भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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होता, उस हालतमें भी वह जीवित रहनेकी इच्छा करता है। वहीं श्वेत-कृष्ण मूषक उन वल्लियोंको काट रहे हैं। ऊपर भीषण विषधर साँपोंसे घिरे घोर कान्तारमें महोग्रडाकिनीरूपा स्त्रीका जाल फैला है। कूपके ऊपर भीषण गज है। कूपके भीतर नाग है। वल्ली कटते ही कूप-पतनका भय भी सामने है। भीषण भ्रमरोंका भी डर है ही। फिर मधुलोभमें उस ब्राह्मणकी तरह अन्य प्राणी सब भूलकर जीवित रहना चाहता है।' कातर प्रार्थना 'माँ! यह महासंसार ही तो वह कान्तार है। क्या यह कम दुर्गम है ? माँ ! यह कितना भीषण है ! माँ ! तुम्हारे अभयहस्तका सहारा न हो, तुम्हारे अंक (गोद)-का सुख न हो, तुम्हारी नखमणिचन्द्रिकाकी शीतलता न हो, तो इससे किसकी मुक्ति हो सकती है ? माँ ! यह विविध व्याधियाँ ही तो भीषण व्याल हैं। माँ! ये तो व्यालोंसे भी कहीं अधिक भीषण हैं। एक ही व्याधि प्राणीको जर्जर कर देती है; दद्रु, खर्जु, ज्वर, अतिसार, कुष्ठ, प्लेग, विषूचिका, क्षय, शिरःशूल, उदरशूल आदि अगणित व्याधियाँ शरीरको जर्जर कर देती हैं। वह सौन्दर्य कहाँ चला जाता है? देहकी कान्ति समाप्त हो जाती है, बाल पक जाते हैं, मुख दन्तविहीन हो जाता है, रमणीयता समाप्त हो जाती है। अब भूषण, अलंकार, अंगरागादि बाह्य कृत्रिम साधनोंसे उसकी सुन्दरता बढ़ाना कितनी विडम्बना है! वृद्धावस्था तो वह भीषण नारी है। सुन्दरी-से- सुन्दरी स्त्री तथा सुन्दर-से-सुन्दर पुरुषको भी विरूप कर देना इसका खेल है। हे माँ! फिर भी स्त्री आदिके मायामय देहोंमें क्यों व्यामोह होता है ? रूप और वर्णका विनाश करना जराका प्रमुख कार्य है। माँ! कितना भीषण व्यामोह है ! प्राणी आधि-व्याधि, जरा, रोगादिसे पीड़ित, त्रस्त तथा विरूप हो रहे हैं। जिसपर मोहित होता है, वह भी आधि-व्याधिग्रस्त, मृत्युमुखपतनोन्मुख ही है। कोई किसीको विपत्तिसे बचा नहीं सकता। फिर भी व्यामोह, रति, रागका उपद्रव ? आश्चर्य है। आचार्यने क्या ही सुन्दर कहा है'— 'अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम्।' 'अहो! ये आधियाँ (मानसी पीड़ाएँ) तो व्याधियोंसे भी भीषण हैं, इनके तापसे तो माँ ! सिवा तुम्हारे अंकके कहीं भी निवृत्ति हो ही नहीं सकती। हे माँ! हे जननि ! हे कल्याणमयि ! हे सकरुणे ! क्या तू अपनी विपन्न सन्तानोंकी उपेक्षा कर सकती है? नहीं, माँ! यह तो सब अपराध मादृश मूढ़ोंका ही है।' 'कान्त-कान्ताकी विरह-वेदना कितना भीषण ताप है। क्या इसका पारावार है? क्या इसीसे इन्दुमतीके विरहमें रघुका करुण अवसान नहीं हो गया? क्या पुरूरवाका उन्माद और पागलपन इसी विरहव्यथाका, प्रिय वियोगका ही परिणाम नहीं था ? क्या नरनाट्यमें प्रभु रामने भी माँ ! आपकी विरहवेदनाका लोहा नहीं माना ? माँ ! प्रेममतवाली गोपांगनाओं, प्रभु कृष्ण तथा रासेश्वरी राधा-रानीने भी विरहव्यथाका कितना भीषण अनुभव किया था। माँ ! वास्तविक प्रेम और वासनाका भेद सहसा किसकी समझमें आ सकता है? फिर भी आखिर यह मानसिक व्यथा, आन्तरिक आधि क्या एक ही प्राणीके जीवनका अन्त नहीं कर सकती ? इन विषयोंमें क्या बिना आपकी कृपाके कोई विवेक कारगर होता है ? माँ ! यह शरीर ही तो वह अन्धकूप है, उसीमें तो कालरूपी सर्प भी रहता है, जो प्राणियोंका अन्त करता है। शरीरमें जीवनकी जो आशा है, वही तो वल्ली है। शरीररूप कूपके ऊपर जो छः मुँह, बारह पैरोंका भीषण गज है, वह यही संवत्सरात्मा काल है। छः ऋतुएँ ही उसके मुख हैं, बारह मास ही उसके पैर हैं, शुक्ल- कृष्ण पक्ष ही उसके श्वेत-कृष्ण वर्ण हैं। दिन-रात ही तो इस जीविताशा आयुरूपी वल्लीको प्रतिक्षण काटनेवाले मूषक हैं। माँ ! विविध काम ही तो भीषण भ्रमर हैं। विविध कामरस ही वह मधुधाराएँ हैं, जिनमें प्राणी मोहित हो रहा है। माँ! आपकी कृपासे ही इस संसारसिन्धुको पार किया जा सकता है, उसके