप है। अतएव मैं समस्त प्राणियोंमें व्याप्त होकर स्थित हूँ। कारणभूत मायामय निज देहसे द्युलोकादिको स्पर्शकर मैं स्थित हूँ। अथवा भूलोकके ऊपर पितर अर्थात् आकाशकी मैं रचना करती हूँ। समुद्रमें जलके भीतर मेरे कारणभूत अम्मय ऋषि हैं, उन्हीं महर्षिकी पुत्री होकर मैं देवीसूक्तका दर्शन करती हूँ। अथवा समुद्र अर्थात् अन्तरिक्षमें अपने अर्थात् अम्मय देवशरीरोंमें मेरा कारणभूत ब्रह्म चैतन्य रहता है, अतः मैं कारणभूत होकर सर्वत्र व्याप्त हूँ। मैं ही सम्पूर्ण भूतों और सभी कार्योंका आरम्भ करती हूँ। जैसे वात अन्य प्रेरणाके ही स्वयं कार्य करता है, वैसे ही परशक्तिरूपा मैं स्वेच्छासे ही सब काम करती हूँ। आकाश और पृथिवीसे पर मैं हूँ। असंग, उदासीन ब्रह्मचैतन्यरूपा मैं हूँ। भगवतीकी विविध विभूतियाँ सर्वप्रपंच एवं अवतारोंकी मूलभूता प्रथमा महालक्ष्मी हैं। तीनों गुणोंकी साम्यावस्थारूपा त्रिगुणा वे ही भगवती परमेश्वरी हैं। वे लक्ष्य-अलक्ष्य दो रूपवाली हैं। मायारूप लक्ष्य है, ब्रह्मरूप अलक्ष्य है। मायाशबल ब्रह्मरूपा भगवती ही त्रिगुणा परमेश्वरी हैं। जैसे घटादि कार्यमें कारणभूत मृत्तिका व्याप्त है, वैसे ही सम्पूर्ण विश्वमें वे व्याप्त हैं। हर एक पदार्थमें अस्ति, भाति, प्रिय यह तीन ब्रह्मके और नाम, रूप यह दो मायाके रूप हैं। उपर्युक्त सूक्ष्मरूपके अतिरिक्त उपासकोंके अनुग्रहार्थ भगवतीके अवतारस्वरूप स्थूलरूप भी प्रकट होते हैं। वे दक्षिण भागके नीचेके हाथमें पानपात्र, ऊपरके हाथमें गदा, वामभागके ऊपरके हाथमें खेटक, नीचेके हाथमें श्रीफल तथा नाग, लिंग एवं योनिको सिरमें धारण किये हुए, तप्त कांचनके समान दिव्य वर्णवाली हैं, तप्त ज्ञानशक्ति खेटक है, तुर्यावृत्ति (समाधि) पानपात्र है, लिंग पुरुषतत्त्व है, योनि प्रकृतितत्त्व है, नाग काल है। मातुलिंग (फल) ग्रहणसे भगवती यह सूचित करती हैं कि मैं ही सर्वकर्मफलदात्री हूँ। गदाधारणसे क्रियास्वरूप विक्षेपशक्ति और खेटधारणसे ज्ञान-शक्तिका अधिष्ठातृत्व ही बोधित किया गया है। नाग, लिंग, योनिधारणसे यह सूचित किया गया है कि प्रकृति, पुरुष और काल तीनोंका अधिष्ठान परब्रह्मरूपा मैं ही हूँ। 'ह्रीं' बीजका अभिप्राय भी यही है। ये ही भुवनेश्वरी हैं। सूक्तरूप भुवनेश्वरी और महालक्ष्मी दोनों एक ही हैं तथापि पाश, अंकुश, अभय, वरादि आयुधधारणसे भेद है। भगवती और सृष्टि प्राणियोंके परिपक्व कर्मोंका भोगद्वारा क्षय हो जानेपर प्रलय होता है। उस समय सब प्रपंच मायाके ही उदरमें लीन रहता है। माया भी स्वप्रतिष्ठ निर्गुण ब्रह्ममें लीन रहती है—'अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन् निर्गुणे

श्रीभगवती-तत्त्व ५११

सम्प्रलीयते।' विष्णुपुराणके इन वचनोंसे अव्यक्तका भी ब्रह्ममें लय स्मृत है। अव्यक्तका माया ही अर्थ है, प्राणियोंके कर्म-फल-भोगका जब समय आता है, तब चिदात्मिका भगवतीमें सिसृक्षा (सृष्टिकी इच्छा) उत्पन्न होती है। मायाकी उसी अवस्थाको विचिकीर्षा आदि शब्दोंसे कहा जाता है। कर्मपरिपाकका विनश्यद अवस्थावाला प्रागभाव ही विचिकीर्षा है। यद्यपि गुणसाम्यदशामें कर्मपरिपाकादिके अनुकूल कोई भी व्यापार नहीं होते, अतः साम्यावस्था-भंगका क्या कारण है, यह जानना बहुत कठिन है तथापि जैसे निद्राके अव्यवहित प्राक्कालके प्रबोधानुकूल दृढ़ संकल्पकी महिमासे ही नियत समयपर निद्रा भंग होती है, वैसे ही प्रलयके अव्यवहित प्राक्कालिक ईश्वरीय संकल्पसे ही नियत समयपर जागता है। विभागको न प्राप्त हुआ यह बिन्दु ही 'अव्यक्त' कहलाता है। यह मायाकी ही अवस्था है, अतः यह मायापदवाच्य होता है। यद्यपि यह महदादिके समान तत्त्वान्तररूपसे उत्पन्न नहीं होता, अतएव माया ही है तथापि मायाकी एक विशिष्टाकारसे उत्पत्ति हुई है, अतः 'तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिविधं द्विजसत्तम' इत्यादि वचनोंसे उसकी उत्पत्ति भी कही गयी है। केवल ब्रह्ममें कारणता नहीं बन सकती, अतएव उसे भी सूक्ष्मावस्थाविशिष्ट मायासे युक्त ब्रह्ममें ही कारणता समझनी चाहिये। बीज और अंकुरके बीचकी उच्छूनावस्थाको ही और जिसमें बीज धरणि, अनिल और जलके सम्पर्कसे क्लिन्न होकर कुछ फूलता है, अव्यक्तावस्था समझनी चाहिये। गुणसाम्य बीजावस्था है, वही शुद्ध माया है। बीजका अंकुरित होना कार्यावस्था है। स्पष्ट ईक्षण और अहंकार आदि ही महत्तत्त्व, अहन्तत्त्व आदि हैं। व्यष्टि जगत्में समझ सकते हैं कि निद्रावस्था बीजावस्था है, निद्राका प्रबोधोन्मुख होना अव्यक्तावस्था है, विकल्प- विशेषविरहित प्रबोध महत्तत्त्वकी अवस्था है, अहंकारका उल्लेख होना ही अहंतत्त्वकी अवस्था है, तदनन्तर स्थूल कार्यादि सम्पत्ति होती है। अन्तर्मुख अव्यक्तकी 'तुरीय' संज्ञा है, बहिर्मुख अव्यक्तकी 'कारण देह' संज्ञा है। बहिर्मुख अव्यक्तसे सूक्ष्म-स्थूल देहकी उत्पत्ति होती है, इसीमें सम्पूर्ण विश्व आ जाता है। समष्टि-व्यष्टि स्थूल देह और ज्ञानेन्द्रिय तथा अन्तःकरणके अधिपति सरस्वती-सहित ब्रह्मा हैं। कर्मेन्द्रियसहित प्राणसंज्ञक क्रियाशक्त्यात्मक लिंगदेहके अधिपति लक्ष्मी-सहित विष्णु हैं। कारणदेहके अधिपति गौरीसहित रुद्र हैं। तुरीयदेहकी अभिमानिनी भुवनेश्वरी और महालक्ष्मी हैं। मूर्तिरहस्य प्रथम महालक्ष्मी भगवतीने सम्पूर्ण जगत्‌को अधिष्ठातासे रहित देखकर केवल तमोगुणरूप उपाधिका आश्रय लेकर बड़ा सुन्दर एक दूसरा रूप धारण किया। साम्यावस्थाभिमानिनी महालक्ष्मी हैं। किंचिच्चलितसदृश तमोगुणविशिष्ट अव्यक्तमें अभिमान करके उसीने महाकालीरूप धारण कर लिया। यद्यपि वह मूल देवीसे अभिन्न ही है तथापि रूपमें भेद है। कज्जलके समान नीलवर्णवाली, सुन्दर दंष्ट्रासे युक्त मनोहर आननवाली, विशाल लोचनवाली, सूक्ष्म कटिवाली वह देवी खड्ग, पात्र, शिरः, खेटको धारण किये कबन्ध, हार और मुण्डकी माला अथवा शवके शिरोंकी माला पहने थी। उस महाकालीने महालक्ष्मीसे कहा कि—'मेरे लिये नाम और कर्म बतलाओ।' महालक्ष्मीने ब्रह्मादिमोहिका होनेसे 'महामाया', उन सबका संख्यान और संहार करनेसे 'महाकाली' और सर्वविध भक्षणकी इच्छावाली होनेसे 'क्षुधा', सर्वविध पानकी इच्छावाली होनेसे 'तृषा', योगकी अधिष्ठात्री होनेसे 'योगनिद्रा', भक्तकृत भक्तिकी इच्छावाली होनेसे 'तृष्णा', महापराक्रमवती होनेसे 'एकवीरा' इत्यादि नाम और नामानुरूप ही कर्म बतलाये हैं। अनन्तर महालक्ष्मीने अतिशुद्ध सत्त्वके द्वारा चन्द्रप्रभाके समान अतिसुन्दर एक और रूप धारण किया। अक्षमाला, अंकुश, वीणा, पुस्तक धारण किये हुए वह बड़ी सुन्दरी देवी प्रकट हुई। उसके लिये भी महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती, आर्या,

