भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृपादृष्टि हुई और जो आपकी ओर चल पड़ा, उसके लिये कितना सुखद आपका मार्ग है, परंतु विषम मार्गमें चलनेसे मृगमरीचिकाके समान लोभ, मोह एवं दुःख, तापका अन्त होता ही नहीं। ये विषय मोहक, भीषण विषाग्नि ज्वालाके समान हैं। बिना आपके अंकमें पहुँचे प्राणीको शान्ति होती ही नहीं। हे माँ! परंतु इसमें दोष किसका ? प्राणीके अपने ही पापोंका तो यह फल है। फिर दूसरोंपर क्षोभ क्यों ? जबतक शुभकर्म हैं, आपकी अनुकूलता है, तबतक सभी साथी हैं, सुखसाधन हैं। वही माता, भ्राता, कान्ता, पति, जो बड़े ही अनुरागी और प्रेमवश प्राण देनेवाले होते हैं, वही कभी अपरक्त विरक्त प्रतीत होने लगते हैं। पर यह अपने ही भाग्यका दोष है, उनपर कुपित होना व्यर्थ ही तो है। माँ! अपार संसारसमुद्रसे पार करना, अपार शोकसागरसे प्राणीका उद्धार करना आपके लिये क्या कठिन है ? माँ! यह तो तुम्हारा खेल होगा। परंतु मादृश पशुओंका इससे परम कल्याण होगा। माँ! गजेन्द्रकी पुकार सुनकर, द्रौपदीका करुणक्रन्दन सुनकर आपने ही तो विष्णुरूपसे दौड़कर उनका उद्धार किया है। माँ! वस्तुस्थिति तो यह है कि वे लोग महासत्त्व और महापुरुष थे, उनके विवेक, विज्ञान एवं धैर्यकी मात्रा अधिक ही थी, साथ ही उनमें सहनशक्ति भी अधिक रही होगी और आपके चरणोंमें प्रीति भी सुतरां उनकी अधिक थी। अपनी शक्तिके बलसे वे आपको खींच सकते थे। किंतु माँ! मुझ दीनकी ओर दृष्टि देकर देखेंगी तो बहुत ही अन्तर प्रतीत होगा। माँ! अल्पसत्त्व, अल्पधैर्य, अल्पभक्ति, अल्पशक्ति मुझ दीनकी तो माँ! एकमात्र आप ही सहारा हैं।' 'माँ! कभी-कभी आपकी मायासे अविश्वास, अनास्था एवं अश्रद्धाका भी तो उपद्रव चलता ही रहता है। हे माँ! हे माहेश्वरी! हे दयार्णवरूपे! मेरा तो आपके दयाकणसे ही उद्धार हो सकता है, फिर मेरी बार ही यह अनुदारता क्यों ? माँ! दुर्भाग्य एवं अविवेक, विमोह एवं रागकी स्थितिमें प्रकृतिके कण-कण उद्वेजक होते हैं। कभी-कभी दूसरोंके अनुकूल भाव भी भ्रान्तिसे प्रतिकूल ही प्रतीत होते हैं। शत्रुको मित्र, मित्रको शत्रु, रक्तको विरक्त और विरक्तको रक्त समझनेकी भी भूल होती है। परिस्थितियाँ भी सबकी पृथक् होती हैं। किंतु माँ! जब हम अपना ही मन अपने वशमें नहीं कर पाते तो दूसरोंके मनपर हमारा अधिकार हो जाय, यह आशा कितनी भीषण दुराशा है।' सांसारिक मोह-ममताका परिणाम 'पुत्र, मित्र, कलत्र, बन्धु, बान्धव किसीका भी अपराग हमें खलता है और बेहद खलता है। जिन पुत्रों, मित्रोंके लिये, जिन पत्नियों, प्रेयसियोंके लिये न जाने क्या-क्या करना और कितना-कितना कष्ट भोगना पड़ा, उनका अपराग देखकर हृदय कितना विदीर्ण होता है। वे झूठे प्रेमके नाटक, वह झूठी आँसुओंकी झड़ी, वह रहस्यपूर्ण सस्नेह मधुर वचन- विन्यास, वह मधुर मुद्राएँ, स्वात्मसमर्पणकी वह मधुर चेष्टाएँ और मधुर मिलन कितने भीषण सिद्ध होते हैं। माँ! यह कैसी विडम्बना है ? अहो! महापुरुष भर्तृहरिकी कितनी सुन्दर अनुभूति है। हाय! जिसका मैं इष्टदेवताकी तरह निरन्तर चिन्तन करता रहता हूँ, वह मुझसे विरक्त है, मुझे नहीं चाहती, वह किसी औरसे प्रेम करती है और कैसी विधिकी विडम्बना है कि वह उसका प्रेमास्पद भी तो किसी औरसे ही प्रेम करता है, प्रेम करनेवालीको नहीं चाहता। किंतु जिसे वह चाहता है, वह उसकी प्रेयसी उससे प्रेम न कर मुझे चाहती है। अहो! उस मेरी प्रियाको धिक्कार है और उस पुरुष तथा उसकी प्रेयसी एवं इस मदन तथा मुझे भी धिक्कार है'— यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः। अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥ 'हे दयामयि! तृष्णाविषविषूचिका अभी कितना परेशान करेगी ? माँ! मेरे पास इसकी कोई भी सफल औषध नहीं दिखती। यह विलाप, यह करुणक्रन्दन,