भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
श्रीभगवती-तत्त्व ५११ निष्क्रिय शंकर) भी मोक्षफल प्रदान कर देता है— सपर्णामाकीर्णा कतिपयगुणैः सादरमिह श्रयन्त्यन्ये वल्लीं मम तु मतिरेवं विलसति। अपर्णैका सेव्या जगति सकलैर्यत्परिवृतः पुराणोऽपि स्थाणुः फलति किल कैवल्यपदवीम् ॥' (आनन्दलहरी ७) आगे चलकर आचार्य कहते हैं—भगवान् शंकरके पास तो वृद्ध वृषभकी सवारी, भाँग, धत्तूर आदि विषोंका खाना, दिशाका वसन, श्मशान क्रीड़ास्थान, भुजङ्गभूषण आदि जो सामग्रियाँ हैं, वह प्रसिद्ध ही है, फिर भी जो उनमें ऐश्वर्य है, वह केवल भगवतीके पाणिग्रहणका ही फल है। भगवतीके सौभाग्यसे ही शंकरका ऐश्वर्य है— 'भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥' इन उक्तियोंका यही अभिप्राय है कि शक्तिके बिना कूटस्थब्रह्म अकिञ्चित्कर है, उसमें ऐश्वर्य आदि कुछ भी नहीं रह सकता। शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः । यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः ॥ —इत्यादि वचनोंसे अनन्त शक्तियोंका वर्णन है। शक्ति और शक्तिमान् दोनोंका ही अभेद्य सम्बन्ध रहता है। भक्त कहते हैं कि देवीकी महिमा अनन्त है, फिर भी जो वर्णन समाप्त किया जाता है, वह गुणोंके समाप्त हो जानेसे नहीं, किंतु असमर्थ्य या थकावटसे ही स्तुति समाप्त की जाती है। 'महिमानं यदुत्कीर्त्य तव संह्रियते वचः । श्रमेण तदशक्त्या वा न गुणानामियत्तया ॥' प्राणियोंको अभीष्ट वस्तुओंमें रूप, जय, यश और शत्रुपराभव अभीष्ट होता है, यह सब निश्छलभावसे मातासे ही माँगा जाता है—माता ही देती है— 'रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥' इसीलिये सुरासुर सभी अपने मुकुट-किरीटके रत्नोंसे माताके चरणपीठका वन्दन करते हैं— सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके । कृष्णने भी भक्तिपूर्वक उन्हींकी स्तुति की— कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके। शाक्ताद्वैतकी दृष्टि यह है कि अनन्त विश्वका अधिष्ठानभूत शुद्धबोधस्वरूप प्रकाश ही शिवतत्त्व समझा जाता है। उस प्रकाशमें जो विमर्श है, वही शक्ति है। प्रकाशके साथ विचारात्मक शक्तिका अस्तित्व अनिवार्य है। बिना प्रकाशके विमर्श नहीं और बिना विमर्शके प्रकाश भी नहीं रहता। यद्यपि वेदान्तियोंकी दृष्टिमें बिना विमर्शके भी अनन्त, निर्विकल्प प्रकाश रहता है, परंतु शाक्ताद्वैतियोंकी दृष्टिसे विमर्श हर समय रहता है। यहाँतक कि महावाक्यजन्य परब्रह्माकारवृत्तिके उत्पन्न हो जानेपर भी, आवरक अज्ञानके मिट जानेपर भी स्वयं वृत्तिरूप विमर्श बना ही रहता है। वेदान्ती इस वृत्तिको स्वपरविनाशक मानते हैं, परंतु शाक्ताद्वैती कहते हैं कि अपने-आपमें ही नाश्य-नाशकभाव सम्भव नहीं है। यदि उस वृत्तिके नाशके लिये दूसरी वृत्तिकी उत्पत्ति मानेंगे, तब तो उसके भी नाशके लिये अन्यवृत्ति माननी पड़ेगी, फिर अनवस्थाकी प्रसक्ति होगी। अविद्या स्वयं नष्ट होनेवाली है, अतः उससे भी उस वृत्तिरूपा विद्याका नाश नहीं कहा जा सकता। विरोध न होनेके कारण विद्याविद्याका सुन्दोपसुन्दन्यायसे भी परस्पर नाश्य-नाशकभाव नहीं कहा जा सकता। जो कहा जाता है, जैसे कतकरज जलके भीतर भी मिट्टीको नष्ट करके स्वयं नष्ट हो जाता है, वैसे ही विद्यारूपावृत्ति स्वातिरिक्त अविद्या तत्कार्यको नष्ट करके स्वयं भी नष्ट हो जाती है। परंतु दृष्टान्तमें कतकरजका नाश नहीं होता, किंतु इतर रजोंको साथ लेकर कतकरज पानीके नीचे बैठ जाती है, अतः यहाँ भी उक्त दृष्टान्तोंसे वृत्तिका नाश नहीं कहा जा सकता। यही स्थिति— विषं विषान्तरं जयति स्वयमपि जीर्यति, पयः पयोऽन्तरं जयति स्वयमपि जीर्यति। —इत्यादि उक्तियोंकी भी है अर्थात् वहाँ भी विष या पय नष्ट नहीं होता, अपितु दूसरे पय या विषकी अजीर्णताको नष्ट करके अपने आप भी पच
५२० भक्तिसुधा जाता है। अतः इन दृष्टान्तोंसे भी वृत्तिका नाश नहीं कहा जा सकता। इसलिये वृत्तिरूप विद्यासे संश्लिष्ट होकर ही अनन्तप्रकाशस्वरूप शिव सदा विराजमान रहता है। इसी तरह यह भी विचार उठता है कि अविद्यानिवृत्ति क्या है? कोई वस्तु कहींसे निवृत्त होते हुए भी कहीं-न-कहीं रहती ही है। यदि ध्वंसरूप निवृत्ति मानी जाय, तो भी अपने कारणमें उसकी स्थिति माननी पड़ेगी; क्योंकि घटादिका ध्वंस होनेपर भी अपने कारण कपाल, चूर्ण आदि कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूपमें उनकी स्थिति माननी ही पड़ती है। यही स्थिति लयरूपा निवृत्तिकी भी है। यदि निवृत्तिको सर्वथा निःस्वरूप कहें, तो उसके लिये प्रयत्न नहीं हो सकता। सही कहें, तब तो उसी रूपसे शक्तिकी स्थिति रह सकती है। अनिर्वचनीय कहें, तो उसको भी ज्ञाननिवर्त्यता कहनी पड़ेगी, अतएव कुछ आचार्योंने पंचम-प्रकारा अविद्या निवृत्ति मानी है तथा उस रूपसे भी
श्रीभगवती-तत्त्व ५२१
मिश्रीका, सौगन्ध्य बिना पुष्पका, सौन्दर्य बिना सुन्दरीका, लज्जा बिना कुलांगनाका कुछ भी महत्त्व नहीं रह जाता। शाक्ताद्वैतदृष्टिसे शक्ति शिवस्वरूप ही है, सच्चिदानन्दमें चिद्भाव विमर्श है, सत्का भाव शिव है। रुद्रहीनं विष्णुहीनं न वदन्ति जनाः किल। शक्तिहीनं यथा सर्वे प्रवदन्ति नराधमम्॥ अर्थात् कोई भी प्राणी रुद्रहीन, विष्णुहीन होनेसे शोचनीय नहीं होता, अपितु शक्तिहीन होनेसे ही शोचनीय होता है। 'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।' बलहीन प्राणीको अपनी आत्माका भी उपलम्भ नहीं हो सकता— गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो हरेः पत्नीं पद्मा हरसहचरीमद्रितनयाम्। तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिःसीममहिमा महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि॥ (सौन्दर्यलहरी ९७) परब्रह्ममहिषीरूपा भगवतीको आचार्योंने तुरीया चिच्छक्तिरूप ही बतलाया है। शङ्करः पुरुषाः सर्वे स्त्रियः सर्वा महेश्वरी। विषयी भगवानीशो विषयः परमेश्वरी॥ मन्ता स एव विश्वात्मा मन्तव्यं तु महेश्वरी। आकाशः शङ्करो देवः पृथिवी शङ्करप्रिया॥ समुद्र-वेल, वृक्ष-लता, शब्द-अर्थ, पदार्थ- शक्ति, पुं-स्त्री, यज्ञ-इज्या, क्रिया-फलभुक्, गुण- व्यक्ति-व्यंजकतारूप, प्रथमनीति-जय बोध-बुद्धि, धर्म- सत्क्रिया, सन्तोष-तुष्टि, इच्छा-काम, यज्ञ-दक्षिणा, आज्याहुति-पुरोडाश, काष्ठा-निमेष, मुहूर्त-कला, ज्योत्स्ना-प्रदीप, रात्रि-दिन, ध्वज-पताका, तृष्णा- लोभ, रति-राग उपर्युक्त भेदोंसे उसी तत्त्वका अनेकधा प्राकट्य होता है। 'शक्ति' शब्दसे बहुतसे लोग केवल माया, अविद्या आदि बहिरंग शक्तियोंको ही समझते हैं। परंतु भगवान्की स्वरूपभूता आह्लादिनी शक्ति, जीवभूता पराप्रकृति आदि भी शक्ति शब्दसे व्यवहृत होते हैं। जैसे सिता, द्राक्षा, मधु आदिमें मधुरिमा उनका परमान्तरंग स्वरूप ही है, वैसे ही परमानन्द- रसामृतसार समुद्र भगवान्की परमान्तरंग-स्वरूपभूता शक्ति ही भगवती है— विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा परा। अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते॥ यहाँपर विष्णु और क्षेत्रज्ञको भी शक्ति ही कहा गया है। यद्यपि शक्तियाँ अनेक हैं तथापि आनन्दाश्रित आह्लादिनी, चेतनाश्रित संवित्, सदंशाश्रित सन्धिनीशक्ति होती है। क्षेत्रज्ञ तटस्थशक्ति है, माया बहिरंगशक्ति मानी जाती है। तत्त्वविद् लोग कहते हैं कि जैसे पुष्पका सौगन्ध्य सम्यक् रूपसे तब अनुभूत हो सकता है, जब पुष्पकी घ्राणशक्ति हो। अन्य लोगोंको तो व्यवधानके साथ किंचिन्मात्र ही गन्धका अनुभव होता है। उसी तरह भगवतीके सुन्दर स्वरूपका सम्यक् अनुभव परम शिवको ही प्राप्त होता है; वह अन्य दृष्टिका विषय ही नहीं— घृतक्षीरद्राक्षामधुमधुरिमा कैरपि पदै- र्विशिष्ट्यानाख्येयो भवति रसनामात्रविषयः। तथा ते सौन्दर्यं परमशिवदृङ्मात्रविषयः कथङ्कारं ब्रूमः सकलनिगमागोचरगुणे॥ (सौन्दर्यलहरी २) अर्थात् वस्तुतः निर्गुणा, सत्या, सनातनी, सर्वस्वरूपा भगवती ही भक्तानुग्रहार्थ सगुण होकर प्रकट होती हैं। वैसे तो भगवतीके अनन्त स्वरूप हैं, पर विशेषतः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी और सिद्धिदात्री— ये नौ स्वरूप प्रधान है— कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम्। परब्रह्मस्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी॥ सर्वस्वरूपा सर्वेशी सर्वाधारा परात्परा। सर्वबीजस्वरूपा च सर्वमूला निराश्रया॥ सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमङ्गलमङ्गला। वैसे तो अनन्त शक्तियाँ हैं, फिर भी इनके अतिरिक्त और भी कुछ प्रधान शक्तियाँ हैं, जो पूज्य हैं। व्यवहार और परमार्थमें उनका परम उद्योग है।
निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति, इंधिका, दीपिका, रोचिका, मोचिका, परा, सूक्ष्मा, सूक्ष्मामृता, ज्ञानामृता, अमृता, आप्यायिनी, व्यापिनी, व्योमरूपा, तीक्ष्णा, अनन्ता, सृष्टि, ऋद्धि, स्मृति, मेधा, कान्ति, लक्ष्मी, द्युति, स्थिति, सिद्धि, जड़ा, पालिनी, शान्ति, ऐश्वर्या, रति, कामिका, वरदा, आह्लादिनी, प्रीति, दीर्घा, रौद्री, निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा, क्रोधिनी, पुष्टि, तुष्टि, धृति, चन्द्रिका आदि सृष्टि चिद्घनमहासमुद्रकी अनन्त शक्तिस्वामिनी ही भगवती हैं। 'अगस्त्यसंहिता' के वचनानुसार भगवान् शिवने श्रीरामका प्रत्यक्ष साक्षात् करनेके लिये बड़ी तपस्या और आराधना की। भगवान् रामने प्रसन्न होकर कहा कि यदि मेरा तत्त्व जानना चाहते हो तो मेरी आह्लादिनी पराशक्तिकी आराधना करो, उसके बिना मेरी स्थिति नहीं होती— आह्लादिनीं परां शक्तिं स्तूयाः सात्वतसम्मताम्। सदाराध्यस्तदा रामस्तदधीनस्तया विना। तिष्ठामि न क्षणं शम्भो जीवनं परमं मम॥ यह सुनकर श्रीशिवजीने भगवतीकी आराधना की। भगवतीने कृपाकर उन्हें दर्शन दिया। उनके अद्भुत रूपको देखकर उन्होंने अति भक्तिसे दिव्य स्तुति की— वन्दे विदेहतनयापदपुण्डरीकं कैशोरसौरभसमाहतयोगिचित्तम् । हन्तुं त्रितापमनिशं मुनिहंससेव्यं सन्मानसालिपरीपीतपरागपुञ्जम् ॥ करुणा तो शिव, विष्णु आदि सभी देवोंमें होती है, परंतु परमकल्याणमयी, करुणामयी तो श्रीअम्बा ही हैं। कुपुत्रपर भी अम्बाकी करुणा ही रहती है— 'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥' शत्रुसे निष्ठुरतापूर्वक युद्ध करते हुए भी माँके हृदयमें शत्रुओंपर भी कृपा रहती है। उनको बाणोंसे पवित्र करके दिव्यलोकमें
श्रीभगवती-तत्त्व ५२३ माँसे कहता है—हे माँ! जब आपके स्वामी भगवान् जीवोंपर हित-बुद्ध्या कुपित होते हैं, तब आप 'यह क्या? संसारमें निर्दोष कौन है?' ऐसा कहकर समुचित उपायोंसे पिताको अनुकूल बनाती हैं, इसीलिये कि आप ही सच्ची माँ हो। नित्यं विश्वं वशयति हरिर्निग्रहानुग्रहाभ्या- माद्ये शक्तिं विघटयति ते हन्त कारुण्यपूरः। भगवान् श्रीहरि जगत्को अपने वशमें रखते हैं; परंतु आपकी करुणा हरिकी निग्रहादि शक्तियोंको भी स्वाधीन रखती है। भगवती ही सबसे अन्तर और महत्त्वपूर्ण हैं, इसीलिये भक्त कहते हैं— त्वय्येवाश्रयते दया रघुपते देवस्य सत्यं यतो वैदेहि त्वदसन्निधौ भगवता वाली निरामाहतः। नित्ये कापि वधूर्वधं तव तु सान्निध्ये त्वदङ्गव्यथा कुर्वाणोऽप्यभितः पतन्नशरणः काको विवेकोज्झितः॥ [
५२४ भक्तिसुधा
अचिन्त्य अमित आकारोंकी मूलभूत सत्तास्वरूपा भी वही है, वही गुणातीत है। निर्विकल्पबोधसे ही स्वप्रकाशरूपेण भगवतीकी अवगति होती है, अतएव अद्वितीय परब्रह्मस्वरूपसे भगवती नित्य ही प्रसिद्ध हैं। 'केनोपनिषद्' में ब्रह्मविद्यारूप भगवतीका वर्णन मिलता है, उसीकी कृपासे इन्द्र आदिकोंको ब्रह्मस्वरूपका बोध हुआ था। जब इन्द्रके सामनेसे ब्रह्मका अन्तर्धान हो गया, तब इन्द्र लज्जित होकर उसी आकाशमें खड़े रह गये और तपस्या करने लगे। बहुत दिनोंकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर भगवती इन्द्रके सामने प्रकट हुईं— स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीम्। इन्द्रने उसी आकाशमें बहुशोभमाना हैम अलंकारोंसे युक्त ब्रह्मविद्यारूपा भगवतीको देखा और उनकी कृपासे ब्रह्मको जाना। शक्तिके उपासकोंका तो सर्वस्व शक्ति है ही, परंतु तत्तद्देवताओंके उपासकोंको भी शक्तिकी आराधना करनी पड़ती है। यहाँतक कि शक्तिकी उपासनाके बिना उन-उन देवताओंकी प्राप्ति ही नहीं होती। सम्मोहनतन्त्रमें तो स्पष्ट ही यह उक्ति है कि गौरतेज राधिकाकी उपासना किये बिना, जो केवल श्यामतेज कृष्णकी आराधना करता है, वह पातकी होता है— गौरतेजो बिना यस्तु श्यामतेजः समर्चयेत्। जपेद्वा ध्यायते वापि स भवेत्पातकी शिवे॥ (गोपालसहस्रनाम १७)
गायत्री-तत्त्व
किसी गायत्रीनिष्ठ सज्जनका प्रश्न है कि 'गायत्री- मन्त्रका वास्तविक अर्थ क्या है? गायत्री-मन्त्रके द्वारा किस स्वरूपसे किस देवताका ध्यान किया जाय? कोई गोरूपा गायत्रीका, कोई आदित्यमण्डलस्था श्वेत- पद्मस्थिता किसी देवीका ध्यान करना बतलाते हैं, कोई ब्रह्माणी, रुद्राणी, नारायणीका ध्यान उचित समझते हैं, कहीं पंचमुखी गायत्रीका ध्यान बतलाया गया है, तो कोई राधा-कृष्णका ध्यान समुचित मानते हैं। ऐसी स्थितिमें बुद्धिमें भ्रम होता है कि गायत्री-मन्त्रका मुख्य अर्थ और ध्येय क्या है?' इस सम्बन्धमें यद्यपि शास्त्रोंमें बहुत कुछ विवेचन है तथापि यहाँ संक्षेपमें कुछ लिखा जाता है— बृहदारण्यक० (५।१४)-में 'भूमिरन्तरिक्षं द्यौः' इन आठ अक्षरोंको गायत्रीका प्रथम पाद कहा है, 'ऋचो यजूंषि सामानि' इन आठ अक्षरोंको गायत्रीका द्वितीय पाद कहा गया है, 'प्राणोऽपानो व्यानः' इन आठ अक्षरोंको गायत्रीका तीसरा पाद माना गया है। इस तरह लोकात्मा, वेदात्मा एवं प्राणात्मा—ये तीनों ही गायत्रीके तीन पाद हैं। परब्रह्म परमात्मा ही चतुर्थ पाद हैं। 'भूमिरन्तरिक्षम्' इत्यादि श्रुतियोंपर व्याख्या करते हुए आचार्य शंकर कहते हैं कि सम्पूर्ण छन्दोंमें गायत्री-छन्द प्रधान है; क्योंकि वही छन्दोंके प्रयोक्ता गयाख्य प्राणोंका रक्षक है। सम्पूर्ण छन्दोंका आत्मा प्राण है, प्राणका आत्मा गायत्री है। क्षतसे रक्षक होनेके कारण प्राण क्षात्र है, प्राणोंका रक्षण करनेवाली गायत्री है। द्विजोत्तम जन्मका हेतु भी गायत्री ही है। गायत्रीके तीनों पादोंकी उपासना करनेवालोंको लोकात्मा, वेदात्मा और प्राणात्माके सम्पूर्ण विषय उपनत होते हैं। गायत्रीका चतुर्थ पाद ही 'तुरीय' शब्दसे कहा जाता है। जो रजोजात सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करता है, वह सूर्यमण्डलान्तर्गत पुरुष है। जैसे वह पुरुष सर्वलोकाधिपत्यकी श्री एवं यशसे तपता है, वैसे ही तुरीयपादवन्दिता श्री और यशसे दीप्त होता है। गायत्री सम्पूर्ण वेदोंकी जननी है। जो गायत्रीका अभिप्राय है, वही सम्पूर्ण वेदोंका अर्थ है। विश्व- तैजस-प्राज्ञ, विराट्-हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, व्यष्टि- समष्टि जगत् तथा उसकी जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—यह
गायत्री-तत्त्व [पृष्ठ ५२५]