५१२ भक्तिसुधा ब्राह्मी, कामधेनु, वेदगर्भा, धीश्वरी नाम और नामानुरूप ही कर्म बतलाये गये हैं। महालक्ष्मी स्वयं ही साम्यावस्थाकी अभिमानिनी होते हुए रजोगुणकी भी अभिमानिनी हुईं, अतएव महालक्ष्मीका रक्त-रूप वर्णन मिलता है। अन्तमें महालक्ष्मीने महाकाली और महासरस्वतीसे कहा कि—‘आप दोनों अपने अनुरूप स्त्री-पुरुषरूप मिथुन उत्पन्न करो।' ऐसा कहकर स्वयं महालक्ष्मीने निर्मल ज्ञानमय कमलपर विराजमान एक स्त्री एवं एक पुरुषका मिथुन बनाया। ब्रह्मा, धाता आदि पुरुषके नाम तथा श्री, पद्मा, कमला, लक्ष्मी आदि स्त्रीके नाम हुए। महाकालीने भी एक मिथुन बनाया, उसमें नीलकण्ठ, रक्तबाहु, श्वेतांग, चन्द्रशेखर पुरुष हुआ और शुक्ल वर्णकी ही सुन्दरी स्त्री हुई। पुरुषके रुद्र, शंकर, स्थाणु, कपर्दी, त्रिलोचन नाम हुए; स्त्रीके त्रयी, विद्या, कामधेनु, भाषा, अक्षरा, स्वरा आदि नाम हुए। सरस्वतीसे भी उत्पन्न मिथुनमें विष्णु, हृषीकेश, वासुदेव, जनार्दन पुरुषके और उमा, गौरी, सती, चण्डी, सुन्दरी, सुभगा, शिवा स्त्रीके नाम हुए। इस तरह बिना पुरुषके ही युवतियाँ ही पुरुष बन गयीं। साधारण लोग इसे असम्भव समझते हैं, परंतु अचिन्त्य मायाशक्तिकी महिमा जाननेवालोंके लिये यह असम्भव नहीं। महालक्ष्मीने ब्रह्माका सरस्वतीसे, रुद्रका गौरीसे, वासुदेवका लक्ष्मीसे विवाह कर दिया। ब्रह्माने सरस्वतीके साथ ब्रह्माण्ड बनाया, रुद्रने गौरीके साथ संहारका काम किया और विष्णुने लक्ष्मीके साथ पालन किया। ब्रह्मदृष्टिसे चैतन्यरूपा सरस्वती, सत्तारूपी लक्ष्मी, आनन्दरूपा काली हैं, अतः चैतन्यका अभिव्यंजक सत्त्व सत्ताव्यंजक रज और आनन्दव्यंजक तम है। सुषुप्तिमें तमकी बहुलतासे आनन्दमयकी व्यक्ति होती है। सत्त्वोत्कर्षसुलभ प्रिय, मोद और प्रमोदरूप फलात्मक आनन्दमयका सुषुप्तिमें पर्यवसान तमोरूपा निद्रामें होता है, इसलिये रुद्रमें तमका व्यवहार होता है। सत्ताव्यंजक रजका पर्यवसान सत्त्वात्मक ज्ञानमें होता है, इसलिये विष्णुको सत्त्व कहा है। चैतन्यव्यंजक रज अपने रूपमें रहता है, इसलिये ब्रह्मामें कहा जाता है। इतिहासकी दृष्टिसे पहले उत्पत्ति, फिर स्थिति, फिर संहार होता है। साधनामें संहार, पालन और उत्पादन यह क्रम मान्य होता है। स्थितिकालमें भी उन्नतिके लिये तीनों शक्तियोंकी अपेक्षा है। दोषोंका संहार, रक्षणीय गुणोंका पालन और फिर अविद्यमान गुणादिकोंका उत्पादन अभीष्ट होता है। रोगोंका नाश, प्राणोंका रक्षण और बलका उत्पादन यह शिव, विष्णु एवं ब्रह्माका काम है। वैसे ये सब-के-सब विशुद्ध सत्त्वमय हैं, इसलिये शैवपुराणोंमें शिवको भी सत्त्वमय कहा गया है। शैव, वैष्णव, शाक्त सबके यहाँ अपने इष्टदेवको ही मूलतत्त्व माना जाता है। मूलतत्त्वमें ही पूर्ण सर्वज्ञता आदिकी विवक्षासे सत्त्वमय कहा जाता है। गुणकृत आवरण एवं तत्प्रभावसे रहित होनेके कारण उसे ही निर्गुण भी कहा जाता है। जिस तरह मेघादि सूर्यके आवरक होते हैं, उपनेत्रादि नहीं; उसी तरह अस्वच्छ उपाधि सच्चिदानन्दकी आवरक होती है, स्वच्छ नहीं। इसीलिये शिवकी शक्ति कालीसे संहार होता है। केवल प्रकाशमें सृष्टि नहीं हो सकती, इसीलिये सरस्वतीको रजके अधिष्ठाता ब्रह्माका सहारा लेना पड़ता है। रजसे कार्य बनता चलता है, परंतु यदि उसमें टिकाव न हो, तो पालन नहीं बन सकता, अतः कार्यको टिकाऊ या स्थिर करनेके लिये लक्ष्मीको तमोऽधिष्ठाता विष्णुकी अपेक्षा होती है। तमके प्राबल्यमें अत्यन्त रुकावट होनेपर पालन न होकर संहार होता है। परंतु संहारमें भी किसका, कब, कितने दिनतक संहार हो, इसके ज्ञानके लिये सत्त्वकी अपेक्षा है, इसीलिये काली शिवका सहारा लेती हैं। अन्यथा ब्रह्माको रज, रुद्रको तम और विष्णुको सत्त्वका अधिष्ठाता कहा जाता है। ब्रह्माका रंग तो उनके गुण रजके अनुसार रक्त है; परंतु शिव, विष्णुमें यह नहीं घटता। सत्त्वगुणके अनुसार शिव शुक्ल और तमके अनुसार विष्णु कृष्ण हैं।

श्रीभगवती-तत्त्व [५१३]

