भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 540, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 540

५३० भक्तिसुधा भगवती ही निखिल प्रपंचकी निर्मात्री स्वप्रकाशरूपा भगवती ही निखिल प्रपंचका निर्माण करके उसमें वही प्रवेश करती है। जिस तरह एक ही आकाश घटाकाश और महाकाशके रूपमें प्रकट होता है, उसी तरह स्वप्रकाश चैतन्य ही विद्याशक्तिविशिष्ट ईश्वर, अविद्या या अन्तःकरण-विशिष्ट होकर जीवरूपमें व्यक्त होता है। उन्हीं अनेक उपाधिभेदोंसे ही जीवोंमें नानात्व और गमागम सब कुछ उत्पन्न होता है। जैसे सूर्यभगवान् उच्चावच अनेक प्रकारकी वस्तुओंका प्रकाश करते हैं, परंतु उनके गुणों या दोषोंसे वे युक्त नहीं होते, वैसे ही अखण्डबोधरूप सर्वान्तरात्मा सभी दृश्यका प्रकाशन करते हैं, परंतु उनके गुणों और दोषोंमें वे लिप्त नहीं होते। जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्ब या रज्जुमें सर्प, वैसे ही शुद्धप्रकाशस्वरूप परमतत्त्वमें समस्त प्रकाश्य परिकल्पित है। अतएव ईश्वर, सूत्रात्मा, विराट्, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, गौरी, ब्राह्मी, वैष्णवी, सूर्य, तारक, तारकेश, स्त्री, पुमान्, नपुंसक एवं शुभ, अशुभ समस्त प्रपंच ही परात्परपूर्णतम परम तत्त्वका ही स्वरूप है। जो भी कुछ देखा या सुना जाता है, उसके भीतर और बाहर व्याप्त होकर एक वही निर्विकार पूर्ण चिति ही विद्यमान है। सबको सत्तास्फूर्ति सुख प्रदान करनेवाली चितिसे विमुक्त होकर जो कुछ भी है वह शून्य है, वन्ध्यापुत्रके समान है। जैसे सर्प, धारा, माला आदि भेदोंमें एक रज्जु ही अनेकधा भासित होती है, वैसे ही एक चिद्रूप आत्मा ही अनेक रूपमें भासित होता है। जैसे अधिष्ठानके बिना कल्पित पदार्थकी सत्ता और स्फूर्ति नहीं टिक सकती, वैसे ही सच्चित्-स्वरूप परमतत्त्वके बिना कल्पित विश्वमें सत्ता और स्फूर्ति नहीं रहती। यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु दृश्यते श्रूयतेऽपि वा। अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्याहं सर्वदा स्थिता॥ न तदस्ति मया त्यक्तं वस्तु किञ्चिच्चराचरम्। यद्यस्ति चेत्तच्छून्यं वन्ध्यापुत्रोपमं हि तत्॥ माँके श्रीचरणोंमें अनन्तकोटिब्रह्माण्डजननी पराम्बा, रामचन्द्र राघवेन्द्रकी हृदयेश्वरीके मंगलमय चरणारविन्दको अपनी अविरल अश्रुधाराओंसे सिंचित करता हुआ एक भक्त कहता है—'हे अम्ब! कल्याणमयी भगवति! हे देवि! यह आपका अबोध, किंकर्तव्यविमूढ शिशु आपके चरणारविन्दकी शरण है। हे माँ! अब यह ताप सहनकी सीमाके बाहर हो गया है। हे माँ! मैं जानता हूँ कि मैं तुम्हारा योग्य पुत्र नहीं हूँ। मैं तुम्हारे चरणारविन्द-स्पर्शका भी अधिकारी नहीं हूँ। माँ! फिर भी अधम-से-अधम, पतित-से-पतित पुत्रकी भी अम्बा उपेक्षा नहीं करती'— 'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥' 'माँ! मुझे तो सबने उपेक्षित कर दिया है। ठीक ही है, तुम्हारे अभिशापसे सन्तप्तकी रक्षा सिवा तुम्हारे और कौन कर सकता है? माँ! तुम तो प्रभुसे भी यही कहती हो कि 'न कश्चिन्नापराध्यति।' ऐसा व्यक्ति कौन है, जिससे अपराध नहीं बनता? यह अबोध शिशु है; इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। इसे पुचकारकर अंकमें लेना चाहिये। माँ! तुम्हारे चरणोंके बिना सब जगत् सन्तापजनक हो रहा है। संसारमें कोई इस अधमको देखने-पूछनेवाला नहीं है। माँ! संसारकी विडम्बनासे दग्ध हो रहा हूँ। अनेक बार अपमानित और तिरस्कृत हुआ, फिर भी तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर सकता। अपने ही अपराधोंके कारण स्थिर प्रबोध, स्थिर वैराग्य नहीं होता। हे पुत्रवत्सले! तुम्हारे बिना आशाके अनुकूल ही नहीं, आशासे भी अधिक कारुणिक हृदयसे अपराधी पुत्रको दूसरा कौन पुचकार सकता है?'

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ) · पृष्ठ 540, कुल 778 में से · BharatKosha