तीनों अवस्थाएँ प्रणवकी अ, उ, म् इन तीनों मात्राओंके अर्थ हैं। सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापक, उत्पादक, पालक, संहारक सर्वेश्वर प्रणवका वाच्यार्थ है। सर्वरहित सर्वाधिष्ठान सच्चिदानन्द परब्रह्म प्रणवका लक्ष्यार्थ है। उत्पादक, पालक, संहारक त्रिविध लोकात्मा भगवान् तीनों व्याहृतियोंके अर्थ हैं। जगदुत्पत्ति-स्थिति-संहार-कारण परब्रह्म ही 'सवितृ' शब्दका अर्थ है। तथापि गायत्रीद्वारा विश्वोत्पादक, स्वप्रकाश परमात्माके उस रमणीय चिन्मय तेजका ध्यान किया जाता है, जो समस्त बुद्धियोंका प्रेरक एवं साक्षी है। विश्वोत्पादक परमात्माके वरेण्य भर्गको बुद्धिप्रेरक एवं बुद्धिसाक्षी कहनेसे जीवात्मा और परमात्माका अभेद परिलक्षित होता है, अतः साधनचतुष्टयसम्पन्न उत्तमाधिकारीके लिये प्रत्यक्चैतन्याभिन्न, निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्मका ही चिन्तन गायत्री- मन्त्रके द्वारा किया जाता है। अनन्त कल्याणगुण- गणसम्पन्न, सगुण, निराकार, परमेश्वरकी उपासना गायत्रीके द्वारा हो सकती है। सगुण, साकार, सच्चिदानन्द परब्रह्मका ध्यान गायत्रीके द्वारा किया जा सकता है। प्राणिप्रसवार्थक 'षूङ्' धातुसे 'सवितृ' शब्दकी निष्पत्ति होती है। यहाँ उत्पत्तिको उपलक्षण मानकर उत्पत्ति, स्थिति एवं लयका कारण परब्रह्म ही 'सवितृ' शब्दका अर्थ है। इस दृष्टिसे उत्पादक, पालक, संहारक जो भी देवता प्रमाणसिद्ध हैं, वे सभी गायत्रीके अर्थ हैं। उत्पादक, पालक, संहारक—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा उनकी स्वरूपभूत तीनों शक्तियोंका ध्यान किया जाता है। त्रिपदा गायत्री त्रैलोक्य, त्रैविद्य तथा प्राण जिस गायत्रीके स्वरूप हैं, वह त्रिपदा गायत्री परोरजा आदित्यमें प्रतिष्ठित है; क्योंकि आदित्य तो मूर्त-अमूर्त दोनोंका ही रस है। इसके बिना सब शुष्क हो जाते हैं, अतः त्रिपदा गायत्री आदित्यमें प्रतिष्ठित है। 'आदित्यः चक्षुः'—स्वरूप सत्तामें प्रतिष्ठित है। वह सत्ता बल अर्थात् प्राणमें प्रतिष्ठित है, अतः सर्वाश्रयभूत प्राण ही परमोत्कृष्ट है। गायत्री अध्यात्म प्राणमें प्रतिष्ठित है। जिस प्राणमें सम्पूर्ण देव, वेद, कर्मफल एक हो जाते हैं, वही प्राण-स्वरूपा गायत्री सबकी आत्मा है। शब्दकारी वागादि प्राण 'गय' हैं, उनका त्राण करनेवाली गायत्री है। आचार्य अष्टवर्षके बालकको उपनीत करके जब गायत्री प्रदान करता है, तब जगदात्मा प्राण ही उसके लिये समर्पित करता है। जिस माणवकको आचार्य गायत्रीका उपदेश करता है, उसके प्राणोंका त्राण करता है, नरकादि पतनसे बचा लेता है। गायत्रीके प्रथम पादको जाननेवाला यति यदि धनपूर्ण तीनों लोकोंका दान ले, तो भी उसे कोई दोष नहीं लगता। जो द्वितीय पादको जानता है, वह जितनेमें त्रयी विद्यारूप सूर्य तपता है, उन सब लोकोंको प्राप्त कर सकता है। तीसरे पादको जाननेवाला सम्पूर्ण प्राणिवर्गको प्राप्त कर सकता है। सारांश यह है कि यदि पादत्रयके समान भी कोई दाता- प्रतिग्रहीता हो, तब भी गायत्रीविद्को प्रतिग्रहदोष नहीं लगता, फिर चतुर्थ पादके वेदिताके लिये तो ऐसी कोई वस्तु ही नहीं है, जो उसके ज्ञानका फल कहा जा सके। वस्तुतः त्रिप्राद-विज्ञानका भी प्रतिग्रहसे अधिक ही फल होता है, क्योंकि इतना प्रतिग्रह कौन ले सकता है? गायत्रीके उपस्थान-मन्त्रमें कहा गया है कि हे गायत्रि! आप त्रैलोक्यरूप पादसे एकपदी हो, त्रयी विद्यारूप पादसे द्विपदी हो, प्राणादि तृतीय पादसे त्रिपदी हो, चतुर्थ तुरीय पादसे चतुष्पदी हो। इस तरह चार पादोंसे युक्त मन्त्रोंद्वारा आपकी उपासना होती है। इसके बाद अपने निरुपाधिक आत्मास्वरूपसे अपद हो, 'नेति-नेति' इत्यादि निषेधोंसे वह सर्वनिषेधोंका अवधिरूपसे बोधित सम्पूर्ण व्यवहारोंका अगोचर है, अतः प्रत्यक्ष परोरजा आपके
तुरीय पादको हम प्रणाम करते हैं। आपकी प्राप्तिमें विघ्नकारी पापी, आपकी प्राप्तिमें विघ्नसम्पादन- लक्षण अपने अभीष्टको प्राप्त न करें, इस अभिप्रायसे अथवा जिससे द्वेष हो, उसके प्रति भी अमुक व्यक्ति अमुक अभिप्रेत फलको प्राप्त न करें, मैं अमुक फल पाऊँ, ऐसी भावनासे वह मिल जाता है। गायत्रीका अग्नि ही मुख है। अग्निमुखको न जाननेसे ही एक गायत्रीविद् हाथी बनकर जनकका वाहन बना था। जैसे अग्निमें अधिक-से-अधिक ईंधन समाप्त हो जाता है, वैसे ही अग्निमुख गायत्रीके ज्ञानसे सब पाप समाप्त हो जाते हैं। 'छान्दोग्योपनिषद्' में कहा गया है कि यह सम्पूर्ण चराचर भूत-प्रपंच गायत्री ही है। किस तरह सब कुछ गायत्री है, इसपर कहा गया है कि वाक् ही गायत्री है, वाक् ही समस्त भूतोंका गान एवं रक्षण करती है। 'मा भैषीः' इत्यादि वचनोंसे वाक्-द्वारा ही भयकी निवृत्ति होती है। गायत्रीको पृथ्वीरूप [L
शक्तिका स्वरूप ५२७
शक्तिका स्वरूप
श्रीभगवतीने देवीभागवतका संक्षेपमें श्रीविष्णुके लिये उपदेश किया है— 'सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्।' अर्थात् यह सब कुछ सनातन मैं ही हूँ। मेरेसे भिन्न कोई तत्त्व नहीं है। वेदान्तवेद्य परतत्त्व ही शिव तथा स्कन्दपुराणके शिवतत्त्व, रामायणके राम, श्रीविष्णुपुराणके विष्णु एवं वही सूर्य, शक्ति आदिरूपसे प्रकट होता है। श्रीहिमालयपर कृपा करके करुणामयी, कल्याणमयी अम्बाने ही अपने दिव्यस्वरूपका उपदेश दिया है— 'अहमेवास पूर्वं तु नान्यत्किञ्चिन्नगाधिप।' नगाधिप! मैं ही एक सब कुछ हूँ। मेरा अनन्त अखण्ड ब्राह्मारूप अप्रतर्क्य एवं अनिर्देश्य है, अनौपम्य और अनामय है। उसी सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाश परब्रह्मकी एक स्वतःसिद्धा शक्ति है, वही माया नामसे प्रख्यात है। जैसे मृत्तिकामें घटोत्पादिनी शक्ति और वह्निमें दाहिकाशक्ति होती है, वैसे ही ब्रह्ममें अनन्तकोटिब्रह्माण्डोत्पादिनी शक्ति है। वही निखिल विश्वकी जननी है। इस पक्षमें जगत् भ्रान्तिमय या अध्यस्त कैसे है, प्रपंचकी स्वरूपसत्ता न होनेसे आरोप्यानुभवसे आदिम संस्कार नहीं बन सकेगा, फिर भ्रान्ति या अध्यास कैसे सम्भव होगा—इत्यादि शंकाओंको स्थान ही नहीं रहता; क्योंकि शक्तिद्वारा ब्रह्मकी ही प्रपंचरूपसे अभिव्यक्ति हो जायगी, फिर अद्वैत सिद्धान्तमें कोई विरोध नहीं होगा। कारण कि पारमार्थिक सद्रूप परमात्मा ही अद्वितीय है। प्रपंच और उसकी जननी शक्ति तो सत्, असत् और सदसद्, इन तीनोंसे विलक्षण है। अतएव अनिर्वचनीया है। जैसे वह्निशक्ति वह्निसे विलक्षण है, वैसे ही सत्की शक्ति सत्से विलक्षण है। अतएव अनिर्वचनीय है— न सती सा नासती सा नोभयात्मविरोधतः। एतद्विलक्षणा काचिद् वस्तुसत्तास्ति सर्वदा॥ ब्रह्मज्ञानद्वारा इसका बाध हो जाता है। इसलिये ब्रह्मकी तरह वह नित्य सत् नहीं है, परंतु उसीके कार्यभूत प्रपंचसे समस्त व्यवहार बनता है, इसलिये ब्रह्मकी तरह वह असत् भी नहीं और परस्पर विरोध होनेके कारण दोनोंकी स्थिति असम्भव है, अतः सदसद् उभय स्वरूप भी नहीं है। अनिर्वचनीय वस्तुरूप मायाशक्ति मोक्षपर्यन्त विद्यमान रहती है। जैसे पावकमें उष्णता, सूर्यमें किरण और चन्द्रमामें चन्द्रिका है, वैसे ही ब्रह्मात्मिका चिच्छक्तिरूपा भगवतीमें सहजसिद्धा मायाशक्ति है। सुषुप्तिमें जैसे समस्त जीवोंके व्यवहार विलीन रहते हैं, वैसे ही प्रलयकालमें समस्त जीव और उनके कर्म मायामें विलीन रहते हैं। पृथिव्यादि समस्त प्रपंच अभेदभावसे उसी मायामें विलीन रहता है। उसी शक्तिके अनिर्वचनीय सम्बन्धसे निर्गुण-निर्लिप्त चिच्छक्ति जगत्का बीज अर्थात् कारणरूप भी हो जाती है। उस परमतत्त्वके आश्रित रहनेवाली मायाशक्ति उसे आवृत्त करती है, इसलिये ब्रह्मशक्ति सदोष समझी जाती है। मायाशक्तिके विद्या और अविद्या दो भेद हैं। उनमें विद्या विशुद्धा सत्त्वात्मिका होनेसे स्वाश्रयको व्यामोहित नहीं करती। अतः वह निर्दोष है। तमसे अभिभूत सत्त्वयुक्त अविद्या (मलिन सत्त्वप्रधाना प्रकृति) स्वाश्रयकी व्यामोहकारिणी है, इसीलिये ब्रह्म सदोष है। चैतन्यके सम्बन्धसे तद्गत (विशुद्ध सत्त्वगुणप्रधाना मायागत) चिदाभास ही चेतनप्रधान होनेके कारण निमित्तकर्ता है और उसी शक्तिका (तमःप्रधाना प्रकृतिका) प्रपंचरूपमें परिणाम होता है, अतः वही समवायकारण (उपादानकारण) भी है। कुछ लोग उस मायाशक्तिको ही तप कहते हैं। परमेश्वर उसीसे विश्वका निर्माण करते हैं— 'सा तपस्तप्त्वाेदं सर्वं समसृजत।' और कोई शाखी (शाखावाले) उसे ही तम कहते हैं। 'तम आसीत् तमसा गूढमग्रे।'
