भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२४ भक्तिसुधा
अचिन्त्य अमित आकारोंकी मूलभूत सत्तास्वरूपा भी वही है, वही गुणातीत है। निर्विकल्पबोधसे ही स्वप्रकाशरूपेण भगवतीकी अवगति होती है, अतएव अद्वितीय परब्रह्मस्वरूपसे भगवती नित्य ही प्रसिद्ध हैं। 'केनोपनिषद्' में ब्रह्मविद्यारूप भगवतीका वर्णन मिलता है, उसीकी कृपासे इन्द्र आदिकोंको ब्रह्मस्वरूपका बोध हुआ था। जब इन्द्रके सामनेसे ब्रह्मका अन्तर्धान हो गया, तब इन्द्र लज्जित होकर उसी आकाशमें खड़े रह गये और तपस्या करने लगे। बहुत दिनोंकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर भगवती इन्द्रके सामने प्रकट हुईं— स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीम्। इन्द्रने उसी आकाशमें बहुशोभमाना हैम अलंकारोंसे युक्त ब्रह्मविद्यारूपा भगवतीको देखा और उनकी कृपासे ब्रह्मको जाना। शक्तिके उपासकोंका तो सर्वस्व शक्ति है ही, परंतु तत्तद्देवताओंके उपासकोंको भी शक्तिकी आराधना करनी पड़ती है। यहाँतक कि शक्तिकी उपासनाके बिना उन-उन देवताओंकी प्राप्ति ही नहीं होती। सम्मोहनतन्त्रमें तो स्पष्ट ही यह उक्ति है कि गौरतेज राधिकाकी उपासना किये बिना, जो केवल श्यामतेज कृष्णकी आराधना करता है, वह पातकी होता है— गौरतेजो बिना यस्तु श्यामतेजः समर्चयेत्। जपेद्वा ध्यायते वापि स भवेत्पातकी शिवे॥ (गोपालसहस्रनाम १७)
गायत्री-तत्त्व
किसी गायत्रीनिष्ठ सज्जनका प्रश्न है कि 'गायत्री- मन्त्रका वास्तविक अर्थ क्या है? गायत्री-मन्त्रके द्वारा किस स्वरूपसे किस देवताका ध्यान किया जाय? कोई गोरूपा गायत्रीका, कोई आदित्यमण्डलस्था श्वेत- पद्मस्थिता किसी देवीका ध्यान करना बतलाते हैं, कोई ब्रह्माणी, रुद्राणी, नारायणीका ध्यान उचित समझते हैं, कहीं पंचमुखी गायत्रीका ध्यान बतलाया गया है, तो कोई राधा-कृष्णका ध्यान समुचित मानते हैं। ऐसी स्थितिमें बुद्धिमें भ्रम होता है कि गायत्री-मन्त्रका मुख्य अर्थ और ध्येय क्या है?' इस सम्बन्धमें यद्यपि शास्त्रोंमें बहुत कुछ विवेचन है तथापि यहाँ संक्षेपमें कुछ लिखा जाता है— बृहदारण्यक० (५।१४)-में 'भूमिरन्तरिक्षं द्यौः' इन आठ अक्षरोंको गायत्रीका प्रथम पाद कहा है, 'ऋचो यजूंषि सामानि' इन आठ अक्षरोंको गायत्रीका द्वितीय पाद कहा गया है, 'प्राणोऽपानो व्यानः' इन आठ अक्षरोंको गायत्रीका तीसरा पाद माना गया है। इस तरह लोकात्मा, वेदात्मा एवं प्राणात्मा—ये तीनों ही गायत्रीके तीन पाद हैं। परब्रह्म परमात्मा ही चतुर्थ पाद हैं। 'भूमिरन्तरिक्षम्' इत्यादि श्रुतियोंपर व्याख्या करते हुए आचार्य शंकर कहते हैं कि सम्पूर्ण छन्दोंमें गायत्री-छन्द प्रधान है; क्योंकि वही छन्दोंके प्रयोक्ता गयाख्य प्राणोंका रक्षक है। सम्पूर्ण छन्दोंका आत्मा प्राण है, प्राणका आत्मा गायत्री है। क्षतसे रक्षक होनेके कारण प्राण क्षात्र है, प्राणोंका रक्षण करनेवाली गायत्री है। द्विजोत्तम जन्मका हेतु भी गायत्री ही है। गायत्रीके तीनों पादोंकी उपासना करनेवालोंको लोकात्मा, वेदात्मा और प्राणात्माके सम्पूर्ण विषय उपनत होते हैं। गायत्रीका चतुर्थ पाद ही 'तुरीय' शब्दसे कहा जाता है। जो रजोजात सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करता है, वह सूर्यमण्डलान्तर्गत पुरुष है। जैसे वह पुरुष सर्वलोकाधिपत्यकी श्री एवं यशसे तपता है, वैसे ही तुरीयपादवन्दिता श्री और यशसे दीप्त होता है। गायत्री सम्पूर्ण वेदोंकी जननी है। जो गायत्रीका अभिप्राय है, वही सम्पूर्ण वेदोंका अर्थ है। विश्व- तैजस-प्राज्ञ, विराट्-हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, व्यष्टि- समष्टि जगत् तथा उसकी जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—यह