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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

गायत्री-तत्त्व [पृष्ठ ५२५]

तीनों अवस्थाएँ प्रणवकी अ, उ, म् इन तीनों मात्राओंके अर्थ हैं। सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापक, उत्पादक, पालक, संहारक सर्वेश्वर प्रणवका वाच्यार्थ है। सर्वरहित सर्वाधिष्ठान सच्चिदानन्द परब्रह्म प्रणवका लक्ष्यार्थ है। उत्पादक, पालक, संहारक त्रिविध लोकात्मा भगवान् तीनों व्याहृतियोंके अर्थ हैं। जगदुत्पत्ति-स्थिति-संहार-कारण परब्रह्म ही 'सवितृ' शब्दका अर्थ है। तथापि गायत्रीद्वारा विश्वोत्पादक, स्वप्रकाश परमात्माके उस रमणीय चिन्मय तेजका ध्यान किया जाता है, जो समस्त बुद्धियोंका प्रेरक एवं साक्षी है। विश्वोत्पादक परमात्माके वरेण्य भर्गको बुद्धिप्रेरक एवं बुद्धिसाक्षी कहनेसे जीवात्मा और परमात्माका अभेद परिलक्षित होता है, अतः साधनचतुष्टयसम्पन्न उत्तमाधिकारीके लिये प्रत्यक्चैतन्याभिन्न, निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्मका ही चिन्तन गायत्री- मन्त्रके द्वारा किया जाता है। अनन्त कल्याणगुण- गणसम्पन्न, सगुण, निराकार, परमेश्वरकी उपासना गायत्रीके द्वारा हो सकती है। सगुण, साकार, सच्चिदानन्द परब्रह्मका ध्यान गायत्रीके द्वारा किया जा सकता है। प्राणिप्रसवार्थक 'षूङ्' धातुसे 'सवितृ' शब्दकी निष्पत्ति होती है। यहाँ उत्पत्तिको उपलक्षण मानकर उत्पत्ति, स्थिति एवं लयका कारण परब्रह्म ही 'सवितृ' शब्दका अर्थ है। इस दृष्टिसे उत्पादक, पालक, संहारक जो भी देवता प्रमाणसिद्ध हैं, वे सभी गायत्रीके अर्थ हैं। उत्पादक, पालक, संहारक—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा उनकी स्वरूपभूत तीनों शक्तियोंका ध्यान किया जाता है। त्रिपदा गायत्री त्रैलोक्य, त्रैविद्य तथा प्राण जिस गायत्रीके स्वरूप हैं, वह त्रिपदा गायत्री परोरजा आदित्यमें प्रतिष्ठित है; क्योंकि आदित्य तो मूर्त-अमूर्त दोनोंका ही रस है। इसके बिना सब शुष्क हो जाते हैं, अतः त्रिपदा गायत्री आदित्यमें प्रतिष्ठित है। 'आदित्यः चक्षुः'—स्वरूप सत्तामें प्रतिष्ठित है। वह सत्ता बल अर्थात् प्राणमें प्रतिष्ठित है, अतः सर्वाश्रयभूत प्राण ही परमोत्कृष्ट है। गायत्री अध्यात्म प्राणमें प्रतिष्ठित है। जिस प्राणमें सम्पूर्ण देव, वेद, कर्मफल एक हो जाते हैं, वही प्राण-स्वरूपा गायत्री सबकी आत्मा है। शब्दकारी वागादि प्राण 'गय' हैं, उनका त्राण करनेवाली गायत्री है। आचार्य अष्टवर्षके बालकको उपनीत करके जब गायत्री प्रदान करता है, तब जगदात्मा प्राण ही उसके लिये समर्पित करता है। जिस माणवकको आचार्य गायत्रीका उपदेश करता है, उसके प्राणोंका त्राण करता है, नरकादि पतनसे बचा लेता है। गायत्रीके प्रथम पादको जाननेवाला यति यदि धनपूर्ण तीनों लोकोंका दान ले, तो भी उसे कोई दोष नहीं लगता। जो द्वितीय पादको जानता है, वह जितनेमें त्रयी विद्यारूप सूर्य तपता है, उन सब लोकोंको प्राप्त कर सकता है। तीसरे पादको जाननेवाला सम्पूर्ण प्राणिवर्गको प्राप्त कर सकता है। सारांश यह है कि यदि पादत्रयके समान भी कोई दाता- प्रतिग्रहीता हो, तब भी गायत्रीविद्को प्रतिग्रहदोष नहीं लगता, फिर चतुर्थ पादके वेदिताके लिये तो ऐसी कोई वस्तु ही नहीं है, जो उसके ज्ञानका फल कहा जा सके। वस्तुतः त्रिप्राद-विज्ञानका भी प्रतिग्रहसे अधिक ही फल होता है, क्योंकि इतना प्रतिग्रह कौन ले सकता है? गायत्रीके उपस्थान-मन्त्रमें कहा गया है कि हे गायत्रि! आप त्रैलोक्यरूप पादसे एकपदी हो, त्रयी विद्यारूप पादसे द्विपदी हो, प्राणादि तृतीय पादसे त्रिपदी हो, चतुर्थ तुरीय पादसे चतुष्पदी हो। इस तरह चार पादोंसे युक्त मन्त्रोंद्वारा आपकी उपासना होती है। इसके बाद अपने निरुपाधिक आत्मास्वरूपसे अपद हो, 'नेति-नेति' इत्यादि निषेधोंसे वह सर्वनिषेधोंका अवधिरूपसे बोधित सम्पूर्ण व्यवहारोंका अगोचर है, अतः प्रत्यक्ष परोरजा आपके

तुरीय पादको हम प्रणाम करते हैं। आपकी प्राप्तिमें विघ्नकारी पापी, आपकी प्राप्तिमें विघ्नसम्पादन- लक्षण अपने अभीष्टको प्राप्त न करें, इस अभिप्रायसे अथवा जिससे द्वेष हो, उसके प्रति भी अमुक व्यक्ति अमुक अभिप्रेत फलको प्राप्त न करें, मैं अमुक फल पाऊँ, ऐसी भावनासे वह मिल जाता है। गायत्रीका अग्नि ही मुख है। अग्निमुखको न जाननेसे ही एक गायत्रीविद् हाथी बनकर जनकका वाहन बना था। जैसे अग्निमें अधिक-से-अधिक ईंधन समाप्त हो जाता है, वैसे ही अग्निमुख गायत्रीके ज्ञानसे सब पाप समाप्त हो जाते हैं। 'छान्दोग्योपनिषद्' में कहा गया है कि यह सम्पूर्ण चराचर भूत-प्रपंच गायत्री ही है। किस तरह सब कुछ गायत्री है, इसपर कहा गया है कि वाक् ही गायत्री है, वाक् ही समस्त भूतोंका गान एवं रक्षण करती है। 'मा भैषीः' इत्यादि वचनोंसे वाक्-द्वारा ही भयकी निवृत्ति होती है। गायत्रीको पृथ्वीरूप [L

शक्तिका स्वरूप ५२७

शक्तिका स्वरूप

श्रीभगवतीने देवीभागवतका संक्षेपमें श्रीविष्णुके लिये उपदेश किया है— 'सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्।' अर्थात् यह सब कुछ सनातन मैं ही हूँ। मेरेसे भिन्न कोई तत्त्व नहीं है। वेदान्तवेद्य परतत्त्व ही शिव तथा स्कन्दपुराणके शिवतत्त्व, रामायणके राम, श्रीविष्णुपुराणके विष्णु एवं वही सूर्य, शक्ति आदिरूपसे प्रकट होता है। श्रीहिमालयपर कृपा करके करुणामयी, कल्याणमयी अम्बाने ही अपने दिव्यस्वरूपका उपदेश दिया है— 'अहमेवास पूर्वं तु नान्यत्किञ्चिन्नगाधिप।' नगाधिप! मैं ही एक सब कुछ हूँ। मेरा अनन्त अखण्ड ब्राह्मारूप अप्रतर्क्य एवं अनिर्देश्य है, अनौपम्य और अनामय है। उसी सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाश परब्रह्मकी एक स्वतःसिद्धा शक्ति है, वही माया नामसे प्रख्यात है। जैसे मृत्तिकामें घटोत्पादिनी शक्ति और वह्निमें दाहिकाशक्ति होती है, वैसे ही ब्रह्ममें अनन्तकोटिब्रह्माण्डोत्पादिनी शक्ति है। वही निखिल विश्वकी जननी है। इस पक्षमें जगत् भ्रान्तिमय या अध्यस्त कैसे है, प्रपंचकी स्वरूपसत्ता न होनेसे आरोप्यानुभवसे आदिम संस्कार नहीं बन सकेगा, फिर भ्रान्ति या अध्यास कैसे सम्भव होगा—इत्यादि शंकाओंको स्थान ही नहीं रहता; क्योंकि शक्तिद्वारा ब्रह्मकी ही प्रपंचरूपसे अभिव्यक्ति हो जायगी, फिर अद्वैत सिद्धान्तमें कोई विरोध नहीं होगा। कारण कि पारमार्थिक सद्रूप परमात्मा ही अद्वितीय है। प्रपंच और उसकी जननी शक्ति तो सत्, असत् और सदसद्, इन तीनोंसे विलक्षण है। अतएव अनिर्वचनीया है। जैसे वह्निशक्ति वह्निसे विलक्षण है, वैसे ही सत्‌की शक्ति सत्‌से विलक्षण है। अतएव अनिर्वचनीय है— न सती सा नासती सा नोभयात्मविरोधतः। एतद्विलक्षणा काचिद् वस्तुसत्तास्ति सर्वदा॥ ब्रह्मज्ञानद्वारा इसका बाध हो जाता है। इसलिये ब्रह्मकी तरह वह नित्य सत् नहीं है, परंतु उसीके कार्यभूत प्रपंचसे समस्त व्यवहार बनता है, इसलिये ब्रह्मकी तरह वह असत् भी नहीं और परस्पर विरोध होनेके कारण दोनोंकी स्थिति असम्भव है, अतः सदसद् उभय स्वरूप भी नहीं है। अनिर्वचनीय वस्तुरूप मायाशक्ति मोक्षपर्यन्त विद्यमान रहती है। जैसे पावकमें उष्णता, सूर्यमें किरण और चन्द्रमामें चन्द्रिका है, वैसे ही ब्रह्मात्मिका चिच्छक्तिरूपा भगवतीमें सहजसिद्धा मायाशक्ति है। सुषुप्तिमें जैसे समस्त जीवोंके व्यवहार विलीन रहते हैं, वैसे ही प्रलयकालमें समस्त जीव और उनके कर्म मायामें विलीन रहते हैं। पृथिव्यादि समस्त प्रपंच अभेदभावसे उसी मायामें विलीन रहता है। उसी शक्तिके अनिर्वचनीय सम्बन्धसे निर्गुण-निर्लिप्त चिच्छक्ति जगत्‌का बीज अर्थात् कारणरूप भी हो जाती है। उस परमतत्त्वके आश्रित रहनेवाली मायाशक्ति उसे आवृत्त करती है, इसलिये ब्रह्मशक्ति सदोष समझी जाती है। मायाशक्तिके विद्या और अविद्या दो भेद हैं। उनमें विद्या विशुद्धा सत्त्वात्मिका होनेसे स्वाश्रयको व्यामोहित नहीं करती। अतः वह निर्दोष है। तमसे अभिभूत सत्त्वयुक्त अविद्या (मलिन सत्त्वप्रधाना प्रकृति) स्वाश्रयकी व्यामोहकारिणी है, इसीलिये ब्रह्म सदोष है। चैतन्यके सम्बन्धसे तद्गत (विशुद्ध सत्त्वगुणप्रधाना मायागत) चिदाभास ही चेतनप्रधान होनेके कारण निमित्तकर्ता है और उसी शक्तिका (तमःप्रधाना प्रकृतिका) प्रपंचरूपमें परिणाम होता है, अतः वही समवायकारण (उपादानकारण) भी है। कुछ लोग उस मायाशक्तिको ही तप कहते हैं। परमेश्वर उसीसे विश्वका निर्माण करते हैं— 'सा तपस्तप्त्वाेदं सर्वं समसृजत।' और कोई शाखी (शाखावाले) उसे ही तम कहते हैं। 'तम आसीत् तमसा गूढमग्रे।'