तमोरूप अज्ञानसे ही आवृत्त होकर परम-तत्त्व प्रपंचरूपमें प्रतीत होता है। उसे ही कोई ज्ञान, माया, प्रधान, प्रकृति एवं अजाशक्ति भी कहते हैं। उसीको कोई विमर्श, कोई अविद्या भी कहा करते हैं। केचित्तां तम इत्याहुस्तमः केचिज्जडं परे। ज्ञानं मायां प्रधानञ्च प्रकृतिं शक्तिमप्यजाम्॥ विमर्श इति तां प्राहुः शैवशास्त्रविशारदाः। अविद्यामितरे प्राहुर्वेदतत्त्वार्थचिन्तकाः ॥ ब्रह्म निर्विकार साक्षी दृक्से माया दृश्य है, अतः जड़ है। अधिष्ठानज्ञानसे उसका नाश हो जाता है, अतः असती है। द्वैतजालका द्रष्टा चैतन्य दृश्य नहीं है। यदि उसमें भी दृश्यता हो तो वह भी जड़ ही हो जायगा, अतः स्वप्रकाश चैतन्य दूसरेसे प्रकाशित नहीं होता। तस्याजडत्वं दृश्यत्वाज्ज्ञाननाशात्ततोऽसती। चैतन्यस्य न दृश्यत्वं दृश्यत्वे जडमेव तत्॥ वह चैतन्य जैसे जड़से नहीं प्रकाशित होता, वैसे ही दूसरे चैतन्यसे भी उसका प्रकाश नहीं होता। कारण ऐसा माननेमें अनवस्था होना अनिवार्य है। साथ ही वह अपनेसे भी अपना प्रकाश नहीं करता; क्योंकि ऐसी स्थितिमें उसमें कर्तृत्व और उसीमें कर्मत्व होगा, जो संगत नहीं है। पर समवेत- क्रियाफलशाली कर्म हुआ करता है। अपने-आप कर्ता और अपने-आप कर्म यह पक्ष अत्यन्त विरुद्ध है, अतः दीपकके समान यह स्वयं प्रकाशमान होकर दूसरोंका प्रकाशक है, इसलिये स्वयंप्रकाश कहलाता है— स्वप्रकाशञ्च चैतन्यं न परेण प्रकाशितम्। अनवस्थादोषसत्त्वान्न स्वेनापि प्रकाशितम्॥ कर्मकर्तृविरोधः स्यात् तस्मात्तद्दीपवत्स्वयम्। प्रकाशमानमन्येषां भासकं विद्धि पर्वत ॥ जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिमें दृश्यका व्यभिचार होता है अर्थात् जागरका दृश्य स्वप्नमें नहीं और स्वप्नका जागरमें नहीं और इन दोनोंका सुषुप्तिमें नहीं, सुषुप्तिका बीजात्मक अज्ञान जागर-स्वप्नमें नहीं। परंतु इन तीनों अवस्थाओंका अखण्ड बोध या संविद् सर्वभासक रूपमें नित्य अव्यभिचारी है। संविद् या बोधका व्यभिचार या अभाव कभी भी अनुभवमें न आता है, न आ सकता है। यदि बोधके भी अभावका अनुभव माना जाय तो वहाँ भी वह अभाव जिस साक्षीसे अनुभूत होता है, वह बोधरूप साक्षी जब विद्यमान ही है, तब बोध या संविद्का अभाव कैसे कहा जा सकता है ? बिना बोध या संविद्के भाव-अभाव दोनों ही नहीं सिद्ध हो सकते। अतः संविद्का अभाव सिद्ध करनेके लिये भी संविद्रूप साक्षीकी आवश्यकता रहती ही है। इसीलिये सर्वभासक स्वप्रकाश होनेसे बोध चैतन्यरूप है, अबाध्य अव्यभिचारी होनेसे सत्य एवं नित्य है। 'मैं कभी न होऊँ ऐसा नहीं, किंतु सदा रहूँ ही।' इस तरह प्राणियोंके निरतिशय निरुपाधिक पर- प्रेमका आस्पद होनेसे वह परमानन्दरूप है। साथ ही जब उससे भिन्न सारा प्रपंच मिथ्या ही है, तब कोई भी उसमें तात्त्विक सम्बन्ध नहीं बन सकता। अतः संवित्की असंगता भी सिद्ध ही है। जब स्वप्रकाश संविद्रूपा भगवतीसे भिन्न माया और उसका कार्य सभी सत्, असत् और सदसत् विलक्षण अनिर्वचनीय मिथ्या है, तब फिर परिच्छेदक (भेदक या मापक) देश-काल-वस्तु न होनेसे ही अपरिच्छिन्नता (त्रिविधपरिच्छेदशून्यता) भी सहजमें ही सिद्ध हो जाती है। यह जो सर्वदृश्यभासक बोध सिद्ध किया गया है, यह आत्माका धर्म नहीं है, किंतु आत्मस्वरूप ही है। धर्म माननेपर आत्मा उसका दृश्य होनेसे आत्मामें जड़ता आ जायगी। 'तच्च ज्ञानं नात्मधर्मे धर्मत्वे जडतात्मनः।' यदि ज्ञान स्वप्रकाश आत्माका धर्म है तो उसकी आवश्यकता ही क्या रहती है? ज्ञानको स्वप्रकाश और आत्माको जड़ मानना भी ठीक नहीं, कारण कि स्वप्रकाश ज्ञान जड़ आत्माका ही शेष या अंग नहीं हो सकता है। लोकमें जड़ ही चेतनका शेष होता है, यही प्रसिद्ध है। जैसे बोध या ज्ञान जड़रूप आत्माका धर्म नहीं बन सकता, वैसे ही वह
शक्तिका स्वरूप ५२९ चिद्बोधरूप आत्माका भी धर्म नहीं हो सकता। कारण चित्का चित्से भेद ही नहीं हो सकता, फिर भेद बिना चित्, चित्का धर्मधर्मिभाव कैसे बन सकेगा? इसलिये आत्मा सद्रूप, ज्ञानरूप एवं सुखस्वरूप है। यह अवश्य समझनेकी बात है कि जो घटादिविषयक ज्ञान और अभीष्ट विषयजन्य सुख नामसे प्रसिद्ध है, वह अनित्य और विनाशी अन्तःकरणका वृत्तिरूप (परिणाम) है। उसी ज्ञानाभास या सुखाभासमें अविवेकियोंको ज्ञान या सुखका भ्रम होता है। परंतु इन विनाशी वृत्तिरूप ज्ञान और सुखोंका प्रकाशक स्वप्रकाश अखण्ड बोध या ज्ञान ही असली ज्ञान और सुख है। ग्यान अखंड एक सीताबर। सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥ (रा०च०मा० ७।७८।४; १।११७।६) 'चिद्धर्मत्वं चितो नास्ति चितश्चिन्नैव भिद्यते।' वह बोध ही अत्यन्त अबाध्य होनेसे पारमार्थिक सत्य है और वही सब कुछ है। अतः पूर्ण और असंग एवं द्वैतजालसे विवर्जित है। वही काम, कर्मादिके सहित अपनी मायासे ही पूर्वसंस्कारके अनुसार कालकर्मके विपाकसे सृष्टिकी इच्छावाला हो जाता है। जैसे कोई प्राणी पूर्व-संस्कारसे अबुद्धिपूर्वक ही नींदसे उठ बैठता है, वैसे ही आत्माकी यह सृष्टि काल-कर्मसंस्कारसे अबुद्धिपूर्वक ही होती है। यही जगत् बीजभूत प्रकृतिसे विशिष्ट मेरा स्वरूप अव्याकृत या मायाशबल कहलाता है, वही समस्त कारणोंका कारण है और समस्त तत्त्वोंका आदिभूत तत्त्व है, वही मायाशक्तियुक्त सच्चिदानन्द कहलाता है, वही समस्त कर्मोंका घनीभूतस्वरूप ज्ञानों और इच्छाओंका आश्रय है, वही आदितत्त्व ह्रींकार, ओंकार आदिका वाच्य तत्त्व है। सर्वकर्मघनीभूतं इच्छाज्ञानक्रियाश्रयम्। ह्रींकारमन्त्रवाच्यं तदादितत्त्वं तदुच्यते॥ उसी मायाशक्तिविशिष्ट अव्याकृतसे शब्द- तन्मात्रस्वरूप सूक्ष्माकाश उत्पन्न होता है। उससे स्पर्शात्मक वायु और वायुसे रूपतन्मात्रा-स्वरूप तेज और उससे रसात्मक जल, जलसे गन्धात्मिका पृथ्वी उत्पन्न होती है। इन्हीं अपंचीकृत सूक्ष्म पंचभूतोंके सात्त्विक अंशसे अन्तःकरण और पंचज्ञानेन्द्रियाँ, राजस अंशसे प्राण और पंचज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। वह सब मिलकर व्यापक लिंगशरीर ही आत्माका सूक्ष्म देह कहा जाता है। पूर्वोक्त अव्याकृत ही आत्माका कारणदेह है। भूतोंके तामस अंशसे पंचीकरण मार्गसे स्थूल प्रपंच और विराट्की उत्पत्ति होती है। भूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशसे उत्पन्न अन्तःकरणके वृत्तिभेदसे चार रूप बन जाते हैं। संकल्प-विकल्प करते समय मन, निश्चय करते हुए बुद्धि, स्मरण करते समय चित्त और अहंकार- कालमें यह अहंकार कहा जाता है। विशुद्धसत्त्वप्रधाना प्रकृति माया और मलिनसत्त्वप्रधाना अविद्या कहलाती है। स्वाश्रयको न मोहित करनेवाली विद्यामें प्रतिबिम्ब-समन्वित अधिष्ठान ईश्वर कहा जाता है, वह स्वाश्रयके ज्ञानसे युक्त सर्वज्ञ सर्वानुग्राहक है। अविद्यामें प्रतिबिम्बसमन्वित अधिष्ठान अल्पज्ञ एवं दुःखादिका आश्रयभूत जीव है। दोनों ही स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीन देहोंसे युक्त हैं। व्यष्टि- स्थूल-सूक्ष्म-कारण जीवके हैं और समष्टि तीनों देह ईश्वरके हैं। व्यष्टिमें कारण-देहाभिमानी प्राज्ञ, सूक्ष्म-शरीराभिमानी तैजस और स्थूल-शरीराभिमानी विश्व कहलाता है। समष्टि-कारण देहका अभिमानी अव्याकृत, सूक्ष्मदेहका अभिमानी हिरण्यगर्भ एवं स्थूल-प्रपंचका अभिमानी विराट् कहलाता है। ईश्वर ही नाना भोगोंके आश्रयभूत विश्वका निर्माण करते हैं। भगवतीने कहा— मेरी मायाशक्तिसे ही समस्त चराचर विश्व बनता है। वह माया भी मुझसे पृथक् नहीं है। व्यवहारदृष्टिसे जो माया और अविद्या कहलाती है, वह परमार्थतः मुझसे पृथक् कुछ भी नहीं है— व्यवहारदृशा येयं विद्या मायेति विश्रुता। तत्त्वदृष्ट्या तु नास्त्येव तत्त्वमेवास्ति केवलम् ॥
