भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 545

माँके श्रीचरणोंमें ५३५ बिना सभी प्रयत्न व्यर्थ होते हैं। माँ! कुछ भी हो, मेरी तो एकमात्र आशा आप ही हैं। माँ! यदि आपने जरा-सी भी उपेक्षा की तो फिर मैं कहींका न रहूँगा।' 'यह शरीर ही रथ है, बुद्धि ही सारथि है, इन्द्रियाँ ही घोड़े हैं। जो बुद्धिके द्वारा इन्द्रियोंको नियन्त्रित करके संसारचक्रमें भ्रमण करता है, वह मोहित नहीं होता। संसारमें राज्यका छिन जाना, पुत्रका नाश, प्रिय पत्नीका नष्ट हो जाना, सुहृदोंका नष्ट होना आदि भीषण दुःख होते हैं। इन दुःखोंका भेषज ज्ञान ही है। विक्रम, धन, मित्र, सुहृदोंसे इस सम्बन्धमें कोई लाभ नहीं होता। किंतु ज्ञान, दम, त्याग एवं अप्रमादसे युक्त होकर सर्वप्राणियोंको अभय देकर जो पद प्राप्त किया जा सकता है, वह सहस्रों ऋतुओं एवं उपवासोंसे भी प्राप्त नहीं होता।' 'पुत्र, मित्र, वित्त, कलत्र, किसीके भी विप्रयोगमें जो वेदना होती है, उसे कोई अनुभवी ही समझता है। तज्जन्य शोकसे प्रत्येक गात्र तथा रोम-रोममें दाह उत्पन्न होता है। प्रज्ञा भी अभिभूत हो जाती है।' 'पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥' (रा०च०मा० २।६४।७) 'प्राप्यते सुमहद्दुःखं विषाग्निप्रतिमं विभो।' विष एवं अग्निके तुल्य प्रियवियोगदुःख अतिभीषण होता है। इससे तप्त प्राणी मरणको ही श्रेष्ठ समझता है— तदिदं व्यसनं प्राप्तं मया भाग्यविपर्ययात्। तस्यान्तं नाधिगच्छामि ऋते प्राणविमोक्षणात् ॥ अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो भवेद्यदि। तदा दुःखैर्न लिप्येरन् नलरामयुधिष्ठिराः ॥ (पञ्चदशी ७।१५६) 'भाविका भाव होकर ही रहता है। यदि उसका भी प्रतिकार हो सकता तो फिर नल, राम एवं युधिष्ठिरको सन्तप्त न होना पड़ता। इसीलिये महापुरुषोंने कहा है'— यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा। इति चिन्ताविषघ्नोऽयं बोधो भ्रमनिवर्तकः॥ (पञ्चदशी ७।१६८) 'जो नहीं होनेवाला है, वह नहीं होगा। जो होनेवाला है, वह होकर ही रहेगा, यही विचार चिन्ताविषका औषध है। फिर जो हमारी वस्तु है, वह दूसरेको नहीं ही मिलेगी'— 'यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम्॥' 'फिर भी हे विश्वप्रसवित्री ! हे सकरुणे ! हे दीनरक्षामणे ! बिना तुम्हारी कृपादृष्टिकी वृष्टि हुए सब उपाय, सब साधन व्यर्थ हैं। माता-पिता बालकके रक्षक होते हैं, परंतु अम्ब ! तुम्हारी कृपाके बिना वे भी रक्षक नहीं हो सकते, उनके प्रयत्नशील रहनेपर भी बालककी मृत्यु हो ही जाती है। आर्त प्राणीको बचानेवाली औषध भी आर्तको नहीं बचा सकती; क्योंकि औषध-सेवन करते हुए भी प्राणीको मरना ही पड़ता है। समुद्रमें डूबते हुएको जलयान बचाता है, परंतु आपके कृपाकटाक्षके बिना हे माँ ! जहाज भी डूब ही जाता है। माँ ! तुम्हारी कृपासे ही सौभाग्यशालियोंको दिव्य वैराग्य प्राप्त होता है, जिसके कारण बड़े-बड़े सम्राट् विविध ऐश्वर्यों, भोगसामग्रियोंका अनायास ही त्याग कर देते हैं। नहुष, गय, ययाति आदि सुदुर्लभ भोगोंको छोड़कर अरण्यमें चले गये थे। माँ ! आपकी कृपाकोरसे ही ऋषियोंने निश्चय किया था कि 'न सुखाल्लभते सुखम्।' सुखसे सुख नहीं मिलता। विशेषकर ब्राह्मणका देह क्षुद्र कामके लिये नहीं, अपितु घोर तपस्या और कष्टसहनके लिये ही होता है'— ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते। कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च॥ (श्रीमद्भा० ११।१७।४२) 'जगदम्ब ! आपकी कृपासे ही वीतराग विश्ववन्द्य महानुभाव परमसुन्दरियों, प्राणवल्लभाओंके मोहजालसे मुक्त हो सके थे। माँ ! यद्यपि आपके चरणोंकी ओर चलना बड़ा कठिन मालूम पड़ता है, बड़ा ही ऊबड़- खाबड़, गहन वन, पर्वत-सा मार्ग आपकी प्राप्तिका मार्ग है और विषयों का मार्ग बड़ा ही रोचक एवं सुखकर प्रतीत होता है; परंतु जिसपर आपकी