भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 547

माँके श्रीचरणोंमें ५३७ अरण्यरोदन न होना चाहिये। यह विलुण्ठन, यह बेचैनी और भीषण आतुरता, यह अनवस्थिति मेरे प्रयत्नसे मिटनेवाली नहीं है। मूर्खतावश जिसे हृदय खोलकर दिखाना चाहते हैं, उसे देखनेका समय ही नहीं और देखनेकी रुचि भी नहीं है। फिर वही शून्य, भीषण दावदग्ध, निर्जन, शून्य अरण्यका रोदन, दीर्घ श्वास- निःश्वास, आर्तनाद, माँ! तुम्हीं सुन लो। जो जन्म- जन्मान्तरोंतक सम्बन्ध न छोड़नेका संकल्प कर चुके हैं, वे इसी जन्ममें साथ छोड़ गये। उनकी दृष्टि भाव- भंगीमें परिवर्तन, क्रान्तिकारी परिवर्तन हो गये। कातर चित्त किसीकी सद्भावनाकी कल्पनासे कितना प्रफुल्लित होता है, यह भी तो एक भाग्यकी बात है। जीवनमें हमने जिससे राग किया, वही हमसे विरागी बना। जिसे पकड़ना चाहा, उसने ही भागना चाहा। जिसे नहीं चाहा, उसे भले ही पाया हो, परंतु जिसपर प्रेम किया, वह मुझे ठुकरानेमें सुखी हुआ। माँ! अब बस ले लो अपने चरणोंमें। यह अवहेलना, यह अपमान कबतक सहाओगी? श्वा, शूकर, गर्दभके समान विषयोंका कीड़ा बनकर, कांचन-कामिनीका किंकर बनकर अभी और कितना अपमान सहना पड़ेगा? मातः ! यह राग अतिविषम है, सर्पके समान डँसता है, भीषण असिके समान मर्मच्छेदन करता है, भाले-बर्छेके समान हृदयको विद्ध करता है, रज्जुके समान बन्धन करता है, पावकके समान दहन करता है, रात्रिके समान अन्ध बना देता है, पाषाण-आघातके तुल्य विवश कर देता है, प्रज्ञाका विनाश करता है और ऐसा कौन दुःख है, जो रागान्ध प्राणीको नहीं मिलता? हे जगज्जननी! क्या मेरे इस दुर्विपाकका अन्त ही नहीं होना है? यह संसार-कदर्थना आखिर कबतक भोगनी पड़ेगी? क्या इस दीर्घ, उष्ण निःश्वास-परम्पराकी कोई अवधि भी है? आखिर यह सब उपद्रव जिनके कारण हैं, वे भी तो ऊब गये। माँ! इस दृश्यविषूचिकाका एक-एक कण भी तो भीषण अनर्थकारी होता है। जड़भरतने अखण्ड भूमण्डलका राज्य छोड़ा, प्रिय पत्नी, पुत्र, पौत्र, स्निग्ध दुहिताओंको भी छोड़ा, उन्हें क्या मृगीसुतमें इतना स्नेह होना चाहिये था? माँ! क्या जड़भरत विवेक-विज्ञानकी बातें नहीं जानते थे? ओह! कितना भयंकर व्यामोह, कितनी विधिविडम्बना है? कितने ही स्नेही प्रज्ञाका पाठ पढ़ाते हैं और इस स्थितिपर तरस खाते हैं, पर क्या माँ! आप संसारसे भी अधिक निष्ठुर हो, जो संसार-जितनी भी दया नहीं दिखलाती हो? क्या आपकी दया संसार-जैसी निष्फल होती है?' 'हे माँ! त्वचा-मांस-रक्तादिसमूह ही तो स्त्री- पुरुषप्रपंच है। भूषण, विलेपन, अंगराग आदिसे जिन अंगोंका लालन किया गया था, उन्हींको श्मशानोंमें श्व-शृगालादि इतस्ततः कर्षण कर रहे हैं। मेरुशृंग- ततोल्लासि गंगाजलधाराके तुल्य जिन प्रमदास्तनोंपर मुक्ताहार सुशोभित होते थे, आज उन्हीं स्तनोंको ओदनके लघुपिण्डके समान श्वान आकर्षण कर रहे हैं। पूर्णेन्दुबिम्बवदना, पुष्पाभिराममधुरा सब कुछ मल, मांस, रक्त आदिका ही परिणाम तो है। उन्हीं रक्त, मांस, केश आदिकी श्मशानमें कितनी भीषण दुर्गति होती है। माँ! क्या आपका चरण-चिन्तन करनेपर भी अविवेक, अज्ञान, अशान्तिका रहना उचित है। माँ! अशरणशरण आपके चरण हैं। माँ! अकारणकरुणा आपका हृदय है। हे करुणा-वरुणालये! क्या यह सब कुछ मेरे लिये व्यर्थ ही है? क्या किसीका वर-शाप आपकी दयासे भी अधिक प्रभावशाली है? माँ! तत्त्वज्ञ लोग तो सदासे ही सावधान करते आये हैं कि सन्ध्याके समान क्षणमात्र रागवती ही स्त्रियाँ होती हैं। नदीके समान ही इनका आशय कुटिल होता है। भुजंगीके समान ही ये अविश्वास्य होती हैं। विद्युत्के समान इनकी चपलता प्रसिद्ध है। इनका वचन अमृतमय, किंतु हृदय तो क्षुरधाराके तुल्य तीक्ष्ण होता है'— सन्ध्यावत्क्षणरागिण्यो नदीवत् कुटिलाशयाः। भुजङ्गीवदविश्वाश्या विद्युद्वच्चपलाः स्त्रियः ॥ वचोऽमृतमयं यासां कामिनां रसवर्धनम्। हृदयं क्षुरधाराभं प्रियः को नाम योषिताम् ॥