भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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शक्तिका स्वरूप ५२७

शक्तिका स्वरूप

श्रीभगवतीने देवीभागवतका संक्षेपमें श्रीविष्णुके लिये उपदेश किया है— 'सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्।' अर्थात् यह सब कुछ सनातन मैं ही हूँ। मेरेसे भिन्न कोई तत्त्व नहीं है। वेदान्तवेद्य परतत्त्व ही शिव तथा स्कन्दपुराणके शिवतत्त्व, रामायणके राम, श्रीविष्णुपुराणके विष्णु एवं वही सूर्य, शक्ति आदिरूपसे प्रकट होता है। श्रीहिमालयपर कृपा करके करुणामयी, कल्याणमयी अम्बाने ही अपने दिव्यस्वरूपका उपदेश दिया है— 'अहमेवास पूर्वं तु नान्यत्किञ्चिन्नगाधिप।' नगाधिप! मैं ही एक सब कुछ हूँ। मेरा अनन्त अखण्ड ब्राह्मारूप अप्रतर्क्य एवं अनिर्देश्य है, अनौपम्य और अनामय है। उसी सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाश परब्रह्मकी एक स्वतःसिद्धा शक्ति है, वही माया नामसे प्रख्यात है। जैसे मृत्तिकामें घटोत्पादिनी शक्ति और वह्निमें दाहिकाशक्ति होती है, वैसे ही ब्रह्ममें अनन्तकोटिब्रह्माण्डोत्पादिनी शक्ति है। वही निखिल विश्वकी जननी है। इस पक्षमें जगत् भ्रान्तिमय या अध्यस्त कैसे है, प्रपंचकी स्वरूपसत्ता न होनेसे आरोप्यानुभवसे आदिम संस्कार नहीं बन सकेगा, फिर भ्रान्ति या अध्यास कैसे सम्भव होगा—इत्यादि शंकाओंको स्थान ही नहीं रहता; क्योंकि शक्तिद्वारा ब्रह्मकी ही प्रपंचरूपसे अभिव्यक्ति हो जायगी, फिर अद्वैत सिद्धान्तमें कोई विरोध नहीं होगा। कारण कि पारमार्थिक सद्रूप परमात्मा ही अद्वितीय है। प्रपंच और उसकी जननी शक्ति तो सत्, असत् और सदसद्, इन तीनोंसे विलक्षण है। अतएव अनिर्वचनीया है। जैसे वह्निशक्ति वह्निसे विलक्षण है, वैसे ही सत्‌की शक्ति सत्‌से विलक्षण है। अतएव अनिर्वचनीय है— न सती सा नासती सा नोभयात्मविरोधतः। एतद्विलक्षणा काचिद् वस्तुसत्तास्ति सर्वदा॥ ब्रह्मज्ञानद्वारा इसका बाध हो जाता है। इसलिये ब्रह्मकी तरह वह नित्य सत् नहीं है, परंतु उसीके कार्यभूत प्रपंचसे समस्त व्यवहार बनता है, इसलिये ब्रह्मकी तरह वह असत् भी नहीं और परस्पर विरोध होनेके कारण दोनोंकी स्थिति असम्भव है, अतः सदसद् उभय स्वरूप भी नहीं है। अनिर्वचनीय वस्तुरूप मायाशक्ति मोक्षपर्यन्त विद्यमान रहती है। जैसे पावकमें उष्णता, सूर्यमें किरण और चन्द्रमामें चन्द्रिका है, वैसे ही ब्रह्मात्मिका चिच्छक्तिरूपा भगवतीमें सहजसिद्धा मायाशक्ति है। सुषुप्तिमें जैसे समस्त जीवोंके व्यवहार विलीन रहते हैं, वैसे ही प्रलयकालमें समस्त जीव और उनके कर्म मायामें विलीन रहते हैं। पृथिव्यादि समस्त प्रपंच अभेदभावसे उसी मायामें विलीन रहता है। उसी शक्तिके अनिर्वचनीय सम्बन्धसे निर्गुण-निर्लिप्त चिच्छक्ति जगत्‌का बीज अर्थात् कारणरूप भी हो जाती है। उस परमतत्त्वके आश्रित रहनेवाली मायाशक्ति उसे आवृत्त करती है, इसलिये ब्रह्मशक्ति सदोष समझी जाती है। मायाशक्तिके विद्या और अविद्या दो भेद हैं। उनमें विद्या विशुद्धा सत्त्वात्मिका होनेसे स्वाश्रयको व्यामोहित नहीं करती। अतः वह निर्दोष है। तमसे अभिभूत सत्त्वयुक्त अविद्या (मलिन सत्त्वप्रधाना प्रकृति) स्वाश्रयकी व्यामोहकारिणी है, इसीलिये ब्रह्म सदोष है। चैतन्यके सम्बन्धसे तद्गत (विशुद्ध सत्त्वगुणप्रधाना मायागत) चिदाभास ही चेतनप्रधान होनेके कारण निमित्तकर्ता है और उसी शक्तिका (तमःप्रधाना प्रकृतिका) प्रपंचरूपमें परिणाम होता है, अतः वही समवायकारण (उपादानकारण) भी है। कुछ लोग उस मायाशक्तिको ही तप कहते हैं। परमेश्वर उसीसे विश्वका निर्माण करते हैं— 'सा तपस्तप्त्वाेदं सर्वं समसृजत।' और कोई शाखी (शाखावाले) उसे ही तम कहते हैं। 'तम आसीत् तमसा गूढमग्रे।'