तमोरूप अज्ञानसे ही आवृत्त होकर परम-तत्त्व प्रपंचरूपमें प्रतीत होता है। उसे ही कोई ज्ञान, माया, प्रधान, प्रकृति एवं अजाशक्ति भी कहते हैं। उसीको कोई विमर्श, कोई अविद्या भी कहा करते हैं। केचित्तां तम इत्याहुस्तमः केचिज्जडं परे। ज्ञानं मायां प्रधानञ्च प्रकृतिं शक्तिमप्यजाम्॥ विमर्श इति तां प्राहुः शैवशास्त्रविशारदाः। अविद्यामितरे प्राहुर्वेदतत्त्वार्थचिन्तकाः ॥ ब्रह्म निर्विकार साक्षी दृक्से माया दृश्य है, अतः जड़ है। अधिष्ठानज्ञानसे उसका नाश हो जाता है, अतः असती है। द्वैतजालका द्रष्टा चैतन्य दृश्य नहीं है। यदि उसमें भी दृश्यता हो तो वह भी जड़ ही हो जायगा, अतः स्वप्रकाश चैतन्य दूसरेसे प्रकाशित नहीं होता। तस्याजडत्वं दृश्यत्वाज्ज्ञाननाशात्ततोऽसती। चैतन्यस्य न दृश्यत्वं दृश्यत्वे जडमेव तत्॥ वह चैतन्य जैसे जड़से नहीं प्रकाशित होता, वैसे ही दूसरे चैतन्यसे भी उसका प्रकाश नहीं होता। कारण ऐसा माननेमें अनवस्था होना अनिवार्य है। साथ ही वह अपनेसे भी अपना प्रकाश नहीं करता; क्योंकि ऐसी स्थितिमें उसमें कर्तृत्व और उसीमें कर्मत्व होगा, जो संगत नहीं है। पर समवेत- क्रियाफलशाली कर्म हुआ करता है। अपने-आप कर्ता और अपने-आप कर्म यह पक्ष अत्यन्त विरुद्ध है, अतः दीपकके समान यह स्वयं प्रकाशमान होकर दूसरोंका प्रकाशक है, इसलिये स्वयंप्रकाश कहलाता है— स्वप्रकाशञ्च चैतन्यं न परेण प्रकाशितम्। अनवस्थादोषसत्त्वान्न स्वेनापि प्रकाशितम्॥ कर्मकर्तृविरोधः स्यात् तस्मात्तद्दीपवत्स्वयम्। प्रकाशमानमन्येषां भासकं विद्धि पर्वत ॥ जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिमें दृश्यका व्यभिचार होता है अर्थात् जागरका दृश्य स्वप्नमें नहीं और स्वप्नका जागरमें नहीं और इन दोनोंका सुषुप्तिमें नहीं, सुषुप्तिका बीजात्मक अज्ञान जागर-स्वप्नमें नहीं। परंतु इन तीनों अवस्थाओंका अखण्ड बोध या संविद् सर्वभासक रूपमें नित्य अव्यभिचारी है। संविद् या बोधका व्यभिचार या अभाव कभी भी अनुभवमें न आता है, न आ सकता है। यदि बोधके भी अभावका अनुभव माना जाय तो वहाँ भी वह अभाव जिस साक्षीसे अनुभूत होता है, वह बोधरूप साक्षी जब विद्यमान ही है, तब बोध या संविद्का अभाव कैसे कहा जा सकता है ? बिना बोध या संविद्के भाव-अभाव दोनों ही नहीं सिद्ध हो सकते। अतः संविद्का अभाव सिद्ध करनेके लिये भी संविद्रूप साक्षीकी आवश्यकता रहती ही है। इसीलिये सर्वभासक स्वप्रकाश होनेसे बोध चैतन्यरूप है, अबाध्य अव्यभिचारी होनेसे सत्य एवं नित्य है। 'मैं कभी न होऊँ ऐसा नहीं, किंतु सदा रहूँ ही।' इस तरह प्राणियोंके निरतिशय निरुपाधिक पर- प्रेमका आस्पद होनेसे वह परमानन्दरूप है। साथ ही जब उससे भिन्न सारा प्रपंच मिथ्या ही है, तब कोई भी उसमें तात्त्विक सम्बन्ध नहीं बन सकता। अतः संवित्की असंगता भी सिद्ध ही है। जब स्वप्रकाश संविद्रूपा भगवतीसे भिन्न माया और उसका कार्य सभी सत्, असत् और सदसत् विलक्षण अनिर्वचनीय मिथ्या है, तब फिर परिच्छेदक (भेदक या मापक) देश-काल-वस्तु न होनेसे ही अपरिच्छिन्नता (त्रिविधपरिच्छेदशून्यता) भी सहजमें ही सिद्ध हो जाती है। यह जो सर्वदृश्यभासक बोध सिद्ध किया गया है, यह आत्माका धर्म नहीं है, किंतु आत्मस्वरूप ही है। धर्म माननेपर आत्मा उसका दृश्य होनेसे आत्मामें जड़ता आ जायगी। 'तच्च ज्ञानं नात्मधर्मे धर्मत्वे जडतात्मनः।' यदि ज्ञान स्वप्रकाश आत्माका धर्म है तो उसकी आवश्यकता ही क्या रहती है? ज्ञानको स्वप्रकाश और आत्माको जड़ मानना भी ठीक नहीं, कारण कि स्वप्रकाश ज्ञान जड़ आत्माका ही शेष या अंग नहीं हो सकता है। लोकमें जड़ ही चेतनका शेष होता है, यही प्रसिद्ध है। जैसे बोध या ज्ञान जड़रूप आत्माका धर्म नहीं बन सकता, वैसे ही वह

शक्तिका स्वरूप ५२९ चिद्बोधरूप आत्माका भी धर्म नहीं हो सकता। कारण चित्का चित्से भेद ही नहीं हो सकता, फिर भेद बिना चित्, चित्का धर्मधर्मिभाव कैसे बन सकेगा? इसलिये आत्मा सद्रूप, ज्ञानरूप एवं सुखस्वरूप है। यह अवश्य समझनेकी बात है कि जो घटादिविषयक ज्ञान और अभीष्ट विषयजन्य सुख नामसे प्रसिद्ध है, वह अनित्य और विनाशी अन्तःकरणका वृत्तिरूप (परिणाम) है। उसी ज्ञानाभास या सुखाभासमें अविवेकियोंको ज्ञान या सुखका भ्रम होता है। परंतु इन विनाशी वृत्तिरूप ज्ञान और सुखोंका प्रकाशक स्वप्रकाश अखण्ड बोध या ज्ञान ही असली ज्ञान और सुख है। ग्यान अखंड एक सीताबर। सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥ (रा०च०मा० ७।७८।४; १।११७।६) 'चिद्धर्मत्वं चितो नास्ति चितश्चिन्नैव भिद्यते।' वह बोध ही अत्यन्त अबाध्य होनेसे पारमार्थिक सत्य है और वही सब कुछ है। अतः पूर्ण और असंग एवं द्वैतजालसे विवर्जित है। वही काम, कर्मादिके सहित अपनी मायासे ही पूर्वसंस्कारके अनुसार कालकर्मके विपाकसे सृष्टिकी इच्छावाला हो जाता है। जैसे कोई प्राणी पूर्व-संस्कारसे अबुद्धिपूर्वक ही नींदसे उठ बैठता है, वैसे ही आत्माकी यह सृष्टि काल-कर्मसंस्कारसे अबुद्धिपूर्वक ही होती है। यही जगत् बीजभूत प्रकृतिसे विशिष्ट मेरा स्वरूप अव्याकृत या मायाशबल कहलाता है, वही समस्त कारणोंका कारण है और समस्त तत्त्वोंका आदिभूत तत्त्व है, वही मायाशक्तियुक्त सच्चिदानन्द कहलाता है, वही समस्त कर्मोंका घनीभूतस्वरूप ज्ञानों और इच्छाओंका आश्रय है, वही आदितत्त्व ह्रींकार, ओंकार आदिका वाच्य तत्त्व है। सर्वकर्मघनीभूतं इच्छाज्ञानक्रियाश्रयम्। ह्रींकारमन्त्रवाच्यं तदादितत्त्वं तदुच्यते॥ उसी मायाशक्तिविशिष्ट अव्याकृतसे शब्द- तन्मात्रस्वरूप सूक्ष्माकाश उत्पन्न होता है। उससे स्पर्शात्मक वायु और वायुसे रूपतन्मात्रा-स्वरूप तेज और उससे रसात्मक जल, जलसे गन्धात्मिका पृथ्वी उत्पन्न होती है। इन्हीं अपंचीकृत सूक्ष्म पंचभूतोंके सात्त्विक अंशसे अन्तःकरण और पंचज्ञानेन्द्रियाँ, राजस अंशसे प्राण और पंचज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। वह सब मिलकर व्यापक लिंगशरीर ही आत्माका सूक्ष्म देह कहा जाता है। पूर्वोक्त अव्याकृत ही आत्माका कारणदेह है। भूतोंके तामस अंशसे पंचीकरण मार्गसे स्थूल प्रपंच और विराट्की उत्पत्ति होती है। भूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशसे उत्पन्न अन्तःकरणके वृत्तिभेदसे चार रूप बन जाते हैं। संकल्प-विकल्प करते समय मन, निश्चय करते हुए बुद्धि, स्मरण करते समय चित्त और अहंकार- कालमें यह अहंकार कहा जाता है। विशुद्धसत्त्वप्रधाना प्रकृति माया और मलिनसत्त्वप्रधाना अविद्या कहलाती है। स्वाश्रयको न मोहित करनेवाली विद्यामें प्रतिबिम्ब-समन्वित अधिष्ठान ईश्वर कहा जाता है, वह स्वाश्रयके ज्ञानसे युक्त सर्वज्ञ सर्वानुग्राहक है। अविद्यामें प्रतिबिम्बसमन्वित अधिष्ठान अल्पज्ञ एवं दुःखादिका आश्रयभूत जीव है। दोनों ही स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीन देहोंसे युक्त हैं। व्यष्टि- स्थूल-सूक्ष्म-कारण जीवके हैं और समष्टि तीनों देह ईश्वरके हैं। व्यष्टिमें कारण-देहाभिमानी प्राज्ञ, सूक्ष्म-शरीराभिमानी तैजस और स्थूल-शरीराभिमानी विश्व कहलाता है। समष्टि-कारण देहका अभिमानी अव्याकृत, सूक्ष्मदेहका अभिमानी हिरण्यगर्भ एवं स्थूल-प्रपंचका अभिमानी विराट् कहलाता है। ईश्वर ही नाना भोगोंके आश्रयभूत विश्वका निर्माण करते हैं। भगवतीने कहा— मेरी मायाशक्तिसे ही समस्त चराचर विश्व बनता है। वह माया भी मुझसे पृथक् नहीं है। व्यवहारदृष्टिसे जो माया और अविद्या कहलाती है, वह परमार्थतः मुझसे पृथक् कुछ भी नहीं है— व्यवहारदृशा येयं विद्या मायेति विश्रुता। तत्त्वदृष्ट्या तु नास्त्येव तत्त्वमेवास्ति केवलम् ॥

