भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीभगवती-तत्त्व ५११ निष्क्रिय शंकर) भी मोक्षफल प्रदान कर देता है— सपर्णामाकीर्णा कतिपयगुणैः सादरमिह श्रयन्त्यन्ये वल्लीं मम तु मतिरेवं विलसति। अपर्णैका सेव्या जगति सकलैर्यत्परिवृतः पुराणोऽपि स्थाणुः फलति किल कैवल्यपदवीम् ॥' (आनन्दलहरी ७) आगे चलकर आचार्य कहते हैं—भगवान् शंकरके पास तो वृद्ध वृषभकी सवारी, भाँग, धत्तूर आदि विषोंका खाना, दिशाका वसन, श्मशान क्रीड़ास्थान, भुजङ्गभूषण आदि जो सामग्रियाँ हैं, वह प्रसिद्ध ही है, फिर भी जो उनमें ऐश्वर्य है, वह केवल भगवतीके पाणिग्रहणका ही फल है। भगवतीके सौभाग्यसे ही शंकरका ऐश्वर्य है— 'भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥' इन उक्तियोंका यही अभिप्राय है कि शक्तिके बिना कूटस्थब्रह्म अकिञ्चित्कर है, उसमें ऐश्वर्य आदि कुछ भी नहीं रह सकता। शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः । यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः ॥ —इत्यादि वचनोंसे अनन्त शक्तियोंका वर्णन है। शक्ति और शक्तिमान् दोनोंका ही अभेद्य सम्बन्ध रहता है। भक्त कहते हैं कि देवीकी महिमा अनन्त है, फिर भी जो वर्णन समाप्त किया जाता है, वह गुणोंके समाप्त हो जानेसे नहीं, किंतु असमर्थ्य या थकावटसे ही स्तुति समाप्त की जाती है। 'महिमानं यदुत्कीर्त्य तव संह्रियते वचः । श्रमेण तदशक्त्या वा न गुणानामियत्तया ॥' प्राणियोंको अभीष्ट वस्तुओंमें रूप, जय, यश और शत्रुपराभव अभीष्ट होता है, यह सब निश्छलभावसे मातासे ही माँगा जाता है—माता ही देती है— 'रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥' इसीलिये सुरासुर सभी अपने मुकुट-किरीटके रत्नोंसे माताके चरणपीठका वन्दन करते हैं— सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके । कृष्णने भी भक्तिपूर्वक उन्हींकी स्तुति की— कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके। शाक्ताद्वैतकी दृष्टि यह है कि अनन्त विश्वका अधिष्ठानभूत शुद्धबोधस्वरूप प्रकाश ही शिवतत्त्व समझा जाता है। उस प्रकाशमें जो विमर्श है, वही शक्ति है। प्रकाशके साथ विचारात्मक शक्तिका अस्तित्व अनिवार्य है। बिना प्रकाशके विमर्श नहीं और बिना विमर्शके प्रकाश भी नहीं रहता। यद्यपि वेदान्तियोंकी दृष्टिमें बिना विमर्शके भी अनन्त, निर्विकल्प प्रकाश रहता है, परंतु शाक्ताद्वैतियोंकी दृष्टिसे विमर्श हर समय रहता है। यहाँतक कि महावाक्यजन्य परब्रह्माकारवृत्तिके उत्पन्न हो जानेपर भी, आवरक अज्ञानके मिट जानेपर भी स्वयं वृत्तिरूप विमर्श बना ही रहता है। वेदान्ती इस वृत्तिको स्वपरविनाशक मानते हैं, परंतु शाक्ताद्वैती कहते हैं कि अपने-आपमें ही नाश्य-नाशकभाव सम्भव नहीं है। यदि उस वृत्तिके नाशके लिये दूसरी वृत्तिकी उत्पत्ति मानेंगे, तब तो उसके भी नाशके लिये अन्यवृत्ति माननी पड़ेगी, फिर अनवस्थाकी प्रसक्ति होगी। अविद्या स्वयं नष्ट होनेवाली है, अतः उससे भी उस वृत्तिरूपा विद्याका नाश नहीं कहा जा सकता। विरोध न होनेके कारण विद्याविद्याका सुन्दोपसुन्दन्यायसे भी परस्पर नाश्य-नाशकभाव नहीं कहा जा सकता। जो कहा जाता है, जैसे कतकरज जलके भीतर भी मिट्टीको नष्ट करके स्वयं नष्ट हो जाता है, वैसे ही विद्यारूपावृत्ति स्वातिरिक्त अविद्या तत्कार्यको नष्ट करके स्वयं भी नष्ट हो जाती है। परंतु दृष्टान्तमें कतकरजका नाश नहीं होता, किंतु इतर रजोंको साथ लेकर कतकरज पानीके नीचे बैठ जाती है, अतः यहाँ भी उक्त दृष्टान्तोंसे वृत्तिका नाश नहीं कहा जा सकता। यही स्थिति— विषं विषान्तरं जयति स्वयमपि जीर्यति, पयः पयोऽन्तरं जयति स्वयमपि जीर्यति। —इत्यादि उक्तियोंकी भी है अर्थात् वहाँ भी विष या पय नष्ट नहीं होता, अपितु दूसरे पय या विषकी अजीर्णताको नष्ट करके अपने आप भी पच