भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाँके श्रीचरणोंमें ५३९ ही विहंगम हैं। धैर्यद्रुमका विध्वंसन करनेवाली, मोहरूपी आवर्तोसे अतिसुदुस्तर तथा प्रोत्तुंग चिन्तारूपी तटवाली इस नदीको जो पार कर जाते हैं, वे ही विशुद्ध मनवाले योगीजन सुखी होते हैं'— आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङ्गाकुला रागग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी। मोहावर्तसुदुस्तरातिगहना प्रोत्तुङ्गचिन्तातटी तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगीश्वराः॥ 'यह विषय सबके सब अवश्य ही बहुत दिन बाद भी जायँगे ही। वियोगमें कोई भी भेद नहीं। फिर भी प्राणी क्यों नहीं इनको स्वेच्छासे छोड़ता? यदि ये विषय स्वेच्छासे जायँगे तो मनके अतुल परितापके हेतु बनेंगे। किंतु यदि समझदारीके साथ इन्हें छोड़ दिया जाय, तब तो वे अनन्त शान्ति-सुखके हेतु बनते हैं'— 'अंतहु तोहिं तजैंगे पामर! तू न तजै अबही ते॥' (वि०प० १९८।३) अवश्यं यातारश्चिरतरमुषित्वाऽपि विषयाः वियोगे को भेदस्त्यजति न जनो यत्स्वयममून। व्रजन्तः स्वातन्त्र्यादतुलपरितापाय मनसः स्वयं त्यक्ता ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति॥ मोहकी विचित्र महिमा 'परंतु फिर भी मोह-महिमा विचित्र है। बेचारा पतंग तो दहनके भीषण स्वरूपको बिना जाने उसमें पड़कर मरता है, बेचारा मीन भी बिना समझे वंशीयुक्त मांस खा लेता है। परंतु हमलोग तो जानते हुए इन विपज्जालजटिल कामोंको नहीं छोड़ पाते'— अजानन्माहात्म्यं पततु शलभस्तीव्रदहने स मीनोऽप्यज्ञानाद्बडिशयुतमश्नातु पिशितम्। विजानन्तोऽप्येतद्वयमिह विपज्जालजटिलान् न मुञ्चामः कामानहह गहनो मोहमहिमा॥ 'सचमुच जो विवेकी लोग विविध भोगों, कांचन, धनादिकोंको अतिनिःस्पृहताके साथ छोड़ देते हैं, वे बड़ा ही दुष्कर कार्य करते हैं। हमलोगोंको तो कोई विशिष्ट भोग, धनादि न पहले मिले, न अब ही प्राप्त है और न आगे ही मिलनेका दृढ़ विश्वास है। फिर भी केवल वांछामात्र परिग्रह भी हमलोगोंके छोड़े नहीं छूटते'— ब्रह्मज्ञानविवेकिनोऽमलधियः कुर्वन्त्यहो दुष्करं यन्मुञ्चन्त्युपभोगवन्त्यपि धनान्येकान्ततो निःस्पृहाः। न प्राप्तानि पुरा न सम्प्रति न च प्राप्तौ दृढ़ः प्रत्ययः वाञ्छामात्रपरिग्रहाण्यपि परं त्यक्तुं न शक्ता वयम्॥ 'फिर भी वस्तुएँ कभी स्थिर नहीं हैं। तभी तो एक भग्नशेष राजधानी देखकर कोई सहृदय व्यक्ति कहता है कि कभी यहीं एक सम्राट् था। उसके पार्श्वमें ही सामन्तचक्र था। उसके समीप कितनी सुन्दर राजपरिषद् थी और चन्द्रबिम्बानना दिव्यस्त्रियाँ, उनके विविध विलास-वैभव थे। वे उद्रिक्त राजपुत्र- समूह थे। वे स्तुति-पाठक, बन्दी और वे विचित्र कथाएँ थीं। परंतु सब कुछ जिस कालकी महिमासे आज केवल स्मृतिशेष रह गये, उस कालको नमस्कार है'— भ्रातः कष्टमहो महान् स नृपतिः सामन्तचक्रञ्च तत् पार्श्वे तस्य च सापि राजपरिषत् ताश्चन्द्रबिम्बाननाः। उद्रिक्तः स च राजपुत्रनिवहस्ते बन्दिनस्ताः कथाः सर्वं यस्य वशादगात्स्मृतिपथं कालाय तस्मै नमः॥ 'माँ! आपकी मंगलमयी कृपा हो, तब तो सहस्रों महापुरुषोंके वचन हैं, जिनसे अविवेकान्ध प्राणियोंकी भी आँखें खुल सकती हैं। हे चित्त! इस मोहान्धकारका मार्जन कर प्रभु शिवके चरणारविन्दमें प्रीति कर एवं गंगारजमें ही आसंग कर। अरे! क्या तरंगों, बुद्बुदों या विद्युल्लेखाओं, स्त्रीजनों, ज्वालाग्रों, पन्नगों अथवा सरिद्वेगोंमें कोई प्रत्यय हो सकता है? यदि नहीं तो क्षणभंगुर भावोंके पीछे अपना सर्वनाश क्यों कर रहा है?'— मोहं मार्जयतामुपार्जय रतिं चन्द्रार्धचूड़ामणौ चेतः स्वर्गतरङ्गिणीतटभुवामासङ्गमङ्गीकुरु। को वा वीचिषु बुद्बुदेषु च तडिल्लेखासु च स्त्रीषु च ज्वालाग्रेषु च पन्नगेषु च सरिद्वेगेषु कः प्रत्ययः॥ माँ! संसारके सभी उपाय तभी सार्थक होते हैं,