५३० भक्तिसुधा भगवती ही निखिल प्रपंचकी निर्मात्री स्वप्रकाशरूपा भगवती ही निखिल प्रपंचका निर्माण करके उसमें वही प्रवेश करती है। जिस तरह एक ही आकाश घटाकाश और महाकाशके रूपमें प्रकट होता है, उसी तरह स्वप्रकाश चैतन्य ही विद्याशक्तिविशिष्ट ईश्वर, अविद्या या अन्तःकरण-विशिष्ट होकर जीवरूपमें व्यक्त होता है। उन्हीं अनेक उपाधिभेदोंसे ही जीवोंमें नानात्व और गमागम सब कुछ उत्पन्न होता है। जैसे सूर्यभगवान् उच्चावच अनेक प्रकारकी वस्तुओंका प्रकाश करते हैं, परंतु उनके गुणों या दोषोंसे वे युक्त नहीं होते, वैसे ही अखण्डबोधरूप सर्वान्तरात्मा सभी दृश्यका प्रकाशन करते हैं, परंतु उनके गुणों और दोषोंमें वे लिप्त नहीं होते। जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्ब या रज्जुमें सर्प, वैसे ही शुद्धप्रकाशस्वरूप परमतत्त्वमें समस्त प्रकाश्य परिकल्पित है। अतएव ईश्वर, सूत्रात्मा, विराट्, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, गौरी, ब्राह्मी, वैष्णवी, सूर्य, तारक, तारकेश, स्त्री, पुमान्, नपुंसक एवं शुभ, अशुभ समस्त प्रपंच ही परात्परपूर्णतम परम तत्त्वका ही स्वरूप है। जो भी कुछ देखा या सुना जाता है, उसके भीतर और बाहर व्याप्त होकर एक वही निर्विकार पूर्ण चिति ही विद्यमान है। सबको सत्तास्फूर्ति सुख प्रदान करनेवाली चितिसे विमुक्त होकर जो कुछ भी है वह शून्य है, वन्ध्यापुत्रके समान है। जैसे सर्प, धारा, माला आदि भेदोंमें एक रज्जु ही अनेकधा भासित होती है, वैसे ही एक चिद्रूप आत्मा ही अनेक रूपमें भासित होता है। जैसे अधिष्ठानके बिना कल्पित पदार्थकी सत्ता और स्फूर्ति नहीं टिक सकती, वैसे ही सच्चित्-स्वरूप परमतत्त्वके बिना कल्पित विश्वमें सत्ता और स्फूर्ति नहीं रहती। यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु दृश्यते श्रूयतेऽपि वा। अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्याहं सर्वदा स्थिता॥ न तदस्ति मया त्यक्तं वस्तु किञ्चिच्चराचरम्। यद्यस्ति चेत्तच्छून्यं वन्ध्यापुत्रोपमं हि तत्॥ माँके श्रीचरणोंमें अनन्तकोटिब्रह्माण्डजननी पराम्बा, रामचन्द्र राघवेन्द्रकी हृदयेश्वरीके मंगलमय चरणारविन्दको अपनी अविरल अश्रुधाराओंसे सिंचित करता हुआ एक भक्त कहता है—'हे अम्ब! कल्याणमयी भगवति! हे देवि! यह आपका अबोध, किंकर्तव्यविमूढ शिशु आपके चरणारविन्दकी शरण है। हे माँ! अब यह ताप सहनकी सीमाके बाहर हो गया है। हे माँ! मैं जानता हूँ कि मैं तुम्हारा योग्य पुत्र नहीं हूँ। मैं तुम्हारे चरणारविन्द-स्पर्शका भी अधिकारी नहीं हूँ। माँ! फिर भी अधम-से-अधम, पतित-से-पतित पुत्रकी भी अम्बा उपेक्षा नहीं करती'— 'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥' 'माँ! मुझे तो सबने उपेक्षित कर दिया है। ठीक ही है, तुम्हारे अभिशापसे सन्तप्तकी रक्षा सिवा तुम्हारे और कौन कर सकता है? माँ! तुम तो प्रभुसे भी यही कहती हो कि 'न कश्चिन्नापराध्यति।' ऐसा व्यक्ति कौन है, जिससे अपराध नहीं बनता? यह अबोध शिशु है; इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। इसे पुचकारकर अंकमें लेना चाहिये। माँ! तुम्हारे चरणोंके बिना सब जगत् सन्तापजनक हो रहा है। संसारमें कोई इस अधमको देखने-पूछनेवाला नहीं है। माँ! संसारकी विडम्बनासे दग्ध हो रहा हूँ। अनेक बार अपमानित और तिरस्कृत हुआ, फिर भी तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर सकता। अपने ही अपराधोंके कारण स्थिर प्रबोध, स्थिर वैराग्य नहीं होता। हे पुत्रवत्सले! तुम्हारे बिना आशाके अनुकूल ही नहीं, आशासे भी अधिक कारुणिक हृदयसे अपराधी पुत्रको दूसरा कौन पुचकार सकता है?'

'माँ ! जिनके लिये त्याग, बलिदान किया गया, जिनके लिये अगणित दुःख भोगे गये, जिनके हितार्थ कितने ही अनुष्ठान किये गये, जिनके लिये अगणित आँसू बहाये गये, वे सब मेरे रोने-धोनेको सुना- अनसुना, देखा-अनदेखा करके अपने-अपने काममें लग गये। किसको समय है, जो मुझ-जैसे पागलोंके प्रलाप सुने ? माँ ! उस दिन शिप्राके तटपर तुम्हारी स्मृति आयी थी और तुम्हारे चरणोंका स्मरण किया था। तुम्हारे चरणोंमें कुछ अश्रु चढ़ाये गये थे, परंतु पुनः वही विस्मृति छा गयी। फलस्वरूप उपद्रव भी वे ही-के-वे ही वर्तमान हैं। माँ ! तुम्हीं सिद्धि- बुद्धिस्वरूपा गणपतिप्रिया हो। माँ ! तुम्हीं सरस्वतीस्वरूपा विधिप्रिया हो। माँ ! तुम्हीं अनन्तकोटिब्रह्माण्डकी ऐश्वर्याधिष्ठात्री विष्णुप्रिया महालक्ष्मी भी हो। हे अम्ब ! आप ही तो कामेश्वरअंकनिलया अनन्तब्रह्माण्ड- जननी श्रीषोडशी महात्रिपुरसुन्दरी हो। हे जगदम्ब !

५३२ भक्तिसुधा है। घृतकी आहुतिसे जैसे अग्निकी वृद्धि होती है, वैसे ही भोगसे कामकी वृद्धि ही होती है'— न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ (श्रीमद्भा० ९।१९।१४) 'पृथिवीभरमें जो भी व्रीहि, यव, हिरण्य, पशु एवं स्त्रियाँ हैं, वे सब मिलकर भी एक व्यक्तिको भी तृप्त करनेमें समर्थ नहीं हैं'— यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। सर्वं नैकस्य पर्याप्तमिति मत्वा शमं व्रजेत् ॥ 'संसारकी सभी संचित राशियाँ क्षीण हो जाती हैं, सभी समुन्नतियोंका अन्तमें पतन होता है, सभी संयोगोंका अन्तमें वियोग होता है, सभी जीवनोंका मरणमें ही पर्यवसान है'— सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः। संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।२०) 'कल्याणमयि माँ! सभी विचार आपकी कृपाके बिना निर्वीर्य रहते हैं। आपकी कृपासे ही सद्विचारकी निष्ठा होती है। सम्पूर्ण प्राणी आदिमें अव्यक्त हैं और अन्तमें भी अव्यक्त ही हो जाते हैं, मध्य-मध्यमें ही व्यक्त रहते हैं। संसारमें सहस्रों माता-पिता, सहस्रों पुत्र एवं सहस्रों स्त्रियाँ हुईं, परंतु किसीका सम्बन्ध किसीसे स्थिर न रहा। जन्म-जमान्तरोंमें कितने ही पुत्र तथा अभीष्ट सुन्दरियोंसे सम्बन्ध होता है, परंतु कौन कहाँ, कौन कहाँ? किसी भी सम्बन्धकी स्थिरता नहीं है। जैसे महोदधिमें इधर-उधरसे अनेकधा काष्ठ इकट्ठे होते हैं, किसी लहरके वेगसे पुनः पृथक्-पृथक् बह जाते हैं, वैसे ही कार्यपरतन्त्र प्राणी संयुक्त-वियुक्त होते ही रहते हैं। काल-कर्मके परतन्त्र हो प्राणी जन्म लेता, मरता और भटकता है, तदनुसार ही सुख-दुःख भी भोगता है। यौवन, सौन्दर्य, द्रव्यसंचय, जीवन एवं आरोग्य तथा प्रियसंवास सब अनित्य हैं। इनमें पण्डितोंको मोहित नहीं होना चाहिये'— अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः। आरोग्यं प्रियसंवासो गृध्येत् तत्र न पण्डितः ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।१४) 'सामूहिक दुःखके लिये एकको भी चिन्तित होनेकी आवश्यकता नहीं है। हाँ, बन सके तो अनुद्विग्न रहते हुए शक्तिभर उसके प्रतीकारकी चेष्टा करनी चाहिये'— न जानपदिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हति। अशोचन् प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।१५) 'दुःखका चिन्तन न करना ही उसका महौषध है। चिन्तन करनेसे दुःख मिटता नहीं, परंतु बढ़ता ही है'— भैषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत्। चिन्त्यमानं हि न व्येति भूयश्चापि प्रवर्धते ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।१२) 'अनिष्ट-सम्प्रयोग तथा इष्टविप्रयोगसे ही अल्पबुद्धि प्राणी मानस दुःखोंसे दग्ध रहते हैं। प्रज्ञासे मानस दुःखों और औषधोंसे शारीरिक दुःखोंका हनन करना उचित है। यही विज्ञानकी महिमा है कि प्राणी बालतुल्य न हो'— प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः। एतद् विज्ञानसामर्थं न बालैः समतामियात् ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।१३) 'पूर्वकृत कर्म सब सुखों-दुःखोंके मूल कारण हैं। इस तरह अपना आत्मा ही अपना बन्धु और आत्मा ही अपना रिपु है। शुभ कर्मसे सुख, अशुभसे दुःख होता है। बिना किये कुछ भी नहीं होता। ज्ञानविरुद्ध, विनाशकारण, मूलघाति कर्मोंमें समझदार लोगोंको रत नहीं होना चाहिये। विचार करनेपर यह सम्पूर्ण संसार ही अशाश्वत है, कदलीस्तम्भके समान ही निःसार है। श्मशानमें एक दिन सभीको समान रूपसे समाप्त हो जाना पड़ता है; चाहे धनवान्, रूपवान्, बुद्धिमान् हो, चाहे निर्धन, निर्बुद्धि हो। विभिन्न गृहोंके समान ही शरीर भी आत्माका एक

