भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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सकता है, उसे ही मालूम होना चाहिये। करुणामयि! दीनवत्सले ! आप जो ठीक समझती हैं, वही ठीक है। परंतु माँ! यद्यपि सभी सन्तान आपके ही हैं तथापि दुःखी एवं दीन सन्तानोंपर अम्बाकी कृपा मुख्य रूपसे होती है। माँ! मुझे तो ईर्ष्या होती है, मेरे सेवकोंकी; क्योंकि जितनी कृपा आप मेरे सेवकोंपर करती हैं, उतनी मेरेपर नहीं करतीं। मेरी माँ ! सचमुच मैं विचार करता हूँ तो मेरे समान कोई पातकी नहीं है। किंतु आपके समान पापघ्नी भी कौन है ? किंतु माँ ! भूमिमें जिनका स्खलन होता है, उनका अवलम्बन सिवा भूमिके और क्या हो सकता है? उसी तरह माँ! चिन्मयी माँ! मैं और मेरा जो कुछ भी है, सब तुम्हारेमें ही है, तुम्हारा ही परिणाम, तुम्हारा विवर्त, तुम्हारा ही स्वरूप सब कुछ है। माँ ! तुम्हारे प्रति होनेवाले अपराधोंके होनेपर भी आपके सिवा और कौन सहारा है? माँ! यह भी ठीक है कि अधिकांश समय मायाजालमें, संसारकी भूल-भुलैयामें ही बीतता जा रहा है। जब घोर विपद्ग्रस्त होता हूँ, तभी तो आपको पुकारता हूँ। माँ! जैसे भूखे-प्यासे होनेपर ही अधिकांश माताकी स्मृति होती है, वैसे ही विपद्ग्रस्त सन्तान अपनी पराम्बाके ही चरणोंका आश्रय ग्रहण करते हैं। परतत्त्वमें अहन्तादि प्रपंच कुछ भी नहीं है, शुद्ध, अखण्ड बोध ही वस्तु है। जैसे जलसे भिन्न तरंग, फेन, बुद्बुदादि कुछ भी नहीं है, वैसे ही अखण्ड बोध वस्तुसे भिन्न होकर कुछ भी पदार्थ नहीं है'— हन्तादि परे तत्त्वे मनागपि न विद्यते। ऊर्म्यादीव पृथक् तोये संवित्सारं हि तद्गतः ॥ जबतक बालकल्पित वेताल होता है, तभीतक भय होता है। युक्तिसे वेतालकी कल्पना समाप्त होते ही भय दूर हो जाता है। इस दृश्यप्रपंचके उदरमें भी आप ही हैं। सुमेरु आदि पर्वतजाल वज्रसारवत् प्रतिमा समान होते हुए भी सर्वशून्य चिदणुस्वरूप आपका ही एक अंश है। अगणित, लक्ष-लक्ष, कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड आपके एक अणुमात्र प्रदेशमें हैं। जिस प्रकार मरु-मरीचिकामें जिस क्षण अपार जलराशि एवं तरंग, फेन, बुद्बुदादि अनन्त प्रपंच प्रतीत होता है, उसी क्षण मरु-मरीचिका शुद्ध, शुष्क ही रहती है, वहाँ जलसत्ता सर्वथा ही नहीं होती, वैसे ही अनन्त संग्राम, अनन्त अनुकूल- प्रतिकूल, अनन्त दृश्यविषूचिकाएँ प्रतीतिकालमें ही स्वाधिष्ठानमें ही अत्यन्त शून्य हैं। महाकाश एवं महासूर्यमण्डलमें जैसे बादल, वर्षा, तड़ित्प्रकाश, महावात्या आदि प्रपंचोंके आने-जानेका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता, वैसे ही अनुकूल-प्रतिकूल विविध जगद्विजृम्भणका अधिष्ठान चित्स्वरूपपर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। युद्ध, शान्ति, सृष्टि, प्रलय, अनन्त व्यवहार सभी भ्रान्तिमात्र हैं। राग एवं मोहका भी भीषण प्रपंच, महोत्सव एवं मातम, विविध नृत्य, वादित्र, परिहास, विलास, रसरास, विलाप, क्रन्दन, हाहाकार, चीत्कार सब कुछ अन्ततः आपके चित्स्वरूपमें ही प्रस्फुरित होते हैं। वस्तुतः स्फुरण, शुद्ध, अखण्ड भानसे भिन्न सब भ्रान्ति ही तो है। अग्निकाण्डकी अग्निज्वाला, संग्राम, महाव्याधियों एवं मरणकी रोमांचकारी भीषणता भी शुद्ध चिदुल्लासमात्र ही तो है। माँकी कृपासे ही माँका स्वरूपबोध माँ! राग, द्वेष, मोह, मान, मद, आशा, तृष्णा और धैर्यध्वंसी विकार तथा मरण समयकी भीषण वेदनाएँ सचमुच भ्रान्तिमात्र हैं। परंतु यदि आपकी कृपासे आपका स्वरूप प्रस्फुरित हो सके, तब। वह मरणकालिक कण्ठकी घर्घर्राहट, वह दृष्टिका वैवर्ण्य, वह दीनता कितनी भयावनी है ? जब घोर वेदनाओंसे चारों ओर अन्धकार छा जाता है, दिनमें तारे दिखायी देते हैं, मर्मपीड़ासे भूकम्प एवं भूभ्रमण-सा प्रतीत होने लगता है, वसुधा आकाश एवं आकाश पृथ्वी प्रतीत होते हैं, जीव दिग्भ्रान्त होकर महार्णव या महाकाशकी ओर आकृष्ट होता हुआ भीषण अग्निज्वालासे अथवा महाशिलाके उदरमें प्रविष्ट होता हुआ-सा अपनेको मानने लगता है, रथारूढ़-सा अथवा हिमालयमें