कुछ लोग कहते हैं कि शिव, विष्णुके परस्पर ध्यानसे रूपमें परिवर्तन हो गया। स्थिर रखना तमका कार्य है, अतः पालकमें तमका परमापेक्ष है। अन्यत्र संहार होनेसे रुद्रमें तम, पालक होनेसे विष्णुको सत्त्वमय कहा गया है, कहीं निराकार और अव्यक्तको आकाशादिके समान श्याम रंगका व्यंजक माना जाता है, परंतु त्रिदेवियोंकी रूपव्यवस्था तो सर्वथा गुणोंके अनुसार है। त्रिदेवोंमें उत्पादक, पालक एवं संहारकको क्रमेण राजस, सात्त्विक, तामस कहा है। इन गुणोंके वश होनेसे जीव बद्ध होता है, उपर्युक्त त्रिदेव एवं त्रिदेवियाँ गुणोंके वश नहीं, अपितु गुणोंकी नियन्त्री हैं; अतः वे स्वतन्त्र हैं। इसके अतिरिक्त एक विशेषता और है, वह यह कि गुणोंका विमर्शवैचित्र्य होनेसे एक गुणके भीतर भी सब गुणोंका अस्तित्व होता है। जैसे तामसी प्रकृति जगत्का उपादान है, फिर भी उसके भीतर राजस और सात्त्विक अन्तःकरणादि होते हैं, तमोलेशानुविद्ध सत्त्वप्रधाना अविद्यामें भी तमोरज आदिके तारतम्यसे उत्कर्षापकर्ष होता है, वैसे ही विशुद्ध सत्त्वप्रधाना विद्या या मायामें भी सात्त्विक, राजस, तामस भेद होते हैं। उसी भेदसे ब्रह्मा, विष्णु आदि बनते हैं। यह ईश्वरकोटि है, इनकी उपाधि माया है, वह विशुद्ध सत्त्वप्रधाना होती है, फिर भी उत्पादकमें रज, पालकमें सत्त्व और संहारकमें तमका अंश रहता है। पूर्वोक्त रीतिसे भगवतीके महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती—ये तीन रूप प्रधान हैं। उपनिषदोंमें प्रकृतिको 'लोहित-शुक्ल-कृष्ण' कहा गया है; क्योंकि उसमें रजः, सत्त्व और तम यह तीन गुण होता है। किसी भी कार्यका सम्पादन करनेके लिये हलचल, प्रकाश और अवष्टम्भ अर्थात् रुकावट इन तीनोंकी अपेक्षा हुआ करती है। इनमेंसे एकके बिना कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं होता, इसीलिये सृष्टिको त्रिगुणात्मिका कहा जाता है। प्रकाश सत्त्व है, हलचल रज और अवष्टम्भ तम है। रज रक्त है, सत्त्व शुक्ल है, तम कृष्ण है। केवल निर्विकार, कूटस्थ, चैतन्य कुछ कर नहीं सकता, गुणयोगसे ही कार्य हो सकता है, अतएव गुणोंका आश्रयण करनेसे ही त्रिदेवो एवं त्रिदेव भी तीन रंगके ही हैं। शंकर- सरस्वती ये दोनों भाई-बहन शुक्ल रूपके हैं। ब्रह्मा- लक्ष्मी दोनों भाई-बहन रक्त वर्णके हैं। विष्णु-गौरी ये दोनों भाई-बहन कृष्ण रंगके हैं। भाई-बहन ही प्रायः एक रंगके होते हैं, पति-पत्नीके एक रंग होनेका नियम नहीं होता। इसीलिये शिव-गौरी, विष्णु-लक्ष्मी, ब्रह्मा-सरस्वती ये दम्पती एक रंगके नहीं हैं। गौरीकी सरस्वती ननन्दा हैं, स्वयं उसकी भ्रातृजाया (भावज) हैं, सरस्वती लक्ष्मीकी भावज हैं, लक्ष्मी उसकी ननद हैं, लक्ष्मी गौरीकी ननद हैं। इसीलिये शिव, विष्णु, ब्रह्मामें भी श्यालक एवं भगिनीपतिका सम्बन्ध है। सृष्टिमें हलचल और ज्ञानशक्ति दोनोंकी अपेक्षा होती है। रजकी हलचल और सत्त्वकी ज्ञानशक्ति ही सृष्टि कर सकती है, इसीलिये ब्रह्माकी पत्नी सरस्वतीसे सृष्टि होती है। तमकी रुकावटसे और रजकी हलचलसे पालन होता है, अतएव विष्णुपत्नी लक्ष्मीसे पालन होता है। सत्त्वके प्रकाश एवं तमके अवष्टम्भसे संहार होता है, अतः शिवपत्नी गौरीसे संहार होता है। सर्वसत्त्वमयी भगवती साकार होकर अनेक नामोंवाली होती हैं, निराकाररूपसे तो कोई भी शब्दसे वाच्य नहीं है। ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी। यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता॥ यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। जो त्रिगुणा तामसी महाकाली हैं, वे ही हरिकी योगनिद्रा हैं, विष्णुको जगानेके लिये ब्रह्माने उनकी स्तुति की है। वे दश मुख, दश भुज, दश चरण और तीस विशाल नेत्रवाली हैं। यद्यपि शत्रुओंको उनका रूप बड़ा ही भयावना लगता है तथापि भक्तोंके लिये तो वे रूप, सौभाग्य और कान्तिकी एकमात्र प्रतिष्ठा हैं। खड्ग, बाण, गदा, शूल, चक्र, पाश, भुशुण्डि, परिघ, कार्मुक और सद्यःकृत्त सिर उनके हाथोंमें हैं। इनकी विधिपूर्वक पूजा करनेसे साधक चराचर विश्वको स्वाधीन कर लेता है।

५१४ भक्तिसुधा जो देवी सर्वदेवशरीरोंसे उत्पन्न हुईं, वे महालक्ष्मी हैं। यद्यपि वे सहस्त्रभुज या अनन्त भुजावाली हैं तथापि साधक अष्टादशभुजारूपसे उनको पूजते हैं। उनका मुख शिव-समुद्भूत तेजसे बना है, अतः श्वेत है। भुजा विष्णुके अंशसे हुई है, अतः नील है। स्तनमण्डल सौम्यांशसे बने हैं, अतः सुश्वेत हैं। कटि इन्द्रांशसे हुई है, अतः रक्त है। चरण ब्रह्मांशजन्य होनेसे रक्त तथा जंघा और ऊरु वरुणांशजन्य हैं, अतः नील हैं। सुचित्रजघना, चित्रमाल्या और अम्बरको धारण किये हैं। दाहिने-वाम भागके नीचेके क्रमसे उसके निम्नलिखित आयुध हैं—अक्षमाला, कमल, बाण, असि, कुलिश, गदा, चक्र, त्रिशूल, परशु, शंख, घण्टा, पाश, शक्ति, दण्ड, चर्म, चाप, पानपात्र और कमण्डलु। इन महालक्ष्मीके पूजनसे सर्वलोकाधिपत्य मिलता है। सरस्वती आठ भुजाकी हैं। बाण, मुसल, शूल, चक्र, शंख, घण्टा, लांगल और कार्मुक उनके आयुध हैं। इनकी उपासनासे सर्वज्ञता मिलती है। दशमहाविद्या ( १ ) महाकाली पूर्वोक्त भगवतीके ही दस भेद और होते हैं। इसमें प्रथम महाकाली हैं। महाकाली प्रलयकालसे सम्बद्ध रहती हैं, अतएव वे कृष्णवर्णकी हैं। 'शक्तिविहीन विश्व शवरूप है'—यह दर्शानेके लिये वे शवपर आरूढ़ हैं। शत्रुसंहारकी शक्ति भयावह होती है, इसलिये कालीकी मूर्ति भी भयावह है। शत्रुसंहारके बाद योद्धाका अट्टहास भीषणताके लिये होता है, इसीलिये महाकाली हँसती रहती हैं। निर्बलके आक्रमणको विफलकर उसकी दुर्बलतापर हँसा जाता है, इसी तरह निर्बल विश्वके घमण्डको चूरकर भगवती हँसती हैं। पूर्ण वस्तुको चतुरस्र कहा जाता है, इसीलिये पूर्णतत्त्व चार भुजासे प्रकट हुआ करता है। इसीसे माँ कालीकी चार भुजाएँ हैं। वे स्वयं निर्भय हैं, उनका आश्रयण करनेवाले निर्भय होते हैं, इसीलिये भगवती ने अभय मुद्रा धारण की है। सांसारिक सुख क्षणभंगुर है, परमसुख भगवती ही हैं, जीवित विश्वका एवं मृत विश्वका भी आधार वे ही हैं। मृतप्राणियोंका भी एकमात्र सहारा है, यही द्योतन करनेके लिये देवीने मुण्डमाला पहनी है। विश्व ही ब्रह्मरूपा भगवतीका आवरण है, प्रलयमें सबके लीन होनेपर भगवती नग्न ही रहती हैं। सारे विश्वके श्मशानके तरनेपर उन तमोमयीका विकास होता है, इसीलिये वे श्मशान- वासिनी हैं— शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीम्। चतुर्भुजां खड्गमुण्डवराभयकरां शिवाम्॥ मुण्डमालाधरां देवीं ललज्जिह्वां दिगम्बराम्। एवं सञ्चिन्तयेत् कालीं श्मशानालयवासिनीम् ॥ ( शाक्तप्रमोद-कालीतन्त्र) ( २ ) तारा हिरण्यगर्भावस्थामें कुछ प्रकाश होता है, प्रलयरूपी कालरात्रिमें ताराओंके समान सूक्ष्म जगत्के ज्ञान एवं तत्साधनोंका प्राकट्य होता है, उसी हिरण्यगर्भकी शक्ति 'तारा' है। सूर्य कोटि भी हिरण्यगर्भ कहा जाता है, सूर्य रुद्र भी कहे जाते हैं। उनका शान्त और घोर दो प्रकारका रूप होता है। हिरण्यगर्भ पहले क्षुधासे उग्र था, जब उसे अन्न मिलने लगा, तब शान्त हुआ। उसी उग्र हिरण्यगर्भकी शक्ति उग्रतारा है। प्रत्यालीढपदापिर्ताङ्घ्रिशवहृद्घोराट्टहासापरा खड्गेन्दीवरकर्त्रिखर्परभुजा हुङ्कारबीजोद्भवा। खर्वानीलविशालपिङ्गलजटाजूटैकनागैर्युता जाड्यं न्यस्य कपालकर्तृजगतां हन्त्युग्रतारा स्वयंम्॥ (शाक्तप्रमोद-तारातन्त्र) क्षुधातुर हिरण्यगर्भ भी संहारक होता है, अतः उसकी शक्ति तारा भी संहारिणी है। उसने चारों हाथोंमें जहरीले सर्प लिये हैं। सर्प भी संहारका सूचक है। वह भी शवपर प्रतिष्ठित है। मुण्ड और खप्परसे यह सूचित होता है कि वह भयानक होकर खप्परद्वारा विश्वका रसपान करती है। उसकी जहरीली रश्मियोंकी भयानकता दिखलानेके लिये जटाजूट नागका वर्णन है। प्रकृतिः पुरुषं स्पृष्ट्वा प्रकृतित्वं समुज्झति। तदन्तस्त्वेकतां गत्वा नदीरूपमिवार्णवे॥