गृह ही है। जैसे कोई मृण्मयभाण्ड कुलालके चक्रपर ही नष्ट हो जाता है, तो कोई कुछ बनकर नष्ट होता है, कोई बनकर एवं उपयुक्त होकर नष्ट होता है, वैसे ही जीर्ण, अजीर्ण, शिशु, युवक सबको ही मृत्युके मुखमें जाना पड़ता है। जो केवल मधु देखता है, प्रताप नहीं देखता, वह लोभके वश भ्रष्ट होकर शोकको ही प्राप्त होता है'— मधु यः केवलं दृष्ट्वा प्रतापं नैव पश्यति। स भ्रष्टो मधुलोभेन शोचत्येवं यथा ह्यहम्॥ 'जैसे कोई प्राणी क्रीड़ाके लिये जलमें प्रवेश करके कभी डुबकी लेता है, कभी उतराता है, वैसे ही बुद्धिमान् संसारगहनमें उन्मज्जन-निमज्जन करता हुआ भी घबराता नहीं, अपितु अबुद्धि प्राणी इस डूबने-उतरानेमें व्याकुल हो जाता है। हे माँ! जन्मसे लेकर ही मांसशोणितयुक्त, अमेध्य स्थानमें ऊर्ध्वपाद, अवाक्शिरा होकर रहना पड़ा है, योनिद्वारके भी नाना कष्ट सहने पड़े हैं, एक उपद्रव समाप्त भी नहीं हो पाया कि दूसरे उपद्रव सिरपर आ खड़े हुए हैं। जैसे आमिषके पीछे श्वान दौड़ते हैं, वैसे ही अधिकांश आधियाँ एवं व्याधियाँ मुझ-जैसे प्राणियोंके पीछे ही रहती हैं। इन्द्रियपाशोंसे बद्ध, विविध आसक्तियोंसे घिरा हुआ प्राणी विविध व्यसनोंका शिकार बनता है। उन्हीं व्यसनोंसे पीड़ित होता, उन्हींमें अतृप्त होकर फँसा रहता है। व्यामोहवश साधु-असाधु कर्मोंको करता हुआ अनिवार्य रूपसे प्राणी तत्फलका भागी होता है। यमदूतों और कालसे आकृष्ट होता हुआ विविध विपत्तियोंका भोजन बनता है। अहो! लोभसे वंचित होकर प्राणी कितने अपमानों, दुःखों और विडम्बनाओंमें फँसता है और अपने-आपको समझनेमें असमर्थ ही रहता है। दूसरोंको मूर्ख कहता हुआ भी अपनी मूर्खताकी ओर ध्यान नहीं देता। हे अपराजिते! हे अमिते! अनुपमचरिते माँ! क्या कभी भी प्राणी बिना तुम्हारी कृपासे इस व्यामोहसे, इस मायासे मुक्त हो सकता है? ठीक ही कहा है कि जिसपर आप कृपा करती हैं, वही दुस्तर देवमायाको पार कर सकता है, तभी श्वशृगालभक्ष्य शरीरसे ममाहंबुद्धि हट सकती है। पर इसके लिये निर्व्यलीक, निष्कपट, अकैतवरूपसे आपकी शरणागति अपेक्षित है'— येषां स एव भगवान् दययेदनन्तः सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्। ते दुस्तरामतितरन्ति च देवमायां नैषां ममाहमिति धीः श्वशृगालभक्ष्ये॥ 'माँ! कितना भीषण संसार है! आपने शास्त्रोंमें तो बतला रखा है कि कोई ब्राह्मण हिंस्र-व्याघ्रसंकुल गहन कान्तारमें पहुँच गया। सिंह, व्याघ्र, गज एवं भल्लूकोंके कर्कश घोर नादों एवं भीषण आकृतियोंसे घिर गया। उस भीषण स्थितिको देखकर साक्षात् यमको भी त्रास हो सकता है। ब्राह्मणका हृदय उद्विग्न हो गया, देहमें रोमांच हो गया। वह घोर गहन वनमें दशों दिशाओंमें शरण ढूँढ़ता हुआ भटकता है। भागनेका प्रयत्न करता है, पर भाग भी नहीं सकता। अकस्मात् अन्य भयंकर वनमें पहुँचकर देखता है कि एक भीषण स्त्रीने चारों तरफ जाल फैला रखा है। पाँच-पाँच फणोंवाले अगणित नाग और भीषण वृक्षोंसे भी वह वन घिरा है। उसी वनमें एक कूप था, जो विविध दृढ़ वल्लियोंसे ढँका हुआ था। ब्राह्मण उसी अन्धकूपमें गिर गया और तृणाच्छन्न वल्लियोंपर बृहत् पनस (कटहल) फलके तुल्य लटक गया। सिर नीचेको था, पैर ऊपरको। नीचे कूपमें देखता है कि एक भीषण महानाग है। छः मुख, बारह पैरोंवाला तथा शुक्ल-कृष्ण वर्णका एक महागज कूपके बाहर था। वहाँ वल्लियाँ भी खूब फैली हैं। नानारूपधर घोर मधुकरोंने ऊपर मधुके छत्तेको घेर रखा है, उसमेंसे ही कुछ-कुछ मधु कभी-कभी टपकता है। बालप्राय मूढ़ प्राणी उस मधुसे आकृष्ट होकर उसी मधुधाराको वल्लियोंमें लटका हुआ पान करता है, फिर भी उसकी प्यास बुझती नहीं, नित्य अतृप्त होकर उसी वस्तुकी लालसामें परेशान रहता है। उसी लोभसे वह ब्राह्मण अपनी भीषण दशाको भूल जाता है और उस दुर्दशापूर्ण जीवनसे भी उसे वैराग्य नहीं

होता, उस हालतमें भी वह जीवित रहनेकी इच्छा करता है। वहीं श्वेत-कृष्ण मूषक उन वल्लियोंको काट रहे हैं। ऊपर भीषण विषधर साँपोंसे घिरे घोर कान्तारमें महोग्रडाकिनीरूपा स्त्रीका जाल फैला है। कूपके ऊपर भीषण गज है। कूपके भीतर नाग है। वल्ली कटते ही कूप-पतनका भय भी सामने है। भीषण भ्रमरोंका भी डर है ही। फिर मधुलोभमें उस ब्राह्मणकी तरह अन्य प्राणी सब भूलकर जीवित रहना चाहता है।' कातर प्रार्थना 'माँ! यह महासंसार ही तो वह कान्तार है। क्या यह कम दुर्गम है ? माँ ! यह कितना भीषण है ! माँ ! तुम्हारे अभयहस्तका सहारा न हो, तुम्हारे अंक (गोद)-का सुख न हो, तुम्हारी नखमणिचन्द्रिकाकी शीतलता न हो, तो इससे किसकी मुक्ति हो सकती है ? माँ ! यह विविध व्याधियाँ ही तो भीषण व्याल हैं। माँ! ये तो व्यालोंसे भी कहीं अधिक भीषण हैं। एक ही व्याधि प्राणीको जर्जर कर देती है; दद्रु, खर्जु, ज्वर, अतिसार, कुष्ठ, प्लेग, विषूचिका, क्षय, शिरःशूल, उदरशूल आदि अगणित व्याधियाँ शरीरको जर्जर कर देती हैं। वह सौन्दर्य कहाँ चला जाता है? देहकी कान्ति समाप्त हो जाती है, बाल पक जाते हैं, मुख दन्तविहीन हो जाता है, रमणीयता समाप्त हो जाती है। अब भूषण, अलंकार, अंगरागादि बाह्य कृत्रिम साधनोंसे उसकी सुन्दरता बढ़ाना कितनी विडम्बना है! वृद्धावस्था तो वह भीषण नारी है। सुन्दरी-से- सुन्दरी स्त्री तथा सुन्दर-से-सुन्दर पुरुषको भी विरूप कर देना इसका खेल है। हे माँ! फिर भी स्त्री आदिके मायामय देहोंमें क्यों व्यामोह होता है ? रूप और वर्णका विनाश करना जराका प्रमुख कार्य है। माँ! कितना भीषण व्यामोह है ! प्राणी आधि-व्याधि, जरा, रोगादिसे पीड़ित, त्रस्त तथा विरूप हो रहे हैं। जिसपर मोहित होता है, वह भी आधि-व्याधिग्रस्त, मृत्युमुखपतनोन्मुख ही है। कोई किसीको विपत्तिसे बचा नहीं सकता। फिर भी व्यामोह, रति, रागका उपद्रव ? आश्चर्य है। आचार्यने क्या ही सुन्दर कहा है'— 'अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम्।' 'अहो! ये आधियाँ (मानसी पीड़ाएँ) तो व्याधियोंसे भी भीषण हैं, इनके तापसे तो माँ ! सिवा तुम्हारे अंकके कहीं भी निवृत्ति हो ही नहीं सकती। हे माँ! हे जननि ! हे कल्याणमयि ! हे सकरुणे ! क्या तू अपनी विपन्न सन्तानोंकी उपेक्षा कर सकती है? नहीं, माँ! यह तो सब अपराध मादृश मूढ़ोंका ही है।' 'कान्त-कान्ताकी विरह-वेदना कितना भीषण ताप है। क्या इसका पारावार है? क्या इसीसे इन्दुमतीके विरहमें रघुका करुण अवसान नहीं हो गया? क्या पुरूरवाका उन्माद और पागलपन इसी विरहव्यथाका, प्रिय वियोगका ही परिणाम नहीं था ? क्या नरनाट्यमें प्रभु रामने भी माँ ! आपकी विरहवेदनाका लोहा नहीं माना ? माँ ! प्रेममतवाली गोपांगनाओं, प्रभु कृष्ण तथा रासेश्वरी राधा-रानीने भी विरहव्यथाका कितना भीषण अनुभव किया था। माँ ! वास्तविक प्रेम और वासनाका भेद सहसा किसकी समझमें आ सकता है? फिर भी आखिर यह मानसिक व्यथा, आन्तरिक आधि क्या एक ही प्राणीके जीवनका अन्त नहीं कर सकती ? इन विषयोंमें क्या बिना आपकी कृपाके कोई विवेक कारगर होता है ? माँ ! यह शरीर ही तो वह अन्धकूप है, उसीमें तो कालरूपी सर्प भी रहता है, जो प्राणियोंका अन्त करता है। शरीरमें जीवनकी जो आशा है, वही तो वल्ली है। शरीररूप कूपके ऊपर जो छः मुँह, बारह पैरोंका भीषण गज है, वह यही संवत्सरात्मा काल है। छः ऋतुएँ ही उसके मुख हैं, बारह मास ही उसके पैर हैं, शुक्ल- कृष्ण पक्ष ही उसके श्वेत-कृष्ण वर्ण हैं। दिन-रात ही तो इस जीविताशा आयुरूपी वल्लीको प्रतिक्षण काटनेवाले मूषक हैं। माँ ! विविध काम ही तो भीषण भ्रमर हैं। विविध कामरस ही वह मधुधाराएँ हैं, जिनमें प्राणी मोहित हो रहा है। माँ! आपकी कृपासे ही इस संसारसिन्धुको पार किया जा सकता है, उसके

माँके श्रीचरणोंमें ५३५ बिना सभी प्रयत्न व्यर्थ होते हैं। माँ! कुछ भी हो, मेरी तो एकमात्र आशा आप ही हैं। माँ! यदि आपने जरा-सी भी उपेक्षा की तो फिर मैं कहींका न रहूँगा।' 'यह शरीर ही रथ है, बुद्धि ही सारथि है, इन्द्रियाँ ही घोड़े हैं। जो बुद्धिके द्वारा इन्द्रियोंको नियन्त्रित करके संसारचक्रमें भ्रमण करता है, वह मोहित नहीं होता। संसारमें राज्यका छिन जाना, पुत्रका नाश, प्रिय पत्नीका नष्ट हो जाना, सुहृदोंका नष्ट होना आदि भीषण दुःख होते हैं। इन दुःखोंका भेषज ज्ञान ही है। विक्रम, धन, मित्र, सुहृदोंसे इस सम्बन्धमें कोई लाभ नहीं होता। किंतु ज्ञान, दम, त्याग एवं अप्रमादसे युक्त होकर सर्वप्राणियोंको अभय देकर जो पद प्राप्त किया जा सकता है, वह सहस्रों ऋतुओं एवं उपवासोंसे भी प्राप्त नहीं होता।' 'पुत्र, मित्र, वित्त, कलत्र, किसीके भी विप्रयोगमें जो वेदना होती है, उसे कोई अनुभवी ही समझता है। तज्जन्य शोकसे प्रत्येक गात्र तथा रोम-रोममें दाह उत्पन्न होता है। प्रज्ञा भी अभिभूत हो जाती है।' 'पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥' (रा०च०मा० २।६४।७) 'प्राप्यते सुमहद्दुःखं विषाग्निप्रतिमं विभो।' विष एवं अग्निके तुल्य प्रियवियोगदुःख अतिभीषण होता है। इससे तप्त प्राणी मरणको ही श्रेष्ठ समझता है— तदिदं व्यसनं प्राप्तं मया भाग्यविपर्ययात्। तस्यान्तं नाधिगच्छामि ऋते प्राणविमोक्षणात् ॥ अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो भवेद्यदि। तदा दुःखैर्न लिप्येरन् नलरामयुधिष्ठिराः ॥ (पञ्चदशी ७।१५६) 'भाविका भाव होकर ही रहता है। यदि उसका भी प्रतिकार हो सकता तो फिर नल, राम एवं युधिष्ठिरको सन्तप्त न होना पड़ता। इसीलिये महापुरुषोंने कहा है'— यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा। इति चिन्ताविषघ्नोऽयं बोधो भ्रमनिवर्तकः॥ (पञ्चदशी ७।१६८) 'जो नहीं होनेवाला है, वह नहीं होगा। जो होनेवाला है, वह होकर ही रहेगा, यही विचार चिन्ताविषका औषध है। फिर जो हमारी वस्तु है, वह दूसरेको नहीं ही मिलेगी'— 'यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम्॥' 'फिर भी हे विश्वप्रसवित्री ! हे सकरुणे ! हे दीनरक्षामणे ! बिना तुम्हारी कृपादृष्टिकी वृष्टि हुए सब उपाय, सब साधन व्यर्थ हैं। माता-पिता बालकके रक्षक होते हैं, परंतु अम्ब ! तुम्हारी कृपाके बिना वे भी रक्षक नहीं हो सकते, उनके प्रयत्नशील रहनेपर भी बालककी मृत्यु हो ही जाती है। आर्त प्राणीको बचानेवाली औषध भी आर्तको नहीं बचा सकती; क्योंकि औषध-सेवन करते हुए भी प्राणीको मरना ही पड़ता है। समुद्रमें डूबते हुएको जलयान बचाता है, परंतु आपके कृपाकटाक्षके बिना हे माँ ! जहाज भी डूब ही जाता है। माँ ! तुम्हारी कृपासे ही सौभाग्यशालियोंको दिव्य वैराग्य प्राप्त होता है, जिसके कारण बड़े-बड़े सम्राट् विविध ऐश्वर्यों, भोगसामग्रियोंका अनायास ही त्याग कर देते हैं। नहुष, गय, ययाति आदि सुदुर्लभ भोगोंको छोड़कर अरण्यमें चले गये थे। माँ ! आपकी कृपाकोरसे ही ऋषियोंने निश्चय किया था कि 'न सुखाल्लभते सुखम्।' सुखसे सुख नहीं मिलता। विशेषकर ब्राह्मणका देह क्षुद्र कामके लिये नहीं, अपितु घोर तपस्या और कष्टसहनके लिये ही होता है'— ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते। कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च॥ (श्रीमद्भा० ११।१७।४२) 'जगदम्ब ! आपकी कृपासे ही वीतराग विश्ववन्द्य महानुभाव परमसुन्दरियों, प्राणवल्लभाओंके मोहजालसे मुक्त हो सके थे। माँ ! यद्यपि आपके चरणोंकी ओर चलना बड़ा कठिन मालूम पड़ता है, बड़ा ही ऊबड़- खाबड़, गहन वन, पर्वत-सा मार्ग आपकी प्राप्तिका मार्ग है और विषयों का मार्ग बड़ा ही रोचक एवं सुखकर प्रतीत होता है; परंतु जिसपर आपकी

