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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 532, कुल 778 में से

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निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति, इंधिका, दीपिका, रोचिका, मोचिका, परा, सूक्ष्मा, सूक्ष्मामृता, ज्ञानामृता, अमृता, आप्यायिनी, व्यापिनी, व्योमरूपा, तीक्ष्णा, अनन्ता, सृष्टि, ऋद्धि, स्मृति, मेधा, कान्ति, लक्ष्मी, द्युति, स्थिति, सिद्धि, जड़ा, पालिनी, शान्ति, ऐश्वर्या, रति, कामिका, वरदा, आह्लादिनी, प्रीति, दीर्घा, रौद्री, निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा, क्रोधिनी, पुष्टि, तुष्टि, धृति, चन्द्रिका आदि सृष्टि चिद्घनमहासमुद्रकी अनन्त शक्तिस्वामिनी ही भगवती हैं। 'अगस्त्यसंहिता' के वचनानुसार भगवान् शिवने श्रीरामका प्रत्यक्ष साक्षात् करनेके लिये बड़ी तपस्या और आराधना की। भगवान् रामने प्रसन्न होकर कहा कि यदि मेरा तत्त्व जानना चाहते हो तो मेरी आह्लादिनी पराशक्तिकी आराधना करो, उसके बिना मेरी स्थिति नहीं होती— आह्लादिनीं परां शक्तिं स्तूयाः सात्वतसम्मताम्। सदाराध्यस्तदा रामस्तदधीनस्तया विना। तिष्ठामि न क्षणं शम्भो जीवनं परमं मम॥ यह सुनकर श्रीशिवजीने भगवतीकी आराधना की। भगवतीने कृपाकर उन्हें दर्शन दिया। उनके अद्भुत रूपको देखकर उन्होंने अति भक्तिसे दिव्य स्तुति की— वन्दे विदेहतनयापदपुण्डरीकं कैशोरसौरभसमाहतयोगिचित्तम् । हन्तुं त्रितापमनिशं मुनिहंससेव्यं सन्मानसालिपरीपीतपरागपुञ्जम् ॥ करुणा तो शिव, विष्णु आदि सभी देवोंमें होती है, परंतु परमकल्याणमयी, करुणामयी तो श्रीअम्बा ही हैं। कुपुत्रपर भी अम्बाकी करुणा ही रहती है— 'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥' शत्रुसे निष्ठुरतापूर्वक युद्ध करते हुए भी माँके हृदयमें शत्रुओंपर भी कृपा रहती है। उनको बाणोंसे पवित्र करके दिव्यलोकमें

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