भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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गृह ही है। जैसे कोई मृण्मयभाण्ड कुलालके चक्रपर ही नष्ट हो जाता है, तो कोई कुछ बनकर नष्ट होता है, कोई बनकर एवं उपयुक्त होकर नष्ट होता है, वैसे ही जीर्ण, अजीर्ण, शिशु, युवक सबको ही मृत्युके मुखमें जाना पड़ता है। जो केवल मधु देखता है, प्रताप नहीं देखता, वह लोभके वश भ्रष्ट होकर शोकको ही प्राप्त होता है'— मधु यः केवलं दृष्ट्वा प्रतापं नैव पश्यति। स भ्रष्टो मधुलोभेन शोचत्येवं यथा ह्यहम्॥ 'जैसे कोई प्राणी क्रीड़ाके लिये जलमें प्रवेश करके कभी डुबकी लेता है, कभी उतराता है, वैसे ही बुद्धिमान् संसारगहनमें उन्मज्जन-निमज्जन करता हुआ भी घबराता नहीं, अपितु अबुद्धि प्राणी इस डूबने-उतरानेमें व्याकुल हो जाता है। हे माँ! जन्मसे लेकर ही मांसशोणितयुक्त, अमेध्य स्थानमें ऊर्ध्वपाद, अवाक्शिरा होकर रहना पड़ा है, योनिद्वारके भी नाना कष्ट सहने पड़े हैं, एक उपद्रव समाप्त भी नहीं हो पाया कि दूसरे उपद्रव सिरपर आ खड़े हुए हैं। जैसे आमिषके पीछे श्वान दौड़ते हैं, वैसे ही अधिकांश आधियाँ एवं व्याधियाँ मुझ-जैसे प्राणियोंके पीछे ही रहती हैं। इन्द्रियपाशोंसे बद्ध, विविध आसक्तियोंसे घिरा हुआ प्राणी विविध व्यसनोंका शिकार बनता है। उन्हीं व्यसनोंसे पीड़ित होता, उन्हींमें अतृप्त होकर फँसा रहता है। व्यामोहवश साधु-असाधु कर्मोंको करता हुआ अनिवार्य रूपसे प्राणी तत्फलका भागी होता है। यमदूतों और कालसे आकृष्ट होता हुआ विविध विपत्तियोंका भोजन बनता है। अहो! लोभसे वंचित होकर प्राणी कितने अपमानों, दुःखों और विडम्बनाओंमें फँसता है और अपने-आपको समझनेमें असमर्थ ही रहता है। दूसरोंको मूर्ख कहता हुआ भी अपनी मूर्खताकी ओर ध्यान नहीं देता। हे अपराजिते! हे अमिते! अनुपमचरिते माँ! क्या कभी भी प्राणी बिना तुम्हारी कृपासे इस व्यामोहसे, इस मायासे मुक्त हो सकता है? ठीक ही कहा है कि जिसपर आप कृपा करती हैं, वही दुस्तर देवमायाको पार कर सकता है, तभी श्वशृगालभक्ष्य शरीरसे ममाहंबुद्धि हट सकती है। पर इसके लिये निर्व्यलीक, निष्कपट, अकैतवरूपसे आपकी शरणागति अपेक्षित है'— येषां स एव भगवान् दययेदनन्तः सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्। ते दुस्तरामतितरन्ति च देवमायां नैषां ममाहमिति धीः श्वशृगालभक्ष्ये॥ 'माँ! कितना भीषण संसार है! आपने शास्त्रोंमें तो बतला रखा है कि कोई ब्राह्मण हिंस्र-व्याघ्रसंकुल गहन कान्तारमें पहुँच गया। सिंह, व्याघ्र, गज एवं भल्लूकोंके कर्कश घोर नादों एवं भीषण आकृतियोंसे घिर गया। उस भीषण स्थितिको देखकर साक्षात् यमको भी त्रास हो सकता है। ब्राह्मणका हृदय उद्विग्न हो गया, देहमें रोमांच हो गया। वह घोर गहन वनमें दशों दिशाओंमें शरण ढूँढ़ता हुआ भटकता है। भागनेका प्रयत्न करता है, पर भाग भी नहीं सकता। अकस्मात् अन्य भयंकर वनमें पहुँचकर देखता है कि एक भीषण स्त्रीने चारों तरफ जाल फैला रखा है। पाँच-पाँच फणोंवाले अगणित नाग और भीषण वृक्षोंसे भी वह वन घिरा है। उसी वनमें एक कूप था, जो विविध दृढ़ वल्लियोंसे ढँका हुआ था। ब्राह्मण उसी अन्धकूपमें गिर गया और तृणाच्छन्न वल्लियोंपर बृहत् पनस (कटहल) फलके तुल्य लटक गया। सिर नीचेको था, पैर ऊपरको। नीचे कूपमें देखता है कि एक भीषण महानाग है। छः मुख, बारह पैरोंवाला तथा शुक्ल-कृष्ण वर्णका एक महागज कूपके बाहर था। वहाँ वल्लियाँ भी खूब फैली हैं। नानारूपधर घोर मधुकरोंने ऊपर मधुके छत्तेको घेर रखा है, उसमेंसे ही कुछ-कुछ मधु कभी-कभी टपकता है। बालप्राय मूढ़ प्राणी उस मधुसे आकृष्ट होकर उसी मधुधाराको वल्लियोंमें लटका हुआ पान करता है, फिर भी उसकी प्यास बुझती नहीं, नित्य अतृप्त होकर उसी वस्तुकी लालसामें परेशान रहता है। उसी लोभसे वह ब्राह्मण अपनी भीषण दशाको भूल जाता है और उस दुर्दशापूर्ण जीवनसे भी उसे वैराग्य नहीं

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