कृपादृष्टि हुई और जो आपकी ओर चल पड़ा, उसके लिये कितना सुखद आपका मार्ग है, परंतु विषम मार्गमें चलनेसे मृगमरीचिकाके समान लोभ, मोह एवं दुःख, तापका अन्त होता ही नहीं। ये विषय मोहक, भीषण विषाग्नि ज्वालाके समान हैं। बिना आपके अंकमें पहुँचे प्राणीको शान्ति होती ही नहीं। हे माँ! परंतु इसमें दोष किसका ? प्राणीके अपने ही पापोंका तो यह फल है। फिर दूसरोंपर क्षोभ क्यों ? जबतक शुभकर्म हैं, आपकी अनुकूलता है, तबतक सभी साथी हैं, सुखसाधन हैं। वही माता, भ्राता, कान्ता, पति, जो बड़े ही अनुरागी और प्रेमवश प्राण देनेवाले होते हैं, वही कभी अपरक्त विरक्त प्रतीत होने लगते हैं। पर यह अपने ही भाग्यका दोष है, उनपर कुपित होना व्यर्थ ही तो है। माँ! अपार संसारसमुद्रसे पार करना, अपार शोकसागरसे प्राणीका उद्धार करना आपके लिये क्या कठिन है ? माँ! यह तो तुम्हारा खेल होगा। परंतु मादृश पशुओंका इससे परम कल्याण होगा। माँ! गजेन्द्रकी पुकार सुनकर, द्रौपदीका करुणक्रन्दन सुनकर आपने ही तो विष्णुरूपसे दौड़कर उनका उद्धार किया है। माँ! वस्तुस्थिति तो यह है कि वे लोग महासत्त्व और महापुरुष थे, उनके विवेक, विज्ञान एवं धैर्यकी मात्रा अधिक ही थी, साथ ही उनमें सहनशक्ति भी अधिक रही होगी और आपके चरणोंमें प्रीति भी सुतरां उनकी अधिक थी। अपनी शक्तिके बलसे वे आपको खींच सकते थे। किंतु माँ! मुझ दीनकी ओर दृष्टि देकर देखेंगी तो बहुत ही अन्तर प्रतीत होगा। माँ! अल्पसत्त्व, अल्पधैर्य, अल्पभक्ति, अल्पशक्ति मुझ दीनकी तो माँ! एकमात्र आप ही सहारा हैं।' 'माँ! कभी-कभी आपकी मायासे अविश्वास, अनास्था एवं अश्रद्धाका भी तो उपद्रव चलता ही रहता है। हे माँ! हे माहेश्वरी! हे दयार्णवरूपे! मेरा तो आपके दयाकणसे ही उद्धार हो सकता है, फिर मेरी बार ही यह अनुदारता क्यों ? माँ! दुर्भाग्य एवं अविवेक, विमोह एवं रागकी स्थितिमें प्रकृतिके कण-कण उद्वेजक होते हैं। कभी-कभी दूसरोंके अनुकूल भाव भी भ्रान्तिसे प्रतिकूल ही प्रतीत होते हैं। शत्रुको मित्र, मित्रको शत्रु, रक्तको विरक्त और विरक्तको रक्त समझनेकी भी भूल होती है। परिस्थितियाँ भी सबकी पृथक् होती हैं। किंतु माँ! जब हम अपना ही मन अपने वशमें नहीं कर पाते तो दूसरोंके मनपर हमारा अधिकार हो जाय, यह आशा कितनी भीषण दुराशा है।' सांसारिक मोह-ममताका परिणाम 'पुत्र, मित्र, कलत्र, बन्धु, बान्धव किसीका भी अपराग हमें खलता है और बेहद खलता है। जिन पुत्रों, मित्रोंके लिये, जिन पत्नियों, प्रेयसियोंके लिये न जाने क्या-क्या करना और कितना-कितना कष्ट भोगना पड़ा, उनका अपराग देखकर हृदय कितना विदीर्ण होता है। वे झूठे प्रेमके नाटक, वह झूठी आँसुओंकी झड़ी, वह रहस्यपूर्ण सस्नेह मधुर वचन- विन्यास, वह मधुर मुद्राएँ, स्वात्मसमर्पणकी वह मधुर चेष्टाएँ और मधुर मिलन कितने भीषण सिद्ध होते हैं। माँ! यह कैसी विडम्बना है ? अहो! महापुरुष भर्तृहरिकी कितनी सुन्दर अनुभूति है। हाय! जिसका मैं इष्टदेवताकी तरह निरन्तर चिन्तन करता रहता हूँ, वह मुझसे विरक्त है, मुझे नहीं चाहती, वह किसी औरसे प्रेम करती है और कैसी विधिकी विडम्बना है कि वह उसका प्रेमास्पद भी तो किसी औरसे ही प्रेम करता है, प्रेम करनेवालीको नहीं चाहता। किंतु जिसे वह चाहता है, वह उसकी प्रेयसी उससे प्रेम न कर मुझे चाहती है। अहो! उस मेरी प्रियाको धिक्कार है और उस पुरुष तथा उसकी प्रेयसी एवं इस मदन तथा मुझे भी धिक्कार है'— यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः। अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥ 'हे दयामयि! तृष्णाविषविषूचिका अभी कितना परेशान करेगी ? माँ! मेरे पास इसकी कोई भी सफल औषध नहीं दिखती। यह विलाप, यह करुणक्रन्दन,

माँके श्रीचरणोंमें ५३७ अरण्यरोदन न होना चाहिये। यह विलुण्ठन, यह बेचैनी और भीषण आतुरता, यह अनवस्थिति मेरे प्रयत्नसे मिटनेवाली नहीं है। मूर्खतावश जिसे हृदय खोलकर दिखाना चाहते हैं, उसे देखनेका समय ही नहीं और देखनेकी रुचि भी नहीं है। फिर वही शून्य, भीषण दावदग्ध, निर्जन, शून्य अरण्यका रोदन, दीर्घ श्वास- निःश्वास, आर्तनाद, माँ! तुम्हीं सुन लो। जो जन्म- जन्मान्तरोंतक सम्बन्ध न छोड़नेका संकल्प कर चुके हैं, वे इसी जन्ममें साथ छोड़ गये। उनकी दृष्टि भाव- भंगीमें परिवर्तन, क्रान्तिकारी परिवर्तन हो गये। कातर चित्त किसीकी सद्भावनाकी कल्पनासे कितना प्रफुल्लित होता है, यह भी तो एक भाग्यकी बात है। जीवनमें हमने जिससे राग किया, वही हमसे विरागी बना। जिसे पकड़ना चाहा, उसने ही भागना चाहा। जिसे नहीं चाहा, उसे भले ही पाया हो, परंतु जिसपर प्रेम किया, वह मुझे ठुकरानेमें सुखी हुआ। माँ! अब बस ले लो अपने चरणोंमें। यह अवहेलना, यह अपमान कबतक सहाओगी? श्वा, शूकर, गर्दभके समान विषयोंका कीड़ा बनकर, कांचन-कामिनीका किंकर बनकर अभी और कितना अपमान सहना पड़ेगा? मातः ! यह राग अतिविषम है, सर्पके समान डँसता है, भीषण असिके समान मर्मच्छेदन करता है, भाले-बर्छेके समान हृदयको विद्ध करता है, रज्जुके समान बन्धन करता है, पावकके समान दहन करता है, रात्रिके समान अन्ध बना देता है, पाषाण-आघातके तुल्य विवश कर देता है, प्रज्ञाका विनाश करता है और ऐसा कौन दुःख है, जो रागान्ध प्राणीको नहीं मिलता? हे जगज्जननी! क्या मेरे इस दुर्विपाकका अन्त ही नहीं होना है? यह संसार-कदर्थना आखिर कबतक भोगनी पड़ेगी? क्या इस दीर्घ, उष्ण निःश्वास-परम्पराकी कोई अवधि भी है? आखिर यह सब उपद्रव जिनके कारण हैं, वे भी तो ऊब गये। माँ! इस दृश्यविषूचिकाका एक-एक कण भी तो भीषण अनर्थकारी होता है। जड़भरतने अखण्ड भूमण्डलका राज्य छोड़ा, प्रिय पत्नी, पुत्र, पौत्र, स्निग्ध दुहिताओंको भी छोड़ा, उन्हें क्या मृगीसुतमें इतना स्नेह होना चाहिये था? माँ! क्या जड़भरत विवेक-विज्ञानकी बातें नहीं जानते थे? ओह! कितना भयंकर व्यामोह, कितनी विधिविडम्बना है? कितने ही स्नेही प्रज्ञाका पाठ पढ़ाते हैं और इस स्थितिपर तरस खाते हैं, पर क्या माँ! आप संसारसे भी अधिक निष्ठुर हो, जो संसार-जितनी भी दया नहीं दिखलाती हो? क्या आपकी दया संसार-जैसी निष्फल होती है?' 'हे माँ! त्वचा-मांस-रक्तादिसमूह ही तो स्त्री- पुरुषप्रपंच है। भूषण, विलेपन, अंगराग आदिसे जिन अंगोंका लालन किया गया था, उन्हींको श्मशानोंमें श्व-शृगालादि इतस्ततः कर्षण कर रहे हैं। मेरुशृंग- ततोल्लासि गंगाजलधाराके तुल्य जिन प्रमदास्तनोंपर मुक्ताहार सुशोभित होते थे, आज उन्हीं स्तनोंको ओदनके लघुपिण्डके समान श्वान आकर्षण कर रहे हैं। पूर्णेन्दुबिम्बवदना, पुष्पाभिराममधुरा सब कुछ मल, मांस, रक्त आदिका ही परिणाम तो है। उन्हीं रक्त, मांस, केश आदिकी श्मशानमें कितनी भीषण दुर्गति होती है। माँ! क्या आपका चरण-चिन्तन करनेपर भी अविवेक, अज्ञान, अशान्तिका रहना उचित है। माँ! अशरणशरण आपके चरण हैं। माँ! अकारणकरुणा आपका हृदय है। हे करुणा-वरुणालये! क्या यह सब कुछ मेरे लिये व्यर्थ ही है? क्या किसीका वर-शाप आपकी दयासे भी अधिक प्रभावशाली है? माँ! तत्त्वज्ञ लोग तो सदासे ही सावधान करते आये हैं कि सन्ध्याके समान क्षणमात्र रागवती ही स्त्रियाँ होती हैं। नदीके समान ही इनका आशय कुटिल होता है। भुजंगीके समान ही ये अविश्वास्य होती हैं। विद्युत्के समान इनकी चपलता प्रसिद्ध है। इनका वचन अमृतमय, किंतु हृदय तो क्षुरधाराके तुल्य तीक्ष्ण होता है'— सन्ध्यावत्क्षणरागिण्यो नदीवत् कुटिलाशयाः। भुजङ्गीवदविश्वाश्या विद्युद्वच्चपलाः स्त्रियः ॥ वचोऽमृतमयं यासां कामिनां रसवर्धनम्। हृदयं क्षुरधाराभं प्रियः को नाम योषिताम् ॥