श्रीभगवती-तत्त्व ५१५ पुरुषका स्पर्श करते ही प्रकृति प्रकृतित्वको छोड़कर पुरुषके साथ इस तरह मिल जाती है, जैसे नदी समुद्रमें मिल जाती है। अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥ हरि, हर, विरंचि प्रभृतियोंसे परमपूज्य अम्बाको प्रणाम या उनका स्तवन किसी अकृतपुण्य प्राणीद्वारा नहीं हो सकता। भगवतीकी पूजा जैन-बौद्धोंमें भी होती रही है, विशेषतः ताराकी पूजाका रहस्य बुद्ध ही जानते थे। तारा ही द्वितीया रूपसे प्रसिद्ध हैं, सुतारा रूपसे वही जैनोंमें भी पूज्य हैं, अक्षोभ्य ही वहाँ अवलोकितेश्वररूपमें प्रसिद्ध हैं। क्षोभादिरहितो यस्मात् पीतं हालाहलं विषम्। अतएव महेशानि अक्षोभ्यः परिकीर्तितः॥ तेन सार्धं महामाया तारिणी रमते सदा। हलाहल विष पीनेपर भी जो क्षोभरहित रहे, वही शिव अक्षोभ्य हैं, उनके साथ रमण करनेवाली तारा है। मदीयाराधनाचारं बौद्धरूपी जनार्दनः। एक एव विजानाति नान्यः कश्चन तत्त्वतः॥ (ललितोपाख्यान) ताराकी ही उक्ति है कि बौद्धाचारसे ही उनका पूजन श्रेष्ठ है। तारिणी शक्तियोंसे विशिष्ट महाशक्ति तारा है। सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव यथा नः सुभगा ससि यथा न सुफला ससि। (तै० आ० ६।६।२) 'जनकस्य राज्ञः सद्मनि सीतोत्पन्ना सा सर्व- परानन्दमूर्तिर्गायन्ति मुनयोऽपि देवाश्च।' 'अनन्या राघवेणाहं भास्करेण यथा प्रभा।' 'ऐश्वर्यावचनः शक्तिः सा पराक्रम एव च। तत्स्वरूपा तयोर्दात्री सा शक्तिः परिकीर्तिता ॥' (३) षोडशी प्रशान्त हिरण्यगर्भ या सूर्य शिव है, उनकी शक्ति 'षोडशी' है। इनकी विग्रहमूर्ति पंचवक्त्र है। चारों दिशाओं एवं ऊर्ध्वदिशाके अभिमुख होनेसे उन्हें पंचवक्त्र कहते हैं। तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव, अघोर और ईशान यही इनके प्रसिद्ध नाम हैं। पूर्वा, पश्चिमा, उत्तरा, दक्षिणा, ऊर्ध्वदिक्के हरित, रक्त, धूम्र, नील, पीतरंगके मुख हैं। दस हाथोंमें अभय, टंक, शूल, वज्र, पाश, खड्ग, अंकुश, घण्टा, नाग और अग्नि लिये हैं। यह बोधरूप है— मुक्तापीतपयोदमौक्तिकजपावर्णैर्मुखैः पञ्चभि- स्त्र्यक्षैरञ्चितमीशमिन्दुमुकुटं पूर्णेन्दुकोटिप्रभम्। शूलं टङ्ककृपाणवज्रदहनान् नागेन्द्रपाशाङ्कुशान् पाशं भीतिहरं दधानममिता वाग्भ्यो ज्वलाङ्गं भजे ॥ इसमें षोडशकलाओंका पूर्णरूपसे विकास है, अतएव यह भी 'षोडशी' कहा जाता है। इस पंचवक्त्रकी शक्ति षोडशी है। इसका ध्यान इस प्रकार है— बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्। पाशाङ्कुशशरांश्चापं धारयन्तीं शिवां भजे ॥ (षोडशीतन्त्र) बालार्कमण्डलके समान आभावाली, सूर्य-सोम- अग्नि इन तीन नेत्रोंवाली, चतुर्भुज, पाश-अंकुश-चाप और शरको धारण किये हैं। (४) भुवनेश्वरी वृद्विगत विश्वका अधिष्ठाता त्र्यम्बक है, उसकी शक्ति 'भुवनेश्वरी' है। उसका स्वरूप बतलाते हुए शास्त्र कहते हैं— उद्यद्दिनद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम्। स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्॥ सोमात्मक अमृतसे विश्वका आप्यायन होता है, इसीलिये भगवतीने अपने किरीटमें चन्द्रमाको स्थान दे रखा है। त्रिभुवनका भरण-पोषण भगवती ही करती है। उसीका संकेत करमुद्रासे है। कृपादृष्टिकी सूचना उसके स्मेर (मृदुहास)-से है। शासनशक्तिका सूचक अंकुश-पाश आदिसे है। (५) छिन्नमस्ता विपरिणमान जगत्का अधिपति चेतन कबन्ध

५१६ भक्तिसुधा है, उसकी शक्ति 'छिन्नमस्ता' है। विश्वका उपचय- अपचय तो हर समय ही होता रहता है, परंतु जब ह्रासकी मात्रा कम और विकास या आगमकी मात्रा ज्यादा रहती है, तब भुवनेश्वरीका प्राकट्य होता है। जब निर्गम (ह्रास) अधिक और आगम कम हो जाता है, तब छिन्नमस्ताका प्राधान्य होता है। उसका ध्यान यह है- प्रत्यालीढपदां सदैव दधतीं छिन्नं शिरः कर्तिकां दिग्वस्त्रां स्वकबन्धरशोणितसुधाधारां पिबन्तीं मुदा। नागाबद्धशिरोमणिं त्रिनयनां हृद्युत्पलालङ्कृतां रत्यासक्तमनोभवोपरिदृढां ध्यायेज्जवासन्निभाम्॥ दक्षे चातिसिताविमुक्तचिकुरां कर्त्रीं तथा खर्परं हस्ताभ्यां दधतीं रजोगुणभुवा नाम्नाऽपि सावार्णिनीम्। देव्याश्छिन्नकबन्धरतः पतदसृग्धारां पिबन्तीं मुदा नागाबद्धशिरोमणिर्मनुविदा ध्येया सदा सा सुरैः॥ प्रत्यालीढपदा कबन्धविगलद्रक्तं पिबन्तीं मुदा सैषा या प्रलये समस्तभुवनं भोक्तुं क्षमा तामसी। (छिन्नमस्तातन्त्र) छिन्नमस्ता भगवती छिन्नशीर्ष और कर्तरी एवं खप्परको लिये हुए स्वयं दिगम्बर रहती हैं। कबन्ध- शोणितकी धाराको पीती रहती हैं, कटे हुए सिरमें नागाबद्ध मणि विराजमान है और नील नयन हैं, हृदयमें उत्पलकी माला है, रत्यासक्त मनोभावके ऊपर विराजमान रहती है। (६) त्रिपुरभैरवी क्षीयमान विश्वका अधिष्ठाता दक्षिणामूर्ति कालभैरव हैं, उसकी शक्ति 'भैरवी' है। उसका ध्यान यह है- उद्यद्भानुसहस्त्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्। हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांमशुरत्नमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम्॥ (भैरवीतन्त्र) उदित होते हुए सहस्रों सूर्योंके समान अरुण- कान्तिवाली, क्षौमाम्बरको धारण किये एवं मुण्डमाला पहने हैं। रक्तसे उनके पयोधर लिप्त हैं, तीन नेत्र एवं हिमांशुबद्ध मुकुटको धारण किये तथा हाथमें जपवटी, विद्या, वर एवं अभयमुद्राको धारण किये रहती हैं। (७) धूमावती विश्वकी अमांगल्यपूर्ण अवस्थाकी अधिष्ठात्रीशक्ति 'धूमावती' है। यह विधवा समझी जाती है, अतएव यहाँ पुरुषका वर्णन नहीं है। यहाँ पुरुष अव्यक्त है, चैतन्य, बोध आदि अत्यन्त तिरोहित होते हैं। इसका ध्यान यह है- विवर्णा चञ्चला दुष्टा दीर्घा च मलिनाम्बरा। विमुक्तकुन्तला वै सा विधवा विरलद्विजा॥ काकध्वजरथारूढा विलम्बितपयोधरा। शूर्पहस्तातिरिक्षाक्षा धूतहस्ता वरानना॥ प्रवृद्धघोणा तु भृशं कुटिला कुटिलेक्षणा। क्षुत्पिपासार्दिता नित्यं भयदा कलहास्पदा॥ विवर्णा, चंचला, दुष्टा एवं दीर्घ तथा मलिन अम्बरवाली, खुले केशोंवाली, विरल दन्तवाली, विधवारूपमें रहनेवाली, काकध्वजवाले रथपर आरूढ़, लम्बे पयोधरवाली, हाथमें शूर्प लिये हुए, अत्यन्त रूक्ष नेत्रवाली, कम्पित हस्त, लम्बी नासिका, कुटिल स्वभाव, कुटिल नेत्रयुक्त, क्षुधा-पिपासासे पीड़ित, सदा भयप्रद और कलहकी निवास Ground रूपिणी है। (८) बगला व्यष्टिमें शत्रुसंहिजीर्षा, समष्टिमें परमेश्वरकी संहारेच्छाकी अधिष्ठात्री शक्ति 'बगला' है। इसका ध्यान यह है- जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं वामेन शत्रून् परिपीडयन्तीम्। गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि॥ अर्थात् शत्रुके हृदयपर आरूढ़, वामहस्तसे शत्रुजिह्वाको खींचकर दक्षिण हस्तसे गदाप्रहार करनेवाली, पीतवस्त्र धारण की हुई बगला है। मध्ये सुधाब्धिमणिमण्डपरत्नवेदी सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम्। पीताम्बराभरणमाल्यविभूषिताङ्गीं देवीं नमामि धृतमुद्गरवैरिजिह्वाम्॥