५३० भक्तिसुधा भगवती ही निखिल प्रपंचकी निर्मात्री स्वप्रकाशरूपा भगवती ही निखिल प्रपंचका निर्माण करके उसमें वही प्रवेश करती है। जिस तरह एक ही आकाश घटाकाश और महाकाशके रूपमें प्रकट होता है, उसी तरह स्वप्रकाश चैतन्य ही विद्याशक्तिविशिष्ट ईश्वर, अविद्या या अन्तःकरण-विशिष्ट होकर जीवरूपमें व्यक्त होता है। उन्हीं अनेक उपाधिभेदोंसे ही जीवोंमें नानात्व और गमागम सब कुछ उत्पन्न होता है। जैसे सूर्यभगवान् उच्चावच अनेक प्रकारकी वस्तुओंका प्रकाश करते हैं, परंतु उनके गुणों या दोषोंसे वे युक्त नहीं होते, वैसे ही अखण्डबोधरूप सर्वान्तरात्मा सभी दृश्यका प्रकाशन करते हैं, परंतु उनके गुणों और दोषोंमें वे लिप्त नहीं होते। जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्ब या रज्जुमें सर्प, वैसे ही शुद्धप्रकाशस्वरूप परमतत्त्वमें समस्त प्रकाश्य परिकल्पित है। अतएव ईश्वर, सूत्रात्मा, विराट्, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, गौरी, ब्राह्मी, वैष्णवी, सूर्य, तारक, तारकेश, स्त्री, पुमान्, नपुंसक एवं शुभ, अशुभ समस्त प्रपंच ही परात्परपूर्णतम परम तत्त्वका ही स्वरूप है। जो भी कुछ देखा या सुना जाता है, उसके भीतर और बाहर व्याप्त होकर एक वही निर्विकार पूर्ण चिति ही विद्यमान है। सबको सत्तास्फूर्ति सुख प्रदान करनेवाली चितिसे विमुक्त होकर जो कुछ भी है वह शून्य है, वन्ध्यापुत्रके समान है। जैसे सर्प, धारा, माला आदि भेदोंमें एक रज्जु ही अनेकधा भासित होती है, वैसे ही एक चिद्रूप आत्मा ही अनेक रूपमें भासित होता है। जैसे अधिष्ठानके बिना कल्पित पदार्थकी सत्ता और स्फूर्ति नहीं टिक सकती, वैसे ही सच्चित्-स्वरूप परमतत्त्वके बिना कल्पित विश्वमें सत्ता और स्फूर्ति नहीं रहती। यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु दृश्यते श्रूयतेऽपि वा। अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्याहं सर्वदा स्थिता॥ न तदस्ति मया त्यक्तं वस्तु किञ्चिच्चराचरम्। यद्यस्ति चेत्तच्छून्यं वन्ध्यापुत्रोपमं हि तत्॥ माँके श्रीचरणोंमें अनन्तकोटिब्रह्माण्डजननी पराम्बा, रामचन्द्र राघवेन्द्रकी हृदयेश्वरीके मंगलमय चरणारविन्दको अपनी अविरल अश्रुधाराओंसे सिंचित करता हुआ एक भक्त कहता है—'हे अम्ब! कल्याणमयी भगवति! हे देवि! यह आपका अबोध, किंकर्तव्यविमूढ शिशु आपके चरणारविन्दकी शरण है। हे माँ! अब यह ताप सहनकी सीमाके बाहर हो गया है। हे माँ! मैं जानता हूँ कि मैं तुम्हारा योग्य पुत्र नहीं हूँ। मैं तुम्हारे चरणारविन्द-स्पर्शका भी अधिकारी नहीं हूँ। माँ! फिर भी अधम-से-अधम, पतित-से-पतित पुत्रकी भी अम्बा उपेक्षा नहीं करती'— 'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥' 'माँ! मुझे तो सबने उपेक्षित कर दिया है। ठीक ही है, तुम्हारे अभिशापसे सन्तप्तकी रक्षा सिवा तुम्हारे और कौन कर सकता है? माँ! तुम तो प्रभुसे भी यही कहती हो कि 'न कश्चिन्नापराध्यति।' ऐसा व्यक्ति कौन है, जिससे अपराध नहीं बनता? यह अबोध शिशु है; इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। इसे पुचकारकर अंकमें लेना चाहिये। माँ! तुम्हारे चरणोंके बिना सब जगत् सन्तापजनक हो रहा है। संसारमें कोई इस अधमको देखने-पूछनेवाला नहीं है। माँ! संसारकी विडम्बनासे दग्ध हो रहा हूँ। अनेक बार अपमानित और तिरस्कृत हुआ, फिर भी तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर सकता। अपने ही अपराधोंके कारण स्थिर प्रबोध, स्थिर वैराग्य नहीं होता। हे पुत्रवत्सले! तुम्हारे बिना आशाके अनुकूल ही नहीं, आशासे भी अधिक कारुणिक हृदयसे अपराधी पुत्रको दूसरा कौन पुचकार सकता है?'
'माँ ! जिनके लिये त्याग, बलिदान किया गया, जिनके लिये अगणित दुःख भोगे गये, जिनके हितार्थ कितने ही अनुष्ठान किये गये, जिनके लिये अगणित आँसू बहाये गये, वे सब मेरे रोने-धोनेको सुना- अनसुना, देखा-अनदेखा करके अपने-अपने काममें लग गये। किसको समय है, जो मुझ-जैसे पागलोंके प्रलाप सुने ? माँ ! उस दिन शिप्राके तटपर तुम्हारी स्मृति आयी थी और तुम्हारे चरणोंका स्मरण किया था। तुम्हारे चरणोंमें कुछ अश्रु चढ़ाये गये थे, परंतु पुनः वही विस्मृति छा गयी। फलस्वरूप उपद्रव भी वे ही-के-वे ही वर्तमान हैं। माँ ! तुम्हीं सिद्धि- बुद्धिस्वरूपा गणपतिप्रिया हो। माँ ! तुम्हीं सरस्वतीस्वरूपा विधिप्रिया हो। माँ ! तुम्हीं अनन्तकोटिब्रह्माण्डकी ऐश्वर्याधिष्ठात्री विष्णुप्रिया महालक्ष्मी भी हो। हे अम्ब ! आप ही तो कामेश्वरअंकनिलया अनन्तब्रह्माण्ड- जननी श्रीषोडशी महात्रिपुरसुन्दरी हो। हे जगदम्ब !
५३२ भक्तिसुधा है। घृतकी आहुतिसे जैसे अग्निकी वृद्धि होती है, वैसे ही भोगसे कामकी वृद्धि ही होती है'— न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ (श्रीमद्भा० ९।१९।१४) 'पृथिवीभरमें जो भी व्रीहि, यव, हिरण्य, पशु एवं स्त्रियाँ हैं, वे सब मिलकर भी एक व्यक्तिको भी तृप्त करनेमें समर्थ नहीं हैं'— यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। सर्वं नैकस्य पर्याप्तमिति मत्वा शमं व्रजेत् ॥ 'संसारकी सभी संचित राशियाँ क्षीण हो जाती हैं, सभी समुन्नतियोंका अन्तमें पतन होता है, सभी संयोगोंका अन्तमें वियोग होता है, सभी जीवनोंका मरणमें ही पर्यवसान है'— सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः। संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।२०) 'कल्याणमयि माँ! सभी विचार आपकी कृपाके बिना निर्वीर्य रहते हैं। आपकी कृपासे ही सद्विचारकी निष्ठा होती है। सम्पूर्ण प्राणी आदिमें अव्यक्त हैं और अन्तमें भी अव्यक्त ही हो जाते हैं, मध्य-मध्यमें ही व्यक्त रहते हैं। संसारमें सहस्रों माता-पिता, सहस्रों पुत्र एवं सहस्रों स्त्रियाँ हुईं, परंतु किसीका सम्बन्ध किसीसे स्थिर न रहा। जन्म-जमान्तरोंमें कितने ही पुत्र तथा अभीष्ट सुन्दरियोंसे सम्बन्ध होता है, परंतु कौन कहाँ, कौन कहाँ? किसी भी सम्बन्धकी स्थिरता नहीं है। जैसे महोदधिमें इधर-उधरसे अनेकधा काष्ठ इकट्ठे होते हैं, किसी लहरके वेगसे पुनः पृथक्-पृथक् बह जाते हैं, वैसे ही कार्यपरतन्त्र प्राणी संयुक्त-वियुक्त होते ही रहते हैं। काल-कर्मके परतन्त्र हो प्राणी जन्म लेता, मरता और भटकता है, तदनुसार ही सुख-दुःख भी भोगता है। यौवन, सौन्दर्य, द्रव्यसंचय, जीवन एवं आरोग्य तथा प्रियसंवास सब अनित्य हैं। इनमें पण्डितोंको मोहित नहीं होना चाहिये'— अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः। आरोग्यं प्रियसंवासो गृध्येत् तत्र न पण्डितः ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।१४) 'सामूहिक दुःखके लिये एकको भी चिन्तित होनेकी आवश्यकता नहीं है। हाँ, बन सके तो अनुद्विग्न रहते हुए शक्तिभर उसके प्रतीकारकी चेष्टा करनी चाहिये'— न जानपदिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हति। अशोचन् प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।१५) 'दुःखका चिन्तन न करना ही उसका महौषध है। चिन्तन करनेसे दुःख मिटता नहीं, परंतु बढ़ता ही है'— भैषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत्। चिन्त्यमानं हि न व्येति भूयश्चापि प्रवर्धते ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।१२) 'अनिष्ट-सम्प्रयोग तथा इष्टविप्रयोगसे ही अल्पबुद्धि प्राणी मानस दुःखोंसे दग्ध रहते हैं। प्रज्ञासे मानस दुःखों और औषधोंसे शारीरिक दुःखोंका हनन करना उचित है। यही विज्ञानकी महिमा है कि प्राणी बालतुल्य न हो'— प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः। एतद् विज्ञानसामर्थं न बालैः समतामियात् ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।१३) 'पूर्वकृत कर्म सब सुखों-दुःखोंके मूल कारण हैं। इस तरह अपना आत्मा ही अपना बन्धु और आत्मा ही अपना रिपु है। शुभ कर्मसे सुख, अशुभसे दुःख होता है। बिना किये कुछ भी नहीं होता। ज्ञानविरुद्ध, विनाशकारण, मूलघाति कर्मोंमें समझदार लोगोंको रत नहीं होना चाहिये। विचार करनेपर यह सम्पूर्ण संसार ही अशाश्वत है, कदलीस्तम्भके समान ही निःसार है। श्मशानमें एक दिन सभीको समान रूपसे समाप्त हो जाना पड़ता है; चाहे धनवान्, रूपवान्, बुद्धिमान् हो, चाहे निर्धन, निर्बुद्धि हो। विभिन्न गृहोंके समान ही शरीर भी आत्माका एक
