भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 533, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 533

श्रीभगवती-तत्त्व ५२३ माँसे कहता है—हे माँ! जब आपके स्वामी भगवान् जीवोंपर हित-बुद्ध्या कुपित होते हैं, तब आप 'यह क्या? संसारमें निर्दोष कौन है?' ऐसा कहकर समुचित उपायोंसे पिताको अनुकूल बनाती हैं, इसीलिये कि आप ही सच्ची माँ हो। नित्यं विश्वं वशयति हरिर्निग्रहानुग्रहाभ्या- माद्ये शक्तिं विघटयति ते हन्त कारुण्यपूरः। भगवान् श्रीहरि जगत्को अपने वशमें रखते हैं; परंतु आपकी करुणा हरिकी निग्रहादि शक्तियोंको भी स्वाधीन रखती है। भगवती ही सबसे अन्तर और महत्त्वपूर्ण हैं, इसीलिये भक्त कहते हैं— त्वय्येवाश्रयते दया रघुपते देवस्य सत्यं यतो वैदेहि त्वदसन्निधौ भगवता वाली निरामाहतः। नित्ये कापि वधूर्वधं तव तु सान्निध्ये त्वदङ्गव्यथा कुर्वाणोऽप्यभितः पतन्नशरणः काको विवेकोज्झितः॥ [