की कल्पना है, सदाशिवमें फलककी कल्पना है, निर्विशेष ब्रह्मके आश्रित श्रीकामेश्वरीके श्रीहस्तमें पाश, अंकुश, इक्षु, धनुष और बाण हैं। राग ही पाश है, द्वेष ही अंकुश है, मन ही इक्षु-धनुष है, शब्दादि विषय पुष्पबाण हैं। कहीं इच्छाशक्तिको ही पाश, ज्ञानको ही अंकुश, क्रियाशक्तिको ही धनुष-बाण माना गया है- इच्छाशक्तिमयं पाशमङ्कुशं ज्ञानरूपिणम्। क्रियाशक्तिमये बाणधनुषी दधदुज्ज्वलम्॥ पूजारहस्य नामरूपात्मक जगत्में सच्चिदानन्दकी भावना ही अम्बाको पाद्यसमर्पण है। सूक्ष्मजगत्में ब्रह्मभावना ही अर्घ्यसमर्पण है। भावनाओंमें ब्रह्मभावना ही आचमन है। सर्वत्र सत्त्वादिगुणोंमें चिदानन्दभावना ही स्नान है। चिद्रूपा कामेश्वरीमें वृत्तिविषयताका चिन्तन करना ही प्रोक्षण है। निरञ

५१८ भक्तिसुधा पुरुषरूपिणी 'देव्यथर्वशीर्ष' में देवीने स्वयं अपनेको ब्रह्मरूपिणी कहा है और यह भी कहा है कि प्रकृतिपुरुषात्मक जगत् मुझसे आविर्भूत होता है— अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत्। शून्यं चाशून्यं च॥ एतावता जो कहते हैं कि प्रकृतिरूपिणी ही देवी है, उनका यह कहना ठीक नहीं। अपनी सर्वात्मताको दिखलाते हुए अपनेको ही आनन्द-अनानन्द, विज्ञान- अविज्ञान, ब्रह्म-अब्रह्म—सब कुछ बतलाया है। अजामें कहा है कि मैं ही सब जगत् हूँ—'अहमखिलं जगत्।' वेद-अवेद, विद्या-अविद्या, अजा-अनजा सब कुछ भगवती ही हैं। कालरात्रिं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम्। सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम्॥ —इस मन्त्रसे भगवतीके प्रसिद्ध अनेक रूपोंका वर्णन करके उसे ही 'एषात्मशक्तिः। एषा विश्वमोहिनी' इत्यादि वचनोंसे आत्मशक्तिरूप भी कहा है। यहाँ आत्मशक्तिका आत्मरूपाशक्ति भी अर्थ किया जाता है। तभी 'य एवं वेद स शोकं तरति' इस वचनसे इसके वेदनमें शोकोपलक्षित संसारका तरण कहा गया है। आगे चलकर कहा है—'यस्याः स्वरूपं ब्रह्मादयो न जानन्ति तस्मादुच्यते अज्ञेया। यस्या अन्तो न लभ्यते तस्मादुच्यते अनन्ता।*** एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका।' अनन्ता, एका, अनेका सब कुछ है। आचार्य भगवान् शंकरने भी भगवतीके सगुण- निर्गुण दोनों ही रूपोंको बड़े सुन्दर शब्दोंमें कहा है— 'हे देवि! आपके निमेष-उन्मेषसे जगत्की उत्पत्ति और प्रलय होता है। सन्त लोग कहते हैं कि आपके निमेषेसे जगत्का प्रलय हो जाता है, इसीलिये मालूम पड़ता है कि आप जगद्रक्षणके लिये ही निर्निमेष नयनोंसे भक्तोंको देखती हैं— निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये। त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः परित्रातुं शङ्के परिहृतनिमेषास्तव दृशः॥ (सौन्दर्यलहरी ५५) शक्तिकी दृष्टिसे भी देखा जाय, तो शक्ति बिना सारा प्रपंच शवमात्र ठहरता है। अशक्त व्यक्ति, अशक्त समाज, अशक्त जाति, अशक्त देश भारभूत ही होता है, अतः शक्तिकी पूजा सर्वत्र स्वाभाविक है। संसारमें प्रत्येक पदार्थमें तत्तत्कार्य-सम्पादनकी शक्ति है, तभी उसका मूल्य है। अनन्तानन्तकार्योत्पादनानुकूल शक्तिसे सम्पन्न ही परमेश्वर होता है। न्यूनशक्तिसम्पन्न ईश्वर होता है। जितना-जितना शक्तिराहित्य होता है, उतना ही जीवत्व आता है। अधिकाधिक शक्तिसाहित्यमें ईश्वरत्व आता है। निर्गुण, निराकार, निर्विकार, कूटस्थ परब्रह्म अनन्त शक्तियोंकी केन्द्रभूता महाशक्तिसे संवलित होनेपर ही विश्वकी सृष्टि, पालन, संहार आदिमें समर्थ होते हैं। यदि शक्तिसंवलन न हो, तो शिव भी सृष्ट्यादिमें असमर्थ, अशक्त, शवमात्र रह जाता है, अतएव ईश्वरका ईश्वरत्व ही शक्तिमूलक है। जिसके सम्बन्धसे ही कूटस्थ चेतन ईश्वर बनता है, उसके महत्त्वको कौन कहे? शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि। (सौन्दर्यलहरी २) आचार्य तो कहते हैं कि संसारमें बहुत लोग अनेक गुणोंसे युक्त सपर्णा (पत्तोंवाली) कल्पलताका बड़े आदरसे सेवन करते हैं, परंतु मेरी तो ऐसी बुद्धि होती है कि (बिना पत्तोंवाली बेल) एक अपर्णा पार्वतीका ही सेवन करना चाहिये; क्योंकि उसके संसर्गसे पुराना स्थाणु ठूँठ (पुराणपुरुषोत्तम कूटस्थ महादेव) भी कैवल्यरूप परमफल प्रदान करता है। सारांश यह कि सपर्णा कल्पलताके सेवनसे भी अपर्णा (पार्वती)-का सेवन बहुत अधिक चमत्कारपूर्ण है। कल्पलता बहुत फल प्रदान कर सकती है, परंतु वह मोक्ष देनेमें समर्थ नहीं। किंतु अपर्णाका स्वयं तो कहना ही क्या, उसके संसर्गसे पुराना ठूँठ (पुराणपुरुष