गृह ही है। जैसे कोई मृण्मयभाण्ड कुलालके चक्रपर ही नष्ट हो जाता है, तो कोई कुछ बनकर नष्ट होता है, कोई बनकर एवं उपयुक्त होकर नष्ट होता है, वैसे ही जीर्ण, अजीर्ण, शिशु, युवक सबको ही मृत्युके मुखमें जाना पड़ता है। जो केवल मधु देखता है, प्रताप नहीं देखता, वह लोभके वश भ्रष्ट होकर शोकको ही प्राप्त होता है'— मधु यः केवलं दृष्ट्वा प्रतापं नैव पश्यति। स भ्रष्टो मधुलोभेन शोचत्येवं यथा ह्यहम्॥ 'जैसे कोई प्राणी क्रीड़ाके लिये जलमें प्रवेश करके कभी डुबकी लेता है, कभी उतराता है, वैसे ही बुद्धिमान् संसारगहनमें उन्मज्जन-निमज्जन करता हुआ भी घबराता नहीं, अपितु अबुद्धि प्राणी इस डूबने-उतरानेमें व्याकुल हो जाता है। हे माँ! जन्मसे लेकर ही मांसशोणितयुक्त, अमेध्य स्थानमें ऊर्ध्वपाद, अवाक्शिरा होकर रहना पड़ा है, योनिद्वारके भी नाना कष्ट सहने पड़े हैं, एक उपद्रव समाप्त भी नहीं हो पाया कि दूसरे उपद्रव सिरपर आ खड़े हुए हैं। जैसे आमिषके पीछे श्वान दौड़ते हैं, वैसे ही अधिकांश आधियाँ एवं व्याधियाँ मुझ-जैसे प्राणियोंके पीछे ही रहती हैं। इन्द्रियपाशोंसे बद्ध, विविध आसक्तियोंसे घिरा हुआ प्राणी विविध व्यसनोंका शिकार बनता है। उन्हीं व्यसनोंसे पीड़ित होता, उन्हींमें अतृप्त होकर फँसा रहता है। व्यामोहवश साधु-असाधु कर्मोंको करता हुआ अनिवार्य रूपसे प्राणी तत्फलका भागी होता है। यमदूतों और कालसे आकृष्ट होता हुआ विविध विपत्तियोंका भोजन बनता है। अहो! लोभसे वंचित होकर प्राणी कितने अपमानों, दुःखों और विडम्बनाओंमें फँसता है और अपने-आपको समझनेमें असमर्थ ही रहता है। दूसरोंको मूर्ख कहता हुआ भी अपनी मूर्खताकी ओर ध्यान नहीं देता। हे अपराजिते! हे अमिते! अनुपमचरिते माँ! क्या कभी भी प्राणी बिना तुम्हारी कृपासे इस व्यामोहसे, इस मायासे मुक्त हो सकता है? ठीक ही कहा है कि जिसपर आप कृपा करती हैं, वही दुस्तर देवमायाको पार कर सकता है, तभी श्वशृगालभक्ष्य शरीरसे ममाहंबुद्धि हट सकती है। पर इसके लिये निर्व्यलीक, निष्कपट, अकैतवरूपसे आपकी शरणागति अपेक्षित है'— येषां स एव भगवान् दययेदनन्तः सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्। ते दुस्तरामतितरन्ति च देवमायां नैषां ममाहमिति धीः श्वशृगालभक्ष्ये॥ 'माँ! कितना भीषण संसार है! आपने शास्त्रोंमें तो बतला रखा है कि कोई ब्राह्मण हिंस्र-व्याघ्रसंकुल गहन कान्तारमें पहुँच गया। सिंह, व्याघ्र, गज एवं भल्लूकोंके कर्कश घोर नादों एवं भीषण आकृतियोंसे घिर गया। उस भीषण स्थितिको देखकर साक्षात् यमको भी त्रास हो सकता है। ब्राह्मणका हृदय उद्विग्न हो गया, देहमें रोमांच हो गया। वह घोर गहन वनमें दशों दिशाओंमें शरण ढूँढ़ता हुआ भटकता है। भागनेका प्रयत्न करता है, पर भाग भी नहीं सकता। अकस्मात् अन्य भयंकर वनमें पहुँचकर देखता है कि एक भीषण स्त्रीने चारों तरफ जाल फैला रखा है। पाँच-पाँच फणोंवाले अगणित नाग और भीषण वृक्षोंसे भी वह वन घिरा है। उसी वनमें एक कूप था, जो विविध दृढ़ वल्लियोंसे ढँका हुआ था। ब्राह्मण उसी अन्धकूपमें गिर गया और तृणाच्छन्न वल्लियोंपर बृहत् पनस (कटहल) फलके तुल्य लटक गया। सिर नीचेको था, पैर ऊपरको। नीचे कूपमें देखता है कि एक भीषण महानाग है। छः मुख, बारह पैरोंवाला तथा शुक्ल-कृष्ण वर्णका एक महागज कूपके बाहर था। वहाँ वल्लियाँ भी खूब फैली हैं। नानारूपधर घोर मधुकरोंने ऊपर मधुके छत्तेको घेर रखा है, उसमेंसे ही कुछ-कुछ मधु कभी-कभी टपकता है। बालप्राय मूढ़ प्राणी उस मधुसे आकृष्ट होकर उसी मधुधाराको वल्लियोंमें लटका हुआ पान करता है, फिर भी उसकी प्यास बुझती नहीं, नित्य अतृप्त होकर उसी वस्तुकी लालसामें परेशान रहता है। उसी लोभसे वह ब्राह्मण अपनी भीषण दशाको भूल जाता है और उस दुर्दशापूर्ण जीवनसे भी उसे वैराग्य नहीं
होता, उस हालतमें भी वह जीवित रहनेकी इच्छा करता है। वहीं श्वेत-कृष्ण मूषक उन वल्लियोंको काट रहे हैं। ऊपर भीषण विषधर साँपोंसे घिरे घोर कान्तारमें महोग्रडाकिनीरूपा स्त्रीका जाल फैला है। कूपके ऊपर भीषण गज है। कूपके भीतर नाग है। वल्ली कटते ही कूप-पतनका भय भी सामने है। भीषण भ्रमरोंका भी डर है ही। फिर मधुलोभमें उस ब्राह्मणकी तरह अन्य प्राणी सब भूलकर जीवित रहना चाहता है।' कातर प्रार्थना 'माँ! यह महासंसार ही तो वह कान्तार है। क्या यह कम दुर्गम है ? माँ ! यह कितना भीषण है ! माँ ! तुम्हारे अभयहस्तका सहारा न हो, तुम्हारे अंक (गोद)-का सुख न हो, तुम्हारी नखमणिचन्द्रिकाकी शीतलता न हो, तो इससे किसकी मुक्ति हो सकती है ? माँ ! यह विविध व्याधियाँ ही तो भीषण व्याल हैं। माँ! ये तो व्यालोंसे भी कहीं अधिक भीषण हैं। एक ही व्याधि प्राणीको जर्जर कर देती है; दद्रु, खर्जु, ज्वर, अतिसार, कुष्ठ, प्लेग, विषूचिका, क्षय, शिरःशूल, उदरशूल आदि अगणित व्याधियाँ शरीरको जर्जर कर देती हैं। वह सौन्दर्य कहाँ चला जाता है? देहकी कान्ति समाप्त हो जाती है, बाल पक जाते हैं, मुख दन्तविहीन हो जाता है, रमणीयता समाप्त हो जाती है। अब भूषण, अलंकार, अंगरागादि बाह्य कृत्रिम साधनोंसे उसकी सुन्दरता बढ़ाना कितनी विडम्बना है! वृद्धावस्था तो वह भीषण नारी है। सुन्दरी-से- सुन्दरी स्त्री तथा सुन्दर-से-सुन्दर पुरुषको भी विरूप कर देना इसका खेल है। हे माँ! फिर भी स्त्री आदिके मायामय देहोंमें क्यों व्यामोह होता है ? रूप और वर्णका विनाश करना जराका प्रमुख कार्य है। माँ! कितना भीषण व्यामोह है ! प्राणी आधि-व्याधि, जरा, रोगादिसे पीड़ित, त्रस्त तथा विरूप हो रहे हैं। जिसपर मोहित होता है, वह भी आधि-व्याधिग्रस्त, मृत्युमुखपतनोन्मुख ही है। कोई किसीको विपत्तिसे बचा नहीं सकता। फिर भी व्यामोह, रति, रागका उपद्रव ? आश्चर्य है। आचार्यने क्या ही सुन्दर कहा है'— 'अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम्।' 'अहो! ये आधियाँ (मानसी पीड़ाएँ) तो व्याधियोंसे भी भीषण हैं, इनके तापसे तो माँ ! सिवा तुम्हारे अंकके कहीं भी निवृत्ति हो ही नहीं सकती। हे माँ! हे जननि ! हे कल्याणमयि ! हे सकरुणे ! क्या तू अपनी विपन्न सन्तानोंकी उपेक्षा कर सकती है? नहीं, माँ! यह तो सब अपराध मादृश मूढ़ोंका ही है।' 'कान्त-कान्ताकी विरह-वेदना कितना भीषण ताप है। क्या इसका पारावार है? क्या इसीसे इन्दुमतीके विरहमें रघुका करुण अवसान नहीं हो गया? क्या पुरूरवाका उन्माद और पागलपन इसी विरहव्यथाका, प्रिय वियोगका ही परिणाम नहीं था ? क्या नरनाट्यमें प्रभु रामने भी माँ ! आपकी विरहवेदनाका लोहा नहीं माना ? माँ ! प्रेममतवाली गोपांगनाओं, प्रभु कृष्ण तथा रासेश्वरी राधा-रानीने भी विरहव्यथाका कितना भीषण अनुभव किया था। माँ ! वास्तविक प्रेम और वासनाका भेद सहसा किसकी समझमें आ सकता है? फिर भी आखिर यह मानसिक व्यथा, आन्तरिक आधि क्या एक ही प्राणीके जीवनका अन्त नहीं कर सकती ? इन विषयोंमें क्या बिना आपकी कृपाके कोई विवेक कारगर होता है ? माँ ! यह शरीर ही तो वह अन्धकूप है, उसीमें तो कालरूपी सर्प भी रहता है, जो प्राणियोंका अन्त करता है। शरीरमें जीवनकी जो आशा है, वही तो वल्ली है। शरीररूप कूपके ऊपर जो छः मुँह, बारह पैरोंका भीषण गज है, वह यही संवत्सरात्मा काल है। छः ऋतुएँ ही उसके मुख हैं, बारह मास ही उसके पैर हैं, शुक्ल- कृष्ण पक्ष ही उसके श्वेत-कृष्ण वर्ण हैं। दिन-रात ही तो इस जीविताशा आयुरूपी वल्लीको प्रतिक्षण काटनेवाले मूषक हैं। माँ ! विविध काम ही तो भीषण भ्रमर हैं। विविध कामरस ही वह मधुधाराएँ हैं, जिनमें प्राणी मोहित हो रहा है। माँ! आपकी कृपासे ही इस संसारसिन्धुको पार किया जा सकता है, उसके
