भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीभगवती-तत्त्व ५२१

मिश्रीका, सौगन्ध्य बिना पुष्पका, सौन्दर्य बिना सुन्दरीका, लज्जा बिना कुलांगनाका कुछ भी महत्त्व नहीं रह जाता। शाक्ताद्वैतदृष्टिसे शक्ति शिवस्वरूप ही है, सच्चिदानन्दमें चिद्भाव विमर्श है, सत्‌का भाव शिव है। रुद्रहीनं विष्णुहीनं न वदन्ति जनाः किल। शक्तिहीनं यथा सर्वे प्रवदन्ति नराधमम्॥ अर्थात् कोई भी प्राणी रुद्रहीन, विष्णुहीन होनेसे शोचनीय नहीं होता, अपितु शक्तिहीन होनेसे ही शोचनीय होता है। 'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।' बलहीन प्राणीको अपनी आत्माका भी उपलम्भ नहीं हो सकता— गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो हरेः पत्नीं पद्मा हरसहचरीमद्रितनयाम्। तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिःसीममहिमा महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि॥ (सौन्दर्यलहरी ९७) परब्रह्ममहिषीरूपा भगवतीको आचार्योंने तुरीया चिच्छक्तिरूप ही बतलाया है। शङ्करः पुरुषाः सर्वे स्त्रियः सर्वा महेश्वरी। विषयी भगवानीशो विषयः परमेश्वरी॥ मन्ता स एव विश्वात्मा मन्तव्यं तु महेश्वरी। आकाशः शङ्करो देवः पृथिवी शङ्करप्रिया॥ समुद्र-वेल, वृक्ष-लता, शब्द-अर्थ, पदार्थ- शक्ति, पुं-स्त्री, यज्ञ-इज्या, क्रिया-फलभुक्, गुण- व्यक्ति-व्यंजकतारूप, प्रथमनीति-जय बोध-बुद्धि, धर्म- सत्क्रिया, सन्तोष-तुष्टि, इच्छा-काम, यज्ञ-दक्षिणा, आज्याहुति-पुरोडाश, काष्ठा-निमेष, मुहूर्त-कला, ज्योत्स्ना-प्रदीप, रात्रि-दिन, ध्वज-पताका, तृष्णा- लोभ, रति-राग उपर्युक्त भेदोंसे उसी तत्त्वका अनेकधा प्राकट्य होता है। 'शक्ति' शब्दसे बहुतसे लोग केवल माया, अविद्या आदि बहिरंग शक्तियोंको ही समझते हैं। परंतु भगवान्‌की स्वरूपभूता आह्लादिनी शक्ति, जीवभूता पराप्रकृति आदि भी शक्ति शब्दसे व्यवहृत होते हैं। जैसे सिता, द्राक्षा, मधु आदिमें मधुरिमा उनका परमान्तरंग स्वरूप ही है, वैसे ही परमानन्द- रसामृतसार समुद्र भगवान्‌की परमान्तरंग-स्वरूपभूता शक्ति ही भगवती है— विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा परा। अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते॥ यहाँपर विष्णु और क्षेत्रज्ञको भी शक्ति ही कहा गया है। यद्यपि शक्तियाँ अनेक हैं तथापि आनन्दाश्रित आह्लादिनी, चेतनाश्रित संवित्, सदंशाश्रित सन्धिनीशक्ति होती है। क्षेत्रज्ञ तटस्थशक्ति है, माया बहिरंगशक्ति मानी जाती है। तत्त्वविद् लोग कहते हैं कि जैसे पुष्पका सौगन्ध्य सम्यक् रूपसे तब अनुभूत हो सकता है, जब पुष्पकी घ्राणशक्ति हो। अन्य लोगोंको तो व्यवधानके साथ किंचिन्मात्र ही गन्धका अनुभव होता है। उसी तरह भगवतीके सुन्दर स्वरूपका सम्यक् अनुभव परम शिवको ही प्राप्त होता है; वह अन्य दृष्टिका विषय ही नहीं— घृतक्षीरद्राक्षामधुमधुरिमा कैरपि पदै- र्विशिष्ट्यानाख्येयो भवति रसनामात्रविषयः। तथा ते सौन्दर्यं परमशिवदृङ्मात्रविषयः कथङ्कारं ब्रूमः सकलनिगमागोचरगुणे॥ (सौन्दर्यलहरी २) अर्थात् वस्तुतः निर्गुणा, सत्या, सनातनी, सर्वस्वरूपा भगवती ही भक्तानुग्रहार्थ सगुण होकर प्रकट होती हैं। वैसे तो भगवतीके अनन्त स्वरूप हैं, पर विशेषतः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी और सिद्धिदात्री— ये नौ स्वरूप प्रधान है— कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम्। परब्रह्मस्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी॥ सर्वस्वरूपा सर्वेशी सर्वाधारा परात्परा। सर्वबीजस्वरूपा च सर्वमूला निराश्रया॥ सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमङ्गलमङ्गला। वैसे तो अनन्त शक्तियाँ हैं, फिर भी इनके अतिरिक्त और भी कुछ प्रधान शक्तियाँ हैं, जो पूज्य हैं। व्यवहार और परमार्थमें उनका परम उद्योग है।