श्रीभगवती-तत्त्व ५११ निष्क्रिय शंकर) भी मोक्षफल प्रदान कर देता है— सपर्णामाकीर्णा कतिपयगुणैः सादरमिह श्रयन्त्यन्ये वल्लीं मम तु मतिरेवं विलसति। अपर्णैका सेव्या जगति सकलैर्यत्परिवृतः पुराणोऽपि स्थाणुः फलति किल कैवल्यपदवीम् ॥' (आनन्दलहरी ७) आगे चलकर आचार्य कहते हैं—भगवान् शंकरके पास तो वृद्ध वृषभकी सवारी, भाँग, धत्तूर आदि विषोंका खाना, दिशाका वसन, श्मशान क्रीड़ास्थान, भुजङ्गभूषण आदि जो सामग्रियाँ हैं, वह प्रसिद्ध ही है, फिर भी जो उनमें ऐश्वर्य है, वह केवल भगवतीके पाणिग्रहणका ही फल है। भगवतीके सौभाग्यसे ही शंकरका ऐश्वर्य है— 'भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥' इन उक्तियोंका यही अभिप्राय है कि शक्तिके बिना कूटस्थब्रह्म अकिञ्चित्कर है, उसमें ऐश्वर्य आदि कुछ भी नहीं रह सकता। शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः । यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः ॥ —इत्यादि वचनोंसे अनन्त शक्तियोंका वर्णन है। शक्ति और शक्तिमान् दोनोंका ही अभेद्य सम्बन्ध रहता है। भक्त कहते हैं कि देवीकी महिमा अनन्त है, फिर भी जो वर्णन समाप्त किया जाता है, वह गुणोंके समाप्त हो जानेसे नहीं, किंतु असमर्थ्य या थकावटसे ही स्तुति समाप्त की जाती है। 'महिमानं यदुत्कीर्त्य तव संह्रियते वचः । श्रमेण तदशक्त्या वा न गुणानामियत्तया ॥' प्राणियोंको अभीष्ट वस्तुओंमें रूप, जय, यश और शत्रुपराभव अभीष्ट होता है, यह सब निश्छलभावसे मातासे ही माँगा जाता है—माता ही देती है— 'रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥' इसीलिये सुरासुर सभी अपने मुकुट-किरीटके रत्नोंसे माताके चरणपीठका वन्दन करते हैं— सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके । कृष्णने भी भक्तिपूर्वक उन्हींकी स्तुति की— कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके। शाक्ताद्वैतकी दृष्टि यह है कि अनन्त विश्वका अधिष्ठानभूत शुद्धबोधस्वरूप प्रकाश ही शिवतत्त्व समझा जाता है। उस प्रकाशमें जो विमर्श है, वही शक्ति है। प्रकाशके साथ विचारात्मक शक्तिका अस्तित्व अनिवार्य है। बिना प्रकाशके विमर्श नहीं और बिना विमर्शके प्रकाश भी नहीं रहता। यद्यपि वेदान्तियोंकी दृष्टिमें बिना विमर्शके भी अनन्त, निर्विकल्प प्रकाश रहता है, परंतु शाक्ताद्वैतियोंकी दृष्टिसे विमर्श हर समय रहता है। यहाँतक कि महावाक्यजन्य परब्रह्माकारवृत्तिके उत्पन्न हो जानेपर भी, आवरक अज्ञानके मिट जानेपर भी स्वयं वृत्तिरूप विमर्श बना ही रहता है। वेदान्ती इस वृत्तिको स्वपरविनाशक मानते हैं, परंतु शाक्ताद्वैती कहते हैं कि अपने-आपमें ही नाश्य-नाशकभाव सम्भव नहीं है। यदि उस वृत्तिके नाशके लिये दूसरी वृत्तिकी उत्पत्ति मानेंगे, तब तो उसके भी नाशके लिये अन्यवृत्ति माननी पड़ेगी, फिर अनवस्थाकी प्रसक्ति होगी। अविद्या स्वयं नष्ट होनेवाली है, अतः उससे भी उस वृत्तिरूपा विद्याका नाश नहीं कहा जा सकता। विरोध न होनेके कारण विद्याविद्याका सुन्दोपसुन्दन्यायसे भी परस्पर नाश्य-नाशकभाव नहीं कहा जा सकता। जो कहा जाता है, जैसे कतकरज जलके भीतर भी मिट्टीको नष्ट करके स्वयं नष्ट हो जाता है, वैसे ही विद्यारूपावृत्ति स्वातिरिक्त अविद्या तत्कार्यको नष्ट करके स्वयं भी नष्ट हो जाती है। परंतु दृष्टान्तमें कतकरजका नाश नहीं होता, किंतु इतर रजोंको साथ लेकर कतकरज पानीके नीचे बैठ जाती है, अतः यहाँ भी उक्त दृष्टान्तोंसे वृत्तिका नाश नहीं कहा जा सकता। यही स्थिति— विषं विषान्तरं जयति स्वयमपि जीर्यति, पयः पयोऽन्तरं जयति स्वयमपि जीर्यति। —इत्यादि उक्तियोंकी भी है अर्थात् वहाँ भी विष या पय नष्ट नहीं होता, अपितु दूसरे पय या विषकी अजीर्णताको नष्ट करके अपने आप भी पच

५२० भक्तिसुधा जाता है। अतः इन दृष्टान्तोंसे भी वृत्तिका नाश नहीं कहा जा सकता। इसलिये वृत्तिरूप विद्यासे संश्लिष्ट होकर ही अनन्तप्रकाशस्वरूप शिव सदा विराजमान रहता है। इसी तरह यह भी विचार उठता है कि अविद्यानिवृत्ति क्या है? कोई वस्तु कहींसे निवृत्त होते हुए भी कहीं-न-कहीं रहती ही है। यदि ध्वंसरूप निवृत्ति मानी जाय, तो भी अपने कारणमें उसकी स्थिति माननी पड़ेगी; क्योंकि घटादिका ध्वंस होनेपर भी अपने कारण कपाल, चूर्ण आदि कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूपमें उनकी स्थिति माननी ही पड़ती है। यही स्थिति लयरूपा निवृत्तिकी भी है। यदि निवृत्तिको सर्वथा निःस्वरूप कहें, तो उसके लिये प्रयत्न नहीं हो सकता। सही कहें, तब तो उसी रूपसे शक्तिकी स्थिति रह सकती है। अनिर्वचनीय कहें, तो उसको भी ज्ञाननिवर्त्यता कहनी पड़ेगी, अतएव कुछ आचार्योंने पंचम-प्रकारा अविद्या निवृत्ति मानी है तथा उस रूपसे भी

श्रीभगवती-तत्त्व ५२१

मिश्रीका, सौगन्ध्य बिना पुष्पका, सौन्दर्य बिना सुन्दरीका, लज्जा बिना कुलांगनाका कुछ भी महत्त्व नहीं रह जाता। शाक्ताद्वैतदृष्टिसे शक्ति शिवस्वरूप ही है, सच्चिदानन्दमें चिद्भाव विमर्श है, सत्‌का भाव शिव है। रुद्रहीनं विष्णुहीनं न वदन्ति जनाः किल। शक्तिहीनं यथा सर्वे प्रवदन्ति नराधमम्॥ अर्थात् कोई भी प्राणी रुद्रहीन, विष्णुहीन होनेसे शोचनीय नहीं होता, अपितु शक्तिहीन होनेसे ही शोचनीय होता है। 'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।' बलहीन प्राणीको अपनी आत्माका भी उपलम्भ नहीं हो सकता— गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो हरेः पत्नीं पद्मा हरसहचरीमद्रितनयाम्। तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिःसीममहिमा महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि॥ (सौन्दर्यलहरी ९७) परब्रह्ममहिषीरूपा भगवतीको आचार्योंने तुरीया चिच्छक्तिरूप ही बतलाया है। शङ्करः पुरुषाः सर्वे स्त्रियः सर्वा महेश्वरी। विषयी भगवानीशो विषयः परमेश्वरी॥ मन्ता स एव विश्वात्मा मन्तव्यं तु महेश्वरी। आकाशः शङ्करो देवः पृथिवी शङ्करप्रिया॥ समुद्र-वेल, वृक्ष-लता, शब्द-अर्थ, पदार्थ- शक्ति, पुं-स्त्री, यज्ञ-इज्या, क्रिया-फलभुक्, गुण- व्यक्ति-व्यंजकतारूप, प्रथमनीति-जय बोध-बुद्धि, धर्म- सत्क्रिया, सन्तोष-तुष्टि, इच्छा-काम, यज्ञ-दक्षिणा, आज्याहुति-पुरोडाश, काष्ठा-निमेष, मुहूर्त-कला, ज्योत्स्ना-प्रदीप, रात्रि-दिन, ध्वज-पताका, तृष्णा- लोभ, रति-राग उपर्युक्त भेदोंसे उसी तत्त्वका अनेकधा प्राकट्य होता है। 'शक्ति' शब्दसे बहुतसे लोग केवल माया, अविद्या आदि बहिरंग शक्तियोंको ही समझते हैं। परंतु भगवान्‌की स्वरूपभूता आह्लादिनी शक्ति, जीवभूता पराप्रकृति आदि भी शक्ति शब्दसे व्यवहृत होते हैं। जैसे सिता, द्राक्षा, मधु आदिमें मधुरिमा उनका परमान्तरंग स्वरूप ही है, वैसे ही परमानन्द- रसामृतसार समुद्र भगवान्‌की परमान्तरंग-स्वरूपभूता शक्ति ही भगवती है— विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा परा। अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते॥ यहाँपर विष्णु और क्षेत्रज्ञको भी शक्ति ही कहा गया है। यद्यपि शक्तियाँ अनेक हैं तथापि आनन्दाश्रित आह्लादिनी, चेतनाश्रित संवित्, सदंशाश्रित सन्धिनीशक्ति होती है। क्षेत्रज्ञ तटस्थशक्ति है, माया बहिरंगशक्ति मानी जाती है। तत्त्वविद् लोग कहते हैं कि जैसे पुष्पका सौगन्ध्य सम्यक् रूपसे तब अनुभूत हो सकता है, जब पुष्पकी घ्राणशक्ति हो। अन्य लोगोंको तो व्यवधानके साथ किंचिन्मात्र ही गन्धका अनुभव होता है। उसी तरह भगवतीके सुन्दर स्वरूपका सम्यक् अनुभव परम शिवको ही प्राप्त होता है; वह अन्य दृष्टिका विषय ही नहीं— घृतक्षीरद्राक्षामधुमधुरिमा कैरपि पदै- र्विशिष्ट्यानाख्येयो भवति रसनामात्रविषयः। तथा ते सौन्दर्यं परमशिवदृङ्मात्रविषयः कथङ्कारं ब्रूमः सकलनिगमागोचरगुणे॥ (सौन्दर्यलहरी २) अर्थात् वस्तुतः निर्गुणा, सत्या, सनातनी, सर्वस्वरूपा भगवती ही भक्तानुग्रहार्थ सगुण होकर प्रकट होती हैं। वैसे तो भगवतीके अनन्त स्वरूप हैं, पर विशेषतः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी और सिद्धिदात्री— ये नौ स्वरूप प्रधान है— कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम्। परब्रह्मस्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी॥ सर्वस्वरूपा सर्वेशी सर्वाधारा परात्परा। सर्वबीजस्वरूपा च सर्वमूला निराश्रया॥ सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमङ्गलमङ्गला। वैसे तो अनन्त शक्तियाँ हैं, फिर भी इनके अतिरिक्त और भी कुछ प्रधान शक्तियाँ हैं, जो पूज्य हैं। व्यवहार और परमार्थमें उनका परम उद्योग है।

निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति, इंधिका, दीपिका, रोचिका, मोचिका, परा, सूक्ष्मा, सूक्ष्मामृता, ज्ञानामृता, अमृता, आप्यायिनी, व्यापिनी, व्योमरूपा, तीक्ष्णा, अनन्ता, सृष्टि, ऋद्धि, स्मृति, मेधा, कान्ति, लक्ष्मी, द्युति, स्थिति, सिद्धि, जड़ा, पालिनी, शान्ति, ऐश्वर्या, रति, कामिका, वरदा, आह्लादिनी, प्रीति, दीर्घा, रौद्री, निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा, क्रोधिनी, पुष्टि, तुष्टि, धृति, चन्द्रिका आदि सृष्टि चिद्घनमहासमुद्रकी अनन्त शक्तिस्वामिनी ही भगवती हैं। 'अगस्त्यसंहिता' के वचनानुसार भगवान् शिवने श्रीरामका प्रत्यक्ष साक्षात् करनेके लिये बड़ी तपस्या और आराधना की। भगवान् रामने प्रसन्न होकर कहा कि यदि मेरा तत्त्व जानना चाहते हो तो मेरी आह्लादिनी पराशक्तिकी आराधना करो, उसके बिना मेरी स्थिति नहीं होती— आह्लादिनीं परां शक्तिं स्तूयाः सात्वतसम्मताम्। सदाराध्यस्तदा रामस्तदधीनस्तया विना। तिष्ठामि न क्षणं शम्भो जीवनं परमं मम॥ यह सुनकर श्रीशिवजीने भगवतीकी आराधना की। भगवतीने कृपाकर उन्हें दर्शन दिया। उनके अद्भुत रूपको देखकर उन्होंने अति भक्तिसे दिव्य स्तुति की— वन्दे विदेहतनयापदपुण्डरीकं कैशोरसौरभसमाहतयोगिचित्तम् । हन्तुं त्रितापमनिशं मुनिहंससेव्यं सन्मानसालिपरीपीतपरागपुञ्जम् ॥ करुणा तो शिव, विष्णु आदि सभी देवोंमें होती है, परंतु परमकल्याणमयी, करुणामयी तो श्रीअम्बा ही हैं। कुपुत्रपर भी अम्बाकी करुणा ही रहती है— 'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥' शत्रुसे निष्ठुरतापूर्वक युद्ध करते हुए भी माँके हृदयमें शत्रुओंपर भी कृपा रहती है। उनको बाणोंसे पवित्र करके दिव्यलोकमें

श्रीभगवती-तत्त्व ५२३ माँसे कहता है—हे माँ! जब आपके स्वामी भगवान् जीवोंपर हित-बुद्ध्या कुपित होते हैं, तब आप 'यह क्या? संसारमें निर्दोष कौन है?' ऐसा कहकर समुचित उपायोंसे पिताको अनुकूल बनाती हैं, इसीलिये कि आप ही सच्ची माँ हो। नित्यं विश्वं वशयति हरिर्निग्रहानुग्रहाभ्या- माद्ये शक्तिं विघटयति ते हन्त कारुण्यपूरः। भगवान् श्रीहरि जगत्को अपने वशमें रखते हैं; परंतु आपकी करुणा हरिकी निग्रहादि शक्तियोंको भी स्वाधीन रखती है। भगवती ही सबसे अन्तर और महत्त्वपूर्ण हैं, इसीलिये भक्त कहते हैं— त्वय्येवाश्रयते दया रघुपते देवस्य सत्यं यतो वैदेहि त्वदसन्निधौ भगवता वाली निरामाहतः। नित्ये कापि वधूर्वधं तव तु सान्निध्ये त्वदङ्गव्यथा कुर्वाणोऽप्यभितः पतन्नशरणः काको विवेकोज्झितः॥ [

५२४ भक्तिसुधा

अचिन्त्य अमित आकारोंकी मूलभूत सत्तास्वरूपा भी वही है, वही गुणातीत है। निर्विकल्पबोधसे ही स्वप्रकाशरूपेण भगवतीकी अवगति होती है, अतएव अद्वितीय परब्रह्मस्वरूपसे भगवती नित्य ही प्रसिद्ध हैं। 'केनोपनिषद्' में ब्रह्मविद्यारूप भगवतीका वर्णन मिलता है, उसीकी कृपासे इन्द्र आदिकोंको ब्रह्मस्वरूपका बोध हुआ था। जब इन्द्रके सामनेसे ब्रह्मका अन्तर्धान हो गया, तब इन्द्र लज्जित होकर उसी आकाशमें खड़े रह गये और तपस्या करने लगे। बहुत दिनोंकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर भगवती इन्द्रके सामने प्रकट हुईं— स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीम्। इन्द्रने उसी आकाशमें बहुशोभमाना हैम अलंकारोंसे युक्त ब्रह्मविद्यारूपा भगवतीको देखा और उनकी कृपासे ब्रह्मको जाना। शक्तिके उपासकोंका तो सर्वस्व शक्ति है ही, परंतु तत्तद्देवताओंके उपासकोंको भी शक्तिकी आराधना करनी पड़ती है। यहाँतक कि शक्तिकी उपासनाके बिना उन-उन देवताओंकी प्राप्ति ही नहीं होती। सम्मोहनतन्त्रमें तो स्पष्ट ही यह उक्ति है कि गौरतेज राधिकाकी उपासना किये बिना, जो केवल श्यामतेज कृष्णकी आराधना करता है, वह पातकी होता है— गौरतेजो बिना यस्तु श्यामतेजः समर्चयेत्। जपेद्वा ध्यायते वापि स भवेत्पातकी शिवे॥ (गोपालसहस्रनाम १७)