५३८ भक्तिसुधा 'भ्रमर जैसे एक पुष्पसे दूसरे पुष्पपर जाता रहता है, यही स्थिति स्त्रीकी होती है'— 'भृङ्गीव पुष्पपुरुषं स्त्री वाञ्छति नवं नवम्।' 'अति चपल पारदका निग्रह किया जा सकता है, परंतु स्त्रीचित्तग्रहणकी कोई भी युक्ति नहीं है'— अत्यन्तचपलस्येह पारदस्य निबन्धने। कामं विज्ञायते युक्तिर्न स्त्रीचित्तस्य काचन॥ 'परंतु स्त्रीकी ही क्यों, कुत्सित स्त्रियों-जैसी ही कुत्सित पुरुषोंकी भी स्थिति तो वैसी ही है। माँ! वस्तुतस्तु, यदि आपकी कृपा होती है तो सभी अनुकूल होते हैं। आपकी कृपाके बिना प्रकृतिके परमाणु-परमाणु उद्वेजक ही सिद्ध होते हैं। माँ! अब तो एक बार अनुकम्पाभरी दृष्टिसे निहार दो। माँ! यह विषयों तथा कामादिकोंद्वारा और कितनी कदर्थना और कितनी विडम्बना सहाओगी?' 'माँ! मैंने इन तरलचित्तोंकी कितनी स्तुति नहीं की? इनका कितना अनुनय नहीं किया? जितनी स्तुतिमयी दीनतायुक्त पत्रिकाओंद्वारा इनके सामने रोना रोया, उतना यदि आपके सामने रोया होता तो ये पश्चात्तापके दिन न आते। जो सिर आपके भक्तों एवं आपके ही चरणारविन्दमें झुकाना चाहिये था, वह मृगमरीचिकामय प्राणियोंके सामने झुका। जो महत्त्व, जो गौरव आपके प्रति होना उचित था, वह साधारण प्राणियोंके प्रति किया गया। हाँ, वह भी यदि सर्वस्वरूपा आपको ही समझकर आपके ही प्रति होता तो कोई बात न थी। परंतु माँ! उन सब बातोंको मेरी कमजोरी समझा गया, मुझपर दया दिखायी गयी। बहुतोंने उपहास भी किया, बहुतोंने उपेक्षा की, बहुतोंने घृणा भी की, बहुतोंने उसे भी एक उपद्रव समझकर इस बलाको टालना ही उचित समझा। मेरे भावपूर्ण हृदयको ठुकराया गया। उन पत्रिकाओंका आदर करना, हृदयसे लगा लेना, भाव समझना तो दूरकी बात, उन्हें देखना, पढ़ना भी शुद्ध भार समझा गया। माँ! यह सब आपकी उपेक्षा और मेरे दुर्भाग्यका ही तो परिणाम था। माँ! जिनके लिये कितने ही अनुष्ठान, कितनी ही प्रार्थनाएँ की गयीं, जिनके लिये घोर वेदना सहन की गयी, लक्षों अश्रु- बिन्दुओंका समर्पण किया गया, उन्हींद्वारा उपेक्षा, पूर्ण उपेक्षा, हृदयको पूर्णरूपसे कुचल डालनेका प्रयत्न किया गया। जिनके लिये मानापमान सहा गया, मानहीन भोजन किया गया, उनसे ही क्या मिला? ठीक ही है। अनेक दुर्गम-विषम देशोंमें भटकना पड़ा, परंतु कुछ भी न मिला। जाति-कुलके अनुकूल उचित अभिमान छोड़कर भी निष्फल सेवा, निष्फल अनुनय-विनय करना पड़ा, दूसरोंके गृहोंमें मानवर्जित, आशङ्कायुक्त काकवत् भोजन करना पड़ा। यह सब तृष्णा एवं कामकी ही कदर्थना तो थी। हे पापकर्मनिरते तृष्णे! क्या अब भी तुझे सन्तोष नहीं है?'— भ्रान्तं देशमनेकदूर्गविषयं प्राप्तं न किञ्चित् फलं त्यक्त्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला। भुक्तं मानविवर्जितं परगृहे स्वाशङ्कया काकवत् तृष्णे जृम्भसि पापकर्मनिरते नाद्यापि सन्तुष्यसि॥ 'खलोंकी आराधनाओंमें तत्पर होकर उनके विविध उल्लापोंको भी सहा, हृदयके आँसुओंको रोककर शून्य मनसे उनके उपहासोंको भी सहा। माँ! आखिर जीवन भी तो क्षणभंगुर ही है। आदित्यके गमनागमनद्वारा प्रतिदिन ही तो जीवन क्षीण हो रहा है। वह कार्यभार गुरु व्यापारोंसे कालका बीतना भी कहाँ मालूम पड़ रहा है? माँ! जन्म, जरा, मरणादि भीषण विपत्तियोंको देखकर भी त्रास उत्पन्न नहीं होता। माँ! सचमुच मोहमयी प्रमादमदिरासे हम सभी उन्मत्त हो रहे हैं'— आदित्यस्य गतागतैरहरहः सङ्क्षीयते जीवनं व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते। दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत्॥ 'माँ! भर्तृहरिके कथनानुसार सचमुच आशा नामकी नदी अति भीषण है। विविध प्रकारके मनोरथ ही इसका जल है। विविध विषय तृष्णा-तरंगोंसे वह आकुल है। राग ही उसमें ग्राह है। विविध वितर्क

माँके श्रीचरणोंमें ५३९ ही विहंगम हैं। धैर्यद्रुमका विध्वंसन करनेवाली, मोहरूपी आवर्तोसे अतिसुदुस्तर तथा प्रोत्तुंग चिन्तारूपी तटवाली इस नदीको जो पार कर जाते हैं, वे ही विशुद्ध मनवाले योगीजन सुखी होते हैं'— आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङ्गाकुला रागग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी। मोहावर्तसुदुस्तरातिगहना प्रोत्तुङ्गचिन्तातटी तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगीश्वराः॥ 'यह विषय सबके सब अवश्य ही बहुत दिन बाद भी जायँगे ही। वियोगमें कोई भी भेद नहीं। फिर भी प्राणी क्यों नहीं इनको स्वेच्छासे छोड़ता? यदि ये विषय स्वेच्छासे जायँगे तो मनके अतुल परितापके हेतु बनेंगे। किंतु यदि समझदारीके साथ इन्हें छोड़ दिया जाय, तब तो वे अनन्त शान्ति-सुखके हेतु बनते हैं'— 'अंतहु तोहिं तजैंगे पामर! तू न तजै अबही ते॥' (वि०प० १९८।३) अवश्यं यातारश्चिरतरमुषित्वाऽपि विषयाः वियोगे को भेदस्त्यजति न जनो यत्स्वयममून। व्रजन्तः स्वातन्त्र्यादतुलपरितापाय मनसः स्वयं त्यक्ता ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति॥ मोहकी विचित्र महिमा 'परंतु फिर भी मोह-महिमा विचित्र है। बेचारा पतंग तो दहनके भीषण स्वरूपको बिना जाने उसमें पड़कर मरता है, बेचारा मीन भी बिना समझे वंशीयुक्त मांस खा लेता है। परंतु हमलोग तो जानते हुए इन विपज्जालजटिल कामोंको नहीं छोड़ पाते'— अजानन्माहात्म्यं पततु शलभस्तीव्रदहने स मीनोऽप्यज्ञानाद्बडिशयुतमश्नातु पिशितम्। विजानन्तोऽप्येतद्वयमिह विपज्जालजटिलान् न मुञ्चामः कामानहह गहनो मोहमहिमा॥ 'सचमुच जो विवेकी लोग विविध भोगों, कांचन, धनादिकोंको अतिनिःस्पृहताके साथ छोड़ देते हैं, वे बड़ा ही दुष्कर कार्य करते हैं। हमलोगोंको तो कोई विशिष्ट भोग, धनादि न पहले मिले, न अब ही प्राप्त है और न आगे ही मिलनेका दृढ़ विश्वास है। फिर भी केवल वांछामात्र परिग्रह भी हमलोगोंके छोड़े नहीं छूटते'— ब्रह्मज्ञानविवेकिनोऽमलधियः कुर्वन्त्यहो दुष्करं यन्मुञ्चन्त्युपभोगवन्त्यपि धनान्येकान्ततो निःस्पृहाः। न प्राप्तानि पुरा न सम्प्रति न च प्राप्तौ दृढ़ः प्रत्ययः वाञ्छामात्रपरिग्रहाण्यपि परं त्यक्तुं न शक्ता वयम्॥ 'फिर भी वस्तुएँ कभी स्थिर नहीं हैं। तभी तो एक भग्नशेष राजधानी देखकर कोई सहृदय व्यक्ति कहता है कि कभी यहीं एक सम्राट् था। उसके पार्श्वमें ही सामन्तचक्र था। उसके समीप कितनी सुन्दर राजपरिषद् थी और चन्द्रबिम्बानना दिव्यस्त्रियाँ, उनके विविध विलास-वैभव थे। वे उद्रिक्त राजपुत्र- समूह थे। वे स्तुति-पाठक, बन्दी और वे विचित्र कथाएँ थीं। परंतु सब कुछ जिस कालकी महिमासे आज केवल स्मृतिशेष रह गये, उस कालको नमस्कार है'— भ्रातः कष्टमहो महान् स नृपतिः सामन्तचक्रञ्च तत् पार्श्वे तस्य च सापि राजपरिषत् ताश्चन्द्रबिम्बाननाः। उद्रिक्तः स च राजपुत्रनिवहस्ते बन्दिनस्ताः कथाः सर्वं यस्य वशादगात्स्मृतिपथं कालाय तस्मै नमः॥ 'माँ! आपकी मंगलमयी कृपा हो, तब तो सहस्रों महापुरुषोंके वचन हैं, जिनसे अविवेकान्ध प्राणियोंकी भी आँखें खुल सकती हैं। हे चित्त! इस मोहान्धकारका मार्जन कर प्रभु शिवके चरणारविन्दमें प्रीति कर एवं गंगारजमें ही आसंग कर। अरे! क्या तरंगों, बुद्बुदों या विद्युल्लेखाओं, स्त्रीजनों, ज्वालाग्रों, पन्नगों अथवा सरिद्वेगोंमें कोई प्रत्यय हो सकता है? यदि नहीं तो क्षणभंगुर भावोंके पीछे अपना सर्वनाश क्यों कर रहा है?'— मोहं मार्जयतामुपार्जय रतिं चन्द्रार्धचूड़ामणौ चेतः स्वर्गतरङ्गिणीतटभुवामासङ्गमङ्गीकुरु। को वा वीचिषु बुद्बुदेषु च तडिल्लेखासु च स्त्रीषु च ज्वालाग्रेषु च पन्नगेषु च सरिद्वेगेषु कः प्रत्ययः॥ माँ! संसारके सभी उपाय तभी सार्थक होते हैं,

जब आपकी कृपादृष्टि हो। उसके बिना तो यही जँचता है— मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजना॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥ (रा०च०मा० ३।२।६, ८) माँ ही एकमात्र शरण माँ! निराश, हताशकी एकमात्र आप ही आशा हैं, इस संसारमें अन्धेकी यष्टिके तुल्य मुझ-सरीखे प्रपन्न, पतित पशुओंका एकमात्र आप ही सहारा हैं। माँ! भीषण संसार भले ही अत्यन्त असत्प्राय हो तथापि मैं अतिसन्त्रस्त हूँ। हे कृपणवत्सले! कौन कह सकता है कि जड़भरत विद्वान् एवं विवेकी नहीं थे? जिसने अखण्ड भूमण्डलका चक्रवर्तित्व छोड़ा, परमप्रिय ऐश्वर्यपूर्ण पट्टरानियों, हृदयाभिन्न पुत्र- पुत्रियोंका परित्याग किया, वही एक दृश्य विषूचिकाके बिन्दुकणसमुद्भूत हरिण-शावकके माया-मोहमें फँस गये। भृत्यवत्सले! यही तो है समुद्र पारकर गोपदमैं डूब जानेका उदाहरण! विदेहराजतनये माँ! कभी- कभी प्राणी उत्कृष्टसे उत्कृष्ट वस्तुओंका त्यागकर देता है, परंतु कालान्तरमें वही नगण्य वस्तुओंका रागी बनकर दीन हो जाता है और उन्हींके लिये विविध विडम्बनाओंका पात्र बनता है। माँ! मनका गुलाम, इन्द्रियोंका दास प्राणी विषयोंका कीड़ा बन जाता है। माँ! सम्पूर्ण कदर्थनाओंकी जड़ माया-ममता ही तो है। यदि आप चाहें तो क्या ये सब क्षणभर भी टिक सकते हैं? माँ! वस्तुतस्तु आपकी कृपाके बिना ही मूढ़मति प्राणीके लिये यह संसार वज्रसार है। जैसे बाल-कल्पित वेताल उसकी मृत्यूतक पीछा नहीं छोड़ता, वैसे ही यह स्वकल्पित संसार भी वज्रपंजरके तुल्य दुर्भेद्य बना रहता। जैसे घोर सन्ताननिदान आतप ही मृगों

