भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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शक्तिका स्वरूप ५२९ चिद्बोधरूप आत्माका भी धर्म नहीं हो सकता। कारण चित्का चित्से भेद ही नहीं हो सकता, फिर भेद बिना चित्, चित्का धर्मधर्मिभाव कैसे बन सकेगा? इसलिये आत्मा सद्रूप, ज्ञानरूप एवं सुखस्वरूप है। यह अवश्य समझनेकी बात है कि जो घटादिविषयक ज्ञान और अभीष्ट विषयजन्य सुख नामसे प्रसिद्ध है, वह अनित्य और विनाशी अन्तःकरणका वृत्तिरूप (परिणाम) है। उसी ज्ञानाभास या सुखाभासमें अविवेकियोंको ज्ञान या सुखका भ्रम होता है। परंतु इन विनाशी वृत्तिरूप ज्ञान और सुखोंका प्रकाशक स्वप्रकाश अखण्ड बोध या ज्ञान ही असली ज्ञान और सुख है। ग्यान अखंड एक सीताबर। सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥ (रा०च०मा० ७।७८।४; १।११७।६) 'चिद्धर्मत्वं चितो नास्ति चितश्चिन्नैव भिद्यते।' वह बोध ही अत्यन्त अबाध्य होनेसे पारमार्थिक सत्य है और वही सब कुछ है। अतः पूर्ण और असंग एवं द्वैतजालसे विवर्जित है। वही काम, कर्मादिके सहित अपनी मायासे ही पूर्वसंस्कारके अनुसार कालकर्मके विपाकसे सृष्टिकी इच्छावाला हो जाता है। जैसे कोई प्राणी पूर्व-संस्कारसे अबुद्धिपूर्वक ही नींदसे उठ बैठता है, वैसे ही आत्माकी यह सृष्टि काल-कर्मसंस्कारसे अबुद्धिपूर्वक ही होती है। यही जगत् बीजभूत प्रकृतिसे विशिष्ट मेरा स्वरूप अव्याकृत या मायाशबल कहलाता है, वही समस्त कारणोंका कारण है और समस्त तत्त्वोंका आदिभूत तत्त्व है, वही मायाशक्तियुक्त सच्चिदानन्द कहलाता है, वही समस्त कर्मोंका घनीभूतस्वरूप ज्ञानों और इच्छाओंका आश्रय है, वही आदितत्त्व ह्रींकार, ओंकार आदिका वाच्य तत्त्व है। सर्वकर्मघनीभूतं इच्छाज्ञानक्रियाश्रयम्। ह्रींकारमन्त्रवाच्यं तदादितत्त्वं तदुच्यते॥ उसी मायाशक्तिविशिष्ट अव्याकृतसे शब्द- तन्मात्रस्वरूप सूक्ष्माकाश उत्पन्न होता है। उससे स्पर्शात्मक वायु और वायुसे रूपतन्मात्रा-स्वरूप तेज और उससे रसात्मक जल, जलसे गन्धात्मिका पृथ्वी उत्पन्न होती है। इन्हीं अपंचीकृत सूक्ष्म पंचभूतोंके सात्त्विक अंशसे अन्तःकरण और पंचज्ञानेन्द्रियाँ, राजस अंशसे प्राण और पंचज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। वह सब मिलकर व्यापक लिंगशरीर ही आत्माका सूक्ष्म देह कहा जाता है। पूर्वोक्त अव्याकृत ही आत्माका कारणदेह है। भूतोंके तामस अंशसे पंचीकरण मार्गसे स्थूल प्रपंच और विराट्की उत्पत्ति होती है। भूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशसे उत्पन्न अन्तःकरणके वृत्तिभेदसे चार रूप बन जाते हैं। संकल्प-विकल्प करते समय मन, निश्चय करते हुए बुद्धि, स्मरण करते समय चित्त और अहंकार- कालमें यह अहंकार कहा जाता है। विशुद्धसत्त्वप्रधाना प्रकृति माया और मलिनसत्त्वप्रधाना अविद्या कहलाती है। स्वाश्रयको न मोहित करनेवाली विद्यामें प्रतिबिम्ब-समन्वित अधिष्ठान ईश्वर कहा जाता है, वह स्वाश्रयके ज्ञानसे युक्त सर्वज्ञ सर्वानुग्राहक है। अविद्यामें प्रतिबिम्बसमन्वित अधिष्ठान अल्पज्ञ एवं दुःखादिका आश्रयभूत जीव है। दोनों ही स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीन देहोंसे युक्त हैं। व्यष्टि- स्थूल-सूक्ष्म-कारण जीवके हैं और समष्टि तीनों देह ईश्वरके हैं। व्यष्टिमें कारण-देहाभिमानी प्राज्ञ, सूक्ष्म-शरीराभिमानी तैजस और स्थूल-शरीराभिमानी विश्व कहलाता है। समष्टि-कारण देहका अभिमानी अव्याकृत, सूक्ष्मदेहका अभिमानी हिरण्यगर्भ एवं स्थूल-प्रपंचका अभिमानी विराट् कहलाता है। ईश्वर ही नाना भोगोंके आश्रयभूत विश्वका निर्माण करते हैं। भगवतीने कहा— मेरी मायाशक्तिसे ही समस्त चराचर विश्व बनता है। वह माया भी मुझसे पृथक् नहीं है। व्यवहारदृष्टिसे जो माया और अविद्या कहलाती है, वह परमार्थतः मुझसे पृथक् कुछ भी नहीं है— व्यवहारदृशा येयं विद्या मायेति विश्रुता। तत्त्वदृष्ट्या तु नास्त्येव तत्त्वमेवास्ति केवलम् ॥