भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 538

तमोरूप अज्ञानसे ही आवृत्त होकर परम-तत्त्व प्रपंचरूपमें प्रतीत होता है। उसे ही कोई ज्ञान, माया, प्रधान, प्रकृति एवं अजाशक्ति भी कहते हैं। उसीको कोई विमर्श, कोई अविद्या भी कहा करते हैं। केचित्तां तम इत्याहुस्तमः केचिज्जडं परे। ज्ञानं मायां प्रधानञ्च प्रकृतिं शक्तिमप्यजाम्॥ विमर्श इति तां प्राहुः शैवशास्त्रविशारदाः। अविद्यामितरे प्राहुर्वेदतत्त्वार्थचिन्तकाः ॥ ब्रह्म निर्विकार साक्षी दृक्से माया दृश्य है, अतः जड़ है। अधिष्ठानज्ञानसे उसका नाश हो जाता है, अतः असती है। द्वैतजालका द्रष्टा चैतन्य दृश्य नहीं है। यदि उसमें भी दृश्यता हो तो वह भी जड़ ही हो जायगा, अतः स्वप्रकाश चैतन्य दूसरेसे प्रकाशित नहीं होता। तस्याजडत्वं दृश्यत्वाज्ज्ञाननाशात्ततोऽसती। चैतन्यस्य न दृश्यत्वं दृश्यत्वे जडमेव तत्॥ वह चैतन्य जैसे जड़से नहीं प्रकाशित होता, वैसे ही दूसरे चैतन्यसे भी उसका प्रकाश नहीं होता। कारण ऐसा माननेमें अनवस्था होना अनिवार्य है। साथ ही वह अपनेसे भी अपना प्रकाश नहीं करता; क्योंकि ऐसी स्थितिमें उसमें कर्तृत्व और उसीमें कर्मत्व होगा, जो संगत नहीं है। पर समवेत- क्रियाफलशाली कर्म हुआ करता है। अपने-आप कर्ता और अपने-आप कर्म यह पक्ष अत्यन्त विरुद्ध है, अतः दीपकके समान यह स्वयं प्रकाशमान होकर दूसरोंका प्रकाशक है, इसलिये स्वयंप्रकाश कहलाता है— स्वप्रकाशञ्च चैतन्यं न परेण प्रकाशितम्। अनवस्थादोषसत्त्वान्न स्वेनापि प्रकाशितम्॥ कर्मकर्तृविरोधः स्यात् तस्मात्तद्दीपवत्स्वयम्। प्रकाशमानमन्येषां भासकं विद्धि पर्वत ॥ जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिमें दृश्यका व्यभिचार होता है अर्थात् जागरका दृश्य स्वप्नमें नहीं और स्वप्नका जागरमें नहीं और इन दोनोंका सुषुप्तिमें नहीं, सुषुप्तिका बीजात्मक अज्ञान जागर-स्वप्नमें नहीं। परंतु इन तीनों अवस्थाओंका अखण्ड बोध या संविद् सर्वभासक रूपमें नित्य अव्यभिचारी है। संविद् या बोधका व्यभिचार या अभाव कभी भी अनुभवमें न आता है, न आ सकता है। यदि बोधके भी अभावका अनुभव माना जाय तो वहाँ भी वह अभाव जिस साक्षीसे अनुभूत होता है, वह बोधरूप साक्षी जब विद्यमान ही है, तब बोध या संविद्का अभाव कैसे कहा जा सकता है ? बिना बोध या संविद्के भाव-अभाव दोनों ही नहीं सिद्ध हो सकते। अतः संविद्का अभाव सिद्ध करनेके लिये भी संविद्रूप साक्षीकी आवश्यकता रहती ही है। इसीलिये सर्वभासक स्वप्रकाश होनेसे बोध चैतन्यरूप है, अबाध्य अव्यभिचारी होनेसे सत्य एवं नित्य है। 'मैं कभी न होऊँ ऐसा नहीं, किंतु सदा रहूँ ही।' इस तरह प्राणियोंके निरतिशय निरुपाधिक पर- प्रेमका आस्पद होनेसे वह परमानन्दरूप है। साथ ही जब उससे भिन्न सारा प्रपंच मिथ्या ही है, तब कोई भी उसमें तात्त्विक सम्बन्ध नहीं बन सकता। अतः संवित्की असंगता भी सिद्ध ही है। जब स्वप्रकाश संविद्रूपा भगवतीसे भिन्न माया और उसका कार्य सभी सत्, असत् और सदसत् विलक्षण अनिर्वचनीय मिथ्या है, तब फिर परिच्छेदक (भेदक या मापक) देश-काल-वस्तु न होनेसे ही अपरिच्छिन्नता (त्रिविधपरिच्छेदशून्यता) भी सहजमें ही सिद्ध हो जाती है। यह जो सर्वदृश्यभासक बोध सिद्ध किया गया है, यह आत्माका धर्म नहीं है, किंतु आत्मस्वरूप ही है। धर्म माननेपर आत्मा उसका दृश्य होनेसे आत्मामें जड़ता आ जायगी। 'तच्च ज्ञानं नात्मधर्मे धर्मत्वे जडतात्मनः।' यदि ज्ञान स्वप्रकाश आत्माका धर्म है तो उसकी आवश्यकता ही क्या रहती है? ज्ञानको स्वप्रकाश और आत्माको जड़ मानना भी ठीक नहीं, कारण कि स्वप्रकाश ज्ञान जड़ आत्माका ही शेष या अंग नहीं हो सकता है। लोकमें जड़ ही चेतनका शेष होता है, यही प्रसिद्ध है। जैसे बोध या ज्ञान जड़रूप आत्माका धर्म नहीं बन सकता, वैसे ही वह