भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगायत्री-तत्त्व [पृष्ठ ५२५]
तीनों अवस्थाएँ प्रणवकी अ, उ, म् इन तीनों मात्राओंके अर्थ हैं। सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापक, उत्पादक, पालक, संहारक सर्वेश्वर प्रणवका वाच्यार्थ है। सर्वरहित सर्वाधिष्ठान सच्चिदानन्द परब्रह्म प्रणवका लक्ष्यार्थ है। उत्पादक, पालक, संहारक त्रिविध लोकात्मा भगवान् तीनों व्याहृतियोंके अर्थ हैं। जगदुत्पत्ति-स्थिति-संहार-कारण परब्रह्म ही 'सवितृ' शब्दका अर्थ है। तथापि गायत्रीद्वारा विश्वोत्पादक, स्वप्रकाश परमात्माके उस रमणीय चिन्मय तेजका ध्यान किया जाता है, जो समस्त बुद्धियोंका प्रेरक एवं साक्षी है। विश्वोत्पादक परमात्माके वरेण्य भर्गको बुद्धिप्रेरक एवं बुद्धिसाक्षी कहनेसे जीवात्मा और परमात्माका अभेद परिलक्षित होता है, अतः साधनचतुष्टयसम्पन्न उत्तमाधिकारीके लिये प्रत्यक्चैतन्याभिन्न, निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्मका ही चिन्तन गायत्री- मन्त्रके द्वारा किया जाता है। अनन्त कल्याणगुण- गणसम्पन्न, सगुण, निराकार, परमेश्वरकी उपासना गायत्रीके द्वारा हो सकती है। सगुण, साकार, सच्चिदानन्द परब्रह्मका ध्यान गायत्रीके द्वारा किया जा सकता है। प्राणिप्रसवार्थक 'षूङ्' धातुसे 'सवितृ' शब्दकी निष्पत्ति होती है। यहाँ उत्पत्तिको उपलक्षण मानकर उत्पत्ति, स्थिति एवं लयका कारण परब्रह्म ही 'सवितृ' शब्दका अर्थ है। इस दृष्टिसे उत्पादक, पालक, संहारक जो भी देवता प्रमाणसिद्ध हैं, वे सभी गायत्रीके अर्थ हैं। उत्पादक, पालक, संहारक—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा उनकी स्वरूपभूत तीनों शक्तियोंका ध्यान किया जाता है। त्रिपदा गायत्री त्रैलोक्य, त्रैविद्य तथा प्राण जिस गायत्रीके स्वरूप हैं, वह त्रिपदा गायत्री परोरजा आदित्यमें प्रतिष्ठित है; क्योंकि आदित्य तो मूर्त-अमूर्त दोनोंका ही रस है। इसके बिना सब शुष्क हो जाते हैं, अतः त्रिपदा गायत्री आदित्यमें प्रतिष्ठित है। 'आदित्यः चक्षुः'—स्वरूप सत्तामें प्रतिष्ठित है। वह सत्ता बल अर्थात् प्राणमें प्रतिष्ठित है, अतः सर्वाश्रयभूत प्राण ही परमोत्कृष्ट है। गायत्री अध्यात्म प्राणमें प्रतिष्ठित है। जिस प्राणमें सम्पूर्ण देव, वेद, कर्मफल एक हो जाते हैं, वही प्राण-स्वरूपा गायत्री सबकी आत्मा है। शब्दकारी वागादि प्राण 'गय' हैं, उनका त्राण करनेवाली गायत्री है। आचार्य अष्टवर्षके बालकको उपनीत करके जब गायत्री प्रदान करता है, तब जगदात्मा प्राण ही उसके लिये समर्पित करता है। जिस माणवकको आचार्य गायत्रीका उपदेश करता है, उसके प्राणोंका त्राण करता है, नरकादि पतनसे बचा लेता है। गायत्रीके प्रथम पादको जाननेवाला यति यदि धनपूर्ण तीनों लोकोंका दान ले, तो भी उसे कोई दोष नहीं लगता। जो द्वितीय पादको जानता है, वह जितनेमें त्रयी विद्यारूप सूर्य तपता है, उन सब लोकोंको प्राप्त कर सकता है। तीसरे पादको जाननेवाला सम्पूर्ण प्राणिवर्गको प्राप्त कर सकता है। सारांश यह है कि यदि पादत्रयके समान भी कोई दाता- प्रतिग्रहीता हो, तब भी गायत्रीविद्को प्रतिग्रहदोष नहीं लगता, फिर चतुर्थ पादके वेदिताके लिये तो ऐसी कोई वस्तु ही नहीं है, जो उसके ज्ञानका फल कहा जा सके। वस्तुतः त्रिप्राद-विज्ञानका भी प्रतिग्रहसे अधिक ही फल होता है, क्योंकि इतना प्रतिग्रह कौन ले सकता है? गायत्रीके उपस्थान-मन्त्रमें कहा गया है कि हे गायत्रि! आप त्रैलोक्यरूप पादसे एकपदी हो, त्रयी विद्यारूप पादसे द्विपदी हो, प्राणादि तृतीय पादसे त्रिपदी हो, चतुर्थ तुरीय पादसे चतुष्पदी हो। इस तरह चार पादोंसे युक्त मन्त्रोंद्वारा आपकी उपासना होती है। इसके बाद अपने निरुपाधिक आत्मास्वरूपसे अपद हो, 'नेति-नेति' इत्यादि निषेधोंसे वह सर्वनिषेधोंका अवधिरूपसे बोधित सम्पूर्ण व्यवहारोंका अगोचर है, अतः प्रत्यक्ष परोरजा आपके