गायत्री-तत्त्व

किसी गायत्रीनिष्ठ सज्जनका प्रश्न है कि 'गायत्री- मन्त्रका वास्तविक अर्थ क्या है? गायत्री-मन्त्रके द्वारा किस स्वरूपसे किस देवताका ध्यान किया जाय? कोई गोरूपा गायत्रीका, कोई आदित्यमण्डलस्था श्वेत- पद्मस्थिता किसी देवीका ध्यान करना बतलाते हैं, कोई ब्रह्माणी, रुद्राणी, नारायणीका ध्यान उचित समझते हैं, कहीं पंचमुखी गायत्रीका ध्यान बतलाया गया है, तो कोई राधा-कृष्णका ध्यान समुचित मानते हैं। ऐसी स्थितिमें बुद्धिमें भ्रम होता है कि गायत्री-मन्त्रका मुख्य अर्थ और ध्येय क्या है?' इस सम्बन्धमें यद्यपि शास्त्रोंमें बहुत कुछ विवेचन है तथापि यहाँ संक्षेपमें कुछ लिखा जाता है— बृहदारण्यक० (५।१४)-में 'भूमिरन्तरिक्षं द्यौः' इन आठ अक्षरोंको गायत्रीका प्रथम पाद कहा है, 'ऋचो यजूंषि सामानि' इन आठ अक्षरोंको गायत्रीका द्वितीय पाद कहा गया है, 'प्राणोऽपानो व्यानः' इन आठ अक्षरोंको गायत्रीका तीसरा पाद माना गया है। इस तरह लोकात्मा, वेदात्मा एवं प्राणात्मा—ये तीनों ही गायत्रीके तीन पाद हैं। परब्रह्म परमात्मा ही चतुर्थ पाद हैं। 'भूमिरन्तरिक्षम्' इत्यादि श्रुतियोंपर व्याख्या करते हुए आचार्य शंकर कहते हैं कि सम्पूर्ण छन्दोंमें गायत्री-छन्द प्रधान है; क्योंकि वही छन्दोंके प्रयोक्ता गयाख्य प्राणोंका रक्षक है। सम्पूर्ण छन्दोंका आत्मा प्राण है, प्राणका आत्मा गायत्री है। क्षतसे रक्षक होनेके कारण प्राण क्षात्र है, प्राणोंका रक्षण करनेवाली गायत्री है। द्विजोत्तम जन्मका हेतु भी गायत्री ही है। गायत्रीके तीनों पादोंकी उपासना करनेवालोंको लोकात्मा, वेदात्मा और प्राणात्माके सम्पूर्ण विषय उपनत होते हैं। गायत्रीका चतुर्थ पाद ही 'तुरीय' शब्दसे कहा जाता है। जो रजोजात सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करता है, वह सूर्यमण्डलान्तर्गत पुरुष है। जैसे वह पुरुष सर्वलोकाधिपत्यकी श्री एवं यशसे तपता है, वैसे ही तुरीयपादवन्दिता श्री और यशसे दीप्त होता है। गायत्री सम्पूर्ण वेदोंकी जननी है। जो गायत्रीका अभिप्राय है, वही सम्पूर्ण वेदोंका अर्थ है। विश्व- तैजस-प्राज्ञ, विराट्-हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, व्यष्टि- समष्टि जगत् तथा उसकी जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—यह

गायत्री-तत्त्व [पृष्ठ ५२५]

तीनों अवस्थाएँ प्रणवकी अ, उ, म् इन तीनों मात्राओंके अर्थ हैं। सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापक, उत्पादक, पालक, संहारक सर्वेश्वर प्रणवका वाच्यार्थ है। सर्वरहित सर्वाधिष्ठान सच्चिदानन्द परब्रह्म प्रणवका लक्ष्यार्थ है। उत्पादक, पालक, संहारक त्रिविध लोकात्मा भगवान् तीनों व्याहृतियोंके अर्थ हैं। जगदुत्पत्ति-स्थिति-संहार-कारण परब्रह्म ही 'सवितृ' शब्दका अर्थ है। तथापि गायत्रीद्वारा विश्वोत्पादक, स्वप्रकाश परमात्माके उस रमणीय चिन्मय तेजका ध्यान किया जाता है, जो समस्त बुद्धियोंका प्रेरक एवं साक्षी है। विश्वोत्पादक परमात्माके वरेण्य भर्गको बुद्धिप्रेरक एवं बुद्धिसाक्षी कहनेसे जीवात्मा और परमात्माका अभेद परिलक्षित होता है, अतः साधनचतुष्टयसम्पन्न उत्तमाधिकारीके लिये प्रत्यक्चैतन्याभिन्न, निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्मका ही चिन्तन गायत्री- मन्त्रके द्वारा किया जाता है। अनन्त कल्याणगुण- गणसम्पन्न, सगुण, निराकार, परमेश्वरकी उपासना गायत्रीके द्वारा हो सकती है। सगुण, साकार, सच्चिदानन्द परब्रह्मका ध्यान गायत्रीके द्वारा किया जा सकता है। प्राणिप्रसवार्थक 'षूङ्' धातुसे 'सवितृ' शब्दकी निष्पत्ति होती है। यहाँ उत्पत्तिको उपलक्षण मानकर उत्पत्ति, स्थिति एवं लयका कारण परब्रह्म ही 'सवितृ' शब्दका अर्थ है। इस दृष्टिसे उत्पादक, पालक, संहारक जो भी देवता प्रमाणसिद्ध हैं, वे सभी गायत्रीके अर्थ हैं। उत्पादक, पालक, संहारक—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा उनकी स्वरूपभूत तीनों शक्तियोंका ध्यान किया जाता है। त्रिपदा गायत्री त्रैलोक्य, त्रैविद्य तथा प्राण जिस गायत्रीके स्वरूप हैं, वह त्रिपदा गायत्री परोरजा आदित्यमें प्रतिष्ठित है; क्योंकि आदित्य तो मूर्त-अमूर्त दोनोंका ही रस है। इसके बिना सब शुष्क हो जाते हैं, अतः त्रिपदा गायत्री आदित्यमें प्रतिष्ठित है। 'आदित्यः चक्षुः'—स्वरूप सत्तामें प्रतिष्ठित है। वह सत्ता बल अर्थात् प्राणमें प्रतिष्ठित है, अतः सर्वाश्रयभूत प्राण ही परमोत्कृष्ट है। गायत्री अध्यात्म प्राणमें प्रतिष्ठित है। जिस प्राणमें सम्पूर्ण देव, वेद, कर्मफल एक हो जाते हैं, वही प्राण-स्वरूपा गायत्री सबकी आत्मा है। शब्दकारी वागादि प्राण 'गय' हैं, उनका त्राण करनेवाली गायत्री है। आचार्य अष्टवर्षके बालकको उपनीत करके जब गायत्री प्रदान करता है, तब जगदात्मा प्राण ही उसके लिये समर्पित करता है। जिस माणवकको आचार्य गायत्रीका उपदेश करता है, उसके प्राणोंका त्राण करता है, नरकादि पतनसे बचा लेता है। गायत्रीके प्रथम पादको जाननेवाला यति यदि धनपूर्ण तीनों लोकोंका दान ले, तो भी उसे कोई दोष नहीं लगता। जो द्वितीय पादको जानता है, वह जितनेमें त्रयी विद्यारूप सूर्य तपता है, उन सब लोकोंको प्राप्त कर सकता है। तीसरे पादको जाननेवाला सम्पूर्ण प्राणिवर्गको प्राप्त कर सकता है। सारांश यह है कि यदि पादत्रयके समान भी कोई दाता- प्रतिग्रहीता हो, तब भी गायत्रीविद्को प्रतिग्रहदोष नहीं लगता, फिर चतुर्थ पादके वेदिताके लिये तो ऐसी कोई वस्तु ही नहीं है, जो उसके ज्ञानका फल कहा जा सके। वस्तुतः त्रिप्राद-विज्ञानका भी प्रतिग्रहसे अधिक ही फल होता है, क्योंकि इतना प्रतिग्रह कौन ले सकता है? गायत्रीके उपस्थान-मन्त्रमें कहा गया है कि हे गायत्रि! आप त्रैलोक्यरूप पादसे एकपदी हो, त्रयी विद्यारूप पादसे द्विपदी हो, प्राणादि तृतीय पादसे त्रिपदी हो, चतुर्थ तुरीय पादसे चतुष्पदी हो। इस तरह चार पादोंसे युक्त मन्त्रोंद्वारा आपकी उपासना होती है। इसके बाद अपने निरुपाधिक आत्मास्वरूपसे अपद हो, 'नेति-नेति' इत्यादि निषेधोंसे वह सर्वनिषेधोंका अवधिरूपसे बोधित सम्पूर्ण व्यवहारोंका अगोचर है, अतः प्रत्यक्ष परोरजा आपके

तुरीय पादको हम प्रणाम करते हैं। आपकी प्राप्तिमें विघ्नकारी पापी, आपकी प्राप्तिमें विघ्नसम्पादन- लक्षण अपने अभीष्टको प्राप्त न करें, इस अभिप्रायसे अथवा जिससे द्वेष हो, उसके प्रति भी अमुक व्यक्ति अमुक अभिप्रेत फलको प्राप्त न करें, मैं अमुक फल पाऊँ, ऐसी भावनासे वह मिल जाता है। गायत्रीका अग्नि ही मुख है। अग्निमुखको न जाननेसे ही एक गायत्रीविद् हाथी बनकर जनकका वाहन बना था। जैसे अग्निमें अधिक-से-अधिक ईंधन समाप्त हो जाता है, वैसे ही अग्निमुख गायत्रीके ज्ञानसे सब पाप समाप्त हो जाते हैं। 'छान्दोग्योपनिषद्' में कहा गया है कि यह सम्पूर्ण चराचर भूत-प्रपंच गायत्री ही है। किस तरह सब कुछ गायत्री है, इसपर कहा गया है कि वाक् ही गायत्री है, वाक् ही समस्त भूतोंका गान एवं रक्षण करती है। 'मा भैषीः' इत्यादि वचनोंसे वाक्-द्वारा ही भयकी निवृत्ति होती है। गायत्रीको पृथ्वीरूप [L