भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 548

५३८ भक्तिसुधा 'भ्रमर जैसे एक पुष्पसे दूसरे पुष्पपर जाता रहता है, यही स्थिति स्त्रीकी होती है'— 'भृङ्गीव पुष्पपुरुषं स्त्री वाञ्छति नवं नवम्।' 'अति चपल पारदका निग्रह किया जा सकता है, परंतु स्त्रीचित्तग्रहणकी कोई भी युक्ति नहीं है'— अत्यन्तचपलस्येह पारदस्य निबन्धने। कामं विज्ञायते युक्तिर्न स्त्रीचित्तस्य काचन॥ 'परंतु स्त्रीकी ही क्यों, कुत्सित स्त्रियों-जैसी ही कुत्सित पुरुषोंकी भी स्थिति तो वैसी ही है। माँ! वस्तुतस्तु, यदि आपकी कृपा होती है तो सभी अनुकूल होते हैं। आपकी कृपाके बिना प्रकृतिके परमाणु-परमाणु उद्वेजक ही सिद्ध होते हैं। माँ! अब तो एक बार अनुकम्पाभरी दृष्टिसे निहार दो। माँ! यह विषयों तथा कामादिकोंद्वारा और कितनी कदर्थना और कितनी विडम्बना सहाओगी?' 'माँ! मैंने इन तरलचित्तोंकी कितनी स्तुति नहीं की? इनका कितना अनुनय नहीं किया? जितनी स्तुतिमयी दीनतायुक्त पत्रिकाओंद्वारा इनके सामने रोना रोया, उतना यदि आपके सामने रोया होता तो ये पश्चात्तापके दिन न आते। जो सिर आपके भक्तों एवं आपके ही चरणारविन्दमें झुकाना चाहिये था, वह मृगमरीचिकामय प्राणियोंके सामने झुका। जो महत्त्व, जो गौरव आपके प्रति होना उचित था, वह साधारण प्राणियोंके प्रति किया गया। हाँ, वह भी यदि सर्वस्वरूपा आपको ही समझकर आपके ही प्रति होता तो कोई बात न थी। परंतु माँ! उन सब बातोंको मेरी कमजोरी समझा गया, मुझपर दया दिखायी गयी। बहुतोंने उपहास भी किया, बहुतोंने उपेक्षा की, बहुतोंने घृणा भी की, बहुतोंने उसे भी एक उपद्रव समझकर इस बलाको टालना ही उचित समझा। मेरे भावपूर्ण हृदयको ठुकराया गया। उन पत्रिकाओंका आदर करना, हृदयसे लगा लेना, भाव समझना तो दूरकी बात, उन्हें देखना, पढ़ना भी शुद्ध भार समझा गया। माँ! यह सब आपकी उपेक्षा और मेरे दुर्भाग्यका ही तो परिणाम था। माँ! जिनके लिये कितने ही अनुष्ठान, कितनी ही प्रार्थनाएँ की गयीं, जिनके लिये घोर वेदना सहन की गयी, लक्षों अश्रु- बिन्दुओंका समर्पण किया गया, उन्हींद्वारा उपेक्षा, पूर्ण उपेक्षा, हृदयको पूर्णरूपसे कुचल डालनेका प्रयत्न किया गया। जिनके लिये मानापमान सहा गया, मानहीन भोजन किया गया, उनसे ही क्या मिला? ठीक ही है। अनेक दुर्गम-विषम देशोंमें भटकना पड़ा, परंतु कुछ भी न मिला। जाति-कुलके अनुकूल उचित अभिमान छोड़कर भी निष्फल सेवा, निष्फल अनुनय-विनय करना पड़ा, दूसरोंके गृहोंमें मानवर्जित, आशङ्कायुक्त काकवत् भोजन करना पड़ा। यह सब तृष्णा एवं कामकी ही कदर्थना तो थी। हे पापकर्मनिरते तृष्णे! क्या अब भी तुझे सन्तोष नहीं है?'— भ्रान्तं देशमनेकदूर्गविषयं प्राप्तं न किञ्चित् फलं त्यक्त्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला। भुक्तं मानविवर्जितं परगृहे स्वाशङ्कया काकवत् तृष्णे जृम्भसि पापकर्मनिरते नाद्यापि सन्तुष्यसि॥ 'खलोंकी आराधनाओंमें तत्पर होकर उनके विविध उल्लापोंको भी सहा, हृदयके आँसुओंको रोककर शून्य मनसे उनके उपहासोंको भी सहा। माँ! आखिर जीवन भी तो क्षणभंगुर ही है। आदित्यके गमनागमनद्वारा प्रतिदिन ही तो जीवन क्षीण हो रहा है। वह कार्यभार गुरु व्यापारोंसे कालका बीतना भी कहाँ मालूम पड़ रहा है? माँ! जन्म, जरा, मरणादि भीषण विपत्तियोंको देखकर भी त्रास उत्पन्न नहीं होता। माँ! सचमुच मोहमयी प्रमादमदिरासे हम सभी उन्मत्त हो रहे हैं'— आदित्यस्य गतागतैरहरहः सङ्क्षीयते जीवनं व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते। दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत्॥ 'माँ! भर्तृहरिके कथनानुसार सचमुच आशा नामकी नदी अति भीषण है। विविध प्रकारके मनोरथ ही इसका जल है। विविध विषय तृष्णा-तरंगोंसे वह आकुल है। राग ही उसमें ग्राह है। विविध वितर्क