सकता है, उसे ही मालूम होना चाहिये। करुणामयि! दीनवत्सले ! आप जो ठीक समझती हैं, वही ठीक है। परंतु माँ! यद्यपि सभी सन्तान आपके ही हैं तथापि दुःखी एवं दीन सन्तानोंपर अम्बाकी कृपा मुख्य रूपसे होती है। माँ! मुझे तो ईर्ष्या होती है, मेरे सेवकोंकी; क्योंकि जितनी कृपा आप मेरे सेवकोंपर करती हैं, उतनी मेरेपर नहीं करतीं। मेरी माँ ! सचमुच मैं विचार करता हूँ तो मेरे समान कोई पातकी नहीं है। किंतु आपके समान पापघ्नी भी कौन है ? किंतु माँ ! भूमिमें जिनका स्खलन होता है, उनका अवलम्बन सिवा भूमिके और क्या हो सकता है? उसी तरह माँ! चिन्मयी माँ! मैं और मेरा जो कुछ भी है, सब तुम्हारेमें ही है, तुम्हारा ही परिणाम, तुम्हारा विवर्त, तुम्हारा ही स्वरूप सब कुछ है। माँ ! तुम्हारे प्रति होनेवाले अपराधोंके होनेपर भी आपके सिवा और कौन सहारा है? माँ! यह भी ठीक है कि अधिकांश समय मायाजालमें, संसारकी भूल-भुलैयामें ही बीतता जा रहा है। जब घोर विपद्ग्रस्त होता हूँ, तभी तो आपको पुकारता हूँ। माँ! जैसे भूखे-प्यासे होनेपर ही अधिकांश माताकी स्मृति होती है, वैसे ही विपद्ग्रस्त सन्तान अपनी पराम्बाके ही चरणोंका आश्रय ग्रहण करते हैं। परतत्त्वमें अहन्तादि प्रपंच कुछ भी नहीं है, शुद्ध, अखण्ड बोध ही वस्तु है। जैसे जलसे भिन्न तरंग, फेन, बुद्बुदादि कुछ भी नहीं है, वैसे ही अखण्ड बोध वस्तुसे भिन्न होकर कुछ भी पदार्थ नहीं है'— हन्तादि परे तत्त्वे मनागपि न विद्यते। ऊर्म्यादीव पृथक् तोये संवित्सारं हि तद्गतः ॥ जबतक बालकल्पित वेताल होता है, तभीतक भय होता है। युक्तिसे वेतालकी कल्पना समाप्त होते ही भय दूर हो जाता है। इस दृश्यप्रपंचके उदरमें भी आप ही हैं। सुमेरु आदि पर्वतजाल वज्रसारवत् प्रतिमा समान होते हुए भी सर्वशून्य चिदणुस्वरूप आपका ही एक अंश है। अगणित, लक्ष-लक्ष, कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड आपके एक अणुमात्र प्रदेशमें हैं। जिस प्रकार मरु-मरीचिकामें जिस क्षण अपार जलराशि एवं तरंग, फेन, बुद्बुदादि अनन्त प्रपंच प्रतीत होता है, उसी क्षण मरु-मरीचिका शुद्ध, शुष्क ही रहती है, वहाँ जलसत्ता सर्वथा ही नहीं होती, वैसे ही अनन्त संग्राम, अनन्त अनुकूल- प्रतिकूल, अनन्त दृश्यविषूचिकाएँ प्रतीतिकालमें ही स्वाधिष्ठानमें ही अत्यन्त शून्य हैं। महाकाश एवं महासूर्यमण्डलमें जैसे बादल, वर्षा, तड़ित्प्रकाश, महावात्या आदि प्रपंचोंके आने-जानेका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता, वैसे ही अनुकूल-प्रतिकूल विविध जगद्विजृम्भणका अधिष्ठान चित्स्वरूपपर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। युद्ध, शान्ति, सृष्टि, प्रलय, अनन्त व्यवहार सभी भ्रान्तिमात्र हैं। राग एवं मोहका भी भीषण प्रपंच, महोत्सव एवं मातम, विविध नृत्य, वादित्र, परिहास, विलास, रसरास, विलाप, क्रन्दन, हाहाकार, चीत्कार सब कुछ अन्ततः आपके चित्स्वरूपमें ही प्रस्फुरित होते हैं। वस्तुतः स्फुरण, शुद्ध, अखण्ड भानसे भिन्न सब भ्रान्ति ही तो है। अग्निकाण्डकी अग्निज्वाला, संग्राम, महाव्याधियों एवं मरणकी रोमांचकारी भीषणता भी शुद्ध चिदुल्लासमात्र ही तो है। माँकी कृपासे ही माँका स्वरूपबोध माँ! राग, द्वेष, मोह, मान, मद, आशा, तृष्णा और धैर्यध्वंसी विकार तथा मरण समयकी भीषण वेदनाएँ सचमुच भ्रान्तिमात्र हैं। परंतु यदि आपकी कृपासे आपका स्वरूप प्रस्फुरित हो सके, तब। वह मरणकालिक कण्ठकी घर्घर्राहट, वह दृष्टिका वैवर्ण्य, वह दीनता कितनी भयावनी है ? जब घोर वेदनाओंसे चारों ओर अन्धकार छा जाता है, दिनमें तारे दिखायी देते हैं, मर्मपीड़ासे भूकम्प एवं भूभ्रमण-सा प्रतीत होने लगता है, वसुधा आकाश एवं आकाश पृथ्वी प्रतीत होते हैं, जीव दिग्भ्रान्त होकर महार्णव या महाकाशकी ओर आकृष्ट होता हुआ भीषण अग्निज्वालासे अथवा महाशिलाके उदरमें प्रविष्ट होता हुआ-सा अपनेको मानने लगता है, रथारूढ़-सा अथवा हिमालयमें

५४२ भक्तिसुधा गलता हुआ-सा, रसनासे आकृष्ट हुआ-सा विमूढधी होकर प्राणी कितना विवश होता है ? जलावर्तमें तथा पर्जन्यमें, मारुतमें, अनन्त गगनमें, कभी समुद्रमें, कभी पृथ्वीमें गिरता हुआ-सा मोह, मूर्च्छा, वेदनाओंका अनुभव करता है। जब भीषण व्यथासे नाड़ियोंकी स्वाभाविक गति बदल जाती है, भीतर प्रविष्ट वायु बाहर नहीं आता, बाहरका वायु भीतर नहीं जाता, उसी समय संज्ञाविनाशरूप, अतिविस्मृतिस्वरूप मृत्युका व्यवहार होता है। वस्तुतः इस समय भी स्वप्रकाश चेतन आत्मा ज्यों-का-त्यों अक्षुण्ण ही रहता है। दृश्यके अत्यन्तासम्भवकी भावनासे दृश्य वासना क्षीण होती है। किसी हेतुसे अत्यन्त विस्मृति ही जन्तुकी मृत्यु है और स्वप्न एवं माया मनोरथके समान सर्वभावसे विषय-स्वीकार ही जन्म है— जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तविस्मृतिः ॥ जन्म त्वात्मतया पुंसः सर्वभावेन भूरिद। विषयस्वीकृतिं प्राहुर्यथा स्वप्नमनोरथः ॥ (श्रीमद्भा० ११।२२।३८-३९) माँ ! जगदाधारस्वरूपे ! स्थूल, सूक्ष्म, कारणरूप त्रिविध शरीर ही आपका पुर है, इसलिये आप सर्वसाक्षिणी त्रिपुरा हैं। माँ ! कितने ही प्राणी मृत्युके अनन्तर पाषाणहृदयके तुल्य अति जड़ताको प्राप्त होकर बहुत समयतक रहते हैं। वासनावशात् पुनः विविध नरकदुःखोंका अनुभव करके सहस्रों योनियोंमें भटककर, विविध दुःखोंको भोगकर पुनः क्वचित् शमको प्राप्त कर पाते हैं। वस्तुतस्तु सब कुछ हृदयस्थ विचारमात्र ही है। जैसे स्वप्नद्रष्टाके कर्मों और वासनाओंसे संवलित विचार ही घनीभूत होकर वज्रसारतुल्य स्वाप्निक प्रपंचरूपमें प्रकट होते हैं, वैसे ही क्षणमें दुःखशताकुल वृक्षलतादिको प्राप्त होता है। वासनाके अनुरूप ही नरकादि तथा विविध योनिके जन्मोंका भी अनुभव होता है। भावनानुसार ही कोई स्वर्गसुख एवं ब्रह्मलोक-सुखका अनुभव करते हैं। कुछ लोग वासनावशात् ही यह भी अनुभव करते हैं कि यमभटोंसे यमपुरके लिये ले जाये जा रहे हैं, मार्गमें विविध उद्यानों, शोभन विमानोंका अनुभव करते हैं। कभी-कभी स्वकर्मवश प्राप्त हिमानी- कण्टक, श्वभ्र शस्त्रपात आदिका अनुभव करते हैं। कहीं स्निग्धछाया तथा वापीसंयुक्त स्थान प्राप्त होता है। यमपुरमें जाकर यमका दर्शन, शुभाशुभ कर्मोंका विचार, तदनुकूल स्वर्ग-नरकादि भोग, पुनः पंचाग्निविद्याक्रमेण शालिव्रीहि-यवादिभावकी प्राप्ति, शुक्रादि-परिणति, रत्यादिद्वारा गर्भस्थिति, गर्भवृद्धि आदि क्रमेण बालक-जन्म, पुनश्च क्रमेण तारुण्य, जरादिकी अनुभूति होती है। सर्गादिमें शैल, द्रुम, पृथ्वी आदि सब कुछ तत्पदार्थ परमेश्वरमें ही अध्यस्त होते हैं। अनावृत चैतन्यद्वारा सत्त्वत्वेन असत्य वस्तुओंका प्रतिभास होता है। ईश्वर सर्वज्ञ है, अतः उसे सर्वार्थका प्रतिभास होता है। स्वरूपसे अप्रच्युतमें ही जगदध्यास उपपन्न होता है। जैसे स्वप्नद्रष्टाके द्वारा अनेक चेतनाचेतन प्रपंचकी सृष्टि प्रतीत होती है, वहाँ स्वप्नद्रष्टासे भिन्न कुछ भी नहीं है, ठीक वैसे ही अखण्ड भानसे भिन्न होकर चेनताचेतन दृश्य कुछ भी नहीं है। पाषाण, पारदादिमें साभास अन्तःकरण उद्भूत नहीं है, अतः वे अचेतन कहलाते हैं। नर, तिर्यगादिमें साभास अन्तःकरण विकसित होते हैं, अतः वे चेतन कहलाते हैं। हे माँ ! 'योगवासिष्ठ' में ज्ञप्तिस्वरूपसे जो आपने समझाया था कि आतिवाहिक प्रपंच ही आधिभौतिक रूपसे प्रतीत होता है, गम्भीरतासे विचारनेपर बात ठीक वैसी ही प्रतीत होती है। आधिभौतिक प्रपंचकी गुरुता, कठिनता आदि समाप्त हो जाते हैं, जब उसकी आतिवाहिकताका बोध होता है। जैसे स्वप्नमें उपलब्ध प्रपंचकी दुर्भेद्यताका द्रष्टा तभीतक अनुभव करता है, जबतक प्रबोध नहीं होता। प्रबोध होते ही स्वप्नका कारागार, स्वप्नके दुर्भेद्य निगड़ादि बन्धन न जाने कहाँ चले जाते हैं। उनकी कठोरता, उनका अस्तित्व कहाँसे आया था और कहाँ चला गया, यह कहना कठिन है। सब कुछ संकल्पका ही