माँके श्रीचरणोंमें ५३५ बिना सभी प्रयत्न व्यर्थ होते हैं। माँ! कुछ भी हो, मेरी तो एकमात्र आशा आप ही हैं। माँ! यदि आपने जरा-सी भी उपेक्षा की तो फिर मैं कहींका न रहूँगा।' 'यह शरीर ही रथ है, बुद्धि ही सारथि है, इन्द्रियाँ ही घोड़े हैं। जो बुद्धिके द्वारा इन्द्रियोंको नियन्त्रित करके संसारचक्रमें भ्रमण करता है, वह मोहित नहीं होता। संसारमें राज्यका छिन जाना, पुत्रका नाश, प्रिय पत्नीका नष्ट हो जाना, सुहृदोंका नष्ट होना आदि भीषण दुःख होते हैं। इन दुःखोंका भेषज ज्ञान ही है। विक्रम, धन, मित्र, सुहृदोंसे इस सम्बन्धमें कोई लाभ नहीं होता। किंतु ज्ञान, दम, त्याग एवं अप्रमादसे युक्त होकर सर्वप्राणियोंको अभय देकर जो पद प्राप्त किया जा सकता है, वह सहस्रों ऋतुओं एवं उपवासोंसे भी प्राप्त नहीं होता।' 'पुत्र, मित्र, वित्त, कलत्र, किसीके भी विप्रयोगमें जो वेदना होती है, उसे कोई अनुभवी ही समझता है। तज्जन्य शोकसे प्रत्येक गात्र तथा रोम-रोममें दाह उत्पन्न होता है। प्रज्ञा भी अभिभूत हो जाती है।' 'पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥' (रा०च०मा० २।६४।७) 'प्राप्यते सुमहद्दुःखं विषाग्निप्रतिमं विभो।' विष एवं अग्निके तुल्य प्रियवियोगदुःख अतिभीषण होता है। इससे तप्त प्राणी मरणको ही श्रेष्ठ समझता है— तदिदं व्यसनं प्राप्तं मया भाग्यविपर्ययात्। तस्यान्तं नाधिगच्छामि ऋते प्राणविमोक्षणात् ॥ अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो भवेद्यदि। तदा दुःखैर्न लिप्येरन् नलरामयुधिष्ठिराः ॥ (पञ्चदशी ७।१५६) 'भाविका भाव होकर ही रहता है। यदि उसका भी प्रतिकार हो सकता तो फिर नल, राम एवं युधिष्ठिरको सन्तप्त न होना पड़ता। इसीलिये महापुरुषोंने कहा है'— यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा। इति चिन्ताविषघ्नोऽयं बोधो भ्रमनिवर्तकः॥ (पञ्चदशी ७।१६८) 'जो नहीं होनेवाला है, वह नहीं होगा। जो होनेवाला है, वह होकर ही रहेगा, यही विचार चिन्ताविषका औषध है। फिर जो हमारी वस्तु है, वह दूसरेको नहीं ही मिलेगी'— 'यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम्॥' 'फिर भी हे विश्वप्रसवित्री ! हे सकरुणे ! हे दीनरक्षामणे ! बिना तुम्हारी कृपादृष्टिकी वृष्टि हुए सब उपाय, सब साधन व्यर्थ हैं। माता-पिता बालकके रक्षक होते हैं, परंतु अम्ब ! तुम्हारी कृपाके बिना वे भी रक्षक नहीं हो सकते, उनके प्रयत्नशील रहनेपर भी बालककी मृत्यु हो ही जाती है। आर्त प्राणीको बचानेवाली औषध भी आर्तको नहीं बचा सकती; क्योंकि औषध-सेवन करते हुए भी प्राणीको मरना ही पड़ता है। समुद्रमें डूबते हुएको जलयान बचाता है, परंतु आपके कृपाकटाक्षके बिना हे माँ ! जहाज भी डूब ही जाता है। माँ ! तुम्हारी कृपासे ही सौभाग्यशालियोंको दिव्य वैराग्य प्राप्त होता है, जिसके कारण बड़े-बड़े सम्राट् विविध ऐश्वर्यों, भोगसामग्रियोंका अनायास ही त्याग कर देते हैं। नहुष, गय, ययाति आदि सुदुर्लभ भोगोंको छोड़कर अरण्यमें चले गये थे। माँ ! आपकी कृपाकोरसे ही ऋषियोंने निश्चय किया था कि 'न सुखाल्लभते सुखम्।' सुखसे सुख नहीं मिलता। विशेषकर ब्राह्मणका देह क्षुद्र कामके लिये नहीं, अपितु घोर तपस्या और कष्टसहनके लिये ही होता है'— ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते। कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च॥ (श्रीमद्भा० ११।१७।४२) 'जगदम्ब ! आपकी कृपासे ही वीतराग विश्ववन्द्य महानुभाव परमसुन्दरियों, प्राणवल्लभाओंके मोहजालसे मुक्त हो सके थे। माँ ! यद्यपि आपके चरणोंकी ओर चलना बड़ा कठिन मालूम पड़ता है, बड़ा ही ऊबड़- खाबड़, गहन वन, पर्वत-सा मार्ग आपकी प्राप्तिका मार्ग है और विषयों का मार्ग बड़ा ही रोचक एवं सुखकर प्रतीत होता है; परंतु जिसपर आपकी
कृपादृष्टि हुई और जो आपकी ओर चल पड़ा, उसके लिये कितना सुखद आपका मार्ग है, परंतु विषम मार्गमें चलनेसे मृगमरीचिकाके समान लोभ, मोह एवं दुःख, तापका अन्त होता ही नहीं। ये विषय मोहक, भीषण विषाग्नि ज्वालाके समान हैं। बिना आपके अंकमें पहुँचे प्राणीको शान्ति होती ही नहीं। हे माँ! परंतु इसमें दोष किसका ? प्राणीके अपने ही पापोंका तो यह फल है। फिर दूसरोंपर क्षोभ क्यों ? जबतक शुभकर्म हैं, आपकी अनुकूलता है, तबतक सभी साथी हैं, सुखसाधन हैं। वही माता, भ्राता, कान्ता, पति, जो बड़े ही अनुरागी और प्रेमवश प्राण देनेवाले होते हैं, वही कभी अपरक्त विरक्त प्रतीत होने लगते हैं। पर यह अपने ही भाग्यका दोष है, उनपर कुपित होना व्यर्थ ही तो है। माँ! अपार संसारसमुद्रसे पार करना, अपार शोकसागरसे प्राणीका उद्धार करना आपके लिये क्या कठिन है ? माँ! यह तो तुम्हारा खेल होगा। परंतु मादृश पशुओंका इससे परम कल्याण होगा। माँ! गजेन्द्रकी पुकार सुनकर, द्रौपदीका करुणक्रन्दन सुनकर आपने ही तो विष्णुरूपसे दौड़कर उनका उद्धार किया है। माँ! वस्तुस्थिति तो यह है कि वे लोग महासत्त्व और महापुरुष थे, उनके विवेक, विज्ञान एवं धैर्यकी मात्रा अधिक ही थी, साथ ही उनमें सहनशक्ति भी अधिक रही होगी और आपके चरणोंमें प्रीति भी सुतरां उनकी अधिक थी। अपनी शक्तिके बलसे वे आपको खींच सकते थे। किंतु माँ! मुझ दीनकी ओर दृष्टि देकर देखेंगी तो बहुत ही अन्तर प्रतीत होगा। माँ! अल्पसत्त्व, अल्पधैर्य, अल्पभक्ति, अल्पशक्ति मुझ दीनकी तो माँ! एकमात्र आप ही सहारा हैं।' 'माँ! कभी-कभी आपकी मायासे अविश्वास, अनास्था एवं अश्रद्धाका भी तो उपद्रव चलता ही रहता है। हे माँ! हे माहेश्वरी! हे दयार्णवरूपे! मेरा तो आपके दयाकणसे ही उद्धार हो सकता है, फिर मेरी बार ही यह अनुदारता क्यों ? माँ! दुर्भाग्य एवं अविवेक, विमोह एवं रागकी स्थितिमें प्रकृतिके कण-कण उद्वेजक होते हैं। कभी-कभी दूसरोंके अनुकूल भाव भी भ्रान्तिसे प्रतिकूल ही प्रतीत होते हैं। शत्रुको मित्र, मित्रको शत्रु, रक्तको विरक्त और विरक्तको रक्त समझनेकी भी भूल होती है। परिस्थितियाँ भी सबकी पृथक् होती हैं। किंतु माँ! जब हम अपना ही मन अपने वशमें नहीं कर पाते तो दूसरोंके मनपर हमारा अधिकार हो जाय, यह आशा कितनी भीषण दुराशा है।' सांसारिक मोह-ममताका परिणाम 'पुत्र, मित्र, कलत्र, बन्धु, बान्धव किसीका भी अपराग हमें खलता है और बेहद खलता है। जिन पुत्रों, मित्रोंके लिये, जिन पत्नियों, प्रेयसियोंके लिये न जाने क्या-क्या करना और कितना-कितना कष्ट भोगना पड़ा, उनका अपराग देखकर हृदय कितना विदीर्ण होता है। वे झूठे प्रेमके नाटक, वह झूठी आँसुओंकी झड़ी, वह रहस्यपूर्ण सस्नेह मधुर वचन- विन्यास, वह मधुर मुद्राएँ, स्वात्मसमर्पणकी वह मधुर चेष्टाएँ और मधुर मिलन कितने भीषण सिद्ध होते हैं। माँ! यह कैसी विडम्बना है ? अहो! महापुरुष भर्तृहरिकी कितनी सुन्दर अनुभूति है। हाय! जिसका मैं इष्टदेवताकी तरह निरन्तर चिन्तन करता रहता हूँ, वह मुझसे विरक्त है, मुझे नहीं चाहती, वह किसी औरसे प्रेम करती है और कैसी विधिकी विडम्बना है कि वह उसका प्रेमास्पद भी तो किसी औरसे ही प्रेम करता है, प्रेम करनेवालीको नहीं चाहता। किंतु जिसे वह चाहता है, वह उसकी प्रेयसी उससे प्रेम न कर मुझे चाहती है। अहो! उस मेरी प्रियाको धिक्कार है और उस पुरुष तथा उसकी प्रेयसी एवं इस मदन तथा मुझे भी धिक्कार है'— यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः। अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥ 'हे दयामयि! तृष्णाविषविषूचिका अभी कितना परेशान करेगी ? माँ! मेरे पास इसकी कोई भी सफल औषध नहीं दिखती। यह विलाप, यह करुणक्रन्दन,
