भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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जब आपकी कृपादृष्टि हो। उसके बिना तो यही जँचता है— मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजना॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥ (रा०च०मा० ३।२।६, ८) माँ ही एकमात्र शरण माँ! निराश, हताशकी एकमात्र आप ही आशा हैं, इस संसारमें अन्धेकी यष्टिके तुल्य मुझ-सरीखे प्रपन्न, पतित पशुओंका एकमात्र आप ही सहारा हैं। माँ! भीषण संसार भले ही अत्यन्त असत्प्राय हो तथापि मैं अतिसन्त्रस्त हूँ। हे कृपणवत्सले! कौन कह सकता है कि जड़भरत विद्वान् एवं विवेकी नहीं थे? जिसने अखण्ड भूमण्डलका चक्रवर्तित्व छोड़ा, परमप्रिय ऐश्वर्यपूर्ण पट्टरानियों, हृदयाभिन्न पुत्र- पुत्रियोंका परित्याग किया, वही एक दृश्य विषूचिकाके बिन्दुकणसमुद्भूत हरिण-शावकके माया-मोहमें फँस गये। भृत्यवत्सले! यही तो है समुद्र पारकर गोपदमैं डूब जानेका उदाहरण! विदेहराजतनये माँ! कभी- कभी प्राणी उत्कृष्टसे उत्कृष्ट वस्तुओंका त्यागकर देता है, परंतु कालान्तरमें वही नगण्य वस्तुओंका रागी बनकर दीन हो जाता है और उन्हींके लिये विविध विडम्बनाओंका पात्र बनता है। माँ! मनका गुलाम, इन्द्रियोंका दास प्राणी विषयोंका कीड़ा बन जाता है। माँ! सम्पूर्ण कदर्थनाओंकी जड़ माया-ममता ही तो है। यदि आप चाहें तो क्या ये सब क्षणभर भी टिक सकते हैं? माँ! वस्तुतस्तु आपकी कृपाके बिना ही मूढ़मति प्राणीके लिये यह संसार वज्रसार है। जैसे बाल-कल्पित वेताल उसकी मृत्यूतक पीछा नहीं छोड़ता, वैसे ही यह स्वकल्पित संसार भी वज्रपंजरके तुल्य दुर्भेद्य बना रहता। जैसे घोर सन्ताननिदान आतप ही मृगों