माँके श्रीचरणोंमें ५४३ परिणाम है। 'संकल्पस्वरूप ही सब कुछ है' इस बोधके दृढ़ होनेपर कोई भी स्थूल पदार्थ कहीं भी प्रतिरोधक नहीं होता। स्वप्न एवं संकल्पके पर्वतादि संवित्में ही विलीन हो जाते हैं। जैसे सस्पन्द वायु निस्पन्द वायुमें लीन हो जाता है, ठीक वैसे ही संवित्में ही सब संकल्पात्मक प्रपंच विलीन होता है; क्योंकि संविद् ही विभिन्न रूपसे प्रतिभासित होती है। स्वकल्पित प्रपंच ही दुःखका हेतु है मिथ्याज्ञान, अबोध आदिके कारण ही स्वप्न एवं संकल्पके पदार्थों एवं संवित्में भेद प्रतीत होता है। जैसे जल एवं द्रवत्वमें भेद नहीं है, ठीक वैसे ही यहाँ भी भेद नहीं है। स्वप्न एवं जाग्रत्में भी संवित्में परम सत्यता है। स्वप्न आदि पदार्थोंमें परम असत्यता है। स्वप्नमें क्षणमें आकाश एवं क्षणमें वही आकाश पर्वत हो जाता है। अतएव किसी सत् पदार्थके मार्जनमें क्लेश होता है, परंतु जो असत् पदार्थ है, उसके मार्जनमें क्या क्लेश ? आकाशस्वरूप अनन्त ज्ञान ही सब ज्ञेय है। अतिस्वच्छ चित्स्वरूप आकाशमें, एक चित्कणमें ही अनन्त प्रपंचकी व्यर्थ ही भ्रान्ति है। एक परमाणु एवं एक निमेषके लक्षांशमेंसे भी सहस्रों जगत् एवं सहस्रों कल्पोंका विभ्रम होता है। जैसे समुद्रमें अगणित तरंग-परम्परा प्रस्फुरित होती है, वैसे ही एक चित्परमाणुमें अनन्त सर्ग-परम्पराएँ प्रस्फुरित होती रहती हैं। सर्वशक्ति चित्स्वरूप महात्रिपुरा अन्तःकरण-सम्बन्धसे चिच्छक्तिको प्रकट करती है। सत्त्वगुणपर शान्ति, तमपर जड़ता और रजपर रागादिको व्यक्त करती है और कहीं मिश्रित गुणकार्य। सुषुप्ति, प्रलयादिमें कुछ भी नहीं प्रकट करती। व्यवहारके लिये अनेक विकल्पजाल उसीसे प्रकट होते हैं। वस्तुतः परमात्मस्वरूप त्रिपुरा सर्वथा ही प्रपंचातीत है। उसी शुद्ध चिद्रूप महादर्पणमें अनन्त जगज्जाल- परम्परा प्रतिबिम्बके तुल्य प्रतिभासित होती है। जैसे निर्वात, शान्त समुद्र ही स्पन्दवशात् तरंग, फेन, बुद्बुद आदि आकारसे प्रतिभासित होने लगता है, वैसे ही स्वच्छ, शान्त ब्रह्ममें मायावशात् अनन्त जगज्जाल प्रतीत होने लगता है। नाशोऽपि सुखयत्यज्ञमेकवस्त्वतिरागिणाम्। सूचीभूता विदेहापि परितुष्टैव राक्षसी ॥ जैसे वेतालकी कल्पनासे बालक भयभीत होता है, वैसे ही स्वकल्पित प्रपंचसे ही प्राणी दुःखी होता है। स्वकल्पित वस्तुमें ही अतिरागसे प्राणीको आत्मनाश भी सुखकर प्रतीत होता है, जैसे देहनाशमें भी विषूचिका तुष्ट हुई। रागविशेषसे ही अल्पसत्त्व प्राणी तुच्छ वस्तुके लिये तप करके उसे वरदानके रूपमें प्राप्त करना चाहता है— तुच्छोऽप्यर्थोऽल्पसत्त्वानां गच्छति प्रार्थनीयताम्। सूचीवृता पिशाचीत्वं राक्षस्या तपसा स्थितम्॥ कामनात्यागसे दृढ़बोधकी प्राप्ति असम्यग्दर्शन एवं मनके बलसे दीर्घस्वप्न ही संसार बन जाता है। परम कारणसे ही किंचिन्मात्र मननी शक्तिको धारण करनेसे चित् ही चित्त बन जाता है। फिर वही चैत्योन्मुख (दृश्यके उन्मुख) होकर प्रपंच-कल्पनाओंका मूल बनता है। जैसे चिदात्मा एवं जीवमें भेद नहीं, वैसे ही चित्त एवं जीवमें भी भेद नहीं है। सारांश यह कि जैसे जलसे भिन्न होकर तरंग नहीं होता, वैसे ही चित्तसे भिन्न होकर दृश्यप्रपंच नहीं है; क्योंकि अन्वय-व्यतिरेकसे जल होनेपर ही तरंग उपलब्ध होता है, जल न होनेपर तरंग उपलब्ध नहीं होता, वैसे ही चित्तके चांचल्यके बिना प्रपंचकी प्रतीति नहीं होती। इसी तरह अखण्ड भानमें ही चित्तका भी स्फुरण होता है, अखण्ड भानके बिना चित्तका स्फुरण ही असम्भव है। इसीलिये बोधमात्रसे संसारव्याधिकी चिकित्सा हो सकती है। यदि वासनात्यागपूर्वक सर्वत्याग सम्पन्न हो तो तत्क्षण ही मुक्ति हस्तगत होती है— यदि सर्वं परित्यज्य तिष्ठस्युत्क्रान्तवासनः। अमुनैव निमेषेण तन्मुक्तोऽसि न संशयः॥ जैसे ठीक वीक्षणसे ही रज्जुसे सर्पभ्रम हट जाता है, वैसे ही विचारमात्रसे संसृति मिट जाती है। जिन-जिन पदार्थोंमें अभिलाष है, उन-उन पदार्थोंका

५४४ भक्तिसुधा त्याग एवं बोध होनेसे ही दृढ़ बोध होता है— यत्राभिलाषस्तन्नूनं सन्त्यज्य स्थीयते यदि। प्राप्त एवाङ्ग तन्मोक्षः किमेतावतिदुष्करम्॥ जैसे स्फटिकके भीतर घनताके आवेदनसे ही वृक्ष, नगरादिकी प्रतीति होती है, वैसे ही अखण्ड भानरूपी ब्रह्ममें घनताके आवेदनसे ही प्रपंच प्रतीत होता है। जैसे जहाँ भूमिका खनन होता है, वहीं आकाश प्रकट होता है, वैसे ही जिस सम्बन्धमें ही विचार किया जायगा, वही वस्तु स्वरूपसे बाधित होनेपर अखण्डबोधस्वरूप ही अवशिष्ट रहता है। ‘योगवासिष्ठ’ में मन, इन्द्रिय आदिसे अगम्य होनेके कारण उसी परतत्त्वको अणु कहा जाता है। आकाशादि सूक्ष्मातिसूक्ष्म पदार्थोंका भी वही परम कारण है, अतः निरतिशय सूक्ष्म है। जैसे सूक्ष्म वटबीजके भीतर महावृक्षकी सत्ता होती है, वैसे ही परमसूक्ष्म, स्वप्रकाश, व्यापक चित्स्वरूप आत्मामें सत्-असत्, स्थूल-सूक्ष्म सब प्रपंच स्थित होता है। सम्पूर्ण दृश्यप्रपंच शून्य होनेसे वही आकाश कहा जाता है। परंतु जड़ाकाशसे विलक्षण स्वयं चिद्घनस्वरूप है, अतः अनाकाश भी वही है। इन्द्रियातीत होनेसे वह अमल है। चित्तरूपी महाम्बुधिमें अपरगणित जगतरूपी तरंग प्रतिभासित होते हैं। वह चित्त भी उसी अखण्ड भानमें भ्रमरूप है। उसी अनाद्यनन्त परमाकाशमें यह जगच्चित्रके तुल्य अकृत होता हुआ भी कृत-सा प्रतीत होता है। उसीमें अनन्त अहन्ता-ममतारूप संसार भासित होता है। चन्द्र, आदित्य, अग्नि आदि सभी ज्योतियोंका वही परमभासक है, अतः वही ज्योतिका भी ज्योति कहा जाता है। चन्द्रादित्यादि बाह्य ज्योतियों तथा नेत्र, श्रोत्र, मन, बुद्धि आदि आन्तर ज्योतियोंमें वही सत्ता और स्फूर्ति देनेवाला है। महाज्योति, महा अग्नि वही है। वह ऐसा अग्नि है कि महाप्रलयके बादलोंके भी बुझाये नहीं बुझ सकता, क्योंकि आत्मस्वरूप भी अर्थात् आत्मरूप दीप्तिसे ही तो प्रलयाम्बुदका भी परिज्ञान होता है। वही नेत्रगम्य न होनेपर भी हृदयरूपी गृहका प्रकाशदीप है। वही सर्वप्रकाशक एवं अनन्त है। गाढान्धकार स्थित जो अहं किसीसे भी प्रकाशित नहीं होता, वह भी इसी सर्वान्तर ब्रह्मात्मज्योतिसे प्रकाशित होता है। उसी अखण्ड बोधस्वरूपमें प्रमाणाप्रमाण एवं प्रमेय प्रस्फुरित होते हैं। सभी देश, काल एवं वस्तुओंका आधार, अधिष्ठान, भासक भी वही है। सर्वभासक होनेसे वही महान् है। अगम्य, अनिर्भास्य होनेसे वही अणु भी है। उसीसे प्रस्फुरित संकल्प ही स्थूल, सूक्ष्म सब प्रपंच है। संकल्पमें ही स्वल्प देश- कालमें महान् देश-कालकी प्रतीति भी होती है। स्वप्नमें अतिस्वल्प नाड़ी-प्रदेशमें मेरु, आकाश आदि प्रतीत होते हैं। स्वप्नमें ही क्षणमात्र कालमें वर्षों, युगों तथा कल्पोंकी भी प्रतीति होती है। दुःखमें छोटा काल भी महान् प्रतीत होता है। सुखमें महान् समय भी छोटा-सा ही प्रतीत होता है। हरिश्चन्द्रको एक रात्रि ही द्वादश वर्षोंकी प्रतीत हुई। लवण राजाको कुछ मुहूर्तमें ही सौ वर्षोंका घोर दुःखमय मिथ्या प्रपंच प्रतीत हुआ। क्षण-कल्प, प्रकाश-अप्रकाश, दूरत्व-अदूरत्व सभी एक चित्का संकल्पमात्र है। जैसे जबतक कुण्डलादि भूषणोंमें अभिनिवेश होता है, तबतक सुवर्ण प्रतीत नहीं होता। सुवर्ण-बुद्धि स्थिर होनेपर फिर कटकादि-बुद्धि बाधित हो जाती है। निर्मल दर्पण में प्रतिभासित नगरके तुल्य ही शुद्ध बोधमें प्रपंच प्रतिभान है। जैसे घोर तापमयी मरु- मरीचिकामें अनन्त जलराशिकी कल्पना होती है, वैसे ही परम शीतल, शान्त, स्वच्छ, अखण्ड संवित्में भीषण भवाम्भोधि कल्पित है। जैसे स्वप्नों, गन्धर्वों एवं संकल्पोंके मायामय मिथ्या नगरोंमें कुड्यादिकी मिथ्या प्रतीति होती है, वैसे ही ब्रह्ममें आडम्बरपूर्ण दीर्घ जगद्भ्रम है। स्वप्ननगरके आकाश और कुड्य, काष्ठ, पाषाणादिमें कोई भी अन्तर नहीं; क्योंकि सब केवल संकल्प ही हैं। आब्रह्मस्तम्ब प्रपंच चित्रप्रकाशमें ही प्रतिभासित होनेके कारण सब चिद्रूप ही हैं।