माँके श्रीचरणोंमें ५३७ अरण्यरोदन न होना चाहिये। यह विलुण्ठन, यह बेचैनी और भीषण आतुरता, यह अनवस्थिति मेरे प्रयत्नसे मिटनेवाली नहीं है। मूर्खतावश जिसे हृदय खोलकर दिखाना चाहते हैं, उसे देखनेका समय ही नहीं और देखनेकी रुचि भी नहीं है। फिर वही शून्य, भीषण दावदग्ध, निर्जन, शून्य अरण्यका रोदन, दीर्घ श्वास- निःश्वास, आर्तनाद, माँ! तुम्हीं सुन लो। जो जन्म- जन्मान्तरोंतक सम्बन्ध न छोड़नेका संकल्प कर चुके हैं, वे इसी जन्ममें साथ छोड़ गये। उनकी दृष्टि भाव- भंगीमें परिवर्तन, क्रान्तिकारी परिवर्तन हो गये। कातर चित्त किसीकी सद्भावनाकी कल्पनासे कितना प्रफुल्लित होता है, यह भी तो एक भाग्यकी बात है। जीवनमें हमने जिससे राग किया, वही हमसे विरागी बना। जिसे पकड़ना चाहा, उसने ही भागना चाहा। जिसे नहीं चाहा, उसे भले ही पाया हो, परंतु जिसपर प्रेम किया, वह मुझे ठुकरानेमें सुखी हुआ। माँ! अब बस ले लो अपने चरणोंमें। यह अवहेलना, यह अपमान कबतक सहाओगी? श्वा, शूकर, गर्दभके समान विषयोंका कीड़ा बनकर, कांचन-कामिनीका किंकर बनकर अभी और कितना अपमान सहना पड़ेगा? मातः ! यह राग अतिविषम है, सर्पके समान डँसता है, भीषण असिके समान मर्मच्छेदन करता है, भाले-बर्छेके समान हृदयको विद्ध करता है, रज्जुके समान बन्धन करता है, पावकके समान दहन करता है, रात्रिके समान अन्ध बना देता है, पाषाण-आघातके तुल्य विवश कर देता है, प्रज्ञाका विनाश करता है और ऐसा कौन दुःख है, जो रागान्ध प्राणीको नहीं मिलता? हे जगज्जननी! क्या मेरे इस दुर्विपाकका अन्त ही नहीं होना है? यह संसार-कदर्थना आखिर कबतक भोगनी पड़ेगी? क्या इस दीर्घ, उष्ण निःश्वास-परम्पराकी कोई अवधि भी है? आखिर यह सब उपद्रव जिनके कारण हैं, वे भी तो ऊब गये। माँ! इस दृश्यविषूचिकाका एक-एक कण भी तो भीषण अनर्थकारी होता है। जड़भरतने अखण्ड भूमण्डलका राज्य छोड़ा, प्रिय पत्नी, पुत्र, पौत्र, स्निग्ध दुहिताओंको भी छोड़ा, उन्हें क्या मृगीसुतमें इतना स्नेह होना चाहिये था? माँ! क्या जड़भरत विवेक-विज्ञानकी बातें नहीं जानते थे? ओह! कितना भयंकर व्यामोह, कितनी विधिविडम्बना है? कितने ही स्नेही प्रज्ञाका पाठ पढ़ाते हैं और इस स्थितिपर तरस खाते हैं, पर क्या माँ! आप संसारसे भी अधिक निष्ठुर हो, जो संसार-जितनी भी दया नहीं दिखलाती हो? क्या आपकी दया संसार-जैसी निष्फल होती है?' 'हे माँ! त्वचा-मांस-रक्तादिसमूह ही तो स्त्री- पुरुषप्रपंच है। भूषण, विलेपन, अंगराग आदिसे जिन अंगोंका लालन किया गया था, उन्हींको श्मशानोंमें श्व-शृगालादि इतस्ततः कर्षण कर रहे हैं। मेरुशृंग- ततोल्लासि गंगाजलधाराके तुल्य जिन प्रमदास्तनोंपर मुक्ताहार सुशोभित होते थे, आज उन्हीं स्तनोंको ओदनके लघुपिण्डके समान श्वान आकर्षण कर रहे हैं। पूर्णेन्दुबिम्बवदना, पुष्पाभिराममधुरा सब कुछ मल, मांस, रक्त आदिका ही परिणाम तो है। उन्हीं रक्त, मांस, केश आदिकी श्मशानमें कितनी भीषण दुर्गति होती है। माँ! क्या आपका चरण-चिन्तन करनेपर भी अविवेक, अज्ञान, अशान्तिका रहना उचित है। माँ! अशरणशरण आपके चरण हैं। माँ! अकारणकरुणा आपका हृदय है। हे करुणा-वरुणालये! क्या यह सब कुछ मेरे लिये व्यर्थ ही है? क्या किसीका वर-शाप आपकी दयासे भी अधिक प्रभावशाली है? माँ! तत्त्वज्ञ लोग तो सदासे ही सावधान करते आये हैं कि सन्ध्याके समान क्षणमात्र रागवती ही स्त्रियाँ होती हैं। नदीके समान ही इनका आशय कुटिल होता है। भुजंगीके समान ही ये अविश्वास्य होती हैं। विद्युत्के समान इनकी चपलता प्रसिद्ध है। इनका वचन अमृतमय, किंतु हृदय तो क्षुरधाराके तुल्य तीक्ष्ण होता है'— सन्ध्यावत्क्षणरागिण्यो नदीवत् कुटिलाशयाः। भुजङ्गीवदविश्वाश्या विद्युद्वच्चपलाः स्त्रियः ॥ वचोऽमृतमयं यासां कामिनां रसवर्धनम्। हृदयं क्षुरधाराभं प्रियः को नाम योषिताम् ॥
५३८ भक्तिसुधा 'भ्रमर जैसे एक पुष्पसे दूसरे पुष्पपर जाता रहता है, यही स्थिति स्त्रीकी होती है'— 'भृङ्गीव पुष्पपुरुषं स्त्री वाञ्छति नवं नवम्।' 'अति चपल पारदका निग्रह किया जा सकता है, परंतु स्त्रीचित्तग्रहणकी कोई भी युक्ति नहीं है'— अत्यन्तचपलस्येह पारदस्य निबन्धने। कामं विज्ञायते युक्तिर्न स्त्रीचित्तस्य काचन॥ 'परंतु स्त्रीकी ही क्यों, कुत्सित स्त्रियों-जैसी ही कुत्सित पुरुषोंकी भी स्थिति तो वैसी ही है। माँ! वस्तुतस्तु, यदि आपकी कृपा होती है तो सभी अनुकूल होते हैं। आपकी कृपाके बिना प्रकृतिके परमाणु-परमाणु उद्वेजक ही सिद्ध होते हैं। माँ! अब तो एक बार अनुकम्पाभरी दृष्टिसे निहार दो। माँ! यह विषयों तथा कामादिकोंद्वारा और कितनी कदर्थना और कितनी विडम्बना सहाओगी?' 'माँ! मैंने इन तरलचित्तोंकी कितनी स्तुति नहीं की? इनका कितना अनुनय नहीं किया? जितनी स्तुतिमयी दीनतायुक्त पत्रिकाओंद्वारा इनके सामने रोना रोया, उतना यदि आपके सामने रोया होता तो ये पश्चात्तापके दिन न आते। जो सिर आपके भक्तों एवं आपके ही चरणारविन्दमें झुकाना चाहिये था, वह मृगमरीचिकामय प्राणियोंके सामने झुका। जो महत्त्व, जो गौरव आपके प्रति होना उचित था, वह साधारण प्राणियोंके प्रति किया गया। हाँ, वह भी यदि सर्वस्वरूपा आपको ही समझकर आपके ही प्रति होता तो कोई बात न थी। परंतु माँ! उन सब बातोंको मेरी कमजोरी समझा गया, मुझपर दया दिखायी गयी। बहुतोंने उपहास भी किया, बहुतोंने उपेक्षा की, बहुतोंने घृणा भी की, बहुतोंने उसे भी एक उपद्रव समझकर इस बलाको टालना ही उचित समझा। मेरे भावपूर्ण हृदयको ठुकराया गया। उन पत्रिकाओंका आदर करना, हृदयसे लगा लेना, भाव समझना तो दूरकी बात, उन्हें देखना, पढ़ना भी शुद्ध भार समझा गया। माँ! यह सब आपकी उपेक्षा और मेरे दुर्भाग्यका ही तो परिणाम था। माँ! जिनके लिये कितने ही अनुष्ठान, कितनी ही प्रार्थनाएँ की गयीं, जिनके लिये घोर वेदना सहन की गयी, लक्षों अश्रु- बिन्दुओंका समर्पण किया गया, उन्हींद्वारा उपेक्षा, पूर्ण उपेक्षा, हृदयको पूर्णरूपसे कुचल डालनेका प्रयत्न किया गया। जिनके लिये मानापमान सहा गया, मानहीन भोजन किया गया, उनसे ही क्या मिला? ठीक ही है। अनेक दुर्गम-विषम देशोंमें भटकना पड़ा, परंतु कुछ भी न मिला। जाति-कुलके अनुकूल उचित अभिमान छोड़कर भी निष्फल सेवा, निष्फल अनुनय-विनय करना पड़ा, दूसरोंके गृहोंमें मानवर्जित, आशङ्कायुक्त काकवत् भोजन करना पड़ा। यह सब तृष्णा एवं कामकी ही कदर्थना तो थी। हे पापकर्मनिरते तृष्णे! क्या अब भी तुझे सन्तोष नहीं है?'— भ्रान्तं देशमनेकदूर्गविषयं प्राप्तं न किञ्चित् फलं त्यक्त्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला। भुक्तं मानविवर्जितं परगृहे स्वाशङ्कया काकवत् तृष्णे जृम्भसि पापकर्मनिरते नाद्यापि सन्तुष्यसि॥ 'खलोंकी आराधनाओंमें तत्पर होकर उनके विविध उल्लापोंको भी सहा, हृदयके आँसुओंको रोककर शून्य मनसे उनके उपहासोंको भी सहा। माँ! आखिर जीवन भी तो क्षणभंगुर ही है। आदित्यके गमनागमनद्वारा प्रतिदिन ही तो जीवन क्षीण हो रहा है। वह कार्यभार गुरु व्यापारोंसे कालका बीतना भी कहाँ मालूम पड़ रहा है? माँ! जन्म, जरा, मरणादि भीषण विपत्तियोंको देखकर भी त्रास उत्पन्न नहीं होता। माँ! सचमुच मोहमयी प्रमादमदिरासे हम सभी उन्मत्त हो रहे हैं'— आदित्यस्य गतागतैरहरहः सङ्क्षीयते जीवनं व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते। दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत्॥ 'माँ! भर्तृहरिके कथनानुसार सचमुच आशा नामकी नदी अति भीषण है। विविध प्रकारके मनोरथ ही इसका जल है। विविध विषय तृष्णा-तरंगोंसे वह आकुल है। राग ही उसमें ग्राह है। विविध वितर्क